लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा.

अखबारों की अपनी सीमाएं हैं. एक तरफ अत्यधिक तेज़ी से बदलते घटनाक्रम और दूसरी तरफ अगले ही दिन अखबार के छप पाने की मजबूरी! पता चला आपने किसी घटनाक्रम पर कोई प्रतिक्रिया लिखी और अखबार प्रकाशित होते तक उस पूरे खबर का सन्दर्भ ही बदल गया. तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए भले ही यह संभव हो कि गिरगिट की तरह रंग बदलते घटनाक्रम पर उससे भी तेज़ी से ‘स्याह’ को ‘सफ़ेद’ या उसका उल्टा कर दे लेकिन मुद्रित माध्यमों के साथ यह सुविधा नहीं है. झारखण्ड के वर्तमान घटनाक्रम और उस पर तेज़ी से बदलते नेताओं के रुख के बरक्श उपरोक्त चीज़ों को समझा जा सकता है. भाजपा की तरफ से अनंत कुमार ने शिबू सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा की, अखबारों ने उसको आधार बना अपनी प्रतिक्रया भी दी, लेकिन जब-तक आप उस पर आधारित खबर पढ़ें तब-तक पता चला कि अब पुनः मुख्यमंत्री बदल इसी गठबंधन को कायम रखने की संभावनाओं पर विचार शुरू हो गया है. शिबू की तरफ से हेमंत सोरेन ने माफी मांगी और अभी दिल्ली में भाजपा संसदीय दल की बैठक हो रही है जिसमे आगे के विकल्पों पर विचार किया जाएगा. तो अखबार के संपादकों, लेखकों, स्तंभकारों की सबसे बडी चुनौती यही है कि कैसे वह इतने तेज़ी से बदलते घटनाक्रम के साथ कदम-ताल कर सके. खैर.

लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती ‘लोकतंत्र’ पर बार-बार सामने आ रही है. ऐसे ही मामलों से खीझ कर कभी लोहिया ने कहा होगा कि ज़िंदा कौमे पांच साल इंतज़ार नहीं कर सकती. एक बार आपने मतदान कर जनादेश दिया. बस उसके बाद उस परिणाम से प्राप्त ‘गणित’ की तिजारत करने राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से जुट जाते हैं. प्रदेश और देश के अस्थिरता की कीमत पर भी अपना गुना-भाग करने से इन्हें परहेज़ नहीं. कौन किसका कब और कैसे विरोधी और समर्थक हो जाए. सत्ता के लिए कहाँ कौन किसको अपना या पराया बना लेगा, आकलन करना मुश्किल है. जनता तो बस ठगी सी रह इतना ही सोचने पर मजबूर हो जाया करती है कि ‘किसको कातिल मै कहूँ, किसको मसीहा समझूं.’

कम से कम इस मामले में शीबू सोरेन के एक वोट से कुछ भी होना-जाना नहीं था. एक प्रतीकात्मक महत्व, बुरे वक्त के लिए कांग्रेस के भी खैख्वाह बने रहने का सन्देश देने के अलावा इस घटनाक्रम को कोई और मतलब भी नहीं था. लेकिन जैसा की हेमंत सोरेन द्वारा सफाई दी गयी, कम से कम सोरेन ने ‘गलती’ से वोट डाल देने का कृत्य किया होगा इस पर भाजपा और जन-सामान्य को कभी भरोसा नहीं करना चाहिए. आखिरकार झामुमो से ज्यादा वोट की ‘कीमत’ किसको मालूम होगी जिसने नरसिम्हा राव की सरकार को बचाने के अपने योगदान की कीमत वसूल सांसदों का भाव ही बढ़ा दिया था. अभी तो वैसे भी निवर्तमान मुख्यमंत्री के पास विकल्प की कमी थी. वैसे भी अपने लिए एक विधान सभा क्षेत्र नहीं ढूंढ पाने के कारण, एक बार मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपने ही ‘घर’ से उपचुनाव हार जाने का शानदार रेकोर्ड बनाने के कारण उन्हें ‘छांछ’ भी फूक-फूक कर पीना ही था. अंगुली कटा कर शहीद कहलाने की कोशिश का तो इनका शानदार रेकोर्ड भी रहा है. साथ ही मुख्यमंत्री रहते हुए संसद में वोट डालने का भी यह पहला मामला तो था नहीं. याद कीजिये जब अटल जी की सरकार कसौटी पर थी. जब एक-एक वोट मूल्यवान था उस अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के समय ओडिशा के मुख्यमंत्री गिरिधर गोमांग ने तो सांसद के रूप में वोट डाल भारतीय राजनीति का परिदृश्य ही बदल दिया था. तब के लोकसभाध्यक्ष (अब स्व.) जी. एम. सी. बालयोगी द्वारा अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट डालने की अपील को भी नज़र-अंदाज़ करते हुए ‘देश’ से ज्यादा अपनी पार्टी के नमक का हक अदा कर गोमांग ने एक और गलत परंपरा की नीव तो डाल ही दी थी. और अंतरात्मा की आवाज़ तो शायद बालयोगी के हेलिकाप्टर के साथ ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. विडंबना यह कि इस तरह की हर विसंगतियों का खामियाजा अंततः भाजपा को ही जाने-अनजाने भुगतना पड़ा है. उस समय केंद्र का सिंहासन खाली करना पड़ा तो अब इसके बहाने झारखण्ड से हाथ धोने की नौबत.

फिलहाल के विकल्पों की चर्चा की जाय तो हो सकता है बीजेपी को मुख्यमंत्री पद दे कर इस गठबंधन रूपी हादसे को चलते रहने दिया जाय. जिस गठबंधन की राजनीति को कभी अटल जी ने ‘धर्म’ की संज्ञा दी थी वह अब ऐसे ही अवसरवाद का पर्याय ही तो हो कर रहने दिया जाय. या फिर कांग्रेस झामुमो गठबंधन चले, ‘गुरूजी’ केंद्र को अपनी सेवाएं देने प्रस्थान कर जाय या फिर बाबू लाल मरांडी के नेतृत्व में नयी सरकार के गठन की संभावना तलाशा जाएगा. या अंततः फिर जैसा कि वाहन के विपक्ष के नेता ने कहा चुनाव ही करबा लिए जाय. अगर अभी चुनाव भी होते हो तो बीजेपी समेत किसी भी दल के लिए जनता का सामना करना आसान नहीं होगा…बहरहाल.

जब तक लोकतंत्र बचा है तो कोई ना कोई मुख्यमंत्री होगा ही. या पिछले दरवाज़े से केंद्र के शासन का भी विकल्प है. तो सदा की तरह विकल्पहीनता की मजबूरी केवल और केवल मतदाता के पास है. जब तीन प्रदेशों के साथ झारखण्ड का गठन हुआ था उस समय इस आदिवासी प्रदेश की भी आकांक्षा परवान चड़ने लगी थी. अपने बड़े भाई ‘बिहार’ को चिद्धाते हुए वहाँ के लोग गाना गाते थे..राबड़ी-मलाई खैलह, खैलह कलाकंद, आब खैहह शकरकंद अलग भेलह झारखण्ड. अफ़सोस बस इस बात का है कि साथ ही अस्तित्व में आये छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश जब चुनौतियों के बावजूद अपने स्थायित्व के कारण अपने होने का मतलब साबित कर रहा है, वही झारखण्ड के आदिवासीजन के लिए शकर-कंद के अलावा औउर कुछ खा सकने का विकल्प नेताओं ने छोड़ा नहीं है. हालाकि हर बार त्रिशंकु जनादेश देने का जिम्मेदार तो वहां की जनता भी है ही.

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3 Comments on "किसको कातिल मैं कहूं किसको मसीहा समझूं"

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G.M.Shareef
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मैं किस के हाथ में अपना लहू तलाश करूँ,
तमाम शहर नें पहन रखे हैं दस्तानें ????

RAJ SINH
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हम जिंदा कौम हैं ? या थे ? हम तो ६० साल से भी ज्यादा इंतज़ार कर रहे हैं. शवासन में .

RAVI TEMBHARE
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jha ji ! i am totally satisfied from ur view. today major partplayer is electronic media but main thing is TRP. i think they left their subject a mile before. but till now PEN is with u. JAI HIND ! JAI CHATTISGHAR.

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