लेखक परिचय

बी.आर.कौंडल

बी.आर.कौंडल

प्रशासनिकअधिकारी (से.नि.) (निःशुल्क क़ानूनी सलाहकार) कार्यलय: श्री राज माधव राव भवन, ज़िला न्यायालय परिसर के नजदीक, मंडी, ज़िला मंडी (हि.प्र.)

Posted On by &filed under खेत-खलिहान, जन-जागरण, विविधा.


farmer-suicide01राजनितिक दल चाहे कितनी हमदर्दी किसानों के प्रति दिखाएँ लेकिन हकीकत यही है कि किसानों के हितों की सभी सरकारों ने अनदेखी की है | भारत जैसे देश जहाँ पर 70 प्रतिशत लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कृषि व्यवसाय से जुड़े हैं, में किसानों की बदहाली भविष्य के लिए भारी आक्रोश का संकेत देता है | आज तक जिन राजनितिक दलों ने अन्नदाताओं की अनदेखी की है, वे ही उनके भगवान बनने की अथक कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके राजनितिक मनसूबे पूरे हो सके |

भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी की जंतर-मंतर पर आयोजित रैल्ली के दौरान एक किसान द्वारा आत्महत्या किया जाना अत्यंत दुखद है | परन्तु जिस प्रकार सभी राजनितिक पार्टियां इस मुद्दे पर अपनी-अपनी रोटियाँ सेकने में जुटी है वह इससे भी ज्यादा शर्मनाक व निंदनीय है | आत्महत्या का कारण चाहे जो भी हो लेकिन यह तो सर्वविदित है कि देश भर में किसान अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है | लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशों में अपनी वाहवाही लुटते जा रहे हैं | यदि घर में शान्ति नही तो बाहर के रिश्ते किस काम के | भले ही प्रधानमंत्री से लेकर कांग्रेस उपाध्यक्ष मुसीबत की इस घड़ी में किसानों के साथ खड़े होने की बात कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि दोनों राजनितिक दलों ने किसानों की अनदेखी की है | यदि ऐसा न होता तो आज भारत के किसान अन्य देशों के किसानों के मुकाबले इतना कमजोर नही होता |

साल 2010 में जब खेती योग्य जमीने कौड़ियों के भाव अधिग्रहित की जाने लगी तो किसानों ने “किसान संघर्ष समिति” बना कर तीव्र विरोध किया | जिस कारण सरकार को नया भूमि अधिग्रहण कानून पारित करना पड़ा | हालाँकि यह कानून भी पूरी तरह किसानों के हित में नही था, लेकिन दो बातें बुनियादी तौर पर पहले के कानून से भिन्न थी | पहली यह कि जमीन अधिग्रहण के लिए सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए 70 और निजी परियोजनाओं के लिए 80 प्रतिशत किसानों की सहमति जरूरी की गई थी और दूसरी यह कि अधिग्रहण से होने वाले पर्यावरणीय या सामाजिक प्रभाव को नज़रअंदाज नही किया जाएगा | इसके अलावा, इसमें बहुफसली जमीनों के न्यूनतम अधिग्रहण की भी बात कही गयी थी | लेकिन आश्चर्य की बात है कि ऐसे दूरगामी कानून को एक वर्ष के अंदर ही मोदी सरकार ने बदल दिया | सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को सस्ते मूल्य पर आवास उपलब्ध करवाए जायेंगे और उनका विकास होगा, लेकिन यहाँ पूछा जाना चाहिए कि क्या यह कानून किसानों की आत्महत्या रोकने में कारगर साबित होगा ?

यदि सरकार की मंशा साफ़ है, तो जमीन अधिग्रहण से होने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान को किसके हित में नज़रअंदाज किया जा रहा है | अभी हाल ही में झारखंड के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री ने आदिवासियों की जमीनें अधिग्रहित न करने की जो बातें की थी, उसका क्या होगा ? देश में बंद पड़े तमाम कारखानों के नाम करोड़ों एकड़ जमीन बेकार पड़ी है, सबसे पहले तो उन्ही का उपयोग किया जाना चाहिए | देखा जाए, तो नये कानून के दूरगामी और किसानों पर विनाशकारी प्रभाव होंगे | यह सिर्फ किसानों के खिलाफ ही नही है, बल्कि इससे राष्ट्रीय खाद्द्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा पैदा होगा | यह कानून किसानों को मजदूर बनने पर मजबूर करेगा | जाहिर है, इसका भी लाभ कॉर्पोरेट जगत को ही होगा | सरकार को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा किसानों को तबाह कर “मेक इन इंडिया” का नारा साकार नही हो पाएगा |

एक तरफ राजनितिक अनदेखी और दूसरी तरफ बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि का सीधा सम्बंध भले ही जलवायु परिवर्तन से हो, लेकिन इसके कारण किसानों की जो दुर्दशा हो रही है उसका सम्बंध अदूरदर्शी आर्थिक नीतियों से है | किसानों को समय पर बीज व खाद न मिलना, फसल पकने पर उसकी खरीद व भंडारण का सही प्रबंध न करना तथा किसानों को साहूकारों के चुंगल से न निकाल पाना सरकार की विफलता रही है | जिसके कारण आज सैंकड़ों किसान मौत के ग्रास बन चुके हैं तथा हजारों परिवार बदहाली की जिन्दगी बिताने पर मजबूर हैं |

पिछले दिनों किसानों के पास खेती के अलावा पशु-पालन का व्यवसाय भी हुआ करता था क्योंकि पशुधन से जहाँ उन्हें दूध, घी व गोबर की खाद मिलती थी वहीं अब रासायनिक खादों का प्रचलन होने से किसानों ने पशु-पालन को नज़रअंदाज कर दिया है क्योंकि दूध की बिक्री पर भी सरकार कोई ठोस नीति नही बना पायी है | अत: किसानों की रीढ़ की हड्डी, पशु-पालन व्यवसाय आज जर-जर हालत में पहुंच चुका है जिस कारण खेती के बर्बाद होने की सुरत में उनके पास दूसरा कोई विकल्प अपनी आर्थिक स्थिति को संभालने का नही रहा है | यही कारण है कि जब कृषि पर कोई विपति आती है तथा फ़सलें बर्बाद हो जाती है तो किसानों के आगे मौत के सिवा कोई दूसरा विकल्प नही दिख पाता क्योंकि एक तरफ परिवार को खाने के लिए उनके पास अनाज नही रहता और दूसरी तरफ साहूकार कर्ज़ा वापसी का दबाव बढ़ाने लगता है | अंततः वही होता है जो गजेन्द्र सिंह ने दिल्ली में किया |

सरकार ने उदारीकरण के दौर में कृषि व्यापार का उदारीकरण तो कर दिया, लेकिन भारतीय किसानों को वे सुविधाएँ नही मिली जिनके तहत वे विश्व बाज़ार में अपनी ऊपज बेच सके | दूसरी तरफ विदेशी कंपनियां भारत के विशाल बाज़ार पर कब्जा करने पर उतारू हैं | जहाँ किसानों को अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा से जूझना पड़ रहा है वहीं दूसरी तरफ ऊपज की कम कीमत मिलना उनके लिए घातक साबित हो रहा है | यही कारण है कि खेती पर निर्भर लोगों की आमदनी घटती जा रही है जिस कारण गाँव से शहरों की ओर लोगों का पलायन शुरू हो गया है जोकि शहरों के लिए भी घातक साबित होगा | भारत की राजधानी दिल्ली का उदाहरण इस सम्बंध में हमारे सामने है | साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर यदि नज़र डालें तो पिछले एक दशक में किसानों की कुल तादात में 90 लाख की कमी आई है अर्थात हर रोज 2460 किसान खेती छोड़ रहे है | अनाज का भंडार कहे जाने वाले पंजाब में हर साल 10,000 किसान खेती छोड़ रहे है | यदि यही सिलसिला जारी रहा तो वह दिन दूर नही जब भारतवर्ष के सामने एक बार फिर अनाज का संकट खड़ा हो जायेगा |

उचित यह होगा कि किसानों के बारे में यथाशीघ्र मुआवज़ा देने के साथ-साथ यह भी कोशिश की जाए कि उन्हें कर्ज़ के दुश्चक्र में न फंसना दिया जाए | खेती की दशा सुधारने के मामले में जो भी उपाय किये जाएँ वे यह सोच कर नही अपनाए जाने चाहिए कि इससे किसानों को मदद मिलेगी बल्कि यह मान कर किये जाएँ कि किसानों को दी जाने वाली मदद एक तरफ से देश को दी जाने वाली मदद है क्योंकि किसान इस देश की शान व अन्नदाता है |

कृषि-भूमि को विकास के नाम पर गैर-कृषि कार्यों के लिए उपयोग करने की तीव्र गति भी भविष्य में अनाज का घोर संकट पैदा कर सकती है | हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उतर प्रदेश, पंजाब व हरियाणा जैसे प्रदेशों में कृषि-भूमि बड़ी तेज़ी से सिंकुड़ती जा रही है | ऊपर से केन्द्रीय सरकार का भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश इस समस्या को और विकट करने की ओर ईशारा कर रहा है | विडम्बना यह है कि इस विषय पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति दिख रही है | अत: राजनितिक दलों को गरीबों, बेरोजगारों और किसानों को महज़ एक वोट बैंक मानने की मानसिकता से मुक्त होने की जरूरत है तथा ऐसी आर्थिक नीतियाँ अपनाने की आवश्यकता है जिससे कृषि व्यवसाय जोकि भारत जैसे कृषि प्रधान देश की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है, को और सुदृढ़ किया जा सके |

Leave a Reply

3 Comments on "अन्नदाताओं की अनदेखी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
suresh karmarkar
Guest
मुझे समझ में नहीं आता की यह सरकार ”आ बैल मुझे मार ,नहीं मारता हो तो मार ”की नीति पर क्यों चल रही है. अभी राज्ज्य सभा में बहुमत नहीं है। भमि अधिग्रहण बिल के विरोध में विपक्ष लामबंद हो रहा है. एक बात समझ से परे है मोदी सरकार के पहिले जो विधयक अस्तित्व में था उसके बल पर रोबर्ट वड्रा, अडानी,अम्बानी ,टाटा ने क्या जमीने नहीं ली?आज हर जिला स्तर पर जो कई सौ हेक्टयर जमीने कारखानो के नाम पर खली पडी हैं ,वे किस विधेयक के बल और अधिग्रहित की गयी थी?उनके बदले कितना मुआवजा दिया गया… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

आ. कौंडल जी —
आप ने निम्न दो बिन्दू भी रखे हैं।

===>(१)”उचित यह होगा कि किसानों के बारे में यथाशीघ्र मुआवज़ा देने के साथ-साथ यह भी कोशिश की जाए –(२) कि उन्हें कर्ज़ के दुश्चक्र में न फंसना दिया जाए |”<===
——————————————————————————–
(१) ला भी आर्थिक समृद्धि तो नहीं ला पाएगा। क्या सदा के लिए मु
(२) और दूसरा कृषकों पर, ही निर्भर करता है। वे हस्ताक्षर किसी गँव में, कर रहे होंगे, किसी छोटे गाण्व में। वहाँ हर जगह जाकर तो कोई उन्हें रोक नहीं सकता। हस्ताक्षर वें करे, और उन्हें जाकर कैसे रोका जाए?

डॉ.अशोक कुमार तिवारी
Guest
डॉ.अशोक कुमार तिवारी
बहुत दुखद है पर सच तो कहना ही पड़ेगा — दिल्ली में मरने वाला किसान भाजपा शासित प्रदेश राजस्थान का था (हो सकता है रैली रोकने के लिए उसे तैयार करके लाया गया हो तभी तो बीजेपी शासित पुलिस, मुख्यमंत्री केजरीवाल की भी नहीं सुनती है और किसान को बचाने नहीं जाती है- पुलिस को ऐसा आदेश रहा होगा-यदि अपने समर्थकों का घेरा और मंच छोड़कर केजरीवाल उतरते तो उनपर जानलेवा हमला भी हो सकता था- रिलायंस जैसी भ्रष्ट कम्पनी उनके पीछे पड़ी हैं) उस किसान ki durdasha की jimmedar -राजस्थान और केंद्र सरकार है !!! केजरीवाल महान हैं जो… Read more »
wpDiscuz