लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

एक जमाना था महाभारत में एक औरत की पुकार पर श्रीकृष्ण रुपी भारत दौड़ा चला आया था। आज कश्मीर में सचमुच का महाभारत चल रहा है और हजारों औरतें इस जंग में अनाथ बना दी गयी हैं। लेकिन भारत सोया हुआ है।

राज्य और केन्द्र सरकारों ने अभी तक साम्प्रदायिक-आतंक से पीडित औरतों को राहत और पुनर्वास देने के लिए कुछ भी नहीं किया है। शरणार्थी हिन्दुओं के लिए राहत कार्य चल रहा है। अनेक कमियों के बावजूद जारी है।

लेकिन कश्मीरी औरतों के लिए भारतभक्तों की आंखें कभी नम नहीं देखी गयीं। कश्मीरी औरत की इज्जत और मान-मर्यादा की रक्षा के सवाल पर राजनीतिक दलों का गुस्सा कभी दिल्ली की सड़कों पर नजर नहीं आया, कभी संसद ठप्प नहीं हुई ।

आए दिन औरतों पर होने वाले जुल्म की खबरें हम मीडिया में पढ़ते रहे हैं लेकिन एक भी राष्ट्रीय महिला संगठन ने कश्मीरी औरतों के ऊपर हो रहे जुल्मों के प्रतिवाद में दिल्ली और दूसरे शहरों में कोई प्रतिवाद जुलूस तक नहीं निकाला। दिल्ली में किसी औरत के कत्ल या बलात्कार पर जो मीडिया उन्माद पैदा करता रहता है उसी मीडिया और ब्लॉगरों का कश्मीरी औरत के प्रति बेरुखी का भाव क्यों है ?

क्या कश्मीरी औरत का बलात्कार, उत्पीड़न, दमन औरतों के मानवाधिकार हनन की कोटि में आता है ? कश्मीर अकेला क्षेत्र है जहां हजारों औरतों को अहर्निश मानवाधिकार हनन की अवस्था में रहना पड़ रहा है। ये औरतें इतनी असहाय हैं कि कश्मीर छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकतीं।

क्या वजह है तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय मीडिया और टीवी चैनलों में भी कश्मीरी औरतों की तकलीफों पर कोई चर्चा तक नजर नहीं आयी। आखिरकार औरतों पर पड़ने वाले साम्प्रदायिक-आतंकी दुष्प्रभावों की हमारे जागरुक नेता, वे हिन्दी ब्लॉगर, जो कश्मीर में हिन्दुओं के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर आए दिन हंगामे करते रहते हैं और अपने जोश में कश्मीर में चल रहे साम्प्रदायिक-आतंक को समग्रता में नहीं देखते, उन्हें हिन्दू का दुख नजर आता है बाकी का दुख नजर क्यों नहीं आता?

क्या कश्मीरी पंडित के दुख को एक आम कश्मीरी की तकलीफों से अलग करके देखा जा सकता है? क्या यह संभव है जब कश्मीर की घाटियों में आतंकी हमले हो रहे हों उससे हिन्दू बचे रहेंगे? क्या औरतें और मजदूर बचे रहेंगे? हमें कश्मीर में चल रहे साम्प्रदायिक हिंसाचार को समग्रता में देखना चाहिए। कश्मीर का साम्प्रदायिक-आतंकी हिंसाचार हिन्दुओं और औरतों को ही नहीं आम मुसलमान को भी खून में रंग रहा है। यह भारत के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है।

हमारे हिन्दुत्ववादी रणबांकुरों ने कश्मीर में हिन्दू पलायन- हिन्दू उत्पीड़न का इकतरफा राग कुछ इस तरह गाया और भोंपू की तरह मीडिया के जरिए ऐसा प्रचार किया गया गोया कश्मीर में हिन्दू उत्पीड़न के अलावा और कुछ नहीं हो रहा था?

कश्मीर में साम्प्रदायिक-आतंक की राजनीति के मॉडल ने हिन्दुओं के अलावा जिस तबके को सबसे ज्यादा प्रभावित किया वे हैं कश्मीरी औरतें। इनमें ज्यादातर मुसलमान हैं।

साम्प्रदायिक-आतंकियों के द्वारा औरतों का आए दिन अपहरण, बलात्कार, बच्चों का अपहरण और उत्पीड़न रोजमर्रा की बात हो गयी है। औरतों को निशाना बनाने के बाद आतंकी अपराधी अपने लिए स्थानीय शरण, मदद और बंदे जुगाड़ करते हैं।

औरतों को उत्पीडि़त करते हुए आतंकी किसी भी हद तक जाकर हमले और उत्पीड़न कर रहे हैं। आम तौर पर औरतों पर आतंकियों के गिरोह संदेह के कारण हमले करते हैं। उन्हें ज्यों ही किसी कश्मीरी परिवार की आतंकियों के प्रति वफादारी पर संदेह होता है वे औरतों को निशाना बनाते हैं। अपने पक्ष में स्थानीय वातावरण बनाने के लिए वे औरतों पर अत्याचार करते हुए हिटलर के बंदों जैसा आचरण करते हैं।

हजारों कश्मीरी औरतें हैं जिनके पति को पुलिस उठा ले गयी है और वह व्यक्ति अभी तक नहीं लौटा, तकरीबन 10 हजार ऐसे लोग हैं जिनका अता-पता पुलिस बताने को तैयार नहीं हैं, इनकी औरतें और बच्चे अकथनीय यंत्रणाएं झेल रहे हैं। औरतों की अवस्था बेहद खराब है इनमें से ज्यादातर औरतें भयानक मानसिक तकलीफों से गुजर रही हैं। हम नहीं जानते वे कैसे गुजारा कर रही हैं? उनके बच्चे कैसे हैं? राज्य सरकार की तरफ से ऐसी औरतें पहले ही संदेह के घेरे में हैं। इन औरतों के पुनर्वास के सवाल पर कश्मीर में शांति चाहने वालों को विचार करना चाहिए।

कई हजार कश्मीरी मर्द हैं जिन्हें बगैर मुकदमा चलाए राज्य सरकार ने गिरफ्तार करके बंद रखा हुआ है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए, यदि किसी के खिलाफ आपराधिक मामला बनता है तो कानूनी कार्रवाई तेज करके मुकदमे का वैसे ही निपटारा करना चाहिए जैसा पाक आतंकी कसाव के मामले में हुआ है।

आश्चर्य की बात यह है कि कश्मीर में आतंकी गतिविधियों के नाम पर पकड़े आतंकियों के केस वर्षों से अति धीमी गति से चल रहे हैं और ज्यादार मामलों में दसियों साल के बाद भी अभी तक फैसला नहीं आया है। क्या इस तरह की राज्य प्रशासन और केन्द्र सरकार की हरकत को किसी भी तर्क से जायज ठहराया जा सकता है? कसाव को वीआईपी गति से न्याय और कश्मीर में आतंकी होने के आरोप में पकड़े गए बंदी भारतीय बंदों को न्याय के दर्शन दुर्लभ?

हम कश्मीर में शांति चाहते हैं तो हमें जेल में आतंकी गतिविधियों के नाम पर बंद सभी बंदों पर फास्ट ट्रेक कोर्ट की तर्ज पर विशेष अदालतें जेलों में ही बनाकर जल्दी फैसला लेना चाहिए। ज्यादातर बंदियों के पास मुकदमे लड़ने के लिए वकील नहीं हैं उन्हें सरकारी वकील वैसे ही मुहैय्या कराएं जैसे कसाव को दिया गया। हो सकता है इनमें कुछ कसाव जैसे आतंकी हैं , यह भी हो सकता है निर्दोष लोग हों, हमें इस प्रक्रिया को तेज करना चाहिए। इससे कश्मीर में हालात सामान्य बनाने में मदद मिलेगी। आतंकी उत्पीड़न और पुलिस दमन की शिकार औरतों के पुनर्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस संदर्भ में केन्द्र सरकार को पहल करके पुनर्वास पैकेज की घोषणा करनी चाहिए।

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