लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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pmप्रमोद भार्गव

चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग की यह प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली विदेश यात्रा है। इसी की तैयारी में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने बीजिंग की यात्रा हाल ही में की है। क्योंकि चीन अच्छी तरह से जानता है कि भारत से मजबूत व्यापारिक संबंध बनाए बिना उसकी अर्थव्यवस्था की पटरी उतर सकती है। चीन करीब 70 फीसदी लोहा व अन्य कच्चे अयस्क भारत से बेहद सस्ती दरों पर आयात करता है, जो दूसरे देश से आयात करना नामुमकिन है। इसी लोहे की चीन की अधोसंरचना को विस्तार देने में बड़ी भागीदारी है। रेल और ब्रहम्पुत्र नदी पर निर्माणाधीन बांधों की प्रगति इसी लोहे पर निर्भर है। यही नहीं चीन भारत से ही किए कच्चे माल से अनेक किस्म के खिलौने, इलेक्टोनिक उपकरण व सायकिलें तैयार करके भारत को निर्यात करता है। चीन की बनी सामग्री का सबसे बड़ा खरीददार भारत है। जाहिर है, गर्ज चीन की भी है, जिसे उसकी आक्रामकता के चलते अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस लिहाज से भारत को जरुरत है कि वह सीमा व जल विवादों से लेकर जिन द्विपक्षीय आर्थिक मुददों पर भी बात करे, दो टूक और दृढ़ता से करे। जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में एक अच्छा संदेश जाए और चीन की तुलना में भारतीय हितों की हेठी न हो।

चीनी प्रधानमंत्री की इस यात्रा को उत्साहजनक व सुधारात्मक पहल की दृष्टि से लेने की जरुरत है। क्योंकि भारत और चीन के बीच मजबूत दृढ़ता से ही एशिया की तरक्की और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान संभव है। हालांकि चीन में पिछले दिनों नए नेतृत्व द्वारा सत्ता संभालने के बाद से ही नए राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग के बयानों से संकेत मिल रहे थे कि भारत के साथ संबंधों की निकटतम विश्वसनीयता उनकी प्राथमिकता में है। लेकिन लददाख क्षेत्र में चीनी सैनिकों की 19 किमी तक घुसपैठ और फिर वापिसी को ठेंगा दिखाते हुए तंबू तान लेने से यह लगने लगा था कि सुधार की उम्मीदें खटार्इ में पड़ने वाली हैं। 25 साल बाद एकाएक इस नाजुक मोड़ पर पहुंचना दोनों ही देशों के लिए अच्छी बात नहीं थी। यह ठीक है कि लददाख क्षेत्र में दोनों देशों के बीच एक निश्चित सीमा रेखा रेखांकित नहीं है। बावजूद सीमा पर न केवल शांति बनी हुर्इ है, बलिक दोनों देशों की सेनाओं के बीच रिश्ते भी मधुर थे। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद भारत-चीन संबंधों को नर्इ दिशा मिली थी, जो सीमा पर ताजा घुसपैठ के बाद भटक गर्इ है। हालांकि इस घूसपैठ के पीछे चीन से जुड़े विदेशी व रक्षा मामलों के जानकार बता रहे हैं कि चीन की सेना पाकिस्तान की तरह उग्र राष्ट्रवादी है, इसलिए उसे उग्रवादी हथकंडे अपनाने में भी कोर्इ गुरेज नहीं है। लिहाजा हो सकता है कि यह हरकत साम्यवादी नए नेतृत्व को सेना की हैसियत जता देना की दृष्टि से सामने लार्इ गर्इ हो ? वैसे भी चीन ने भारत से ही नहीं अपनी सीमा से लगे जापान, वियतनाम, फिलीपींस, तार्इवान, कोरिया, मलेशिया, रुस आदि देशों से सीमा विवाद मोल लिया हुआ है। दूसरी तरफ वह नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और म्यांमार को आर्थिक मदद  देकर उनके हितपोशण में लगा है। इस कूटनीति को वह भारत व अन्य देशों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाने के नजरिये से भी अंजाम दे रहा है।

ली कियांग की भारत यात्रा संपन्न हो जाने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जापान यात्रा प्रस्तावित है। इस यात्रा से दोनों देशों के बीच मित्रता और व्यापारिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की पहल होगी। चीन को यह यात्रा खल रही है, क्योंकि चीन जापान से सेनाकाकू द्वीप समूहों को हड़पने की फिराक में है। जापान का ठोस प्रतिरोध जारी है। जापानी प्रधानमंत्री शिंजों एबे अपने चीन विरोधी रुख के लिए जाते हैं, जबकि उनकी भारत से गहरी दोस्ती है। यह भारत के लिए सुनहरा अवसर है कि वह जापान की नौसेना के साथ सहभागिता की भूमिका को अंजाम देकर चीन सागर और हिंद महासागर में चीनी कुचेश्टाओं को नियंत्रित रखने की बात ली कियांग के सामने रखे। ऐसा होता है तो जापान के साथ दोस्ती का रंग तो और गहरा होगा ही , अमेरिका, भारत और जापान के संभावित गठजोड़ को भी मजबूती मिलेगी।

भारत चीन विवाद सीमा तक ही सीमित नहीं है, चीन भारत को परेशान करने की दृष्टि से ही पाकिस्तान को सबसे ज्यादा हथियार बेचता है। जबकि चीन अच्छी तरह से जानता है कि वह इन हथियारों का इस्तेमाल भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करता है। भारत और अमेरिका से मजबूत होते रिश्तों के कारण चीन भारत को घेरने  में लगा है। इस नजरिए से उसने नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में अरबों का निवेष किया हुआ है। ब्रहम्पुत्र नदी पर बनाए जा रहे बांधों की श्रृंखला से भी भारत, चीन से परेशान है। उसे चिंता है कि चीन वहां से भारत आने वाली नदियों का पानी न रोक दे ? अक्सार्इ चिन सड़क, पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानना अरुणाचल प्रदेश को 2009 में एशियार्इ विकास बैंक से मिलने वाले कर्ज पर प्रतिबंध लगवाना भी ऐसे विवाद हैं, जिनसे भारत तंग रहता है।

अब तक भारत और चीन प्राकृतिक संसाधनों और बाजार के विस्तार में एक-दूसरे के खिलाफ हर तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं। यह स्थिति वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के परिप्रेक्ष्य में भी प्रगट है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सीट मिलने के मामले में चीन ही प्रमुख रोड़ा है। यह प्रतिस्पर्धा सोना और इमारती लकड़ी से समृद्ध देश घाना में भी दिखार्इ देती है। इसी साल फरवरी में यहां के राष्ट्रपति राजमहल में आए हैं। इसके लिए आर्थिक मदद भारत ने दी। एक माह बाद ही चीन ने यहां विदेश मंत्रालय की इमारत बनवा दी। घाना हाल ही में नए तेल उत्पादक देशों में शामिल हुआ है। दोनों देशों का यह मुकाबला अब आर्कटिक सागर में भी दिखार्इ दे रहा है। दोनों वहां पिघलते ग्लेशियरों के बीच नौबहन के रास्ते बनाने में लगे हैं। वहां जीवाष्म और खनिज की तलाष में हैं। बताते हैं, यहां खनिज व अन्य संसाधनों की भरमार है। बावजूद इनमें कुछ समस्याएं ऐसी हैं जो खुद चीन ने पैदा की हैं, ऐसे में भारत को जरुरत है कि वह उसी पर इन समस्याओं के निराकरण का दबाव बनाए ?

दोनों देश द्विपक्षीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा देने के फेबर में हैं। पिछले कुछ साल के कारोबारी आंकड़ें देखें तो भारत चीन से पिछड़ रहा है। हालांकि दुनिया में आर्थिक मंदी के चलते चीन में भी विदेशी निवेष की स्थिति खराब है। लेकिन भारत की स्थिति ज्यादा दयनीय है। अंतरराष्ट्रीय रेंटिंग एजेंसियों ने ऐसा माहौल रच दिया है कि भारत में फिलहाल पूंजी निवेष ठीक नहीं है। 2011 में जो कारोबार 74 करोड़ अरब अमेरिकी डालर का था, वह 2012 में घटकर 64 करोड़ अरब डालर रह गया। 2011 में भारत का व्यापार घाटा 27 करोड़ अरब डालर था, जो 2013 में आए चीनी आंकड़ों के मुताबिक 2012 में घटकर 29 करोड़ अरब डालर रह गया। फिलहाल चीन का भारत में निवेष 57 करोड़ अरब  डालर का है, जबकि भारत का चीन में निवेष 44 करोड़ अरब डालर का है। यहां गौरतलब है कि चीन से होने वाली वार्ता महज व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। क्योंकि यदि व्यापार के लिए भारत को चीन की जरुरत है तो चीन को भी भारत की जरुरत है। चीन को सस्ती दरों पर लौह अयस्क भारत से ही मिलते हैं, जो चीन के विकास का सबसे जरुरी आधार है। इसलिए भारत को चाहिए कि वह चीन से लददाख में हुर्इ घुसपैठ और अन्य समरिक मुददों के समाधान के लिए दो टूक बात करे।

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