लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

संदर्भ ब्रिटेन में छात्र अनुज विडवे की हत्या

इंग्लैंड के मैनचेस्टर शहर में भारतीय छात्र अनुज बिडवे की हत्या के पीछे नस्लीय कारण होने की संभावना से ब्रिटिश पुलिस ने भी इनकार नहीं किया है। यह छात्र लैंकेस्टर विश्वविद्यालय में माइक्रो इलेक्ट्रोनिक्स का छात्र था। इस छात्र की हत्या केवल समय पूछने में देरी हो जाने के चलते कर दी गई। इसी कारण यह शंका जताई जा रही है कि इतनी सी बात के हत्या की बड़ी बजह नहीं हो सकती, लिहाजा जरूर इसके पीछे नस्लीय मानसिकता रही होगी। ब्रिटेन निवासी भारतीय समुदाय भी ऐसी ही आशंकाएं जता रहा है। एक आशंका यह भी उभरी है कि मौजूदा दौर में पूरे यूरोप में आर्थिक मंदी चल रही है, जो उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं का कारण भी बन रही है। नतीजतन यहां प्रवासियों की सुरक्षा खतरे में है। हालांकि ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और अमेरिका में नस्लीय हमलों का दौर लगातार जारी है। इसे स्थानीय युवक भारतीय एवं अन्य एशियाई मूल के छात्रों को प्रतिस्पर्दा के रूप में भी देख रहे हैं।

पूरी दुनियां में मानवाधिकारों की वकालात करने वाले व उसकी शर्तें विकासशील देशों पर थोपने की कार्यवाही करने वाले अमेरिका, ब्रिटेन व अन्य पश्चिमी देशों की सरजमीं पर रंगभेद कितना वीभत्स है, यह लगातार भारतीयों पर हो रहे हमले से सामने आ गया है। इसके पहले भारतीय सिखों के केश काटने व अमेरिका के ऐरिजोना नगर के एक पेट्रोल पंप के मालिक बलवीरसिंह सोढ़ी की हत्या जैसे मामले को भी नस्लीय सोच व आतंकवादी घटनाओं के संदर्भ में देखा गया है। इन देशों के मूल निवासियों में घृणा,र् ईष्या, विद्वेश व हिंसा का वातावरण जिस स्तर और जिस तरह से तैयार हो रहा है, उससे तय है कि यहां श्वेत-अश्वेत के बीच दूरियां और बढ़ेंगी। हिंसक प्रवृत्तिा धारण कर रही इन देशों की युवा पीढ़ी अश्वेतों के लिए अमानवीय संकट खड़ा करेगी, ऐसी संभावनायें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

इन देशों में रंगभेद, जातीय भेद व वैमनस्य का सिलसिला नया नहीं है। इसकी जड़े बहुत गहरी हैं। इन जड़ों की मजबूती के लिए इन्हें जिस रक्त से सींचा गया था वह भी अश्वेतों का था। हाल ही में अमेरिकी देशों में कोलम्बस के मूल्यांकन को लेकर दो दृष्टिकोण सामने आये हैं। एक दृष्टिकोण उन लोगों का है जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्तार व वजूद उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के अनेक देशों में है। दूसरा दृष्टिकोण्ा या कोलम्बस के प्रति धारणा उन लोगों की है जो दावा करते हैं कि अमेरिका का अस्तित्व ही हम लोगों ने खड़ा किया है। इनका दावा है कि कोलम्बस अमेरिका में इन लोगों के लिए मौत का कहर लेकर आया। क्योंकि कोलम्बस के आने तक अमेरिका में इन लोगों की आबादी बीस करोड़ के करीब थी जो अब घटकर दस करोड़ के आसपास रह गयी है। इतने बड़े नरसंहार के बावजूद अमेरिका में अश्वेतों का संहार लगातार जारी है। अवचेतन में मौजूद इस हिंसक प्रवृत्तिा से अमेरिका व अन्य पाश्चात्य देश अभी भी मुक्त नहीं हो पाये हैं।

फोरी तौर से इन घटनाओं को न तो राजनैतिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए और न ही राजनीतिक रंग देने की कोशिश करनी चाहिए। हालांकि हमारे देश में तो न सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष के किसी नेता ने इन घटनाओं की कोई निंदा की है। ज्यादातर राजनेता खामोश रहने का ही रवैया अपनाये हुए हैं। इससे साबित होता है कि हमारे नेता कितने विदेशी दबाव से प्रभावित और पक्षपात से परिपूर्ण राजनीति कर रहे हैं। दरअसल अमेरिका और ब्रिटेन ने भारत और अन्य प्रगतिशील देशों को जानवरों की तरह हांक लगाकर दबाव का जो वातावरण बनाया है उससे इन देशों के जनमानस में विकासशील देशों के प्रति दोयम दर्जें का रूख अपनाने की मनोवृत्तिा पनपी है। अमेरिकियों में पैदा हुए इस मनोविज्ञान के चलते भारतीय मूल के लोगों व अन्य अप्रवासियों के खिलाफ वैमनस्य का माहौल तैयार हुआ है, जिसकी परिणति अब हिंसा के रूप में सामने आ रही है और इस हिंसा से बचने के लिए भारतीय लोग अपनी पारंपरिक पहचान छिपाकर वर्तमान वातावरण के अनुरूप स्वयं को ढाल रहे हैं।

इस हिंसा और विद्वेष को बढ़ावा मिलने का एक कारण यह भी है कि हमारे देश से जो प्रतिभावान युवा वर्ग पलायन कर पाश्चात्य देशों में पहुंच रहे हैं वे बौध्दिकता से परे किसी उलझन में उलझना नहीें चाहते। पाश्चात्य देशों में रह रहा भारतीय युवा तबका अपने विषयों में इतनी महारत और अपने कर्तव्य के प्रति इतने सजग रहते हैं कि अपनी सफलताओं और उपलब्धियों से वे खुद भी लाभान्वित हो रहे हैं और पाश्चात्य देशों को भी लाभ पहुंचा रहे हैं। पर ये युवा अपनी कर्मठता व योग्यता से जो प्रतिष्ठा व सम्मान विदेशी धरती पर अर्जित कर रहे हैं वह उनके लिएर् ईष्या का कारण बन अभिशाप भी साबित हो रहा है। यही कारण है कि भारतीय मूल के लोगों पर हमलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

अमेरिका में 11 सितम्बर 2001 को हुये आतंकवादी हमलों और ब्रिटेन में श्रृखंलाबध्द भूमिगत रेल धमाकों के बाद बदलते परिदृश्य में पश्चिमी देशों में धार्मिक परिधानों, विशेष तौर से हिजाब और पगड़ी के प्रति ज्यादा नफरत देखने को मिलने लगी थी और अब फिर लंदन व ग्लासगो में हुए आतंकवादी हमलों के बाद रंगभेदी सोच इतना बढ़ गया कि अब कार्य प्रणाली के स्तर पर भी नफरत का वातावरण साफ दिखाई देने लगा है। पश्चिमी देशों में शुरू हुए इन मानवाधिकारों के हनन का नोटिस खासतौर से अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों को लेना चाहिए।

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