लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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निल्ज़ा आंग्मो

मान लीजिए आप एक दिन सुबह उठें और आपको यह पता चले कि आपका मोबार्इल, इंटरनेट, लैंड लाइन और फैक्स ने काम करना बंद कर दिया है तो आप कैसा महसूस करेंगे। मेरे विचार से आप स्वंय को पंगु और लाचार समझेंगे, क्योंकि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में तकनीकी चीजों के इस कदर आदी हो चुके हैं कि इनकी अनुपसिथती में हमें अपने मामूली काम को पूरा करना भी मुश्किल हो जाता है। वास्तव में यह एक ऐसा माध्यम है जिससे हम न सिर्फ एक दूसरे से बलिक देश और दुनिया से भी जुड़े रहते हैं। इन दिनों इंटरनेट 3जी की रफ्तार से कार्य करता है। परंतु तेज रफ्तार और बेहतर सुविधा के यह सारे वायदे शहरों तक ही सीमित हैं। जैसे जैसे आप देश के अंदरूनी, पहाड़ी अथवा दूर दराज के क्षेत्रों में जाते हैं, इंटरनेट की यही सुविधा सुस्त होती जाती है या यूं कहें कि दम तोड़ देती है। लद्दाख जैसे उंचे और ठंडे इलाकें में भी इंटरनेट का कुछ ऐसा ही खस्ताहाल है। हिमालय की गोद में बसा लद्दाख भौगोलिक रूप से देश और दुनिया में अन्य क्षेत्रों से अलग थलग रहा है। हालांकि आधुनिक तकनीक ने पूरी दुनिया को एक गांव में तब्दील कर दिया है। इसके बावजूद लद्दाख में अब भी इंटरनेट की सुविधा नाममात्र की है। इस बात का अहसास स्वंय राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी है क्योंकि जब भी वह इस क्षेत्र का दौरा करते हैं तो उससे पहले अपने टिवटर पर यह संदेश छोड़ जाते हैं कि मैं फिल्हाल लद्दाख जा रहा हूं। इस बात से यह अंदाजा लगाना कतर्इ मुश्किल नहीं होगा कि जब राज्य के मुख्यमंत्री को इस क्षेत्र में इंटरनेट की सुविधा मिलनी मुश्किल होती है तो आमजन का क्या पूछना।

देश के अन्य भागों में जहां बड़ी बड़ी कंपनियां विभिन्न प्रकार के नेटवर्क सुविधा उपलब्ध कराती हैं वहीं लद्दाख में केवल तीन नेटवर्क प्रोवाइडरर्स हैं, वह भी नाममात्र की। जबकि ऐसे दूर दराज ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना पहुंचाने की यही तकनीक अहम किरदार अदा करती है। इन क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय को शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी योजनाएं और देश-विदेश की खबरों की काफी जरूरत है। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं तथा र्इ-गवर्नेंस का अधिकतर दारोमदार भी सूचना तकनीक के इसी स्त्रोत इंटरनेट पर निर्भर है। इसके पीछे सरकार की यह मंशा है कि इसके माध्यम से योजनाओं को अधिक से अधिक जरूरतमंदों तक पहुंचार्इ जाए। हाल ही में लद्दाख आटोनोमस डेवलपमेंट कांउसिल द्वारा प्रकाशित ‘लद्दाख विजन 2025’ के अनुसार सूचना तकनीक के मैदान में यह समूचा क्षेत्र पिछड़ा हुआ है जिसके लिए विषेश कुछ करने की आवश्याकता है। मनरेगा, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की महत्वपूर्ण योजना आर्इडीएसपी, एनसीआरपी और सीआर्इपीए जैसे चंद प्रोजेक्ट ऐसे हैं जिन के लिए लोगों को पूरी तरह सूचना तकनीक पर ही निर्भर करना पड़ता है। ऐसी सिथती में लद्दाख में इसका अभाव उसे देश के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पिछड़ा बनाता है। लेह के सूचना तकनीक की सूरतेहाल का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके बारे में मुझे अपनी इंटर्नशिप के दौरान ज्ञात हुआ और मैंने बैंडविडथ की विषेशता को र्इ-गवर्नेंस और आर्इटी डेवलपमेंट के क्षेत्र में जाना। इस क्षेत्र में नेटवर्क उपलब्धता कराने वाली तीन कंपनियों में से केवल एक ही लद्दाख में सूचना के सभी नेटवर्क अर्थात ब्राडबैंड, वाइस काल, एसएमएस और जीपीआरएस सेवाएं उपलब्ध कराती हैं लेकिन जहां तक वाइस काल और जीपीआरएस का संबंध है तो इनकी सेवाओं का स्तर काफी खराब हैं।

लेह में सूचना तकनीक का नेटवर्क केंद्र तथा निजी दोनों ही सेक्टरों द्वारा उपलब्ध करार्इ जाती है। लेकिन कुछ निजी कंपनियों के पास जिला में मोबाइल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए उन्नत संरचना के सीमित स्त्रोत हैं। जिसका पूरा फायदा यहां के लोगों विशेषकर नर्इ पीढ़ी को नहीं मिल पा रहा है। लेह को तेज रफ्तार ब्राडबैंड सुविधा उपलब्ध कराने के लिए श्रीनगर से लेह तक एक विषेश केबल की आवष्यकता है। ऐसा करने के लिए कंपनियों को दुर्गम पहाड़ी सड़कों और रास्तों से होकर गुजरना होगा। ये केबल जिसे आपटिक्ल फाइबर केबल कहा जाता है, लेह की सीमित इंटरनेट सेवा के लिए रीड की हडडी साबित हो सकता है। मैं लेह में ताकतवर नेटवर्क उपलब्ध कराने का दावा करने वाली एक कंपनी की ग्राहक हूं और मेरा विश्वापस करें कि हमारी सर्विस बिना किसी पूर्व सूचना के बंद कर दी जाती है और यही बात मेरे जेहन में यह उलझन पैदा करती है कि यदि लद्दाख में आपटिक्ल फाइबर केबल मौजूद है तो यहां सुविधाएं इतनी खराब क्यूं है? जब सरकार विशिष्टम आपटिक्ल फाइबर केबल की उपलब्धता का दावा करती है तो लोगों को कमजोर नेटवर्किंग का सामना क्यूं करना होता है।

वास्तव में जब किसी चीज की बुनियाद ही कमजोर हो तो उससे भला स्थार्इत्व की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यही बात लेह के सूचना तकनीक पर भी लागू होती है। जहां आपटिक्ल फाइबर केबल के तार बिछाते वक्त उसकी गुणवत्ता का ख्याल नहीं रखा गया और न ही लगाने के बाद इसका ढ़ंग से रखरखाव भी किया गया। लगातार होती बर्फबारी तथा बार बार सड़कों के निर्माण के लिए जमीन की खुदार्इ के कारण केबल जर्जर हो चुके हैं। देश के अन्य शहरों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से जुड़े रहने के लिए कर्इ केबल नेटवर्क मौजूद हैं। यदि किसी लाइन को मरम्मत अथवा किसी कारणवश बंद भी किया जाता है तो उसके दुसरे विकल्प रखे जाते हैं। जबकि लेह में यदि किसी भी प्रकार से लाइन खराब हो जाती है तो संचार सुविधाओं को कम बेंडविथ पर ट्रांसफर कर दिया जाता है और आपटिक्ल फाइबर केबल नेटवर्क पर निर्भर सभी इंफ्रास्ट्रक्चर सेवाएं बेमानी हो जाती हैं।

पूरे लद्दाख में साइबर कैफे, टेलीफोन बूथ तथा फैक्स मशीनों की सुविधाएं काफी कम हैं। जिसका फायदा यहां के दुकानदार उठाते हैं और मुहंमांगी कीमत वसूलते हैं। जबकि लद्दाख के दूरदराज में यह भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। प्रष्न उठता है कि एक तरफ जहां पूरा देश इंटरनेट के नए रास्ते, नर्इ तकनीकों के माध्यम से शिक्षा के नए रिर्फाम और सरकारी योजनाओं का फायदा उठा रहा है तो वहीं लद्दाखी समुदाय को क्यूं हाशिए पर धकेल दिया गया है। लद्दाख में पर्यटन के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है जिसे विकसित करने की आवश्यगकता है और वह है नर्इ पीढ़ी को सूचना तकनीक से लैस कराना। इसके लिए जरूरी है कि उन्नत किस्म का केबल फाइबर इस्तेमाल किया जाए तथा सभी नेटवर्क को आपस में जोड़ा जाए। लद्दाख हमारे पड़ोसी देश चीन से सटा सीमावर्ती क्षेत्र है जो आज सूचना तकनीक के क्षेत्र में बड़ी तेजी से दुनिया के नक्षे पर उभर रहा है। जिसका मुकाबला स्वंय को इस क्षेत्र में विकसित करके संभव है।

टेक्नालाजी में पिछड़े लद्दाख के संबंध में इससे अधिक हैरत की बात और क्या हो सकती है कि इस क्षेत्र का अपना कोर्इ समाचारपत्र तक नहीं है। श्रीनगर अथवा दिल्ली से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र यहां अवश्यन मिलते हैं परंतु वह भी दो चार दिन बाद। इसके कारण लद्दाखी जनता देश विदेश के घटनाक्रमों तथा सरकारी योजनाओं की जानकारी से वंचित रह जाती है। आखिर इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? सरकार को, यहां की भौगोलिक परिस्थितियों को अथवा लचर प्रशासनिक व्यवस्था को। जिम्मेदार चाहे जो भी हो सजा तो आखिरकार आम जनता को ही भुगतना पड़ रहा है।(चरखा फीचर्स)

(लेखिका रिसर्च स्कालर है)

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