लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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प्रवीण दुबे

देश में ईसाई मिशनरीज अपना दखल बढ़ाती जा रही हैं। भोले-भाले वनवासी,आदिवासी और पिछड़े वर्ग के बीच सेवा, सहायता, शिक्षा, चिकित्सा का पाखंड रचकर उनका धर्मान्तरण किया जा रहा है। देश के तमाम क्षेत्र खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में तो हालात यहां तक जा पहुंचे हैं कि हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए है और उन्हें विदेशी कहकर संबोधित किया जाने लगा है। दूसरी ओर धर्मांतरित होकर ईसाई बने लोग गुपचुप तरीके से स्वयं को आदिवासी वनवासी निरूपित करके संविधान में इन्हें प्राप्त तमाम अधिकारों का उपयोग कर रहे। समय आ गया है कि अब ऐसे लोगों को बेनकाब किया जाए। इस पर देश में व्यापक बहस जरूरी है। बहस इस बात पर भी जरुरी है कि जिन पिछड़े लोगों ने चाहे वह अनुसूचित जाति के हों जनजाति में हों या किसी अन्य पिछड़े वर्ग से आते हों यदि उन्होंने धर्म बदल लिया अर्थात् वह ईसाई हो गए तो इसकेबावजूद उन्हें अनुसूचित जाति,जनजाति अथवा अन्य पिछड़े वर्ग का मानकर आरक्षण जारी रहना चाहिए। वर्तमान में एक उदाहरण बेहद प्रासंगिक कहा जा सकता है। इस समय देश में राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा हो चुकी है। दो  उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी और पूर्णो एजीटोक संगमा के बीच मुकाबला होना है।कहा यह जा रहा है संगमा आदिवासी हैं अत: राष्ट्रपति के लिए देश में पहली बार कोई आदिवासी नेता राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में है अत: उसे राष्ट्रपति भवन पहुंचना ही चाहिए। संगमा के निकट सहयोगी और रणनीतिकार भी इस बात को मुख्य मुद्दा बनाकर खूब प्रचार कर रहे हैं। तथा यह सच है? आपको भी लग रहा होगा कि आखिर हम यह क्या कह रहे हैं? आखिर संगमा आदिवासी नहीं तो क्या हैं ? तो हम यहां कहना चाहेंगे कि संगमा पहले आदिवासी थे या उनके पूर्वज आदिवासी थे अब वे आदिवासी नहीं हैं। उन्होंने अपना अपना धर्म परिवर्तन कर लिया है और अब वे ईसाई (रोमन कैथोलिक)हैं। हम तो यहां तक कहेंगे कि संगमा जब हिन्दू ही नहीं हैं तो वे आदिवासी कैसे हो सकते हैं?भारत में जो आदिवासी हैं वे हिन्दू हैं और जनजातीय तथा पुरातन संस्कृति का प्रतीक हैं। सच तो यह है कि श्री संगमा और निकट सहयोगी इस बात को लेकर देश के सामने भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं। उन्हें खुलकर यह स्वीकार करना चाहिए कि वे धर्म परिवर्तन के बाद रोमन कैथोलिक ईसाई हैं। सर्वविदित है कि भारत के भोले-भाले, गरीब, पिछड़े वनवासियों को पैसे का लालच देकर मतातंरण किया जाता है और इस खेल में ईसाई मिसनरीज बड़े पैमाने पर पूर्वोत्तर के राज्यों में सक्रिय हैं।हमारे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पी.ए. संगमा भी जिन्हें की आदिवासी कहकर प्रचारित किया जा रहा है इसी पूर्वोत्तर के मेघालय से आते हैं। विडंबना देखिए कि राजनैतिक और आरक्षण का लाभ उठाने के लिए जिन्हें आदिवासी कहकर देशवासियों के साथ इमोशनल ब्लैंकमेलिंग का खेल खेला जा रहा है पूर्वोत्तर में ऐसे ही आदिवासियों और वनवासियों को जो मूलत: हिन्दू हैं उन्हें धर्मातंरित करने के लिए तथा हिन्दू मान्यताओं, परम्पराओं और संस्कृति से काटने के लिए आदिवासी की जगह प्रकृतिपूजक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यह शब्द चर्च के द्वारा एक सोची-समझी रणनीति के तहत प्रोटेस्टेण्ट मिशनरियों के 18वीं सदी में भारत आगमन के बाद से ही उपयोग होना शुरू हुआ। मिशनरी को जब यहां लगा कि जब तक आदिवासियों को मूल हिन्दू धर्म के आस्था प्रतीकों से नहीं काटा जाएगा जब तक उन्हें ईसाई बनाना संभव नहीं हैं।इसके लिए उन्होंने पूर्वोत्तर में अस्पताल, शिक्षा केन्द्र प्रारंभ किए  वहीं जमीन, धन की सुविधा का लालच देकर वनवासियों को प्रकृतिपूजक का दर्जा देने और उनके क्षेत्र को आरक्षित कर वहां किसी के भी प्रवेश पर रोक लगाने जैसे काम प्रारंभ किए। जब मतांतरण में थोड़ी कामयाबी मिली तो 1942 में ही पूर्वोत्तर के वनवासी क्षेत्र को न्यू ”इग्लैंड” के नाम से सीधा इग्लैंड-शासित क्षेत्र बनाने की योजना पर भी काम शुरू हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण यह योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अमेरिका ने पूर्वात्तर क्षेत्र में धर्मांतरण के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। व्यापक पैमाने पर यहां धन व मिशनरी भी। इन मिशनरियों ने यहां आदिवासियों को हिन्दू न होने प्रकृतिपूजक होने का व्यापक प्रचार किया। उन्होंने जनजातियों बोलियों को रोमन लिपि में लिखने का कार्य शुरू किया, यहां तक कि बाइबिल छापने का कार्य भी शुरू हुआ।

वैध-अवैध तरीकों से मतांकरण और ईसाईयत के चिन्ह भी बांटे गए। इन्होंने यहां चर्च के माध्यम से अंगे्रजी स्कूल खोले और मतातंरण की आंधी चलाई । जब इनकी संख्या अच्छी खासी हो गई हिन्दू मतावलंबियों को विदेशी कहकर भगाने का षड्यंत्र शुरू हुआ। इसे चर्च की सहायता से हिंसात्मक बनाया गया। आज स्थिति यह है कि वहां आदिवासी लगभग समाप्त हो चुके हैं नागालैण्ड, मिजोरम, मेघालय जैसे राज्य ईसाई बन चुके हैं। हालत इतनी गंभीर है कि वह मेघालय जहां से संगमा आते हैं और उन्हें आदिवासी बताया जा रहा है वहां ईसाई आबादी 64.6 प्रतिशत है और हिन्दू मात्र 14.7 प्रतिशत ही बचा है और अल्पसंख्यक बन गया है नागालैण्ड में तो ईसाइयों का प्रतिशत 98 तक जा पहुंचा है और हिन्दू आबादी मात्र 2 प्रतिशत रह गई है। यहां जाने पर हिन्दू को विदेशी कहकर संबोधित किया जाता है और चारों तरफ ईसाई संस्कृति दिखाई देती है। मिजोरम में भी यही हालात हैं वहां 90 प्रतिशत ईसाई है। इन क्षेत्रों के मूल हिन्दू तथा आदिवासी तो जैसे कहीं खो से गए हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि पीए संगमा जैसे राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सीधा करने के लिए यह तो प्रचारित करते हैं कि वह पूर्वोत्तर के आदिवासी हैं परन्तु सच तो यह है कि इसी तरह के लोगों ने वहां मतातंरण को बढ़ावा दिया और स्वयं इसाई बन गए। इन्होंने लंबा राजनीतिक जीवन होने के बावजूद कभी भी इस क्षेत्र में मतातंरण के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। कभी भी आदिवासियों को उनकी मूल हिन्दू संस्कृति से काटने और उन्हें प्रकृतिपूजक जैसे अलग नाम देने का विरोध नहीं किया। आखिर कैसे विश्वास किया जाए कि ये आदिवासियों के शुभचिंतक है। ऐसे राजनीतिज्ञों को तो मौकापरस्त हीं कहना चाहिए।

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5 Comments on "ये आदिवासी हैं या ईसाई"

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राजीव पाठक
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संगमा ईसाई होते हुए भी एक सच्चे राष्ट्र भक्त हैं | अपने एक ही ज्यादा अवतल दर्पण चश्मे से सबको मत देखिये |

Ramanarayan suthar
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सता पर वाजिब कब्ज़ा ही इसका एकमात्र हल है

Dr. Dhanakar Thakur
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धर्मान्तरण गलत है
हिन्दू अल्पसंख्यक होंगे तो धर्मनिरपेक्षता कहातम होगी और देश का टुकड़ा जता रहेगा
धर्मांतरित ईसाई आरक्षण के हकदा न होने चाहिए
पर संगमा का प्रश्न अलग है – वे ईसाई (रोमन कैथोलिक)हैं। पर उन्होंने एक इटालियन का विरोध किया था अतेव वे राष्ट्रिय हैं और उनका समर्थन होना चाहिए
प्रणव पूजा करनेवाले( दुर्गाभाक्त हैं ) पर वे जिसके इशारे पर काम कर रहे हैं उन्हें समझें.
यह समय की मांग है.

श्रीराम तिवारी
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ये न आदिवासी हैं और न ईसाई ये तो सुविधापरस्त ,खुदगर्ज ,महास्वार्थी, निर्लज्ज और पदलोलुप हैं. इनका कोई धर्म नहीं,इनका कोई सिद्धांत नहीं,इनकी कोई विचारधारा नहीं आदिवासी और गैर आदिवासी भी ये नहीं . ये राजनैतिक क्षितिज के डूबते पुच्छल तारे हैं.

tapas
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वो गरीब आदिवासी लोग जिनके पास मूलभुत सुविधाओ की कमी है .. खाने पिने दवाइया शिक्षा हर चीज का आभाव है उन्हें कोई लालच देगा तो स्वाभाविक है उनका मन डोलेगा…
“भूके पेट भजन न होय गोपाला ”
हिन्दुओ के मंदिरों में भी खूब पैसे आते है …पर पता नही कहा पर संभाल कर रखे है .. उस धन का उपयोग करो और उन गरीब लोगो को सुविधाए प्रदान करो
वरना हाथ पर हाथ धरे ये विधवा प्रलाप करने से कुछ नही होगा …

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