लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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इस्लाम_signविश्वविख्यात विचारक बर्नार्ड लिविस का पूर्वानुमान क्या 21 वीं शताब्दी के समाप्त होते-होते यूरोप का इस्लामीकरण हो जाएगा? क्या पश्चिम के अनेक देशों में जनसांख्यिक परिवर्तन के दबावों व आतंकवाद के बदलते स्वरूप के कारण सभ्याताओं के संघर्ष की अवधारणा एक संभावना बन सकती है? आज इन प्रश्नों को मात्र इतिहासकारों व समाजशास्त्रियों का अस्पष्ट अनुमान नहीं कहा जा सकता है? बल्कि उन प्रसिद्ध विद्वानों के दशकों के अध्ययन या निष्कर्षों को मूर्त रूप देते हुए ऐसा घोषित किया जा रहा है जिनमें इस्लामी इतिहास के 63 वर्षीय विश्वप्रसिद्ध विद्वान बर्नार्ड लिविस और सैम्यूअल हन्टिंगटन भी शामिल हैं। यद्यपि सन 2002 में प्रकाशित एक ग्रंथ लिविस लिख चुके हैंव अमेरिकी चैनलों के राजनीतिक कार्यक्रमों व चैट-शो पर छाए रहने के साथ-साथ ”न्यूयार्क टाईम्स”, ”न्यूयार्कर”, ”टाईम”, ”न्यूजवीक” और कई रणनीतिक प्रकाशनों में लिखते रहे हैं। अरबी, अरामाईक, फ्रांसीसी, जर्मन, हिबू्र और तुर्की व पर्शियन भाषाओं के प्रकाण्ड पण्डित होने के कारण एक इस्लामी विद्वान के रूप में वे जो कुछ कहते या लिखते हैं उसको अमेरिकी राजनीतिज्ञ ध्यान से समझने की कोशिश करते हैं।

सन 1990 में ‘एटलान्टिक’ पत्रिका में उनका एक विशेष अध्ययन ‘द रूट्स ऑफ मुस्लिम रेज’ प्रकाशित हुआ था जो ‘न्यूयार्कर’ में उनके ‘द रिवोल्ट आफ इस्लाम’ नामक पूर्व प्रकाशित शोध लेख का रूपान्तरण था जिसके लिए कहा जाता है कि आज के परिदृश्य का जैसे उन्हें पूर्वाभास था। वस्तुतः लिविस चाहें 12 वीं शताब्दी के दंतकथा बने मुस्लिम महानायक सलादीन के विषय पर लिखें अथवा आज के ओसामा बिन लादेन पर, उनकी आधिकारिक टिप्पणियों को अंतिम शब्द माना जाता है। आज विश्व के इस्लामी आस्था के इतिहास के व्याख्या के रूप में ही नही, बल्कि बर्नार्ड लिविस को स्वयं आधुनिक इतिहास पुरुष के रूप में इसलिए देखा जाता है क्योंकि उनकी दृष्टि, परिष्कृत प्रस्तुति और तार्किक शक्ति ने उन्हें मात्र पश्चिमी अध्येताओं के बीच ही नहीं बल्कि सारे मध्य पूर्व और मध्य एशिया के देशों में लोकप्रिय बना दिया है। उनका ग्रंथ ”द मिडिल ईस्ट ः ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ द लास्ट 2000 इयर्स” पश्चिमी देशों में ही नहीं इस्लामी देशों में भी सर्वाधिक बिक्री वाले ग्रंथों में गिना जाता है। इस्लाम और धर्मों की पुरातन प्रतिद्वन्द्विता व उनमें छिपे संघर्षों के बीजों में आज भी आक्रोश के जो लक्षण प्रकट होते रहे हैं, वे कथित तार्किक व पंथ निरपेक्ष व्यक्ति आज समझ ही नहीं सकते हैं, यह बर्नार्ड लिविस का मानना है। उन्होंने अपने निष्कर्षों को बिना लाग-लपेट के सूचिबद्ध किया है और स्पष्ट रूप से लिखा है कि लगभग एक हजार वर्षों तक इस्लाम ने सांस्कृतिक क्षेत्र में पश्चिम के ऊपर अपना प्रभुत्व बनाए रखा था।

विज्ञान के क्षेत्र में नई-नई खोजों और अविष्कारों के साथ सैन्यशक्ति में भी इस्लामी अभियान पश्चिम से कहीं आगे थे। पर सन 1683 के आते-आते जब तुर्क वियना की घेराबंदी करने में असफल होकर पीछे हटे, इसलाम का राजनीतिक पतन प्रारंभ हो गया और पश्चिम का प्रभुत्व बढ़ता ही गया। आज जब कि इस्लामी विश्व में अपनी आस्था के इतिहास का फिर गहरा अहसास हुआ है और अमेरिका की स्वयं की ऐतिहासिक स्मृतियां न के बराबर है, सदियों पुरानी यादों के बोझ तले मुस्लिम देश प्रतिरक्षात्मक और अक्रामक रुख एक साथ अपनाए हुए हैं। उनके आज के सिध्दांतों में मुसलमानों के वर्तमान राजनीतिक एवं भौगोलिक प्रभाव के सम्पूर्ण विश्व में विस्तार की एक स्पष्ट राजनीतिक योजना है। आज के तुर्की का इस्तानबुल जो पहले कुस्तुनतुनिया या बाईज़ोन्टियम कहलाता था अथवा स्पेन जहां ईसाईयों ने उनके वर्चस्व को समाप्त किया, वे भूल नहीं सके। इसी तरह इस सदी के आरम्भ में हमने युगोस्लाविया में बोसनिया और कोसोवों की समस्याओं को देख चुके है। साफ है कि आज की राजनीति में इस आस्था के इतिहास में झांकना आवश्यक होगा। इतर धर्मों के विरूद्ध स्थायी जिहाद की अवधारणा को आज की विश्व शक्तियों को इस्लाम बनाम गैर-इस्लाम इन दो भागों के धु्रवीकरण के कारण है। ईमान वालों की अनिवार्य विजय का वादा आज उनके प्रचार तंत्र के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण आधे से अधिक विश्व में एक संभावना बन सकता है, ऐसा लिविस मानते हैं।

प्रो. सैम्यूअल हन्टिंगटन की सभ्यता-संघर्ष की अवधारणा की तरह बर्नार्ड लिविस यह तो नहीं कहते हैं कि यह आस्था विश्व को किसी संभावित महायुद्ध की ओर ढ़केल रही है पर वे यह मानते हैं कि शायद लोग चौंकेंगे नहीं यदि यूरोप का शनैः शनैः इसी शताब्दि के अंत तक इस्लामीकरण हो जाए। उस समय बोसनिया, कोसेबो, चेचन्या, तुर्कीस्तान, सिंक्यांग और कश्मीर जैसे रिसते घाव फिर एक नया रूप ले सकते हैं, यह बर्नार्ड लिविस मानते हैं। यह भी एक विडम्बना है कि अपने क्षेत्रीय भूराजनीतिक हितों के कारण अमेरिका के प्रयत्नों द्वारा ही मूल रूप से पैन-इस्लामीकरण को जीवित किया गयाहै। इसकी शुरूआत शीतयुद्ध के दौरान सोवियत संघ के विस्तारवाद के भूत से निपटने के लिए प्रारंभ की गई थी। अमेरिकी मीडिया भी इसके लिए पूरी तरह से उत्तरदायी रहा है। जैसा प्रारम्भ में लिखा गया है बर्नार्ड लिविस का सन 2002 में प्रकाशित ग्रंथ ”व्हाट वेंट रांग?” का उपशीर्षक ‘ द कलैश बिटवीन इस्लाम एण्ड माडर्निटी इन द मिडिल ईस्ट’ ने विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी प्रकाशनों में एक बाढ़ ला दी थी जिसके परिणामस्वरूप लिविस ने पुनः एक महत्वपूर्ण ग्रंथ 2003 में प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था ‘द क्राईसिस आफ इस्लाम: होली वार एण्ड अनहोली टेरर’। बर्नार्ड लिविस की छह दशकों की लेखन यात्रा में सदियों की इस्लामी चिंतन धारा का जो विद्वतापूर्ण विश्लेषण हुआ है उसको सुविधाजनक मोड़ देकर स्वयं अमेरिका ने अपना भूराजनीतिक हित साधने की कोशिश की है।

वे प्राचीन रक्तरंजित धार्मिक प्रतिद्वन्द्विताओं और समसामयिक आक्रोश की जड़ों में जाकर पश्चिमी पाठकों के लिए भाषाई, सांस्कृतिक, एवं धाार्मिक पहचान को इतर आस्थाओं के संदर्भ में इस तरह व्याक्ष्यायित करते हैं जिससे उनकी मानसिकता को अनूठा सिद्ध किया जा सके। लेखक का जन्म 31 मार्च 1916 को लन्दन में हुआ था और उन्हें पौर्वात्य अध्ययन का सर्वोत्कृष्ट व्रिटिश अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार माना गया है। वे सेवानिवृत्ति के बाद प्रिंसटन विश्वविद्यालय में मध्य एशिया एवं पूर्वी अध्ययन के इमेरिटस प्रोफेसर के रूप में अरसे से कार्य कर रहे हैं। पश्चिम के संबंधों पर आधारित इस्लामी इतिहास और विशेषकर आटोमन साम्राज्य के ऊपर उनके अनेक ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। उनके लेखन के प्रभाव का लोहा स्वयं अमेरिकी एवं पश्चिमी देशों की सरकारें भी मात्र विश्वसनीयता के कारण मानती हैं। किस तरह से इस्लाम और ईसाईयत सातवीं शताब्दी के बाद से एक सतत टकराव की स्थिति में रहे हैं यह उनका प्रिय विषय रहा है। जब कि सन 1938 में ही उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के स्कू ल आफ ओरियन्टल स्टडीज़ से स्नातक की उपधि ग्रहण की थी। वे सन 1982 में अमेरिकी नागरिक बने थे। इस्लामी सभ्यता किस तरह शीर्षस्थ स्तर पर थी जब उसने स्पेन, फ्र ांस, और तुर्की पर वर्चस्व बना लिया था पर मुस्लिम समाज की अंदरूनी स्थिति के कारण वह इस दौड़ में पीछे रह गई और ‘क्रूसेडर्स’ सफल हो गए इसका कारण वह 11 वीं शताब्दी में होने वाले इस्लामी समाज की अवनति और उनकी ” सांस्कृतिक श्रेष्ठता ग्रंथि” बताते हैं। एक मजे की बात लिविस अपने कुछ वर्षों पहले के ग्रंथ में कहते हैं मुस्लिम जितना ‘सहिष्णु’ विधर्मियाें के प्रति ऐतिहासिक रूप से रहे हैं उतना ईसाई चर्च भी कभी नहीं थे और यह सिलसिला सत्रहवीं शताब्दी तक चलता रहा था। इसी तरह किसी भी समय इस्लामी न्याय व्यवस्था में आतंकवाद का समर्थन नहीं किया गया था और आत्मघाती बमबारों का प्रारंभ मात्र बीसवीं शताब्दी की देन है उनके इतिहास की नहीं।

एक समय वह भी आया जब अमेरिकी पत्र-पत्रिकाओं ने शोध के नाम पर भड़काऊ और उत्तेजनापूर्ण सामग्री प्रकाशित की थी। यहां तक कि विशेषज्ञों के उद्धरणों के साथ प्रसिद्ध अन्तर्राष्ट्रीय साप्ताहिक ‘टाईम’ और ‘न्यूज़वीक’ ने लगातार अपने अंकों में मुस्लिम देशों व इस्लाम की चर्चा में आमुख कथाएं भी लिख डालीं। मुखपृष्ठ पर उनके शीर्षक ही सिद्ध करते हैं कि उनका रूझान क्या था- ‘इस्लाम: अतिरेकी पुनर्जीवन’ (इस्लाम : द मिलिटेंट रिवाइवल), ‘इस्लाम : क्या विश्व को भयभीत होना चाहिए?’ (इस्लाम : शुड द बर्ल्ड बी अफ्रे ड?), ‘इस्लाम का आक्रोश’ (द रैथ आफ इसलाम), ‘अर्ध चंद्र का संकट’ (क्रिसेंट आफ क्राइसिस) आदि। जेम्स वाल्श नामक एक लेखक ने ‘टाइम’ पत्रिका की आमुख मुस्लिम विश्व में क्रान्ति लाने का अपरिहार्य अंग हैं और उदार प्रजातंत्रों के लिए खतरा है। इसमें भी लिविस व हान्टिंगटन को उध्दृत किया गया था, पर बर्नार्ड लिविस के विचारों की स्वयं अमेरिका में कुछ विचारकों द्वारा आलोचना की गई है। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के एक विश्वविख्याता प्रोफेसर एडवर्ड सईद जो वहां तुलनात्मक साहित्य व अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ थे उन्होंने अपने 1978 के विश्वविख्यात ग्रंथ ‘ओरियन्टलिज्म’ और बाद के शोध ग्रंथों में मध्यपूर्व के प्रति पश्चिमी नजरिए की भर्त्सना की और लिविस को यहूदी समर्थक तक कह डाला। पर इससे लिविस के महत्वपूर्ण योगदान और उसकी विद्वता पर कभी संशय नहीं किया गया और उनकी समग्र ऐतिहासिक दृष्टि को आदर से देखा जाता है।

पर इन सब के बावजूद स्वयं लिविस यह स्वीकार करते है। कि पश्चिम में यदि द्रुतगति से फैलने वाली आज की यदि कोई आस्था है तो वह है इस्लामऔर इसीलिए उन्होंने इस चौंकाने वाली संभावना को रेखांकित किया है कि इस सदी के अंत तक यूरोप इस्लामी रंग को अपना सकता है, चाहे संगठित चर्च संप्रदायों के साथ-साथ उग्रवाद के संबंध में कितनी ही वैचारिक उठापठक की जाए। जनगणनाओं के विश्लेषणों, या जनसांख्यिकी दबाव भी यही सिद्ध करते हैं कि जिन पर तर्कों के जाल में यदि चाहें तो हम लोगों को भ्रमित करते रह सकते हैं। सहसा विश्वास नहीं होता है कि चर्च की यूरोप जैसी अभेद्य हृदयस्थली को, इस्लाम के विरूद्ध प्रचार के बावजूद, बर्नार्ड लिविस जैसे विश्वप्रसिद्ध विचारक भी मानते हैं, इस सदी के अंत तक, मुस्लिम आस्था नियंत्रित कर सकेगी। कभी-कभी ऐसा लगता है कि बर्नार्ड लिविस का यह प्रश्न उठाना आज के विकास क्रम के लिए श्रेयस्कर है क्योंकि इसके द्वारा विश्व राजनीति का मानचित्र फिर बदला सकता है। हाल में फ्रांसीसी समाचार एजेन्सी एएफपी और एसोसिएटेड प्रेस द्वारा प्रसारित ‘द फोरम आन रिलिजन एंड पब्लिक लाइफ’ के एक तीन वर्षीय अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ है कि आज विश्वभर में हर चार में से एक व्यक्ति इस्लामी आस्था को मानता है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले 90 देशों में भारत का स्थान आज तीसरा है। हमारे देश के ऊपर मात्र इण्डोनेशिया और पाकिस्तान ही हैं। चाहे बांग्लादेश हो या मिस्र, ईरान, तुर्की और अल्जीरिया या मोरक्को हो वहां मुसलमानों की संख्या भारत से कम है। हमारे देश में उनकी संख्या 16 करोड़ है। इसी अध्ययन में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि जर्मनी में लेबनान से अधिक मुस्लिम नागरिक हैं, चीन में इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले सीरिया से अधिक हैं और रूस, जार्डन और लीबिया की कुल मिलाकर मुस्लिम जनसंसख्या अधिक है। आज यह अवधारणा कि इसलाम धर्मावलंबी अरब मूल में है ध्वस्त हो चुकी है और यह पूरी तरह से एक वैश्विक समुदाय है।

– हरिकृष्ण निगम

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6 Comments on "इस सदी के अंत तक यूरोप का इस्लामीकरण एक संभावना"

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drshyam gupta
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——–ईसाई व मुस्लिम धर्म में मूलतः कोई अन्तर नहीं है…एक ही थेली के हैं…..योरोप चाहे इस्लामी हो या ईसाई क्या फ़र्क पडता है…..

abhijeet
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क़यामत की तैयारी है .

ANAND
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मुझे लगता है की दुनियासे अगर धर्मो का नमो निशान मिट जायेगा तो सबसे खुशीकी I बात होगी की हम एक हो जायेंगे और धर्मकी दीवारें गिर जाएगी ! कोई उच्च -कोई नीच जाती नहीं रहेगी कोई धर्मके नामपर मार-काट नहीं करेगा न कोई किसीका घर जलाएगा ! दुनियामे सबसे दरिंदा प्राणी है इन्सान ! सबसे बुद्दिमान है इन्सान लेकिन धर्मके जाल में ऐसा फंसा है की उस गर्तसे आज तक उबार नहीं पाया है धर्म ऐसी अफीम है की लोगोंके सरसे नहीं उतरती ! हरेक धर्मके ग्रंथोंमे भ्रामक कहानियां , चमतकारी किस्से गढ़े हुए है की आश्चर्य होता है… Read more »
M.A.Qasmi
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अच्छा लिखा hai

दिवाकर मणि
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एक शोधपरक आलेख, जिससे पूर्णरूपेण सहमत…………….

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