लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

Posted On by &filed under विविधा.


निर्मल रानी

 

हमारा देश जहां महारानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, टीपू सुल्तान, भगतसिंह तथा चंद्रशेखर आज़ाद व इन जैसे हज़ारों देश भक्त सूरमाओं का देश कहा जाता है वहीं जयचंद और मीर जाफर जैसे ग़द्दार भी हमारे देश की देन थे। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि समय के आगे बढऩे के साथ-साथ सच्चे देश भक्त जांबाज़ तो इतिहास के पन्नों तक में सिमट कर रह गए जबकि दूसरी ओर देश की राजनीति पर चारों ओर राष्ट्र विरोधियों लुटेरों, असमाजिक तत्वों तथा स्वार्थी व सत्ता लोलुप प्रवृति के लोगों का वर्चस्व हो गया। परिणामस्वरूप इन तथाकथित जिम्मेदार सत्ताधीशों ने देश को दोनों हाथों से लूटने के लिए भ्रष्टाचार का ऐसा खुला खेल खेलना शुरू कर दिया कि इन्हें अपने काले धन को छुपाने के लिए दूसरे पश्चिमी देशों के उन बैंकों का सहारा लेना पड़ा जो उच्च कोटि की गोपनीयता बरतने में विश्व विख्यात हैं। आज यह अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि हमारे देश के उन तथाकथित जिम्मेदार नेताओं,अधिकारियों तथा अन्य तमाम अति विशिष्ट समझे जाने वाले हज़ारों लोगों की अकूत धन संपत्ति उन विदेशी बैंकों में सुरक्षित है।

 

पिछले दिनों अमेरिका में आई भारी मंदी तथा आर्थिक संकट के बाद अमेरिका ने भी इस बात की ज़रूरत महसूस की कि उच्च स्तरीय गोपनीयता बरतने वाले ऐसे कई देशों के बैंकों से उन अमेरिकी खातेदारों का भी हिसाब-किताब मांगा जाए जो अपना काला धन इन बैंकों में जमा करते हैं। उसी समय से भारत में भी ऐसी ही आवाज़ ज़ोर पकड़ती गई। अब उसी काले धन की वापसी के लिए भारत में इतने अधिक लोग अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं गोया सबके सब ईमानदार हों तथा यह जानते ही न हों कि काला धन किसे कहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को साफ-सुथरा तथा हक व हलाल की कमाई करने वाला भारतीय प्रदर्शित करना चाह रहा है। इस शोर शराबे में मज़े की बात तो यह नज़र आ रही है कि सत्तारूढ़ यूपीए सरकार विशेष कर कांग्रेस के जिम्मेदार नेताओं को काला धन वापसी के इन हिमायतियों द्वारा इस प्रकार कठघरे में खड़ा किया जा रहा है गोया कांगेस या यूपीए ही काला धन विदेशों में जमा करने की सबसे बड़ी दोषी हैं। और तो और काला धन का यह मुद्दा बाबा राम देव जैसे योग सिखाने वाले योग गुरूओं के लिए भी राजनीति में प्रवेश करने का एक मुख्य द्वार सा बन गया है। स्वाभिमान ट्रस्ट के नाम से बनाए गए अपने संगठन के बैनर तले रामदेव पहले तो आम लोगों को बीमारी से मुक्ति दिलाने हेतु योगाभ्यास कराने की बात कहकर सुबह सवेरे चार या पांच बजे अपने निर्धारित शिविर में आमंत्रित करते हैं। उसके पश्चात योग सिखाने के दौरान या उसके बाद वे जनता से राजनैतिक मुद्दों को लेकर रूबरू हो जाते हैं। जनता व उनके मध्य संवाद का इस समय सबसे बड़ा मुद्दा विदेशों से काला धन मंगाना तथा राजनीति में भ्रष्टाचार ही खासतौर पर होता है।

 

धार्मिक चोला पहन कर या स्वयं को धर्मगुरू बताने के बाद राजनीति में प्रवेश करने का हमारे देश में कोई अच्छा परिणाम पहले नहीं देखा गया है। जय गुरूदेव तथा करपात्री जी भी हमारे देश में ऐसे धर्मगुरूओं के नाम हैं जिन्होंने राजनीति में क़दम रखकर कमाया तो कुछ नहीं हां गंवाया बहुत कुछ ज़रूर है। ऐसे में बाबा रामदेव उक्त धर्म गुरूओं से सबक लेना चाहेंगे या उनमें इनसे कहीं अधिक आत्म विश्वास भर चुका है यह तो उन्हीं को पता होगा। बहरहाल राजनीति में उनके पदार्पण की घोषणा के साथ ही उनकी फज़ीहत व आलोचना का दौर भी शुरू हो गया है। पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश में एक शिविर के दौरान उन्हें एक कांग्रेस सांसद ने ब्लडी इंडियन कह दिया। यह रामदेव का सार्वजनिक आरोप था । जबकि सांसद ने इस आरोप से इंकार किया है। सोनिया गांधी को भी यूरोप व इटली निवासी बताकर रामदेव उन पर विदेशी होने जैसा खुला हमला बोल रहे हैं। जगह-जगह योग शिविर में पहुंचने वाले लाभार्थियों की भारी संख्या देखकर बाबा जी कभी तो इतना गद गद हो जाते हैं कि उनके समझ में शायद यह भी नहीं आता कि वे जो कुछ भी बोल रहे हैं वह शिष्टाचार की परिधि में आता भी है या नहीं। जैसे गत् दिनों बिहार के बेतिया जि़ले के एक शिविर में बाबा रामदेव ने बड़े अहंकारपूर्ण ढंग से यह कहा कि राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री तो मेरे चरणों में आकर बैठते हैं तो आखिर मैं क्यों प्रधानमंत्री बनना चाहूंगा। देश के लोगों ने तो कभी भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को बाबा रामदेव के चरणों में बैठे नहीं देखा। परंतु बाबा जी ने अपनी शान स्वयं बढ़ाने के लिए ऐसा कहने में ज़रूर कोई हिचक महसूस नहीं की।

 

बहरहाल अब रामदेव व कांग्रेस पार्टी के एक सेनापति दिग्विजय सिंह उनसे दो-दो हाथ करने के लिए आमने-सामने आ चुके हैं। काले धन पर शोरशराबा करने वाले बाबा जी पर आक्रमण बोलते हुए दिग्विजय सिंह ने उनसे यह पूछा है कि आप भी इस बात का हिसाब दें कि आपके पास बारह वर्ष पूर्व तो महज़ एक साईकल हुआ करती थी आज आप एक हवाई जहाज़ सहित हज़ारों करोड़ रुपये की संपत्ति के मालिक कैसे बन गए? इसके जवाब में बाबा जी ने वही कहा जो आमतौर पर सवालों के घेरे में आने के बाद दूसरे तमाम लोग कहा करते हैं। यानि यह पैसा मेरे अपने नाम पर नहीं बल्कि अमुक ट्रस्ट, संगठन, संस्था या संस्थान के नाम है। परंतु दिग्विजय सिंह की एक बात में ज़रूर पूरा दम नज़र आया कि बाबा जी को अपने भक्तों द्वारा दान में दी जाने वाली राशि को लेकर यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वह रकम कहीं भ्रष्टाचार का पैसा या काला धन तो नहीं है। आमतौर पर देखा भी यही जाता है कि बाबा रामदेव जहां भी जाते हैं वहां का अधिकांशत: व्यापारी वर्ग ही उनके कार्यक्रम तथा स्वागत आदि का जि़ मा संभालता है। अब यहां यह कहने की ज़रूरत नहीं कि इन स्वागतकर्ता व्यवसायियों में कितने लोग ऐसे होते हैं जो दाल में नमक के बराबर मुनाफा कमा कर अपना व्यवसाय चलाते हैं तथा सभी सरकारी कर नियमित रूप से ठीक प्रकार से देते हैं। । बाबा रामदेव से ही जुड़ी दिव्य फार्मेसी नामक वह संस्था भी है जो बाबा जी का अपना आयुर्वेदिक उद्योग है। यहां भी जो दवाईयां मिलती हैं उनका मूल्य बाज़ार में आमतौर पर मिलने वाली दवाईयों से कहीं अधिक मंहगा होता है। इनके तो योग शिविर में प्रवेश करने तथा आगे-पीछे बैठने के भी अलग-अलग शुल्क निर्धारित किए जाते हैं। बताया जा रहा है कि इसी प्रकार रामदेव ने विदेशों में भी अपनी तमाम संपत्तियां बना ली हैं यहां तक कि कथित रूप से एक छोटा समुद्री द्वीप तक बाबा जी ने खरीद लिया है।

 

कांग्रेस बनाम बाबा रामदेव के मध्य काला धन मुद्दे को लेकर छिड़ी इस जंग में बंगारू लक्ष्मण, दिलीप सिंह जूदेव, येदूरप्पा जैसे नेताओं की पार्टी अर्थात् भारतीय जनता पार्टी रामदेव के पक्ष में उतर आई है। रामदेव अपने शिविर में 5-6 फीट के एक गद्दे पर बैठे एक-एक व्यक्ति की भीड़ को देखकर गदगद् हो उठते हैं तथा उन्हें शायद यह महसूस होने लगता है कि सभवत: सारा देश ही उनका अनुयायी बन चुका है। इसी तरह भाजपा भी इसी गलतफहमी की शिकार है कि वह रामदेव का साथ देकर उनके अनुयाईयों को समय आने पर अपने पक्ष में आसानी से हाईजैक कर लेगी। परंतु ज़मीनी हकीकत तो कुछ और ही है। भले ही स्वाब्जिमान ट्रस्ट,दिव्य फार्मेसी या पतंजलि योग पीठ जैसे संस्थानों के सक्रिय कार्यकर्ता व पदाधिकारीगण जगह-जगह उनके साथ क्यों न जुड़ रहे हों परंतु भीड़ के रूप में दिखाई देने वाले यह लोग दरअसल किसी योग शिविर में अपने इलाज व स्वास्थ्य लाभ के लिए ही जाते हैं न कि किसी प्रकार की राजनैतिक विचारधारा में बंधने की गरज़ से। वैसे भी जिस उम्र के लोग रामदेव के शिविर में आते हैं उस उम्र में आम लोगों की राजनैतिक सोच व दिशा पूरी तरह परिपक्व होती है तथा काला धन या भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से को लेकर उन्हें अपने वैचारिक मार्ग से डगमगाया नहीं जा सकता। इन सब के बावजूद भी यदि बाबा रामदेव राजनीति में प्रवेश करना चाह रहे हैं तथा उनका मकसद वास्तव में विदेशों में जमा काला धन की वापसी तथा भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना है तो वास्तव में उनका स्वागत किया जाना चाहिए। परंतु इसके लिए रामदेव को अपने आसपास के लोगों, सलाहकारों, समर्थकों तथा पदाधिकारियों की भी स्पष्ट व निष्पक्ष स्कैनिंग करनी चाहिए कि कहीं उनके भक्तजनों में भी ऐसे लोग तो शामिल नहीं जो कि भ्रष्टाचार तथा काले धन के संग्रह को ही अपने जीवन की सबसे बड़ी सफलता मानते हों।

 

Leave a Reply

19 Comments on "पश्चिमी देशों में जमा काला धन की वापसी के ये पैरोकार"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Sajid
Guest

अगर बाबा अपने मकसद को लेकर खुद जागरूक है तो उन्हें सबसे पहले ये सुनिश्चित करना होगा की जो धन वो ले रहे है वो कोई कला धन तो नहीं है! महज़ काले धन का एक व्यक्ति के कब्ज़े से दुसरे व्यक्ति के कब्ज़े में चले जाने मात्र से वो धन सफ़ेद नहीं हो जायेगा!

Rajesh
Guest

किसी ने शुरवात तो की हमें उनका साथ देना चाहिया

ajit bhosle
Guest
बाबा को ऊपर उठाने वाले लोगों ने बाबा को उपर नहीं उठाया है बाबा स्वयं अपने अच्छे कार्यों से ऊपर उठे हैं, अगर बाबा के आय के साधन अनेतिक होते तो लोग क्या समझते हैं बाबा इतने आराम से सरकार के खिलाफ बोल रहे होते, कदापि नहीं बाबा स्वयम अपनी सम्पति घोषित करें या ना करें उच्च पदों पर बैठे लोगों को उनकी सम्पति एवं आय के स्त्रोत आम लोगों से ज्यादा पता होंगे क्योंकि सारीअनुसंधान करने वाली शक्तियां और उनका नियंत्रण उन लोगों के हाथ में ही है, और वे बाबा की एक चूक का इन्तजार ही कर रहे… Read more »
आर. सिंह
Guest
इस वार्तालाप को आगे बढाते हुए मैं कहना चाहता हूँ की बिना आदर्श का सहारा लिए हुए भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता.मैंने १९७३ से १९८० के भारत के इतिहास के माध्यम से यही समझाने का प्रयास किया है.यह महात्मा गाँधी का आदर्श ही था,जिसके बल पर हम बिना खून खराबा के आजाद हो सके.आज की हमारी हालात का कारण भी उस आदर्श से हमारी दूरी है.अगर हम उसी आदर्श पर चले होते तो भारत कही बहुत ऊपर होता दूसरी बात बाबा रामदेव के युग पुरुष होने की बात, तो अभी भी यह प्रमाणित होना बाकी है.रही बात सूरज को गुलेल… Read more »
ajit bhosle
Guest
सुनील भाई क्या वाक्य लाये हो “सूरज को गुलेल मारना” बाबा रामदेव पर कभी भी कोई आरोप सिध्ध नहीं हो पायेगा, क्योंकि जो लोग बाबा को करीब से जानते हैं वे ही आपको बता सकते हैं की बाबा अपने उद्देश्यों के प्रति किस जूनून के साथ आगे बढ़ते हैं, वो अगर कुछ सालों पहले साइकिल से चलते थे अब उनके संस्थानों का turnover करोडो में है तो ये उनके लक्ष्य पाने के प्रयासों को इंगित करता है यदि बाबा भ्रष्टाचार या बेईमानी से ये धन संग्रह करते तो राजा को तो जेल जाने मे बहुत समय लग गया, इनको पहली… Read more »
wpDiscuz