लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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jammu and kashmirजम्मू-कश्मीर की जब भी चर्चा होती है तो उसके साथ ही संघीय संविधान की एक अस्थाई धारा-370 की चर्चा अनिवार्य रूप से होती है। धारा-370 पर दो पक्ष बन गए हैं। एक पक्ष इस धारा को खत्म करने के पक्ष में है और दूसरा पक्ष इसे बनाए रखने के पक्ष में है। दोनों पक्ष यह मानकर चलते हैं कि धारा-370 से जम्मू-कश्मीर राज्य को देश में एक विशेष दर्जा हासिल है। क्या सचमुच  ही धारा-370 जम्मू-कश्मीर को एक विशेष दर्जा देती है ? और भारतीय संविधान में इस धारा को शामिल करने की जरुरत क्यों पड़ी ? इन दोनों प्रश्नों पर विचार करना जरूरी है। हम सबसे पहले दूसरे प्रश्न पर कि इस धारा को संविधान में शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी , पर विचार करेंगे?

​इंग्लैंड की संसद द्वारा पारित भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम-1947 के प्रावधानों ने १५ अगस्त १९४७ को ब्रिटिश इंडिया को भारत और पाकिस्तान, दो अधिराज्यों  में विभाजित कर दिया। प्रत्येक अधिराज्य का अलग-अलग गवर्नर जनरल होगा और इंग्लैंड की महारानी की शाब्दिक सत्ता दोनों अधिराज्यों पर बनी रही । दोनो अधिराज्यों को अपना अलग-अलग संविधान बनाना था । जब तक नया संविधान नहीं बन जाता तब तक भारत अधिराज्य में शासन व्यवस्था भारत सरकार अधिनियम-1935 में आवश्यक संशोधनों के अन्तर्गत चल रही थी ।

​ भारत स्वतंत्रता अधिनियम-1947 और भारत सरकार अधिनियम 1935 को एक साथ पढ़ने से स्पष्ट था कि ब्रिटिश इंडिया के अधिकार क्षेत्र से बाहर की भारतीय रियासतों को दोनों अधिराज्यों में से किसी एक में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। भारत सरकार के रियासती मंत्रालय ने, जिसके प्रभारी मंत्री उस समय सरदार पटेल थे, एक अधिमिलन पत्र तैयार किया जिसमें सभी रियासतों के राजाओं को कहा गया कि वे अपनी रियासत का अधिराज्य में अधिमिलन करने के पश्चात तीन विषय, विदेश सम्बन्ध, सुरक्षा और संचार संघीय संविधानिक व्यवस्था को दे दें और शेष मामलों में वे अपनी रियासतों के भीतर पूर्ववत शासन चला सकते है। कुछ रियासतों को छोड़ कर बाकी लगभग सभी रियासतों के राजाओं ने संघ के इस प्रस्तावित अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करके भारत अधिराज्य  में शामिल होने का निर्णय 15 अगस्त 1947 से पहले ही कर लिया था। अनेक कारणों से कुछ रियासतें अधिराज्य में 15 अगस्त 1947 के बाद शामिल हुई। उनमें जम्मू-कश्मीर भी एक थी।

​भारत की संविधान सभा द्वारा देश के लिए नये संविधान की प्रक्रिया 15 अगस्त 1947 से काफी देर पहले ही शुरु हो चुकी थी । जो रियासतें अधिराज्य में शामिल हुई थीं , उन्होंने भी निर्मित हो रही नई संघीय संविधान व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी के लिये , अपनी जनसंख्या के अनुपात से अपने प्रतिनिधि संघीय संविधान सभा में भेजे । इस प्रकार नया संविधान बनाने में सभी रियासतों की भी भागीदारी थी। प्रारंभ में यह ही सोचा गया था कि प्रत्येक रियासत की अपनी-अपनी संविधान सभा गठित की जाएगी और वे संविधान सभाएं अपनी-अपनी रियासत के लिए संविधान बनाएगी। उपरोक्त तीन विषयों पर संघीय संविधान की व्यवस्था अन्य राज्यों के समान इन रियासतों पर भी लागू होगी । परन्तु एक ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर दिया जाना संविधानिक दृष्टि से बड़ा अनिवार्य था। यदि सभी रियासतें अपने लिए अलग-अलग संविधान बनाती हैं तो हो सकता है कुछ क्षेत्रों में उन संविधानों और संघीय संविधान में टकराव की स्थिति पैदा हो जाए । इसलिए जरुरी था कि रियासतों के संविधानों और संघीय संविधान में एकरूपता बनी रहे। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए संविधान विशेषज्ञ  बी . एन .राउ की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया और उस कमेटी से कहा गया कि वह सभी रियासतों के लिए एक मानक संविधान तैयार करे । सभी रियासतों की संविधान सभाएं उस मानक संविधान को अपने अपने राज्य हेतु स्वीकार करेंगी ।

​रियासतों के लिए यह मानक संविधान तैयार करने की प्रक्रिया अभी चल ही रही थी कि कुछ क्षेत्रों में यह कहा जाने लगा कि अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग संविधान बनाने से बाद में समस्या उत्पन्न हो सकती है इसलिए रियासतों के लिए अलग संविधान तो बने लेकिन उसे समग्र रूप से संघीय संविधान का ही भाग होना चाहिए । इस पर विचार करने के लिये विभिन्न रियासतों के प्रधानमंत्रियों की बैठक १९ मई १९४९ को बुलाई गई । इसमें निर्णय किया गया कि रियासतों के लिये संविधान भी संघीय संविधान सभा ही बनायेगी और ये संविधान समग्र संघीय संविधान का ही हिस्सा होंगे । लेकिन तब तक संघीय संविधान का प्रारुप लगभग तैयार हो चुका था । इसलिए एम . के . बेलोडी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जो रियासतों के लिए संविधान के प्रावधानों को भी संघीय संविधान में समाहित करने के तरीके निकालें।

इधर ​संघीय संविधान निर्माण की ये सभी प्रक्रियाएं चल ही रही थीं उधर जम्मू कश्मीर रियासत में एक नया इतिहास लिखा जा रहा था । 26 अक्तुबर 1947 को जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा ने भी मानक अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करके संघ में शामिल होने का निर्णय कर लिया। जैसा कि अन्य रियासतों के मामले में हुआ था जम्मू-कश्मीर रियासत ने भी संघ के रियासती मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुरूप विदेशी मामले, सुरक्षा, संचार और इन से जुड़े विषयों पर संघीय संविधानिक व्यवस्था को स्वीकार किया था। इस समय संघीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी । अत: रियासत ने तुरन्त अपने चार प्रतिनिधि संघ की संविधान सभा में भेजे और उन्होंने संघ की नई संविधानिक व्यवस्था में अन्य प्रतिनिधियों की तरह ही शिरकत की । अब तक बेलोडी समिति की रपट भी आ गई थी और संघ में शामिल हुई रियासतों को संघीय संविधानिक व्यवस्था में समाहित कर लिया गया था। कुछ छोटी रियासतें तो साथ के बड़े प्रांतों का ही हिस्सा बन गई थी। कुछ स्थानों पर छोटी-छोटी अनेक रियासतों को मिला कर एक नये राज्य का गठन कर दिया गया था। हिमाचल और पेप्सु ऐसे ही राज्य थे। इस प्रकार संघ के नये संविधान में रियासतों को ख श्रेणी और ग श्रेणी के राज्यों में विभाजित कर दिया गया। ख श्रेणी के राज्यों में बड़ी रियासतें आती थीं और ग श्रेणी राज्यों में छोटी-छोटी रियासतें आती थी। ख श्रेणी राज्यों में संविधानिक प्रमुख का नाम राज प्रमुख रखा गया और ग श्रेणी राज्यों को कमिश्नर के राज्य कहा गया । इस प्रकार जम्मू-कश्मीर रियासत संघीय संविधान रियासत ख श्रेणी राज्यों में सूची बंद्ध की गई और महाराजा हरिसिंह को उसके राज प्रमुख के तौर पर मान्यता दी गई। जिस प्रकार अन्य रियासतों को अपनी संविधानसभाएं गठित करने और अपने लिए संविधान का निर्माण करने के लिए कहा गया था उसी प्रकार जम्मू-कश्मीर रियासत को भी कहा गया ।

​लेकिन 26 जनवरी 1950 को भारत नई संविधानिक व्यवस्था में, ब्रिटिश साम्राज्य का अधिराज्य न रह कर स्वयं को एक गणतंत्र घोषित कर रहा था। बाकी सभी रियासतों के संविधान तो संघीय संविधान में ही समाहित हो गए थे लेकिन कश्मीर में सामान्य स्थिति नहीं थी। सबसे पहले तो जम्मू-कश्मीर राज्य पर पाकिस्तान ने आक्रमण किया हुआ था। यद्यपि एक 1 जनवरी 1949 को युद्ध विराम हो चुका था तब भी राज्य में हालात सामान्य नहीं हुए थे। सबसे बढ़कर राज्य का एक तिहाई हिस्सा अभी भी पाकिस्तान के कब्जे में था और भारत सरकार उस हिस्से को पाकिस्तान से छुड़ाने का प्रयास कर रही थी । दूसरे, भारत जम्मू-कश्मीर राज्य पर पाकिस्तान के आक्रमण के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गया था। भारत की मांग थी कि संयुक्त राष्ट्र संघ पाकिस्तान को आक्रमणकारी घोषित करे और उसे कब्जाई गयी भारत भूमि छोड़ने के लिए कहे। भारत की यह शिकायत सुरक्षा परिषद् में अब तक लम्बित थी। इन सभी कारणों से इस रियासत का संघीय सांविधानिक व्यवस्था में पूरी तरह एकीकरण हो नहीं पाया था । अब जब १५ अगस्त १९४७ को भारत अधिराज्य न रह कर गणतंत्र बन जायेगा तो जम्मू कश्मीर पर संघीय सांविधानिक व्यवस्था किस पद्धति से लागू की जाये ? यह प्रश्न सब के सामने था ।  क्योंकि पाकिस्तानी आक्रमण के कारण जम्मू-कश्मीर में संविधान सभा का गठन हो नहीं सका था और भारत सरकार ने स्वस्थ लोक तांत्रिक परम्पराओं के अनुरूप यह भी निर्णय किया हुआ था कि राज्य के लोग, नई संघीय संविधानिक व्यवस्था को स्वीकारने के लिए अपने राज्य की संविधान सभा के द्वारा इसका अनुमोदन करेंगे। केवल एक राज्य जम्मू-कश्मीर की युद्ध ग्रस्त स्थिति के कारण गणराज्य की घोषणा भी रोकी नहीं जा सकती थी। इन परिस्थितियों में निर्णय किया गया कि संघीय संविधान में एक ऐसी धारा जोड़ी जाए जिसमें जम्मू-कश्मीर राज्य में संघीय संविधानिक व्यवस्था को लागू करने के लिए एक अतिरिक्त प्रक्रिया निश्चित की जाए। ताकि जब जम्मू-कश्मीर राज्य में स्थितियां सामान्य हो जाएंगी तो वहां की संविधान सभा संघीय संविधानिक व्यवस्था के जो प्रावधान राज्य में लागू करना चाहे उसके लिए संघीय संविधान में बार-बार संशोधन न करना पड़े । इस हेतु राष्ट्रपति को ही यह अधिकार दे दिया जाए कि वे कार्यपालिका आदेश के द्वारा संघीय संविधानिक व्यवस्था को उसी रूप में, अपवाद या उपान्तरणों सहित राज्य में लागू कर सकें।

इस पृष्ठभूमि में गोपालस्वामी आयंगर ने संघीय संविधान सभा में धारा ३०६ -ए का प्रारूप प्रस्तुत किया ।( धारा ३०६ ए ही बाद में धारा ३७० बनी) ।प्रस्तावित धारा ३०६-ए प्रस्तुत करते समय उसकी आवश्यकता को रेखांकित करते हुये उन्होंने जो कहा वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है । आयंगर ने कहा कि सभी रियासतों का भारत अधिराज्य में विलय , मानक विलय पत्र पर शासकों के हस्ताक्षर द्वारा हुआ था , लेकिन अब निकट भविष्य में यह अधिराज्य तो रहेगा नहीं , बल्कि इसकी जगह भारत गणराज्य स्थापित हो जायेगा । परन्तु सभी विलीन रियासतों का क्योंकि पहले ही अधिराज्य में एकीकरण हो चुका है और उन सभी ने संघीय संविधान को स्वीकार कर लिया है , इसलिये वे अब भारत गणराज्य का हिस्सा , विलय पत्र पर वहाँ के शासकों के हस्ताक्षर के कारण नहीं , बल्कि इस एकीकरण प्रक्रिया के कारण और संघीय संविधान को स्वीकार कर लेने के कारण बनेंगी ।  लेकिन सांविधानिक एकीकरण की यह प्रक्रिया जम्मू कश्मीर में अनेक कारणों से पूरी नहीं हो सकी है । इन कारणों में प्रमुख कारण तो राज्य पर पाकिस्तान का आक्रमण ही है । शत्रु ने राज्य के एक तिहाई भाग पर क़ब्ज़ा भी कर रखा है , उस को छुड़ाने का भी प्रश्न है । राज्य की निर्वाचित प्रजा सभा विभाजन और आक्रमण के कारण निष्प्रभावी हो गई है और नई संविधान सभा का अभी गठन नहीं किया जा सका है । संविधान सभा को राज्य के विलय को अनुमोदित करना है । इन सभी कारणों से प्रश्न यह है कि राज्य भारत गणतंत्र का अंग कैसे बने और यहाँ संघीय संविधान कैसे लागू है । इन सभी कारणों से जम्मू कश्मीर के संघ में एकीकरण हेतु और उसे संघीय सांविधानिक व्यवस्था का अंग बनाने के लिये धारा ३०६ -ए संविधान में प्रस्तावित की गई है ।

आयंगर ने कहा ,कि इस धारा के कारण

१ जम्मू कश्मीर जो भारत का अंग है , वह भविष्य के संघीय गणतंत्र का अंग भी बना रहेगा ।

२ इस धारा के कारण संघीय विधायिका को , उन सभी विषयों पर , जिनका विलय पत्र में उल्लेख है , विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त हो जायेगा ।इन विषयों को राज्य सरकार की सहमति से बढ़ाया भी जा सकेगा ।

३ भविष्य में जब राज्य की संविधान सभा गठित हो जायेगी तो वह राज्य का संविधान बना लेने के उपरान्त राष्ट्रपति को इस धारा को निरस्त करने के लिये भी कह सकती है और इसमें प्रवर्तन भी कर सकती है । राष्ट्रपति स्वयं भी लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेंगे कि यह धारा प्रवर्तन में नहीं रहेगी या फिर ऐसे अपवादों और उपान्तरणों सहित ही प्रवर्तन में रहेगी ,जो वे विनिर्दिष्ट करें । परन्तु इसके लिये राज्य की विधान सभा की सिफ़ारिश ज़रुरी होगी ।

कोई भ्रम न रहे इस लिये भारत सरकार ने श्वेत पत्र में भी स्पष्ट किया कि जम्मू कश्मीर के महाराजा ने भी भारत में अधिमिलन के लिये उसी अधिमिलन पत्र को निष्पादित किया , जिसे अन्य रियासतों के राजाओं ने किया । इसलिये क़ानूनी दृष्टि से और सांविधानिक दृष्टि से भी इस रियासत की वही स्थिति है जो संघ में विलीन होने वाली अन्य रियासतों की । यह ठीक है कि भारत सरकार ने लोगों की राय जानने का निर्णय किया है , लेकिन इससे रियासत के अधिमिलन की क़ानूनी स्थिति पर कोई अन्तर नहीं पड़ता । यही कारण है कि रियासत को संघीय संविधान के ख श्रेणी के राज्यों में शामिल किया गया है ।

संविधान में धारा ३०६-ए के समावेश से जम्मू कश्मीर राज्य भी संघीय गणतंत्र की इकाई बन गया और इसका शुमार भी अन्य रियासतों की तरह ख श्रेणी के राज्यों में किया गया । गणतंत्र की घोषणा होने से कुछ दिन पहले ख श्रेणी के सभी राजप्रमुखों ने अपने अपने राज्य के लिये संघीय संविधान को लागू करने की उदघोषणा की । उसी प्रकार की उदघोषणा जम्मू कश्मीर के राजप्रमुख के रीजैंट ने की । संविधान की धारा १ और ३७० को तो तुरन्त प्रभाव से लागू कर दिया गया और शेष संविधान को लागू करने की अतिरिक्त प्रक्रिया धारा ३७० में ही दी गई थी । धारा ३७० का समावेश संघीय संविधान के ——– अध्याय में किया गया । इस अध्याय में अन्य अनेक राज्यों के लिये वहाँ की परिस्थितियों को देखते हुये ऐसे प्रावधान किये गये हैं ।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि संघीय संविधान की धारा ३७० किसी दृष्टि से भी जम्मू कश्मीर राज्य को कोई विशेष दर्जा नहीं देती । संघीय संविधान में संघ की विभिन्न इकाइयों से सम्बधित सांविधानिक प्रवधान तो वैसे भी अलग ही है । संघीय संविधान में राज्यों का अधिकार क्षेत्र स्पष्ट है । जम्मू कश्मीर के अपने संविधान में भी राज्य का अधिकार क्षेत्र स्पष्ट है । लेकिन बाक़ी राज्यों का संविधान संघीय संविधान की आन्तरिक परिधि में है और जम्मू कश्मीर का संविधान बाहर की परिधि में है । जैसे कंगारु का बच्चा उसके पेट में है या उसके गले के नीचे लटक रही थैली में ? लेकिन दोनों ही स्थितियों में बच्चे की मौलिक स्थिति में तो कोई अन्तर नहीं पड़ता ।जम्मू कश्मीर के सम्बध में भी  संघीय संविधान की संघ सूची में चिन्हित कर दिये गये विषयों के अतिरिक्त अन्य विषयों पर संघीय विधानपालिका विधि निर्माण कर सकती है लेकिन उसके लिये राज्य सरकार का अनुमोदन ज़रुरी है ।

लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि अब इतने साल बाद भी संविधान में धारा ३७० रखने की ज़रुरत क्या है ? वैसे भी संविधान में इसे अस्थाई प्रावधान ही कहा गया था । भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति से अब इस धारा को कोई ताल्लुक नहीं रह गया है । राज्य में सांविधानिक व्यवस्था साठ साल से चल रही है । संयुक्त राष्ट्र संघ में लम्बित पड़ी भारत की शिकायत तकनीकी आधार पर ही लम्बित है अन्यथा व्यावहारिक रुप से अब वह अप्रासांगिक हो गई है क्योंकि ताशकन्द समझौते और शिमला समझौते में भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही निर्णय कर लिया था कि आपसी विवाद द्विपक्षीय वार्ता से ही सुलझाए जायेंगे , उसमें किसी तीसरे पक्ष की ज़रुरत नहीं है ।रियासत के संघ में अधिमिलन का अनुमोदन भी राज्य की संविधान सभा काफ़ी अरसा पहले ही कर चुकी है । अत:  गोपालस्वामी आयंगर ने यह धारा प्रस्तावित करते समय जिन परिस्थितियों की बात की थी वे सभी समाप्त हो चुकी हैं । राज्य के संघ में एकीकरण की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है । राज्य के संविधान में केवल यह प्रावधान ही नहीं है कि राज्य भारत का अभिन्न अंग है , साथ ही यह भी प्रावधान है कि इस को चुनौती

धारा ३७० स्वयं में भी कुछ सीमा तक अर्थहीन होती जा रही है ।धारा ३७० में प्रावधान है कि संविधान की धारा २३८ के उपबन्ध जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होंगे । लेकिन अब संघीय संविधान में से धारा २३८ ही संशोधन के बाद समाप्त कर दी गई है । ख श्रेणी के राज्य संघीय संविधान में समाप्त कर दिये गये हैं और संघ के सभी राज्य एक ही श्रेणी के हैं । जम्मू कश्मीर की भी संविधान में यही स्थिति है । उसे धारा ३७० की बजह से कोई विशेष दर्जा हासिल नहीं है । लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर कश्मीर के कुछ लोगों के मन में इस धारा से अलगाव की भावना उपजती है । शायद यही कारण था कि जम्मू कश्मीर सरकार बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद और ग़ुलाम मोहम्मद सादिक़ के काल में स्वयं इस धारा को निरस्त कर देने के पक्ष में थी ।

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