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-आर. एल. फ्रांसिस

जनगणना में जाति को शामिल किया जाए या नहीं, इस बात का निर्णय करने के लिए संप्रग सरकार ने मंत्रियों के एक समूह का गठन किया है, जो जल्द ही इस पर अपना निर्णय देगा। देश में 2011 की जनगणना का कार्य चल रहा है। सतारुढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के कई घटक दलों ने जनगणना में जाति को अधार बनाने की कोशिश की है केन्द्र सरकार ऐसे दलो के दबाव में है प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में घोशणा की थी कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल इस मामले में सदस्यों की भावना को ध्यान में रखते हुए जल्दी ही सकरात्मक फैसला करेगा। लगता है कि सरकार जातिगत गणना के बाद पैदा होने वाली कठनाइयों से बचने का अब रास्ता ढूंढ रही है मंत्रियों के समूह का गठन इसी दिशा में उठाया गया पहला कदम है।

1857 में अंग्रेजों के विरुद्व हुए विद्रोह के कारण भारत में राश्ट्रवाद की जो लहर चली थी उसे तोड़ने के लिए उन्होंने समाज में फूट के बीज बोने के लिए जातीय जनगणना का सहारा लिया। 1871 से 1931 तक की जनगणना में जाति शामिल थी उससे जातीय महासभाओं का जो उपद्रव खड़ा हुआ और सामाजिक विद्वेष पनपा उसे देखते हुए कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद जाति के अधार पर गिनती नही की गई इसके पीछे तर्क था कि इससे देश में जाति विभेद बढ़ता है।

ब्रिटिश शासन ने बहुसंख्यक हिन्दूओं को तोड़ने के लिए दलित एवं वनवासियों को उनसे अलग करने की कई योजनाओं पर कार्य किया। अंग्रेजों ने अपने पैर जमाने के लिए ”वर्ण व्यवस्था” के साथ कई प्रयोग किये। 1871 में ‘जरायमपेशा जातियों” के लिए कानून बनाकर कुछ वर्गो को हमेशा के लिए ‘अपराधी’ घोशित कर दिया और यही वह नजरीया था कि 1891 की पहली मर्दुम षुमारी में सिर्फ जातियों की गणना नहीं बल्कि उनकी परिभाशा और व्याख्या को भी शामिल किया गया। इसी का नतीजा था कि ब्रिटिश शासन कुछ खास जातियों को अपने पक्ष में गोलबंद करने में सफल रहा।

जाति भारत की एक अट्ल सच्चाई है वह अपने भीतर सामाजिक, आर्थिक, एवं राजनीतिक स्तरों व अधिकारों को एक साथ समेटे हुए है। भारतीय इतिहास गवाह है कि जातिय उत्पीड़न के षिकार करोड़ों – करोड़ लोगों ने इस से मुक्ति के लिए हिन्दू धर्म/ विचारधारा को आलविदा कह कर इस्लाम और ईसाइयत की शरण ली थी। इसे बड़े खतरे के रुप में लेते हुए हिन्दू नेताओं ने ‘जाति व्यवस्था की जटिलता” को समाज के सामने साफ करने की कोशिश की। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी आदि नेताओं ने ‘जाति की व्याख्या’ ‘गुण एवं कर्म’ के अधार पर की। और उन्होंने निम्न जातियों के हिन्दुओं को ब्रिटिश शासन द्वारा अलग किये जाने की योजना पूना पैक्ट द्वारा विफल कर दी।

ईसाइयत और इस्लाम में दीक्षित निम्न जातियों के वंचित वर्ग आज वहा अपने को असहज महसूस कर रहे है। इन दोनों धर्मो ने अपना तो विकास किया परन्तु निम्न जातियों से आये इन वंचित वर्गो की सुध नही ली। ब्रिटिश शासन के अंत के साथ ही ईसाई मिशनरियों ने निम्न जातियों से ईसाइयत में दीक्षित लोगों को संविधान द्वारा घोशित निम्न जातियों की सूची में रखने की मांग षुरु कर दी थी। लेकिन संविधानसभा ने इसे नही माना। उसे डर था कि ऐसा करने से धर्मपरिर्वन को बढ़वा मिलेगा और इससे देश में तनाव का वातावरण उत्पन होगा।

भारतीय चर्च 1980 से वर्ल्ड चर्च कौंसिल एवं वैटिकन के निर्देषों के तहत ईसाइयत में निम्न जातियों से दीक्षित हुए लोगों को हिन्दू अनुसूचित जातियों की श्रेणी में ले जाने के लिए संविधान में संषोधन करने की मांग कर रहा है। उसका तर्क है कि दीक्षित लोगों के साथ जाति के अधार पर ‘ईसाइयत’ में भेदभाव हो रहा है। मुस्लिम समाज पहले तो अपने अंदर जाति को नकारता रहा है परन्तु अब उसे इसमें लाभ दिखाई देने लगा है अत: वह भी चर्च नेताओं की राह पर चल पड़ा है। इसी का नतीजा है कि सरकार ने उनके वोट बैंक को ध्यान में रखकर ‘सच्चर कमेटी’ का गठन किया था और उसके कुछ ही समय बाद ‘रंगनाथ मिश्र आयोग’ की स्थापना करके इन दोनो धर्मों के लोगों को जाति के अधार पर आरक्षण देने की सिफारिश की है। हालांकि आयोग ने यह माना कि इन दोनो धर्मो ‘ईसाइयत एवं इस्लाम’ में जातियों की संख्या का उसके पास कोई प्रमाणिक आंकड़ा नही है।

जनगणना में जाति को शामिल करने की मांग 2001 में चर्च ने जोरदार तरीके से उठाई थी। सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय ने चर्च की मांग का अनुमोदन किया था परन्तु वाजपेयी सरकार ने इसे नही माना। कुछ चर्च नेताओं ने ‘भारत के जनगणना प्रमुख, महानिबंधक’ को कानूनी नोटिस भी भेजा था। चर्च चाहता था कि अनुसूचित जातियों के लोगों से धर्म संबधी स्वाल न पूछे जाए। यूपीए सरकार आने के बाद जाति जनगणना के परोकर ‘गैर सरकारी चर्च संगठनों’ ने अपनी मुहिम तेज की। इसी का नतीजा था कि 2005 में यूपीए की सलाहकार परिषद में यह मुद्दा उठा। वरिष्‍ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने अपने एक लेख में लिखा है कि तब परिषद की अध्यक्ष श्रीमती सोनियां गांधी यह थाह ले रही थी कि दूसरे राजनीतिक दलों में इस पर क्या सहमति है। कई लोगों का मानना है कि श्रीमती सोनिया गांधी जाति अधारित जनगणना के पक्ष में है और इसके चलते कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि देर-सेवर जातियों के आकड़े इक्कठे किये जाएगें।

अगर ईमानदारी से देखा जाए तो जातीय गणना का कोई बड़ा लाभ ईसाई एवं ईस्लाम के अनुयायियों को भी नहीं होगा उल्टे वह उसी व्यवस्था में धकेल दिये जायेंगे जिससे मुक्ति के लिए उन्होंने धर्म-परिवर्तन करने जैसा कड़ा फैसला लिया था। आज हिन्दू समाज में ‘राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ और हजारों अन्य संगठन समरस्ता का बीज बोने के कार्य में लगे हुए है। पिछले 30 जून को जाति विरोधी संगठन ”मेरी जाति हिंदुस्तानी” से जुड़े कुछ प्रमुख भारतीयों ने डा. वेदप्रताप वैद्विक के नेतृत्व में ‘गृहमंत्री पी. चिदाबरम” से भेट करके जनगणना में जाति को शामिल किये जाने पर अपत्ति दर्ज करवाई। संगठन 18 जुलाई को दिल्ली समेत देश के विभिन्न महानगरों में ‘एक दिन का उपवास’ करने जा रहा है। उपवास में देश एवं समाज के विभिन्न वर्गो के जाने-माने लोग षिरकत करेगें तांकि सरकार को सद्वबुद्वि आए। ईसाई-इस्लाम के अंदर जाति भेद है तो उसे खत्म करना इस धर्म के धार्मिक नेताओं का काम है। न कि जाति को उन धर्मो के बीच कानूनी मान्यता दे दी जाए। अगर ऐसा हुआ तो इसकी प्रतिक्रिया भी होगी।

संविधान सभा ने जबहिन्दू दलितों के लिये आरक्षण उपलब्ध करवाया तो हिन्दुओं, जो कि बहुसंख्यक थे ने दलित वर्गो के आरक्षण को सिंद्वात रुप से स्वीकार कर लिया था। संविधान में ‘सामनता’ के अवसर को उन्होंने दलित वर्गो के पक्ष में कुर्बान कर दिया थाा, उस बुरे व्यवहार और भेदभाव के मुआवजे/हर्जाने के रुप में, जो उनके पूवर्जो ने दलित वर्गो के साथ किया था। लेकिन आज आरक्षण की चाहत में हर वयक्ति एवं नेता इसी जुगाड़ में लगा हुआ है कि उसके लोगों को निम्न जातियों की सूची में शामिल कर लिया जाए तांकि वह आरक्षण और सत्ताा की मलाई खा सके। संविधान निर्माताओं ने जाति मुक्त समाज की जो कल्पना की है यूपीए सरकार को उसका सम्मान करना चाहिए।

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2 Comments on "जातिमुक्त समाज की जरुरत"

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श्रीराम तिवारी
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बहुत सटीक आलेख है फ्रांसिस जी .बधाई

अभिषेक पुरोहित
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बहुत सही कहा आपने.जाति मुक्त समाज का स्वप्न देख कर ही भारत के संवीधान कई आधार शिला रखि गयि थी,जिन धर्मों ने जाती विहीन समाज और समानता के सब्ज बाग दिखा कर धर्म परिवर्तन का कार्य किया था वो धर्म हि अब जाति आधारीत रीजेर्वेशन मन्गने लगे है,इसका अर्थ ये है कि वो लोग भि जाती विहिन समाज की रचना करने मे अशम्र्थ हुवे है तथा उन क्रोदो लोगों को धोखा दिया गया है जो इस झासें आ गये थे,अत: तो वापस सभी का पुन्रावर्त्न हो.

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