लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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जे-एन-यू में बौद्धिक शैतानों द्वारा भारत की बर्बादी का जो आंदोलन चल रहा है, उसे समझने के लिये हम सभी को इतिहास की तह में जाना पड़ेगा. कहानी यह है कि 1877 में सर सैयद अहमद खान ने तत्कालीन ब्रितानी व्यवस्था के साथ मिलकर अलीगढ़ में एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज़ की स्थापना की, जो 1920 में ब्रिटिश भारत राज्य के सरकारी प्रावधान के तहत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना. 16 मार्च 1888 को सर सैयद ने मेरठ में एक भाषण दिया, जिसमें उन्होने कहा कि फर्ज़ करो कि ब्रितानी भारत में नहीं हैं, तो भारत का शासक कौन होगा. कारण यह कि पश्चिम से प्रभावित अंग्रेज़ी बोलने वाले लोग आज भी यह समझते हैं कि हिन्दुओं को शासन करना ही नहीं आता, अत: इनकी क्षमताओं का दोहन करने के लिये हिन्दुओं पर शासन करना हमारा अधिकार है.

विश्वविद्यालयों का निर्माण राष्ट्र करते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में “हिन्दू-मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र हैं” नामक विचार बीज पनपा, जिसने 1906 में मुस्लिम लीग और उसके बाद, 1947 में पाकिस्तान नामक स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र को जन्म दे दिया. यहाँ यह भी जानिये कि भारत का बँटवारा पूरी तरह से हिन्दू-मुस्लिम आधार पर हुआ, किन्तु शेष खण्डित भारत कभी हिन्दू राष्ट्र नहीं बन सका. यहाँ डा भीमराव अंबेडकर जी के जनसंख्या अदल-बदल के सुझाव का भी उल्लेख आवश्यक है, जिसमें उन्होने कहा था कि पाकिस्तान के 2.5 करोड़ हिन्दूओं को भारत और भारत के 2.5 करोड़ बचे मुस्लिमों को पाकिस्तान चले जाना चाहिये. लेकिन उनका यह सुझाव नहीं माना गया.

भारत पाकिस्तान स्वतंत्रता के पश्चात, जहाँ भारत में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का विकास हुआ, वहीं पाकिस्तान में हिन्दुओं का उत्पीड़न शुरु हो गया. इस क्रम में स्वतंत्रता पूर्व के भारत के दलित नेता जोगिन्दर नाथ मण्डल का उल्लेख आवश्यक है, डा. अंबेडकर की सोच से अलग, वह मानते थे कि मुस्लिम राष्ट्र में दलितों का हित अधिक सुरक्षित है और मुहम्मद अली जिन्ना से करीबी के कारण वह पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री भी बने. किन्तु जिन्ना की मृत्यु के बाद ही, उन्हे यह एहसास हो गया कि मुस्लिम राष्ट्र में दलितों का हित छोडिये, उनके साथ रहना भी संभव नहीं है, अत: 8 अक्टूबर 1950 को उन्होने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को भारी मन से अपना त्यागपत्र दे दिया और भारत चले आये. अपना शेष बचा जीवन उन्होने दलितों के हित के लिये लगा दिया. श्री मण्डल का मार्मिक त्यागपत्र विकीसोर्स पर उपलब्ध है. जिसका लिंक पोस्ट में है. मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि प्रत्येक भारतीय को यह त्यागपत्र अवश्य पढ़ना चाहिये. यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत और पाकिस्तान दोनों को कानून मंत्री के रूप में दलित नेता ही मिले, एक और जहाँ डा. अंबेडकर को भारत में पूजा जा रहा है, वहीं श्री मण्डल को पाकिस्तान में दुत्कारा गया और भारत ने लगभग भुला दिया. आग्रहपूर्वक निवेदन है कि राष्ट्रचिंतको को डा. मण्डल को पुनर्जीवित करने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिये.

1975 में भारत में इन्दिरा सरकार ने आपातकाल लगाया, जिसके विरुद्ध मीडिया, जनता एवं विपक्षी दल एकत्र हुये और 1977 में हुए आमचुनावों में इन्दिरा की करारी हार हुई. 1977 की जनता सरकार चल नहीं पायी और इन्दिरा भारी बहुमत से दोबारा सत्ता मे आयीं, इसके बाद उन्होने अपनी मीडिया नीति में परिवर्तन किया और मीडिया को सरकारी प्रलोभन देना प्रारंभ किया, परिणामस्वरूप भारत में वही मीडिया बचा, जो सरकार के रहमोकरम पर चलता रहा अर्थात जिसे विज्ञापनों के रूप में भारी सरकारी सहायता मिलती रही और जिन्होने सरकार से समझौता नहीं किया, वह मीडिया हाउस टिक नहीं सके. अत: वर्तमान में स्थापित मीडिया समूहों की विस्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगते रहते हैं और वर्तमान सरकार भी विज्ञापनों की उसी प्रक्रिया को जारी रखे है और उन मीडिया हाउसों को मोटा पैसा उपलब्ध करवा रही है, जो इस जाने अनजाने राष्ट्र विरोधी विचारों के पोषक समर्थक हैं.

वर्तमान में जे-एन-यू में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो आंदोलन खड़ा किया जा रहा है, उसमें अगलाववाद के वैसे ही बीज़ हैं, जैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में तब थे. 1954 में आगा खान ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भाषण देते समय स्वतंत्र पाकिस्तान बनने में विश्वविद्यालय की भूमिका को गौरव की बात कहा है. जे-एन-यू में बीती 9 फरवरी 2016 को अफज़ल की बरसी पर जो कार्यक्रम हुआ, उसमें भारत की बर्बादी तथा कश्मीर और केरल की आज़ादी के नारे लगे. यह ध्रुव सत्य है, जिसके साक्ष्य उपलब्ध हैं. जब अंग्रेज़ बौद्धिक शैतानों की कलई खुली तो उन्होने एक नकली विडियो जारी कर इसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों द्वारा किया गया षडयंत्र करार कर दिया गया. लेकिन इस घटना के कुछ दिनों बाद बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में जो हुआ, उससे इनकी पोल खुल गई है, अत: अब इन्होने पटियाला कोर्ट में वकीलों-पत्रकारों एवं जे-एन-यू अध्यक्ष की पिटाई को मुख्य मुद्दा बना दिया ताकि इनके षडयंत्र का जनता को पता न चले और अलगाववाद के जिस बीज़ को यह समर्थन देते रहे, वह बात दब जाये.

जब तक भारत में काँग्रेस की सरकार रही, इन बौद्धिक शैतानों को पुरस्कार, सम्मान, मनचाही पोस्टिंग आदि मिलती रही और बदले में काँग्रेसी नेता, जनता को लूटते रहे और इन मलाईखोरों की चुप्पी लगातार बनी रही. वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार में उपरी स्तर पर भ्रष्टाचार लगभग समाप्त है, रिश्वत के लिये कुख्यात रक्षा मंत्रालय में मनोहर परिर्कर जैसे नेता ने मौद्रिक और अमौद्रिक दोनों तरह के भ्रष्टाचारों को समाप्त कर दिया, जिससे भारत की रक्षा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगी है. यह स्थिति अलगाववाद के विरुद्ध जा रही है. अत: सरकार का विरोध करने के लिये यह लोग अन्य मामले ढ़ँढ रहे है, जिसमें कभी एक व्यक्ति की हत्या को राष्ट्रीय असहिष्णुता का नाम दिया गया, तो कभी याकूब जैसे आतंकवादी को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई सजा को न्यायिक हत्या करार दिया और कभी हैदराबाद के छात्र की आत्महत्या को संवैधानिक हत्या का नाम देकर अपनी एकत्रित राजनैतिक शक्ति से आंदोलन करते रहे. इन आंदोलनों में सरकार के विरोधी सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर अघोषित मोर्चा बना लिया है.

बात सरकार के विरोध के विरोध की होती तो जन सामान्य के लिये चिन्ता की बात नहीं थी, बल्कि यह तो स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा का परिचायक होता, लेकिन सरकार का विरोध करने में अंधे हुए लोगों के मूल चरित्र में देश का विरोध करने की राजनीति है, अत: जेन-एन-यू मामले में यह सब नेता एकत्र होकर प्रदर्शन कर रहे हैं. राष्ट्र विरोधी विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम देकर यह लोग जनता को बरगलाना चाहते हैं. आपने देखा है कि काँग्रेसी नेता दिग्यविजय सिंह कभी ओसामा के आगे जी लगाते हैं, तो कभी हाफिज़ सईद साहब कहते हैं, अभी अभी काँग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अफज़ल गुरु को जी लगा कर सम्मानित किया. कारण कि यह नेता जिन लोगों के बीच उठते बैठते हैं, उनके बीच में ऐसे लोगों को सम्मानसूचक शब्दों के साथ ही संबोधित किया जाता है, अत: आतंकियों अलगाववादियों के लिये सबके सामने भी इनके मुख से सम्मानसूचक शब्द अनायास निकल जाते हैं.

भारत एक शांतिप्रिय राष्ट्र है, यहाँ का जनसामान्य सत्यनिष्ठा से अपना व परिवार का भरण पोषण करना चाहता है, लेकिन अंतर्मन से वह यह भी नहीं चाहता कि देश के सोलह टुकड़े हों, यह विशाल समुदाय दुखी एवं शांत बैठा है, कदाचित यह सोचते हुए कि कोई कुछ नहीं कर रहा तो मुझे क्या फर्क पड़ता है, जो होगा वह तो सबके साथ होगा. हमारे इसी भाव ने हमारे समुदाय को व्यापक दु:ख पहुँचाया है. जे-एन-यू का अलगाववादी आंदोलन उस वृक्ष का बीज़ है, जिसपर बीस-तीस-पचास वर्षों बाद फल लगने हैं. यदि इस बीज़ को नष्ट करने के लिये जनता स्वयं सड़क पर नहीं उतरी तो उसकी परिणीति एक नये पाकिस्तान के रूप में होगी, जिसका दुष्कल भारत-पाकिस्तान के बँटवारे के समय लाखों लोगों को झेलना पड़ा था.
अवधेश कुमारrahul-Gandhi-jnu-3

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1 Comment on "जे-एन-यू के अलगाववादी बीज़ में नये राष्ट्र की फसल"

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mahendra gupta
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किसी भी घटना को राजनैतिक मोड़ देना हो तो उसे धर्म या राजनीति से जोड़ दीजिये ,आजकल देश की हर घटना का मीडिया ट्रायल पहले शुरू हो जाता है व उसे असली मुद्दे से भटका दिया जाता है , कितने ही ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जिसे कि मीडिया ट्रायल ने गुमराह किया है ,कन्हैया को कांग्रेस, मार्क्सवादी पार्टी व मीडिया ने निर्दोष करार दे दिया है , जब कि अभी सारी जांच रिपोर्ट आनी बाकी हैं , यही हालत किसी ए बी वी पी के कार्यकर्ता की होती तो ये उसे दोषी ठहरा कर जेल में रखने की वकालत करते… Read more »
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