लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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क्रांतिकारियों को नही थी पसंद चाटुकारिता
देश के क्रांतिकारी आंदोलन की विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों ने ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ के गीत को लेकर गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की आलोचना करनी आरंभ कर दी थी। इसका कारण केवल यह था कि हमारे स्वातंत्र्य समर की क्रांतिकारी विचारधारा के लोगों के लिए ‘अधिनायक’ जैसा शब्द प्रारंभ से ही चुभने वाला था।

‘पंकज’ की पीड़ा

पंकज श्रीवास्तव अपने लेख में यह स्वीकार करते हैं कि गुरूदेव को इस गीत के लिखते ही-आलोचना का शिकार होना पडऩे लगा था। पंकज की पीड़ा है कि इस गीत का विरोध आर.एस.एस.जैसे संगठनों की संकीर्ण मानसिकता के कारण हुआ था। अब उन्हें यह कौन समझाये कि यह गीत गाया गया, 1911 में और आर.एस.एस. का जन्म हुआ 1924 ई. में। लेखक को आर.एस.एस. पर आरोप लगाने से पूर्व कम से कम तथ्यों की पड़ताल तो करनी चाहिए थी।

‘अधिनायक’ शब्द का वैयाकरणिक आधार

जहां तक गुरूदेव के गीत में आये शब्द ‘अधिनायक’ के वैयाकरणिक आधार का प्रश्न है तो  ‘अधिनायक’ सीधे-सीधे तानाशाह का पर्यायवाची है। शब्द ‘नायक’ है, पर नायक में कोई व्यक्ति समाज या राष्ट्र का नेतृत्व स्वाभाविक रूप से हृदय से स्वीकार करता है,क्योंकि उसके अनुसार चलने में वह अपना हित समझता है। जबकि ‘अधिनायक’ के साथ ऐसा नही है। इस शब्द में लगा ‘अधि’ सारी स्थिति को बिगाड़ देता है। ‘अधि’ का अर्थ है ऊपर उठना, अति उगना (बलात् किसी के विकास को रोक देना है) इसका एक अभिप्राय संस्कृत शब्दकोश में किसी वस्तु पर प्रभुता या स्वामित्व प्रकट करना भी है, जब यह ‘अधि’ क्रमण के साथ लगता है तो वहां इसका अभिप्राय हमला या चढ़ाई से हो जाता है। जब यह नियम के साथ जुड़ता है तो वहां भी यह नियम के स्वाभाविक अर्थ को परिवर्तित कर देता है। तब नियम पर किसी की प्रभुता स्पष्ट दिखाई देने लगती है। ऐसे ही अधिमास का अर्थ-लौंद का महीना है, अधिराज का अभिप्राय प्रभुसत्ता प्राप्त परमशासक, अधिराज्यम् का अर्थ शाही हुकूमत या सम्राट का शासन, अधिवास का अभिप्राय धरना देना है। इससे स्पष्ट है कि जहां-जहां ‘अधि’  लग जाता है, वहीं वह प्रभुता और दूसरों पर बलात्, वर्चस्व स्थापित करने की भावना उत्पन्न कर देता है। ‘अधिनायक’ शब्द भी हमें हमारी इच्छा के विरूद्घ नेतृत्व देने वाले व्यक्ति की ओर संकेत करता है। इस वैयाकरणिक आधार को कोई भी व्यक्ति नकार नही सकता, केवल राष्ट्रगान में आये ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर संस्कृत व्याकरण के नियमों में मनमाना परिवर्तन किया जा सकता है।

नायक के अर्थ

नायक के अर्थ (सा.द. के अनुसार) चार प्रकार के माने गये हैं। धीरोदात्त, धीरोद्घत, धीरललित और धीरप्रशांत। इन चारों के कुछ अवांतर भेद होने के कारण नायक के भेद संख्या में 40 माने गये हैं। पर इस नायक में अधि लगते ही इस अधिनायक का अर्थ राजा प्रभु (स्वयंभू) हो जाता है।

गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का स्पष्टीकरण

ऐसे में शब्द के अर्थ का अनर्थ करने की आवश्यकता पंकज श्रीवास्तव जैसे लोगों को नही होनी चाहिए। फिर भी उन्होंने यह कहने का प्रयास किया है कि गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने अपने जीवन काल में यह स्पष्ट किया था कि उन्होंने ‘अधिनायक’ का प्रयोग इस भूमि के लिए या परमपिता परमेश्वर के अर्थों में किया था। इस स्पष्टीकरण से भी दो बातें स्पष्ट होती हैं, एक तो यह कि गुरूदेव पर अधिनायक शब्द ‘जन-गण-मन’ में डालने का कितना अधिक बोझ था, दूसरे यह कि वह स्वयं इस शब्द को किस प्रकार अपने बचाव में बार-बार व्याख्यायित करते रहे।

गुरूदेव की राष्ट्रभक्ति असंदिग्ध है

यह सच है कि गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के पश्चात अपने को अंग्रेजों से मिली ‘मानद’ उपाधि को लौटा दिया था। इस घटना को पंकज श्रीवास्तव ने इस बात से जोडऩे का प्रयास किया है कि गुरूदेव एक देशभक्त और स्वाभिमानी व्यक्ति थे, और इसलिए ही उन्होंने अपनी उपाधि को जलियांवाला बाग हत्याकांड के पश्चात लौटा दिया था। वास्तव में पंकज श्रीवास्तव यहां भी भूल कर रहे हैं। कल्याण सिंह स्वयं कहते हैं कि उनके द्वारा ‘अधिनायक’ शब्द को हटाने की बात कहने का अभिप्राय गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का अपमान करना नही है। वैसे भी गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की देशभक्ति असंदिग्ध है। उस पर किसी ने भी उंगली नही उठाई है। हम स्वयं इस बात के समर्थक हैं कि गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने यह गीत अंग्रेजों के लिए बनाकर तो दिया परंतु जब कांग्रेसी लोगों ने इसे बार-बार गाना आरंभ किया तो उनको भी कष्ट होने लगा था। तथ्य यह भी है कि अंग्रेजों ने गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर को इसी गीत पर प्रसन्न होकर नोबेल पुरस्कार दिलाने की बात उनके सामने रखी थी, जिसे उन्होंने विनय पूर्वक ठुकरा दिया था। वे नही चाहते थे कि इस गीत पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिले।

गुरूदेव का व्यक्तित्व

गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर का व्यक्तित्व पूरी कांग्रेस से ऊपर था। क्योंकि कांग्रेस ने अपनी ‘राजभक्ति’ का व्यामोह 1929-30 में जाकर त्यागा, जब उसने भारत की पूर्ण स्वाधीनता प्राप्ति का संकल्प व्यक्त किया। इतनी देर से (1885 से 1930 तक) कांग्रेस ने आंखें खोलना उचित नही समझा। उसने 1920-21 का असहयोग आंदोलन तथा उससे पूर्व का खिलाफत आंदोलन भी यदि चलाया तो वह भी अपनी राजभक्ति की सीमाओं में रहकर चलाया था। कांग्रेस ने देश के लिए 1930 से जीना सीखा। यह भी एक तथ्य है कि इससे पूर्व वह अपने ‘आकाओं’ं के लिए जी रही थी। उसका स्वाभिमान तो जलियांवाला बाग के हत्याकाण्ड के समय भी नही जागा था।1930 के पश्चात जगी कांग्रेस ने स्वतंत्रता के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया जो निष्फल रहा और 1942 में उसने भारत छोड़ो आंदोलन चलाया था। जो चलने से पहले ही (बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के कारण) फुस्स हो गया था। 1942 के पश्चात कांग्रेस ने एक भी आंदोलन नही चलाया।

बिना खडग़ बिना ढाल, आजादी नही मिलती

कुल 17 साल की कांग्रेस की लड़ाई और उसमें एक भी आंदोलन ऐसा नही जिसे सफल कहा जा सके तो फिर कैसे कहा जाए कि इसके नेता ने हमें ‘बिना खडग़ बिना ढाल आजादी दे दी’ थी। आजादी तो मिली थी सुभाष जैसे बलिदानियों के कारण और कांग्रेस को सत्ता मिली अपनी राजभक्ति के कारण। उस अहसान के बोझ में दबी कांग्रेस को ‘अधिनायक’ पर तो कभी आपत्ति रही और ना ही रहने वाली है।

कल्याण सिंह जैसे नेता का परिवेश

यदि कांग्रेस ‘राजभक्ति’ के व्यामोह से निकलकर देश में अधिनायकवादी संस्कृति से बचकर चलती तो देश का बंटवारा नही होता। कल्याण सिंह जैसे नेता उस परिवेश में पले बढ़े हैं जिसमें केवल देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता है। देशभक्ति में दोगलापन आते ही राष्ट्र में विसंगतियां बढ़ती हैं। जैसा कि कांग्रेस ने ‘अधिनायक’ की आराधना कर देश को 68 वर्ष लगाकर करके भी दिखाया है।‘अधिनायक-चालीसा’ पढ़ते-पढ़ते देश का गणतंत्र ‘गन’ तंत्र में और लोकतंत्र ‘ठोक’ तंत्र में बदल गया। बड़ी तेजी से एक ऐसा नया वर्ग तैयार हुआ है जिसने देश के आर्थिक संसाधनों पर अपनी मुठमर्दी (अधिनायकवादी सोच के द्वारा) से कब्जा कर लिया है।

देश पाताल में चला गया

हमने पूंजीवादी व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण कर दिया है। थैलीशाह और धनपति देश को चला रहे हैं। यह हमारी कुव्यवस्था केवल अधिनायक जय हे गाकर ही बनी है। क्योंकि इस देश का पहला प्रधानमंत्री नेहरू पूर्णत: सामंती सोच का था। वहीं से लोकतंत्र की गाड़ी का पहिया कीचड़ में फंसता गया और ‘अधिनायक जय हे’ बोलते-बोलते देश पाताल में चला गया।

देश के शौर्य को अपमानित नही करेंगे

जब आंखें खुलीं तो पता चला कि पाताल में फंसी गाड़ी को ऊपर उठाने के लिए जो लोग पसीना-पसीना हुए पड़े थे उनमें कल्याणसिंह भी एक थे। कितने ही ‘कल्याणों’ ने मिलकर इतिहास को पलटने का प्रयास किया और कसम खायी कि अब ना तो अधिनायक वंदन करेंगे ना ही अपने लोकनायकों और राष्ट्रनायकों का अपमान करेंगे और ना ही-‘दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल’ का आत्मप्रवंचना प्रदायक गीत गाकर देश के शौर्य को अपमानित करेंगे। इन सबके स्थान पर अब होगी राष्ट्रवंदना, राष्ट्र आराधना और राष्ट्र साधना। ‘अधिनायक’ के स्थान पर अब होगा ‘मंगलदायक’ का आराधन।

कल्याणसिंह का बयान विवादास्पद नही

राज्यपाल के रूप में एक व्यक्ति यह कहे कि ‘अधिनायक’ शब्द राष्ट्रगान से हटाओ और उसके स्थान पर ‘मंगलदायक’ शब्द लाओ तो यह किसी प्रकार का विवादास्पद बयान नही है, अपितु विवादों को मिटाकर एक वाद के झण्डे तले लाकर सबको खड़ा करने का एक पूरा चिंतन है। इस चिंतन में पूरे जीवन के संघर्ष की छिपी हुई पीड़ा है।

राजभवनों में पहुंचें चिंतनशील लोग

राजभवनों में जब घोटालेबाज और केन्द्र के एजेण्ट भेजे जाते हैं, तो उनसे ‘दुर्गंध’ आने लगती है और जब राजभवनों में चिंतक मनीषी और राष्ट्र आराधक लोग जाकर बैठते हैं तो उधर से आते संकेत राष्ट्र का मार्गदर्शन करने लगते हैं। इसलिए राजभवनों में निष्क्रिय लोगों को बैठाने की अपेक्षा चिंतनशील और अनुभवी राजनीतिज्ञों को बैठाने का प्रयास होना चाहिए। राज्यपाल का अभिप्राय है-एक राजनेता का तपस्वी स्वरूप, एक ऐसा व्यक्तित्व जिसे देश के मूल्यों और मान्यताओं की जानकारी हो। हमारा राष्ट्रीय मूल्य  है ऋग्वेद का यह आदेश कि ‘स्वराज्यम् अर्चन्ननुम्’-अर्थात स्वराज्य की आराधना करो। हमें अधिनायक की आराधना नही सिखायी गयी,हमें ‘मंगलदायक स्वराज्य’ की आराधना करना युग-युगों से सिखाया गया है। युग-युगों के उसी मौलिक राष्ट्रीय संस्कार को यदि कल्याणसिंह जैसा राजनेता आज के भारत का मौलिक संस्कार बना देना चाहता है तो इसमें पंकज श्रीवास्तव जैसे लोगों को आपत्ति क्या है? वेद कहता है-राष्ट्रं पिपृहि सौभागाय’ अर्थात हम राष्ट्र की समृद्घि के लिए सदा प्रयास करें।

संस्कृतिनिष्ठ लोगों की आवश्यकता है देश को

जिस दिन सारा राष्ट्र ‘मंगलदायक स्वराज्य’ की आराधना करते हुए राष्ट्र की समृद्घि के लिए सामूहिक प्रयास करना आरंभ कर देगा,उस दिन कल्याण सिंह के कल्याणकारी बोलों का वास्तविक मूल्य हमारी समझ में आ जाएगा। देश को संस्कृतिनिष्ठ लोगों की आवश्यकता है। अपसंस्कृति निष्ठ लोग उठें और अरब सागर की ओर चले जायें।

समाप्त

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