लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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modiएक स्वस्थ लोकतंत्रीय परम्परा के अनुरूप भारतीय जनता पार्टी ने गोवा की अपनी कार्यकर्ता बैठक में सर्वसम्मति और सहमति तक पहुंचने का दुर्गम रास्ता तय करने के बाद नरेंद्र मोदी को अपने चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित किया। लोकतंत्र और लोकप्रियता का अटूट नाता हैं। नरेंद्र मोदी को एक लोकप्रिय नेता बताते हुए पार्टी अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने उत्साह और भरोसे के साथ इसकी घोषणा की श्रीमती सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और मध्यप्रदेश के मुख्मंत्री शिवराज चौहान समेत वहाँ उपस्थित सभी नेताओं ने इसका स्वागत करके भाजपा के अन्दर उभरते कलह को एकता का प्रदर्शन करने की चेष्ठा करके शांत करने का प्रयास किया। लेकिन ठीक एक दिन बाद पार्टी के शीर्ष नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने जब अपना त्यागपत्र सार्वजनिक करते हुए श्री राजनाथसिंह को भेज दिया तो पार्टी के अंतर्मन में छुपे मतभेद खुल कर बाहर आ गए। श्री आडवाणी का यह आरोप कि ‘पार्टी वह पार्टी नहीं रही जो पहले थी। आदर्शों के स्थान पर व्यक्तिगत एजेंडा ले कर चला जा रहा है और यह कि वे काफी समय से अब इसमें असहज महसूस करते रहे हैं.’ निस्संदेह, इससे पार्टी के साधारण कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व तक के मन मस्तिष्कों ने वैचारिक भूकंप के झटके महसूस किए होंगे। गोवा की बैठक से श्री आडवाणी और कुछ और नेताओं की अनुपस्थिति से यह स्पष्ट संकेत तो वस्तुत: पहले से ही मिल चुका था कि सब कुछ ठीक नहीं हैं। नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाया गया तो भाजपानीत गठबंधन के टूटने का खतरा तो मंडरा रहा था लेकिन भाजपा के अन्दर असहमति का संकट अंधड़ बन कर उभरेगा और राजनीतिक आकाश को आच्छादित कर देंगा इसका अंदाज़ शायद पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को भी नहीं रहा होगा.

पार्टी के तीन मुख्य पदों से त्यागपत्र देकर श्री आडवाणी ने स्पष्ट कर दिया कि वे नरेंद्र मोदी को पार्टी के चुनाव अभियान की कमान सौंपे जाने से असंतुष्ट हैं। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जब लोकप्रियता को लोकतंत्र का मापदंड बताते हुए मोदी को यह दायित्व सौंप देने की घोषणा की तो उनके संबोधन से यह भनक मिल रही थी कि श्री आडवाणी का समर्थन प्राप्त नहीं किया जा सका हैं। लेकिन पार्टी की कार्यकारिणी ने प्रकटत: अध्यक्ष के अनुरोध पर इस निर्णय की त्वरित घोषणा करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। श्री आडवाणी गोवा से पूरी तरह अनुपस्थित रहे. उनकी सहमति के बिना और उनकी अनुपस्थिति में यह कदम उठा लिए जाने से उनके स्वाभिमान को चोट पहुंची। उन्होंने अपने आक्रोश को पार्टी के अन्दर अभिव्यक्ति न देकर इस नेतृत्व परिवर्तन को नकारते हुए सभी पदों से अपना त्यागपत्र दे कर अपने विरोध को सार्वजनिक कर दिया। यह एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति विकास है जो पार्टी संगठन में उभरती दरारों को और अधिक चौड़ा करके इसकी पूर्व उपलब्धियों को विस्मरण की गर्त में धकेल सकता हैं। जहां तक मैं जानता हूं सच यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ-भाजपा के पुराने नए सभी कार्यकर्ता जनसंघ के संस्थापक डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बाद स्वर्गीय दीनदयाल उपाध्याय से लेकर श्री अटलबिहारी वाजपेयी, श्री नानाजी देशमुख और श्री लालकृष्ण आडवाणी सरीखे स्वनामधन्य नेताओं के द्वारा व्यक्त विचारों और उनके कामों से प्रभावित और प्रेरित होकर इस पार्टी को आगे बढाने में जुटे हैं। वे पार्टी के अनुशासन की डोर से बंधे रहने की चेष्ठा करते हैं। नरेंद्र मोदी की नियुक्ति सम्बन्धी पार्टी अध्यक्ष राजनाथसिंह की घोषणा को पार्टी में अनुशासन का सम्मान करते हुए सिर झुका कर स्वीकार करना इसी परम्परा के अनुरूप माना जा सकता हैं। लेकिन श्री आडवाणी जैसे शीर्ष नेता के द्वारा इसी नियुक्ति को एक मुद्दा बनाने के जो भी कारण रहे हों उनका बिना विषय विश्लेषण किए त्यागपत्र देना असामयिक ही नहीं बल्कि एक बड़ी भूल माना जा सकता हैं। एक संवेदनशील कालखंड में जब कांग्रेस अनेक गंभीर आरोपों से घिरी हुई है और सत्ता परिवर्तन के आकांक्षी देशवासी भाजपा और भाजपानीत गठबंधन राजग से अपनी उम्मीदों पर खरा उतरने की आस लगाए बैठे हैं यदि निराश हो कर भाजपा से मुख मोड़ लेंगे तो उचित नहीं होगा। अकस्मात उमड़े ऐसे तूफान में भाजपा की डगमगाती नैय्या को किनारे लगा सकने के लिए एक शक्तिशाली और कुशल नाविक को ही पतवार थामनी होगी।

गत अनेक वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में सत्ता तक पहुंचने के लिए मुख्य राजनीतिक दलों को गठबंधन की अनिवार्यता के तहत क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बिठाने और उनकी सहमति जीतने की आवश्यकता का सामना करना पड़ रहा हैं। ऐसे किसी गठबंधन में शामिल दलों को सत्ता में रहते या विपक्ष में अपनी भूमिका निभाते हुए एकजुटता बनाए रखने की नितान्त आवश्यकता होती हैं। संगठनात्मक स्तर पर उनका परस्पर मेलजोल, विचार परामर्श और सहमति के साथ चलना एक अनिवार्य प्रक्रिया हैं। इस पर भी प्रत्येक दल अपनी चुनावी रणनीति निर्धारण के लिए स्वतंत्र रहता हैं। नरेंद्र मोदी की बढती हुई लोकप्रियता के दृष्टिगत जब उनका नाम देश के भावी प्रधानमंत्री के लिए देश और विदेश में व्यापक स्तर पर सुझाया जाने लगा तो भाजपानीत गठबंधन राजग के अन्दर और बाहर खुसर पुसर का उभरना स्वाभाविक था। श्री आडवाणी राजग के अध्यक्ष रहे हैं। उनके साथ गठबंधन के अन्य घटक दलों के नेताओं के साथ चर्चा में नरेंद्र मोदी को आगे बढाए जाने से गठबंधन को होने वाले हानि लाभ का मुद्दा भी आया होगा। ध्यान देने योग्य है कि जदयू के अध्यक्ष श्री शरद यादव ने यद्यपि इस समय भाजपा में मोदी के उन्नयन को पार्टी का अंदरूनी मामला कह कर ख़ारिज कर दिया लेकिन बाद में यदि मोदी के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का रास्ता खुलता दिखाई दिया तो जदयू राजग से अलग हो भी सकता हैं। भाजपा के लिए यह एक चुनौती हैं। दबाव के आगे न झुकते हुए स्थितियों पर नियंत्रण पाते हुए इन चुनौतियों का सामना करना उसकी विवशता भी है और समय की आवश्यकता भी हैं।

इन पंक्तियों के लिखे जाते समय श्री आडवाणी को मनाने के लिए नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के सभी नेताओं के प्रयास जारी थे। उम्मीद की जा रही थी कि उदारमना आडवाणी अपना त्यागपत्र वापस ले लेंगे। भाजपा संसदीय बोर्ड ने भी प्रस्ताव पास करके उनसे त्यागपत्र वापस लेने का अनुरोध किया हैं। यदि वे मान गए तो पार्टी में आया तूफान शायद थम जाए। जो भी हो भारत की राजनीति में हावी बनी रही और इस समय एक के बाद एक आरोपों से घिरी कांग्रेस का एकमात्र विकल्प बन चुकी भाजपा इस स्थिति में नहीं है कि अपने आगे बढते कदमों को थाम कर जनता की आशाओं पर तुषारापात करे। श्री नरेंद्र मोदी को चुनावी कमान सँभाली जा चुकी है उसे वापस लेना असंख्य कार्यकर्ताओं की निराशा का कारण बनेगा और ऐसा करना नैतिक दृष्टि से भी सही नहीं होगा। अपनी राष्ट्रहित परक नीतियों की सफलता, वाक्चातुर्य, प्रचार कौशल और सबसे ऊपर देश के सभी नागरिकों को मजहब सम्प्रदाय की चिंता किए बिना समानता के धरातल पर लाने का उपक्रम यदि नरेंद्र मोदी का रहा तो भाजपा पुन: विजयी हो सकती हैं। श्री मोदी के चुनाव अभियान निर्देशन में भाजपा को आगामी चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनने का अवसर मिल सकता है और ऐसी स्थिति में यह भी संभव है कि जो क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल आज सेकुलरवाद का गौरव नाद करते हुए वोटबैंक राजनीति को अपनी सफलता और वर्चस्व का आधार मानते हैं सर्व पंथ सम भाव की रणनीति के पक्षधर बनें।

श्री आडवाणी ने अपने उत्कृष्ट नेतृत्व कौशल का परिचय देते हुए पार्टी को शून्य से शिखर तक पहुंचाया इसमें कोई दो राय नहीं हैं। उनके बाद पार्टी के अन्दर उन्हीं के पद चिन्हों पर चलते हुए आगे बढ़ने की तत्परता और देश को योग्य नेतृत्व देने के लिए प्रतिस्पर्धा का पनपना स्वाभाविक हैं। दूसरी पंक्ति के अनेक नेता उन्हीं की तरह राष्ट्र समर्पित पार्टी के प्रखर ध्वजवाहक बन कर देश के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हैं। ऐसी तत्परता के होते हुए यदि व्यक्तित्वों के संघर्ष को बल मिला तो पार्टी की संगठनात्मक एकजुटता कमज़ोर होगी। भाजपा की जनविश्वसनीयता को निश्चय ही आघात पहुंचेगा। इस समय भाजपा के लिए सही यही होगा कि वह अपने अंतर्विरोधों से पार पाए. यह समय वैयक्तिक मान अपमान की गाथाओं को जन्म देने का नहीं हैं। कांग्रेस की तेज़ी से घटती लोकप्रियता के दृष्टिगत यदि भाजपा विजयी होकर अपने सहयोगी राजनीतिक दलों के साथ सरकार बना कर जन अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरने के अपने दावे को पूरा करना चाहती है तो उसे अब कमर कसना होगी। भाजपा में नेतृत्व की मशाल नए हाथों में दिया जाना समय की बहुत बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। स्पष्ट है कि वयोवृद्ध नेता श्री आडवाणी को उनकी पूर्ण सहमति के बिना और उनकी अनुपस्थिति में नरेंद्र मोदी को भाजपा की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के द्वारा घोषित किया जाना कहीं बेहतर होता यदि श्री आडवाणी स्वयं खुले मन से इसे पार्टी में उभरते एक व्यक्तित्व को मान्यता देने की दृष्टि से उनके समकक्षों को आस पास खड़े करके उन्हें चुनावी युद्धभूमि में उतरने के लिए अपना आशीर्वाद दे पाते। राजग के सहयोगियों की प्रतिक्रिया से पूर्व ही भाजपा के शीर्ष नेता आडवाणीजी की प्रतिक्रिया का आना न तो पार्टी की सार्वजानिक छवि के लिए हितकर है और न ही पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरक। इसलिए उन्हें मना कर वापस अपने साथ खड़े करने के लिए सभी भाजपा नेता जीजान से जुटे हैं।

 

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