लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के 27 साल बाद उनकी वापसी के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में जो प्रस्ताव पारित किया गया है, वह स्वागत योग्य है, लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या इस प्रस्ताव के अनुकूल ऐसा माहौल बनाया जाएगा, जिससे विस्थापितों की वापसी संभव हो सके ? क्योंकि इस प्रस्ताव की सार्थकता तभी है, जब 4 लाख पंडितों समेत अन्य विस्थापित अपने पुश्तैनी घरों में रहने लग जाएं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विपक्ष के नेता एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सुझाव पर यह प्रस्ताव राज्य की पीडीपी-भाजपा सरकार की ओर से पेश किया गया और घनि मत से पारित हुआ। केवल एक निर्दलीय विधायक राशीद ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। इससे साबित होता है कि राज्य के सभी राजनीतिक दल चाहते है कि आतंकवाद के चलते खदेड़े गए कश्मीरी पंडित अपने घर वापिस आए और कश्मीर में बहुलतावादी संस्कृति की बहार लौटे। हालांकि कश्मीर में विडंबना पूर्ण यह स्थिति भी देखने में आ रही है कि वहां पंडितों के पुनर्वास का तो आतंकवादी और अलगाववादी विरोध करते हैं, किंतु वर्मा से विस्थापित रोहिंग्या मुसलमान लगातार जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में शरणर्थी के रूप में बसते जा रहे हैं। दूसरी तरफ भारत विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से प्राण बचाकर आए लोगों को नागरिक पहचान-पत्र देने का भी अलगाववादी विरोध कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि घाटी के मुस्लिम स्वरूप में बदलाव नहीं आने दिया जाएगा। ऐसे में पंडितों की वापसी कैसे संभव है ?

घाटी में मुस्लिम एकरूपता इसलिए है, क्योंकि वहां से मूल कश्मीरी हिंदुओं का पलायन हो गया है और जो शरणार्थी हैं, उन्हें बीते 70 साल में न तो देश की नागरिकता मिली है और न ही वोट देने का अधिकार मिला है। इसके उलट अलगाववादी उन रोहिंग्या मुसलमानों को घाटी में रहने दे रहे हैं, जो म्यांमार से पलायन कर हाल ही में आए हैं। इस विरोधाभासी मंशा से यह साफतौर से समझ आ जाती है कि घाटी का चरित्र पुरी तरह सांप्रदायिकता की गिरफ्त में है। अनुमान है कि जम्मू-कश्मीर तथा भारत के दूसरे क्षेत्रों में करीब 36000 रोहिंग्या शरणार्थी बस चुके हैं। ये कश्मीर घाटी, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली में आकर जम गए हैं। अक्टूबर 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि जम्मू में 1219 रोहिंग्या मुस्लिम परिवारों के कुल 5107 सदस्य रह रहे हैं। इनमें से 4912 सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त द्वारा शरणार्थी का दर्जा दिया जा चुका है। जून 2016 में महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा में बताया था कि म्यांमार और बांग्लादेश से आए करीब 13400 शरणार्थी राज्य के विभिन्न शिविरों में रह रहे है। यहां प्रश्न उठता है कि जब जम्मू-कश्मीर के वर्तमान हालात में हिंदू विस्थापित अपने घरों की दहलीज पर कदम नहीं रख पा रहे हैं, तब रोहिंग्या इतनी आसानी से अपने ठोर-ठिकाने कैसे बनाते जा रहे है ? ऐसा कहीं कश्मीर के मुस्लिम चरित्र को एकरूपता देने के लिहाज से षड़यंत्र तो नहीं किया जा रहा है ? यदि ये आशंकाएं फली-भूत होती रही तो घाटी और जहरीली होती जाएगी।

कुछ समय पहले पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार ने घाटी में रह रहे शरणर्थियों को राहत देने की अहम् शुरूआत की थी। जिससे इन्हें सस्ती दर के राषन के साथ अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगे। यह शुरूआत हुई ही थी कि मुस्लिम कश्मीरियों ने विरोध शुरू कर दिया, क्योंकि ये शरणर्थी हिंदू,शिख, बौद्ध व दलित हैं। जबकि फिलहाल राहतकारी योजनाओं का लाभ देने का सिलसिला ही हुआ है। यदि इन्हें भारतीय नागरिकता देने की पहल शुरू कर दी गई होती, तो संभव है, घाटी में हिंसक वारदातें शुरू हो गईं होतीं ? साफ है, इस  कश्मीरियत में राई-रती भी इंसानियत को जगह नहीं है। इस कट्टर सांप्रदायिक रवैये से लगता है कि कश्मीर के मुसलमानों में बहुलतावादी सोच सर्वथा दुर्लभ व दूषित हो गई है। शरणार्थियों कों राहत देने का निर्णय पीडीपी सरकार का है, बावजूद पीडीपी नेता अपना पक्ष नहीं रख पा रहे हैं। यही स्थिति स्थानीय कांग्रेस और नेषनल कांफ्रेस पार्टी की है। लोकतंत्र की रक्षा, सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले राहुल गांधी, फारूख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला भी शरणार्थियों का समर्थन करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। ऐसी ही दोगली मानसिकता का परिणाम है कि घाटी में अलगाववाद को बढ़ावा मिला और मुस्लिम धु्रवीकरण हुआ।

इस धु्रवीकरण की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इस घाटी में म्यांमार में अलगाववाद से जुड़े रोहिंग्या मुस्लिम लगातार शरणार्थी के रूप में बसते जा रहे हैं। घाटी के अलावा जम्मू व लद्दाख क्षेत्रों में भी उनकी आमद बढ़ रही है। किंतु कश्मीर के मुस्लिम नेता उनके बसने का विरोध नहीं कर रहे हैं, क्योंकि वह मुसलमान हैं। कभी ‘ब्रह्मदेश‘ के नाम से जाना जाने वाले म्यांमार की आबादी करीब 6 करोड़ है। इनमें मुस्लिम बमुश्किल 5 प्रतिशत हैं। इसलिए मुस्लिम कट्टर व अलगाववाद वहां की संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा नहीं हैं। बावजूद यहां मुस्लिम व बौद्धों में संघर्ष एक न रुकने वाली समस्या बना हुआ है। दरअसल मुस्लिमों के साथ त्रासदी यह है कि वे शासक हों या शरणर्थी किसी भी स्थिति में अन्य समाजों के साथ समरस नहीं हो पाते हैं। असहिष्णुता उनके चरित्र का स्थायी भाव बनकर रह गया है। अब र्तो िस्थति यह हो गई है कि रोहिंग्या पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आइएसआइ के शिकंजे में हैं। वह इन गरीब व लाचारों को आतंकवाद का पाठ पढ़ाने लग गया है। कई आतंकवादी संगठनों के सूत्रधार भी इनके संपर्क में हैं। इसलिए यदि समय रहते इन्हें भारत-भूमि से बेदखल नहीं किया गया तो ये रोहिंग्या घाटी समेत पूरे भारत में बड़ी समस्या बन सकते हैं ?

संविधान निर्माण के समय जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की मांग पर डाॅ भीमराव अंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला से कहा था, ‘ आप चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों की आर्थिक सुरक्षा करे, कश्मीरियों को संपूर्ण भारत में समानता का अधिकार मिले, लेकिन भारत और अन्य भारतीयों को आप कश्मीर में कोई अधिकार देना नहीं चाहते ? मैं देश का कानून मंत्री हूं और मैं अपने देश के साथ कोई अन्याय या विश्वासघात किसी भी हालात में नहीं कर सकता हूं।‘ बावजूद पं नेहरू के अनावश्यक दखल से कश्मीर को विशेष दर्जा मिला। इस भिन्नता का संकट देश बंटवारे से लेकर अब तक भुगत रहा है। यही वजह है कि इस बंटवारे के बाद पाकिस्तान से जो हिंदू, बौद्व, सिख और दलित शरणर्थी होकर जम्मू-कश्मीर में ही ठहर गए थे, उन्हें मौलिक अधिकार आजादी के 70 साल बाद भी नहीं मिले हैं। इनकी संख्या करीब 70-80 लाख हैं, जो 56 शरणार्थी शिविरों में सभी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से महरूम रहते हुए बद् से बद्तर जिंदगी र्का अभिशाप भोग रहे हैं।

वर्तमान में कश्मीरी पंडितों का घर वापसी का मुद्दा वैसा नहीं रह गया है, जैसा शुरू के कुछ वर्षों तक था। दरअसल 27 साल की इस लंबी अवधि में एक पूरी पीढ़ी बदल जाती है, जो विस्थापन के समय बालक थे, वे अब युवा हो चुके है और जो उस समय जवान थे, वे अब बूढ़े हो रहे हैं। अपनी मूल जड़ों से जुदा होकर विस्थापितों ने बद्हाल शिविरों में कैसे दिन गुजारे, इसकी कल्पना ही रूह कंपा देने वाली है। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई हिस्सों में आज भी कश्मीरी पंडित शरणार्थियों का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बावजूद अनेक युवाओं ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कमयाबी हासिल की और समाज पर झाप छोड़ी है, लेकिन उन्हें जम्मू-कश्मीर का मूल नागरिक होने के पश्चात भी लाचारी का जो जीवन गुजरना पड़ा है, उससे केंद्र व राज्य सरकार तथा घाटी के समुदाय विशेष के लोगों का अपराध कम नहीं हो जाता ? आखिर किसी भी सभ्य और संवैधानिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सेता है कि देश के ही एक हिस्से के नागरिकों को जान बचाने के लिए घर-बार छोड़कर पलायन को तजबूर होना पड़ा। यह सवाल जहां कानूनी राज्य व्यवस्था पर है वहीं उस राजनीतिक प्रक्रिया पर भी है, कि वह 27 साल बीत जाने के बावजूद विस्थापितों का पुनर्वास नहीं कर पाई है। ऐसे में पुनर्वास का प्रस्ताव जरूर पारित हो गया है, लेकिन इस प्रस्ताव को पारित कराने वाले दल यदि इसके अमल के लिए अनुकूल माहौल नहीं बना पाते हैं तो इस प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

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1 Comment on "कश्मीरी विस्थापित हिंदुओं का पुनर्वास मुश्किल"

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विनोद कुमार सर्वोदय
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विनोद कुमार सर्वोदय
“देवभूमि कश्मीर का अहिंदुकरण” सेवा में 21.01.2017 संपादक जी महोदय वर्ष 1990 में 19 जनवरी की वह काली भयानक रात वहां के हिन्दुओं के लिए मौत का मंजर बन गयी थी।वहां की मस्जिदों से ऐलान हो रहा था कि हिंदुओं “कश्मीर छोडो” । उनके घरों को लूटा जा रहा था, जलाया जा रहा था ,उनकी बहन-बेटियों के बलात्कार हो रहे थे, प्रतिरोध करने पर कत्ल किये जा रहें थे।मुग़ल काल की बर्बरता का इतिहास दोहराया जा रहा था।देश की प्रजा कश्मीरी हिन्दुओ को अपनी ही मातृभूमि (कश्मीर) में इन धर्मांधों की घिनौनी जिहादी मानसिकता का शिकार बनाया जा रहा था।… Read more »
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