लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन —
(एक) उपलब्धि की कीमत:
प्रत्येक उपलब्धि की कीमत होती है। कुछ घाटा कुछ लाभ।
ऐसा कोई भी लाभ नहीं होता, जिसका कोई मूल्य (घाटा) चुकाना ना पडे।
जितनी भी सुविधाएँ आप प्राप्त करते हैं, बदले में, कुछ न कुछ देते हैं।
कठोर परिश्रम के मूल्य पर छात्र ज्ञानार्जन करता है, आगे बढता है। बिना परिश्रम आप मात्र **’बिना ज्ञान, झूठा प्रमाण-पत्र **’ पा सकते हैं।
सार्वजनिक रूप से; रेलमार्ग, महामार्ग, विमान-तल, बिजली,……इत्यादि सुविधाएँ आप भूमि पर ही कुछ न कुछ निर्माण  करके प्राप्त करते हैं। बिना भूमि आप ऐसी सुविधाएँ, कहाँ स्थापेंगे?

(दो) बहु मंज़िला निर्माण से, भूमि बहुगुणित:
वैसे, मनुष्य ने बहु मंज़िला निर्माणों की रचना से, भूमि को बहुगुणित किया है; एक के ऊपर एक दो ही मंजिलों से आप भूमि को दुगनी कर देते हैं। ऐसे छोटे से क्षेत्र क(५० मंजिले बनाकर)५० गुना भी किया जा सकता है। फिर भी कुछ भूमि की कीमत तो चुकानी ही पडती है।
उसी प्रकार, कुछ युक्तियाँ अवश्य अपनाई जा सकती हैं। जैसे, गुजरात में. मोदी जी ने,नर्मदा की नहर के ऊपर ही छत लगाकर, सौर ऊर्जा को बिजली में रूपांतरित करने की योजना सफल की है। सूर्य प्रकाश से कोई पर्यावरणीय हानि भी नहीं। जो भूमि अधिग्रहण से किया जा सकता था,उसे नहर के ऊपर बना दिया।
(क)भूमि बच गयी,
(ख)साथ पानी की भाँप बनकर,
(ग) पानी का अप-व्यय होना भी बच गया।
(घ) और बिजली उत्पादित हुयी।

पर संक्षेप में –कुछ न कुछ देते हैं, तो ही कुछ पाते हैं।
ऐसी कोई उपलब्धि बताइए,जिसमें  कुछ दिए बिना ही प्राप्ति हो जाती हो? ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है।
(तीन) जनता की मानसिकता में बदलाव:

ऐसे व्यावहारिक बदलाव सफल होने के लिए, जनता की मानसिकता में बदलाव आवश्यक होता है। जब जनता जानकार भी होती है, तो, उसका निर्णय मह्त्व रखता है।

पर विरोधी पक्ष ही हमें भरमा रहे हैं। सामान्य भोले जन सोचने का ठेका राजनैतिक पक्षों को दे देते हैं। स्वयं सोचते नहीं है। तो ऐसे लोगों का कल्याण कैसे किया जाए? ऐसे, भोले जन घोषणाओं से, उक्तियों से, नारों से, और झटपट उपलब्धियों के वचनों से प्रभावित होते हैं। (दिल्ली विधान सभा चुनाव में क्या हुआ?)
उन्हें आम चाहिए, अभी के अभी।आम का बीज बोना नहीं है। तो फिर वादों वाली पार्टियाँ जीत जाती है। ६७ वर्षों से वादों पर जी रहे हैं। अंध निर्णय लिए जाते हैं।

ऐसे अंध निर्णयों से देश और भी पिछड जाता है।  रूपयों को छापकर भी समृद्धि नहीं आती। रुपया सस्ता हो जाता है।

(चार) भूमि अधिग्रहण का विरोध मौलिक नहीं।

विरोधी पक्ष देश-हित के बदले विरोध के लिए ही विरोध करे तो समस्या जटिल बन जाती है। सच्चा दीर्घकालीन हितकारी बदलाव घोषणाओं से, या लोक-लुभावन वचनों से नहीं किया जाता। जनता को भरमाया जा सकता है।

इस लिए, देश की जनता  दुविधा  में फँसी  है।
दुविधा इस लिए, कि, हमारे विचारक-चिन्तक-विद्वान-और सुशिक्षित हितैषी-गण भी इस समस्या पर सैद्धान्तिक निर्णय करने में असमर्थ दिखाई देते है।
फिर मात्र विरोध के लिए विरोध करनेवाले सिद्धान्तहीन पक्ष हमारे भारत में अपनी पकड ’येन केन प्रकारेण’ टिकाने के लिए, विरोध जता रहे हैं।समाचार में रहना ही उनके अस्तित्व का प्रमाण माना जाता है।
(पाँच) प्राकृतिक पर्यावरणीय घाटा?
मेरी दृष्टि में अधिग्रहण से बिना हिचक, निश्चित आर्थिक लाभ है। साथ साथ कुछ घाटा है।
पर लाभ का प्रमाण घाटे की अपेक्षा कई लाख गुना अधिक है।
विरोधी घाटे को ही बहुगुणित दिखा कर जनता की आँखो में धूल झोंकनेका काम कर सकते हैं।
अब प्रचण्ड आर्थिक लाभ की सीमित घाटे से किस भाँति तुलना की जाए?
तो पर्यावरण, गांधी, स्वदेशी इत्यादि सामने ला देते हैं।
पर आज की स्थिति में, छोटी छोटी इकाइयाँ आंतर राष्ट्रीय स्पर्धा में टिक नहीं सकती।
एक हजार एकड की खेती पर कितने कृषक जीविका चला सकते है? उस संख्या की तुलना आप उतनी ही भूमि पर उद्योग लगाकर खेती से अनेकानेक-गुनी प्रजा को जीविका प्रदान कर सकते हैं।
कृषकों की आत्महत्त्याएं बचा सकते हैं। वही कृषक उद्योगों में काम पा सकता है।
(छः) नर्मदा बाँध
उदा: नर्मदा के बाँध के कारण गुजरात में काफी उन्नति हुयी है। नर्मदा बांध ने अहमदाबाद में २४ घण्टे पानी उपलब्ध कराया है। कच्छ को और सारे गुजरात को, भी हराभरा करने में योगदान दिया है। {वहाँ कृषक जो कच्छ के रेगिस्तान में कुछ खेती करता था, वह सम्पन्न हो रहा है। (ऐसी, एक युवा ने स्कूटर पर प्रवास कर के गुजराती में लेखमाला लिखी थी।)
साथ साथ कुछ वनवासियों को अवश्य विस्थापित भी होना पडा होगा ही। मुझे उसकी जानकारी नहीं है। यह घाटा अवश्य है, पर उसके सामने समस्त गुजरात को जल की आपूर्ति हुयी है। यह लाभ,घाटे की अपेक्षा कई लाख गुना है।
जिस अहमदाबाद में पानी की घोर समस्या थी,(वहाँ मैं जाता रहा हूँ।)वहाँ आज २४ घण्टे पानी, सपना नहीं वास्तविकता देखी है।ये दिल्ली की भाँति मर्यादित पानी का आश्वासन नहीं, २४ घण्टे पानी का प्रबंध है।

ऐसा कोई भी प्रकल्प नहीं होता, जिसमें हर नागरिक को लाभ हो।
उदाहरणार्थ: देश की रक्षाहेतु सैनिक अपने प्राण देकर भी जब सीमा पर बलिदान देते हैं; तो क्या लाभ उन्हें मिलता है? क्या लाभ मिलता है? बताइए।
संक्षेप में कुछ पाने के लिए कुछ खोना पडता है।
अर्थशास्त्र लाभ का अनुमानित, हिसाब लगाता है। उसका मूल्य भी अनुमानित किया जाता है।
अंग्रेज़ी में (मैं ने युनिवर्सीटी स्तर पर, इन्जिनियरिंग इकनॉमिक्स भी पढाया है।) इसे Benefit-Cost Ratio कहते हैं।

Benefit माने लाभ। और Cost माने कीमत।१००० करोड का लाभ और सामने २०० करोड की कीमत हो, तो, ==>लाभ/कीमत = १०००/२००= ५ हुयी। इस में लाभ, कीमत से पाँच गुना हआ। ऐसे, विश्लेषण के आधार पर स्वीकृति दी जाती है।
नर्मदा बांध के कारण कितना लाख गुना लाभ हुआ होगा। शायद कई करोड गुना?
(सात) साणंद का वाहन उद्योग केद्र:
साणंद में प्रचण्ड उन्नति हुयी है। हजारों एकड भूमि के घाटे के सामने २२००००० (२२ लाख) वाहनों का कुल  निर्माण अनुमान है।
==>समय लगेगा, पर सारे तर्क यही दिशा दिखा रहे हैं। अभी ही २५००० कारे निर्माण हो रही है, प्रतिवर्ष।
इकनॉमिक टाईम्स का उद्धरण:(सारे शब्द समाचार वाले किरण ठक्कर के हैं)
“टाटा मोटर्स यहां अपनी छोटी कार नैनो की मैन्युफैक्चरिंग करती है। साथ ही, फोर्ड इंडिया का प्लांट तैयार हो रहा है, जबकि होंडा मोटर भी यहां प्लांट खोलने की कतार में खड़ी है। सेल्स वॉल्यूम के लिहाज से देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी ने अपने दो प्लांट्स के लिए यहां जमीन का अधिग्रहण किया है।”
“………………अगले 6-8 साल में इस इलाके में मारुति, टाटा मोटर्स, फोर्ड इंडिया और होंडा कार्स इंडिया की तरफ से तकरीबन 22 लाख पैसेंजर व्हीकल्स का प्रॉडक्शन होने की उम्मीद है।”

जिस उन्नति की बालटी को मिलकर उठाना है, उसी बालटी में अपना पैर गाडकर हम उन्नति की बालटी नहीं उठा सकते।

गांधी जी का रास्ता आज बिलकुल संभव नहीं लगता। स्वदेशी वाले भी देश हित में सोच कर आलेख प्रकाशित करे। मंच की देश-भक्तिपर मुझे संदेह नहीं।
पर आज स्वतंत्र चिन्तन की आवश्यकता है।
वंदे मातरम्‌

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11 Comments on "भूमि अधिग्रहण की समस्या"

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डॉ. मधुसूदन
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Message received by e mail–FROM Su Shri –SHAKUNTALA BAHADUR आदरंणीय मधुसूदन जी , आपके द्वारा भेजे गए दोनों आलेखों के लिये आभारी हूँ । पढ़ तो पहले ही लिये थे किन्तु उत्तर अब दे पा रही हूँ । विलम्ब के लिये क्षमा करें । प्रवक्ता के अन्य लेखों को भी पढ़ने में लग गई थी । १. स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर पूर्व और पश्चिम के जो तुलनात्मक तथ्य आपने प्रस्तुत किये हैं , मेरी उनसे पूर्ण सहमति है । बड़ी ही सहजता से आपने इस संवेदनशील विषय पर प्रकाश डाला है । २. भूमि – अधिग्रहण की समस्या और उसके निवारण… Read more »
Mohan Gupta
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भूमि अधिग्रहण एक जटिल समस्या हैं। देश की आर्थिक उन्नति के साथ साथ हमें कृषि और किसानो का भी ध्यान रखना चाइये। भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। जब से कांग्रेस सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल बनाया हैं , उस समय से देश में कृषि योग्या भूमि में बहुत कमी आ गयी हैं। बिभिन राज्यों में जितनी भूमि अधिग्रहण की गयी हैं उनमे से लगभग ३८ % भूमि पर कोई विकास नहीं हुया हैं. उन्ही अधिग्रहण भूमि पर माफिया लोगो ने साकार की सहायता से कब्जा कर लिया और फिर माफिया लोगो ने गगनचुमि इमारते बनाकर कई फ्लैट्स का निर्माण… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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मोहन जी—निवेदन है, कि, निम्न आलेख भी पढ ले।

औद्योगिक समवाय और भू-अधिग्रहण। और फिरसे प्रतिक्रिया दे।

http://www.pravakta.com/industrial-samvay-and-land-acquisition

Durga Shanker Nagda
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धन्यवाद । नमश्कार डॉ  मधुसूदन जी । I like your below phrase: “जिस उन्नति की बालटी को मिलकर उठाना है, उसी बालटी में अपना पैर गाडकर हम उन्नति की बालटी नहीं उठा सकते।”  उपरोक्त एक अखंड सत्य है । अति सुन्दर सत्य आपने लिखा है । If we Indians can learn this -United we stand, India will be great again soon . और भूमि अधिग्रहण बिल तो अच्छा है तथा विपक्ष को मिल कर इसे पास करना चाहिए लेकिन किसानों को अपनी उपजाऊ भूमी के बदले उतनी ही या उससे ज्यादा उपजाऊ भूमि उसी इलाके में मिलनी चाहिये क्योंकि मनुष्य… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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धन्यवाद -दुर्गा शंकर जी।

क्या मैं अनुरोध कर सकता हूँ, निम्न
“औद्योगिक समवाय और भू-अधिग्रहण”
नामक आलेख को पढने के लिए।
फिर आप टिप्पणी भी दीजियेगा।

http://www.pravakta.com/industrial-samvay-and-land-acquisition

डॉ. मधुसूदन
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आ. दुर्गाशंकर जी–नमस्कार। (१) किसी योजना की स्थूल पैमाने पर (Gross level) पहले, स्वीकृति या अस्वीकृति सुनिश्चित की जाती है। पश्चात सूक्ष्मताएं भरी जाती है। (२) मोदी जी स्वयं भ्रष्ट नहीं है; यह पारदर्शक सच्चाई हमारे पक्षमें है। (३) पश्चात केंद्रीय सत्ता भी मूलतः मोदी जी के भ्रष्टाचार रहित ही मानता हूँ।– आप गडकरी जी की प्रतिक्रिया भी पढिए। (४) फिर, नर्मदा का बाँध, और साणंद का वाहन उद्योग –दोनों की समीक्षा कीजिए( यही संदर्भ उचित है) –अन्य प्रदेशों का इतिहास विशेष अर्थ नहीं रखता। (५) जो यंत्रणा मोदी को धरोहर में मिली है; उसी स्वच्छ जिस शीघ्रता से किया… Read more »
ARUN TIWARI
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17.03.2015 आदरणीय मधु जी भूमि अधिग्रहण से भला कोई कैसे असहमत हो सकता है ? भूमि तो चाहिए ही। किन्तु कायदे ऐसे तो हांे, जिनसे भूमि मालिक सहमत हो। मत भिन्नता, बस इतनी सी है कि आप अन्य उद्योगों की समृद्धि को लेकर चिन्तित है और मैं अन्य के साथ-साथ कृषि उद्योग और कृषि भूमि का अस्तित्व बचाने को लेकर। माननीय, अन्य औद्योगिक उत्पाद हमारी बढती जरूरतांे की पूर्ति की जरूरत हैं; किन्तु अन्न-जल के बगैर तो हम जिंदा ही नहीं रह सकते। भला कोई अन्न उपजाने वाली भूमि, भूमिधर और उसकी प्राथमिकताओं की उपेक्षा कर सकता है ? आप… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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तिवारी जी–नमस्कार।
निम्न कडी पर “औद्योगिक समवाय और भू-अधिग्रहण” आलेख पढने का अनुरोध करता हूँ।

http://www.pravakta.com/industrial-samvay-and-land-acquisition

डॉ. मधुसूदन
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तिवारी जी –नमस्कार। (१) ठीक है। सामान्यतः कोई भी योजना स्थूल आयाम में पहले परखी जानी चाहिए। सूक्ष्मताएँ बाद में भरी जाती है। (२) मेरा अनेक प्रकल्पों का अनुभव यही कहता है। प्रकल्प अभियांत्रिकी, और निर्णायक पथ पद्धति (Critical Path Method) पढाने का, और प्रयोजन का दोनों का अनुभव मुझे है। (३) विपक्ष कृषक के स्वार्थ की पूर्ति के नारों से उसे ललचाकर भटका रहा है। जनता भी, स्वार्थ पूर्ति की लालच से झटपट संगठित होती है। (४) आप अपने ९ सुझावों पर सुनिश्चित कर आलेख डालिए,जो आपने मुझे भेजे थे। सबसे ऊपर विधान अवश्य कीजिए, कि, लेखक भूमिअधिकरण से… Read more »
ARUN TIWARI
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16.03.2015 आदरणीय मधु जी, आप विदेश में रहते हुए भी देश के मुद्दों के प्रति सजग रहते हैं। यह अच्छी बात है। आपने लेख पर मेरी राय चाही है। मेरा मानना है कि मेरी राय उतना महत्व नहीं रखती, जितना उन ज़मीन मालिकों की, जिनकी चिंता मुद्दा बन रही है। अतः मेरी राय है कि यदि आप ज़मीन के मुद्दे को सचमुच जांचना चाहते हों, तो आप भारत की जमीन पर आकर ज़मीन के मालिकों से राय लेकर ही जांचे। जहां तक आपका प्रश्न है कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है ? इसके उत्तर में सोचना चाहिए कि आत्महत्यायें… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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तिवारी जी–नमस्कार।
आप ने समय लेकर दीर्घ टिप्पणी दी–हृदयतल से धन्यवाद।
जिससे, आप की संवेदना व्यक्त होती है।
——————————
पर, इस आलेख का, शीर्षक “भूमि अधिग्रहण” है।
गौण बिन्दू पर टिप्पणी,विषय से भटका सकती है।
आप की टिप्पणी का केन्द्रीय विषय अलग है।
अलग आलेख डालें। मैं जानकारी के अनुपात में,चर्चा में हिस्सा लूँगा।
तत्वतः भूमिअधिग्रहण से असहमत नहीं दिखते आप।
डॉ. मधु सूदन

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