लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under जरूर पढ़ें.


-डॉ. मधुसूदन –

pm-modi-announces-higher-aid-for-rain-affected-farmers

(एक) हमारा संकीर्ण दृष्टि दोष:
हम चाहते हैं; कि, राष्ट्र की प्रत्येक समस्या के समाधान में, हमारी इकाई को, हमारे प्रदेश को, हमें लाभ पहुंचे। और जब ऐसा होता हुआ, नहीं दिखता, तो हम समस्या को हल करने में योगदान देने के बदले, समस्या के जिस गोवर्धन पर्वत को उठाना होता है, उसी पर्वत पर चढ़कर बैठ जाते हैं। तो, पर्वत का भार बढ़कर, उसे उठाना असंभव हो जाता है। समस्याएँ लटकी रहती हैं। उनके सुलझने से जो कुछ लाभ हमें होना था; उस लाभ से भी हम वंचित रहते हैं।
बंधुओं, ऐसे समस्या का समाधान नहीं निकलता। न देश को समस्या सुलझाने से लाभ होता है। एक घटक के नाते जो लाभ हमें पहुंचना होता है, वह भी नहीं पहुंचता।


(
दो) क्या प्रत्येक समाधान से सभी को लाभ?
हर समस्या के सुलझने से हर कोई को लाभ प्रायः कभी नहीं होता। पर अनेक राष्ट्रीय समस्याएँ सुलझने पर जो कुल सामूहिक लाभ होता है, वह अनुपात में कई गुना अधिक होता है।
पर सारी  कुक्कुरमुत्ता पार्टियाँ  छोटी छोटी इकाइयों के स्वार्थ पर टिकी हैं। किसी समुदाय के स्वार्थ को उकसा कर आप झटपट संगठन खडा कर नेता बन सकते हैं। त्याग के आधार पर संगठन करना कठिन होता है।और राष्ट्रीय दृष्टि से संगठन खडा करना और भी कठिन है। ऐसे, राष्ट्रीय दृष्टिका अभाव चारों ओर दिखता है। वैयक्तिक स्वार्थ को उकसाकर संगठन खड़ा करना तो सरल होता है; इस लिए, छोटी-छोटी इकाइयों के बहुत सारे संगठन आप को देशभर में, दिखाई देंगे। सामान्यतः, ऐसे संगठन उन्नति की बालटी के अंदर अपना, पैर गड़ाकर उसे दूसरों से, उठवाना चाहते हैं; उन्नति के, गोवर्धन पर्बत पर चढ़कर, उसका  भार बढ़ाकर उसे दूसरों से उठवाना चाहते हैं। ऐसे, जब समस्याएँ हल नहीं होती तो अपनी इकाई को छोड़कर शासन सहित अन्य सारों को दोष देते हैं।

पर, कुछ त्यागव्रती निःस्वार्थ संगठन भी हैं, जिनके नेतृत्व में राष्ट्रीय-दृष्टि के कर्णधार हैं, पर ये अपवाद ही माने जाएंगे। भाग्य है, हमारा कि, ऐसे संगठनों ने ही भारत को आपत्तियों में सदैव सहायता की है। 

(तीन) क्या हम जनतंत्र में विश्वास करते हैं?
कहने के लिए हम जनतांत्रिक है, वास्तव में हम स्वार्थतांत्रिक हैं। हमारे लिए हर समाधान या समस्या का हल, मेरे प्रदेश को, मेरी जाति को, मेरे समुदाय को क्या मिला, इसी निकष पर टिका है।

(चार) हमारा निकष: 

हमारा निकष है, ऐसा हल जिस में बिना अपवाद, सभी का लाभ हो। किसी को कुछ देना ही ना पड़े। लाभ ही लाभ होना चाहिए।  तभी, सबका साथ, सबका विकास सार्थक होगा। हम मूर्ख हैं।
ऐसे निकष का अर्थ विस्तार यही होगा, कि, हमारे लिए, प्रत्येक समाधान ==>सारे घटक प्रदेशों के स्वार्थों का जोड़ होना चाहिए। उस जोड़ में यदि मेरे गुट का नाम नहीं है, तो हम चढ़ जाएंगे गोवर्धन पर्वत पर। फिर उठाके दिखाइए, उस पर्वत को। या हम जो बाल्टी उठाने का प्रयास हो रहा है, उस बाल्टी में अपने पैर गाड़ देंगे। दिखाइए उठाकर उस बाल्टी को।
क्या इसे राष्ट्रीय दृष्टि कहा जा सकता है?
नहीं। यह स्वार्थी वृत्ति ही राष्ट्रीय समस्या के हल में अड़ंगा है।
इस भाँति समस्याएँ कभी भी हल नहीं हो सकती। 

(पाँच) गुजरात का अनुभव: 
यदि यही नीति गुजरात में गत १० वर्षों में अपनायी गयी होती, तो, सरदार सरोवर (नर्मदा) बांध बन ही ना सकता। और आज सारे कच्छ को और अंशतः राजस्थान को भूमि सिंचन का पानी न पहुंचता। गुजरात के नगर वासियों को २४ घण्टे पानी ना मिलता। साणंद समृद्धि के मार्गपर आगे ना बढ़ता।
एक गुना घाटा हुआ तो सामने १०० गुना से अधिक लाभ हुआ। यह अनुमान लेखक का नहीं, पर विशेषज्ञों का है।

गुजरात में क्या हुआ?
एक (१) एकड़ की भूमि के बदले, सैंकड़ों (१००+) एकड़ भूमि उपजाऊ हो गयी। पूरे कच्छ और कुछ राजस्थान की भूमि भी उपजाऊ हो गयी। कितने सारे नगरों को २४ घण्टे पानी की आपूर्ति होने लगी, बिजली मिलने लगी।

(छः) युक्तियों की पराकाष्ठा

युक्तियों की पराकाष्ठा भी कम न थीं। नर्मदा की नहर के ऊपर ही छत लगाई गयी। जिस से धूप के कारण भाँप बनकर उड़ जानेवाला पानी बचाया गया। फिर छत के ऊपर सौर ऊर्जा संग्राहक लगाए गए। सौर ऊर्जा का संग्रह कर, बिजली निर्मिति भी की गयी।

सोचिए। नर्मदा का बाँध और नहरें बनाने जितनी भूमि लगी।
(क)  उसके बदले में गुजरात सहित कच्छ की कुल भूमि सिंचित हुयी।
(ख) गुजरात के नगरों को २४ घण्टे पानी मिला ।

विशेषज्ञों के अनुसार:
(लाभ /घाटे) के अनुपात की संख्या १०० से भी काफी बड़ी निकली।
एक एक एकड़ भूमि के बदले कई कई एकड़ों को सिंचन ।

कुल खाद्यान्न की उपज भी कई गुना बढ़ी ।
फिर नर्मदा की नहर पर छत लगी।
उस छत के कारण धूप से, भांप बनकर उड़ जानेवाला पानी बचा।
उस छतपर सौर ऊर्जा से बिजली भी बनाई गई।
सौर ऊर्जा किसी भी प्रकार की दूषित वायु नहीं फैलाती।
नहर पर की छत भांप से पानी का व्यय भी बचाती है।
और सौर ऊर्जा के लिए अतिरिक्त भूमि भी बचती है।

(सात) मेरा प्रत्यक्ष अनुभव:

मैं जब, अहमदाबाद गया तो २४ घण्टे नल में पानी देखकर ही चकित था। पहले नल को खोल खोल कर पानी परखा जाता था। ये ऐसा बदलाव था, जो, महिलाओं को शीघ्र संतुष्ट करता, अनुभव हुआ। दिन भर पानी से काम जो पडता है। यह बदलाव पुरूषों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखता।
शेष सारे बदलाव देखकर भी बहुत बहुत हर्षित था।
भूमि दिए बिना  बाँध बन न सकता था, न नहर बन सकती थी,   टाटा का साणंद का उद्योग खड़ा हुआ होता। 

(आठ) हम जादुई छड़ी चाहते हैं।

पर, हम कुछ दिए बिना ही सब कुछ पाना चाहते हैं। यह कपटपूर्ण व्यापार है।
गांधी जी ने भी सात सामाजिक पाप गिनाए, हैं।
१- सिद्धांतों के बिना राजनीति।
२- परिश्रम के बिना संपत्ति का उपभोग।
३- अंतरात्‍मा को मारकर आनंद।
४- चरित्र के बिना ही ज्ञान प्राप्ति।
५- नैतिकता विहीन लेनदेन।
६- मानवता विहीन विज्ञान।
७- बिना त्‍याग की पूजा।

मुझे लगता है; कि आज  (१)- “सिद्धांतों के बिना राजनीति” हो रही है।
(२)- परिश्रम के बिना ही संपत्ति के  उपभोग को, हम पुरस्कृत कर रहे हैं।
(३)- अंतरात्‍मा को मारकर हम सुखी होना चाहते हैं।
(५)- नैतिकता विहीन ही लेन देन  चाहते हैं।
(७)- बिना त्‍याग किए ही, (भारत माता की) पूजा करना चाहते हैं।

लगता है, जागने का समय है; बंधुओं उठो, जागो, और अपनी उन्नति में कुछ योगदान दो। समय निकला जा रहा है।

उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत”॥

अब की बार, अषाढ चूकने का अवसर नहीं है। 
पल पल निकला जा रहा है। 

चेतक करो, अब चेत करो 
उन्नति के, चेतक की टाप सुनायी दे रही है।

Leave a Reply

23 Comments on "भूमि-अधिग्रहण नहीं चाहिए; क्यों? "

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. मधुसूदन
Guest

DO YOU REALLY WANT TO PREVENT SUICIDES LIKE OF GAJENDRA?

Statistics speaks an impartial language.

Wake up friends and PREVENT SUICIDES LIKE OF GAJENDRA?
(1)avoid suicides of farmers by enriching Bharat.
Few acres of acquisition=====>
(2)irrigates hundreds of acres,
(3) prevents famines and increases # of crops. (Go to Katchh and see…for yourself…do not trust me.)
(4) raises depleting ground water table. Otherwise Bharat will suffer severe shortage…..remember my words.
(5) provides for domestic water.
=====> Well wishers of Bharat…..Wake up.<==========

डॉ. मधुसूदन
Guest
मित्रों विचारकों को मौलिक चिन्तन करने का अनुरोध है। (१) कोई व्यवहार करने योग्य उपाय पर बुद्धि लगाइए। (२)You need a handle. अंकुश या लगाम हाथ में आये ऐसी युक्ति सोचनी चाहिए। बालक का रोना, माँ सुनती है, तो दूध पिलाती है। (३) मोदी जी तो अभी आये हैं। अन्याय पहले हुआ है। (क)अर्थ: जन तंत्र में जागरुक जनता का योगदान चाहिए। (ख)अर्थ: कृषि से आज तक भारत आत्म निर्भर नहीं हो पा रहा है। तो उद्योगों को विकसित करें-निर्यात करें। और जनता का पोषण करें। (४)जिस कृषि से आप का पेट तक भरता नहीं। आत्महत्त्यआएँ हो रही हैं; उसको… Read more »
Mohan Gupta
Guest
ब्रिटीश शासन काल के दोरान से कृषको की भूमि का अधिग्रहण होता रहा हैं। स्वतंत्रता के पश्चात जितनी भी भूमि अधिग्रहण की गयी हैं उसके अधिकांश भाग पर कोई विकास नहीं हुआ हैं। बल्कि कृषको की अंधिकांश अधिग्रहित भूमि पर राजनीतिज्ञ और माफिआ लोगो ने कब्जा कर लिया और धोके से इस अनिग्रहित भूमि को बहुत अधिक लाभ पर बेचा। इस कारन कई कृषको को रोज़ी रोटी के लाले पड़ गए हैं। कई कृषको ने आत्म हत्या भी की। इसका परिणाम यह हुया के ७६% कृषक खेती वाडी छोड़ना चाहते हैं। क्योंकि कृषको की कमाई बहुत कम हो गयी हैं।… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
(१)मोहन जी आप की बात सही है। इस पर कोई व्यवहार करने योग्य उपाय पर बुद्धि लगाइए। (२)You need a handle. अंकुश या लगाम हाथ में आये ऐसी युक्ति सोचनी चाहिए। बालक का रोना, माँ सुनती है, तो दूध पिलाती है। (३)और मोदी जी तो अभी आये हैं। अन्याय पहले हुआ है। (क)अर्थ: जन तंत्र में जागरुक जनता का योगदान चाहिए। (ख)अर्थ: कृषि से आज तक भारत आत्म निर्भर नहीं हो पा रहा है। तो उद्योगों को विकसित करें-निर्यात करें। और जनता का पोषण करें। (४)जिस कृषि से आप का पेट तक भरता नहीं। आत्महत्त्यआएँ हो रही हैं; उसको छोडे,… Read more »
आर. सिंह
Guest
डाक्टर मधुसूदन यह समझ रहे हैं कि मुद्दा भूमि अधिग्रहण क़ानून है,जबकि वास्तविक मुद्दा भूमि अधिग्रहण क़ानून २०१३ को निरस्त्र करने के लिए लाया गया अध्यादेश है.वे बार बार गुजरात के विकास का जो उदहारण दे रहे हैं,उससे साफ़ जाहिर होता है कि वे अभी भी अपनी दुनिया में भ्रमण कर रहे हैं.डाक्टर साहिब गुजरात के जिस विकास की बात कर रहे हैं,उसका इस नए अध्यादेश से दूर दूर तक का नाता नहीं है.मैं डाक्टर साहिब से यही अनुरोध करूंगा कि वे अपनी डफली अपना राग वाला रवैया छोड़े और अपने स्वप्न लोक से बाहर आकर वास्तविक मुद्दे को समझे.… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

(१)यह मेरा लेखन स्वातंत्र्य है; मेरा अधिकार भी। मुझे गुजरात का चकाचौंध कर देनेवाला अनुभव, जहाँ, १ पैसा खर्च कर १ रुपया मिला; सामने लाना था।
(२)आप को अलग लेख लिखनेसे रोक नहीं रहा।
(३) मुझे, व्यावसायिक गरिमा से नीचे, (सं)वाद अच्छा नहीं लगता।
(४) आप आखरी टिप्पणी का सम्मान लीजिए; अपवाद केवल ==>दिगभ्रमित स्थिति में ही मैं हस्तक्षेप करूंगा।

डॉ. मधुसूदन
Guest
सभी पाठकों को नमस्कार। (१) आप ने अपने विचार व्यक्त किए। यह कोई कम उपलब्धि नहीं। (२)जनतंत्र में, यह विचारों का व्यक्त होना भी एक आवश्यक विधा है। (३) कुछ पाठक छोडकर भूमिअधिग्रहण का विरोध करते कोई दिखाई नहीं देते। (४) गुजरात भी भारत में ही है। और वहाँ की सफलता भूमि अधिग्रहण की सफलता है। वहां की जानकारी मुझे (कुछ)प्रत्यक्ष है। इस लिए, उसका उदाहरण देना बिलकुल तर्क सम्मत है।वहाँ, जो लाभ १०० गुना आंका गया है; उसे उपेक्षित कैसे किया जा सकता है? और, क्यों उपेक्षित करे? यह पक्षपात क्यों?===> इस लिए, कि वहाँ सफलता प्राप्त हुयी है?… Read more »
wpDiscuz