लेखक परिचय

अरुण माहेश्‍वरी

अरुण माहेश्‍वरी

अरुणजी हिन्दी के महत्वपूर्ण वामपंथी आलोचक हैं और कोलकाता में रहते हैं।

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-अरुण माहेश्वरी

बीस साल में मानव विकास की बीस रिपोर्ट आ चुकी है। विकास के केंद्र में हमेशा मनुष्य रहे, और मनुष्य-केंद्रित विकास को मापने के पैमाने क्या हो जिनके अनुसार विकास कार्यों का एक सही परिप्रेक्ष्य और आगे की योजनाओं का स्वरूप तय किया जा सके – इन्हीं घोषित उद्देश्यों से संयुक्त राष्ट्र संघ के संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम(यूएनडीपी) की ओर से मानव विकास रिपोर्टों (एचडीआर) की तैयारी और प्रकाशन का सिलसिला शुरू हुआ था। 1990 में जब पहली मानव विकास रिपोर्ट प्रकाशित हुई, उसका एक बड़ा विश्व राजनीतिक संदर्भ भी था। 1989 में रूस और पूर्वी योरप के देशों में समाजवाद का पराभव हुआ था और एक नयी एकध्रुवीय दुनिया में वाशिंगटन के पूर्ण वर्चस्व का दौर-दौरा शुरू हो चुका था। समाजवाद को इतिहास का एक भटकाव घोषित करके स्वतंत्र दुनिया अर्थात स्वतंत्र बाजार की दुंदुभी का शोर सुनायी देने लगा था। संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका अमेरिका की मोहर की भूमिका रह गयी थी और आईएमएफ-विश्वबैंक के समायोजन कार्यक्रम खुले आम समाजवादी शिविर की उपस्थिति के काल में सारी दुनिया के मेहनतकशों द्वारा अर्जित अधिकारों और स्वतंत्रताओं के हनन को ही नयी ‘स्वतंत्र दुनिया’ में प्रवेश के एक प्रमुख नुस्खे की तरह पेश किया जा रहा था।

ऐसे समय में 1990 में जब यूएनडीपी की पहली एचडीआर तैयार हुई तो एक नजर में यह राबर्ट एस. मैक्नमारा के ‘नीति विश्लेषण’ के सिद्धांत पर चलते हुए समाजवाद के एक नये सैद्धांतिक विकल्प की तलाश के उपक्रम की तरह लगा था। किसी समय फोर्ड मोटर कंपनी के अध्यक्ष रह चुके मैक्नमारा कई वर्षों तक अमेरिकी सरकार के प्रतिरक्षा सचिव थे जो अमेरिका के वियतनाम युद्ध के शुरूआती वर्ष थे और 1968 से 1981 तक वे विश्व बैंक के अध्यक्ष पद पर रहे। विश्व बैंक के अध्यक्ष के रूप में ही उन्होंने सिर्फ इस उद्देश्य से ‘गरीबी को कम करने’ की नीतियों अर्थात भ्रमों को तैयार करने की पेशकश की थी ताकि दुनिया को (पिछड़े हुए और विकासशली देशों को) समाजवादी क्रांति के खतरों से बचाया जा सके। उस समय दुनिया में साम्राज्यवादी और समाजवादी, दो शिविरों की मौजूदगी के कारण सभी पिछड़े हुए और विकासशील देशों की सरकारों की सार्वभौमिकता काफी हद तक बनी हुई थी। नीतियों को अपनाने के मामले में उनके पास कई चयन थे। विकास का गैर-पूंजीवादी रास्ता विकासशील देशों का तब एक प्रमुख नारा हुआ करता था। गुट-निरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख रूझान साम्राज्यवाद-विरोध का रूझान था। वियतनाम में अमेरिकी हस्तक्षेप ने उसकी साख को मिट्टी में मिला दिया था। ऐसे समय में मैक्नमारा ने विश्व बैंक की सीधी मदद से सारी दुनिया में एनजीओज का एक भारी जाल तैयार किया ताकि राष्ट्रीय सरकारों को दरकिनार करते हुए प्रत्येक देश के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के माध्यम तैयार किये जा सके। एनजीओज का यह जाल आज भी कमोबेस उसी प्रकार काम कर रहा है।

इसीलिये, 1990 में जब यूएनडीपी की पहली मानव विकास रिपोर्ट आयी तब उस पर मैक्नमारा की तरह के ही एक और प्रकल्प के रूप में आशंकित होना अस्वाभाविक नहीं था। इसमें काफी हद तक सचाई भी थी। फर्क सिर्फ यह था कि जो काम मैक्नमारा स्वतंत्र गैर-सरकारी संगठनों के जाल के जरिये करना चाहते थे, अब बदली हुई परिस्थिति में उसी काम का बीड़ा उठाते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ दुनिया की तमाम राजसत्ताओं और सरकारी संस्थाओं के बने-बनाये ढांचे का इस्तेमाल करना चाहता है। अब एकध्रुवीय विश्व में, विकल्प के अभाव के चलते, राष्ट्रीय सरकारों की सार्वभौमिकता का आधार कमजोर हो चुका था। ऐसी स्थिति में एक ओर जहां वित्तीय और आर्थिक नीतियों के मामलों में ब्रेटनवुड संस्थाओं विश्वबैंक, आईएमएफ और गैट से उत्पन्न डबलूटीओ के दबावों और निर्देशों का बोलबाला दिखाई दे रहा था, वहीं राष्ट्रीय सरकारों की सामाजिक नीतियों को भी पेश करने के नये नुस्खों, ढांचों और सच कहा जाए तो पोशाकों अर्थात सज-धज को तैयार करने में यूएनडीपी और उसकी मानव विकास रिपोर्टों की भूमिका सामने आयी। लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि एचडीआर की पहली रिपोर्ट में ही तब तक की दुनिया की परिस्थितियों के विश्लेषण आधार पर जो तस्वीर सामने आयी, वह ऐसी है जो अनेक विकल्पों के बीच से चयन की उपलब्धता को मानव-केंद्रित विकास की राष्ट्रीय नीतियों के निर्धारण में हर लिहाज से श्रेयस्कर बताती है। कहना न होगा, इस प्रकार अपनी मूलभूत प्रस्थापना में शुरू से एचडीआर अमेरिकी साम्राज्यवाद के एकध्रुवीय विश्व के तमाम अभियानों के विरुद्ध खड़ी हो जाती है।

मसलन्, पहली एचडीआर (1990) में ही गुन्नार मिर्डल के ‘साफ्ट स्टेट’ और राष्ट्रीय सरकारों की कथित संपूर्ण विफलताओं के आधार पर तैयार किये गये मैक्नमारा के गैर-सरकारी नुस्खों के विपरीत सबसे पहली इस सचाई को रेखांकित किया गया था कि विगत तीन दशकों में विकासशील देशों ने मानव विकास की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके अलावा और दूसरे जो निष्कर्ष निकाले गये, उन्हें इस प्रकार गिनाया जा सकता है : विगत तीन दशकों में विकासशील उत्तर और दक्षिण के बीच आमदनी की खाई और ज्यादा चौड़ी होने के बावजूद मूलभूत मानव विकास के मामले में फर्क कम हुआ है; विकासशील समाजों में विषमता कम होने का नाम नहीं ले रही है, मानव विकास की दिशा में हुई प्रगति के औसत आंकड़े विकासशील देशों के अंदर की भारी विषमताओं को, शहर ओर देहात के बीच की विषमता को, पुरुष और स्त्री के बीच की विषमता को, धनी और गरीब के बीच की विषमता को छिपाते हैं; बहुत कम आमदनी के बावजूद मानव विकास के काफी सम्मानजनक स्तरों को हासिल किया जा सकता है; आर्थिक विकास और मानव प्रगति के बीच का संबंध स्वत:स्फूर्त नहीं होता है; निहायत कम आमदनी वाले लोगों के लिये सामाजिक अनुदान नितांत जरूरी है; विकासशील देश इतने गरीब नहीं है कि आर्थिक विकास के साथ मानव विकास का खर्च न उठा सके; समायोजन के नाम पर जो मानव मूल्य चुकाया जाता है, वह अक्सर चयन का मामला होता है, अनिवार्यता का नहीं; आने वाले समय में भी मानव विकास की सही रणनीतियों पर अमल के लिये उसे एक अनुकूल बाहरी परिवेश प्रदान करना जरूरी है; कुछ विकासशील अतिकमजोर देशों को दूसरों की तुलना में कहीं ज्यादा विदेशी मदद की जरूरत है; यदि तकनीकी सहयोग से विकासशील देशों में मानवीय योग्यताओं और राष्ट्रीय क्षमताओं का निर्माण करना है तो तकनीकी सहयोग के स्वरूप का पुनर्विन्यास करना होगा; मानव विकास की सफल रणनीति में गैर-सरकारी सहयोग हासिल करना होगा; मानव विकास के लाभों को हासिल करने के लिये आबादी पर नियंत्रण जरूरी है; विकासशील देशों में तेजी से बढ़ती आबादी शहरों में संकेंद्रित हो रही है; और अंतिम निष्कर्ष यह था कि वर्तमान पीढ़ी को अपनी आज की जरूरतों को पूरा करने के लिये विकास की ऐसी टिकाऊ योजनाएं अपनानी होगी जो आने वाली पीढि़यों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की शक्ति को किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं पहुंचायें।

पहली एचडीआर के ये सभी निर्देश योजनबाद्ध विकास की अनिवार्यता को बताने के लिये काफी है। इसके बाद हर साल एचडीआर की एक के बाद एक रिपोर्ट आती चली गयी। 1991 की दूसरी रिपोर्ट में ही साफ शब्दों में यह कहा गया कि विकास संबंधी नीतियों में मनुष्य की अवहेलना का वास्तविक कारण अक्सर राजनीतिक प्रतिबद्धता का अभाव होता है, न कि वित्तीय संसाधनों की कमी। 1992 में जो तीसरी रिपोर्ट आयी, वह वैश्वीकरण के बारे में थी। इसकी भी यह मान्यता थी कि आर्थिक विकास स्वत:स्फूर्त ढंग से आम लोगों की जिंदगियों में सुधार नहीं लाता। आज विश्व बाजार में धनी और गरीब देश असमान भागीदारों के रूप में प्रतिद्वंद्विता कर रहे हैं, जिसके चलते विकासशील देशों को मिलने वाली आर्थिक सहायता से दस गुना से ज्यादा उन्हें व्यापार में घाटा उठाना पड़ता है।

दुनिया के आर्थिक और सामाजिक जीवन के बारे में इन महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक रिपोर्टों के बाद 1993 की एचडीआर में पहली बार जो एक राजनीतिक विकल्प प्रदान करने की कोशिश की गयी, उसमें जन-भागीदारी वाले जनतंत्र की बात की गयी थी और मोटे तौर पर इसके परिपे्रक्ष्य के रूप में कुछ ऐसी बातें कही गयी जो पूरे एचडीआर प्रकल्प को शक के दायरे में डालने वाले राजनीतिक उद्देश्यों पर रोशनी डालती है, जिनकी यहां शुरू में चर्चा की गयी है। इसमें जन-भागीदारी वाले जनतंत्र को आज के वक्त का एक केंद्रीय विषय बताते हुए साफ कहा गया है कि ‘‘बहुत से देशों का जनतांत्रिक संक्रमण, कई समाजवादी सरकारों का पतन तथा सारी दुनिया में जनता के संगठनों का उदय – ये सभी अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक ही ऐतिहासिक परिवर्तन के हिस्से हैं।’’ 1994 की रिपोर्ट भी कुछ हद तक उसके इसी राजनीतिक अभियान का विस्तार जान पड़ती है जिसमें हथियारों की होड़ और मानव विकास के सिलसिले में अमेरिका के एक गृहसचिव के जून 1945 के कथन को उद्धृत किय गया है कि ‘‘ शांति के युद्ध को दो मोर्चों पर लड़ना होगा। पहला, प्रतिरक्षा के मोर्चे पर जहां जीत भय से स्वतंत्र करती है। दूसरा, आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर जहां जीत अभावों से स्वतंत्र करती है।’’ अमेरिका में औद्योगिक-सामरिक गंठजोड़ों के सत्य को देखते हुए इस रिपोर्ट की समूची चर्चा काफी तात्पर्यपूर्ण है।

इसके बाद लिंग और मानव विकास (1995), आर्थिक समृद्धि और मानव विकास(1996) की रिपोर्टें ऐसी है जो मौजूदा रोजगारविहीन, वाणीहीन, निर्दयी, जड़विहीन और भविष्यहीन विकास का एक आख्यान तो पेश करती है, लेकिन किसी ठोस वैकल्पिक सोच के अभाव में विकास के ऐसे विकृत रूप के लिये जिम्मेदार व्यवस्था से भिन्न दूसरी किसी व्यवस्था के निर्माण का रास्ता नहीं बताती। 1997 की रिपोर्ट में गरीबी हटाने के नुस्खे बताये गये हैं, 1998 की रिपोर्ट उपभोग को भी मानव विकास का एक मानदंड बना कर सोचने की बात कहती है। 1999 की रिपोर्ट में वैश्वीकरण के मानवीय चेहरे के प्रश्न को उठाया गया है। इस प्रकार एचडीआर के पहले दस वर्ष बीत गये। देखते ही देखते, दुनिया की राजनीतिक सूरत भी काफी बदल गयी। पिछली सदी के 90 के दशक में जिन्होंने अमेरिकी विद्वानों के उदार जनतंत्र को ही राजनीतिक व्यवस्थाओं के विकास के इतिहास का आखिरी चरण मान लिया था, इसी बीच उनका भी भारी मोहभंग हुआ है। हाल के वर्षों के विश्व आर्थिक संकट के परिणामों ने तो आर्थिक क्षेत्र में विनियमन के सभी प्रयत्नों को शक के दायरे में ला दिया है। और इसके साथ ही हम यह देखते है कि मानव विकास रिपोर्टें क्रमश: एक शुद्ध अकादमिक व्यायाम में तब्दील होकर सारी दुनिया की सरकारों के लिये अपने कामों का एक रिपोर्ट कार्ड बनाने के ढांचे की भूमिका भर निभा रही है, नीतियों के निर्धारण में वर्गीय स्वार्थों की क्रूर वास्तविकता को बदलने के किसी भी उपक्रम में इनका स्थान नहीं रह गया है। एचडीआर के 20 वर्षों बाद ऐसा लगता है जैसे आज ये रिपोर्टें दुनिया के शासक वर्गों को अपनी सचाई को छुपाने के लिये तैयार की जाने वाली रिपोर्टों को एक और आकर्षक भाषा भर देने की भूमिका अदा कर रही है।

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2 Comments on "सच को छिपाने की भाषा"

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Dr.ChandraKumar Jain
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सूचनाओं से समृद्ध, सधी हुई
सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार.
मानव विकास प्रतिवेदन में
मानव की मानवीय खोज और
विकास की धरातलीय शिनाख्त
समय की मांग है…. धुंधलका
दूर होना ही चाहिए…
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

श्रीराम तिवारी
Guest
सामाजिक आर्थिक दुरावस्था का सचित्र चित्रण करना किसी भी रिपोर्ट की ओपचारिकता भर हुआ करती है .वशर्ते वह रिपोर्ट उन विशेषज्ञों के मार्फ़त आई हो जो भूमंडलीकरण .उदारीकरण तथा निजीकरण के अलाम्वार्दारों से वेतन भत्ते पाते हों . अन्य देशो में कमोवेश हेरफेर के साथ किन्तु भारत में तो मानव विकाश के शिल्पकार वही हैं जो कल तक विश्व बैंक तथा अंतर राष्ट्रीय मुद्रा कोष या किसी टॉप बहुराष्ट्रीय कंपनी के कारकून थे .अब होना वही है जो मंजूरे खुदा होगा .
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