अरुण माहेश्‍वरी

अरुणजी हिन्दी के महत्वपूर्ण वामपंथी आलोचक हैं और कोलकाता में रहते हैं।

‘गैर-बराबरी’ आखिर अर्थशास्त्र का मुद्दा बना

 अरुण माहेश्वरी नवउदारवाद के लगभग चौथाई सदी के अनुभवों के बाद मुख्यधारा के राजनीतिक अर्थशास्त्र को बुद्ध के अभिनिष्क्रमण के...

भारतीय वामपंथ के पुनर्गठन की एक प्रस्तावना / अरुण माहेश्‍वरी

(''आत्मालोचना क्रियात्मक और निर्मम होनी चाहिए क्योंकि उसकी प्रभावकारिता परिशुद्ध रूप में उसके दयाहीन होने में ही निहित है। यथार्थ...

मार्कण्डेय : जीवन के बदलते यथार्थ के संवेगों का साधक

-अरुण माहेश्वरी ‘निर्मल वर्मा की कहानियों में लेखकीय कथनों की एक कतार लगी हुई है। जहां जरा-सा गर्मी-सर्दी लगी कि...

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