लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


the-gandhi_familyडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
देश के पाँच राज्यों असम, केरल,तमिलनाडु,पुदुच्चेरी और पश्चिमी बंगाल की विधान सभाओं के चुनाव परिणाम सोनिया कांग्रेस के लिए तो कम से कम ख़तरे का शंखनाद कहा जा सकता है । साम्यवादी मोर्चा, जिसका शोर देश में सबसे ज़्यादा सुनाई देता है, के लिए ये परिणाम उसके अप्रासांगिक हो जाने की सूचना है । जहाँ तक भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी ताक़तों का सवाल है , उनके लिए ये परिणाम उतने ही उत्साहवर्धक कहे जा सकते हैं ।
सोनिया कांग्रेस २०१४ के बाद से ही सिमटती जा रही है । दिशाविगीन वह शुरु से ही रही है । इन चुनाव परिणामों के बाद उसका राज्य केवल कर्नाटक में रह गया है । शेष जिन राज्यों में उसका तथाकथित शासन है उनमें मणिपुर, मिज़ोरम ,मेघालय, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड शामिल है । सोनिया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी अब मानने लगे हैं कि अगले साल के चुनावों में कर्नाटक उनके हाथ से निकल जायेगा । कम्युनिस्ट टोला , जिसमें अब केवल चर्चा के लिए सी पी एम ही बचा है , यदि बंगाल में बहुमत न सही , अपनी दमदार उपस्थिति ही दर्ज करवा देता तो उसकी प्रासांगिकता बची रहती । उसे लगभग तीन सौ सदस्यों वाली विधान सभा में केवल २६ सीटें मिलीं , वे भी तब जब सोनिया कांग्रेस ने उसकी खुल कर मदद की ।
चुनाव परिणामों के विस्तृत विश्लेषण से इन के दूरगामी परिणामों को समझने में सहायता मिल सकती है ।

असम– २०१४ के लोक सभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश की १४ सीटों में से ७ सीटें जीत कर रिकार्ड बनाया था और ३६.९ प्रतिशत मत प्राप्त किए थे । इन लोक सभा चुनावों में भाजपा ने विधान सभा के ६९ क्षेत्रों में अपनी बढ़त बनाई थी । विधान सभा के २०११ में हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को ११.५ प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे और उसने १२६ सदस्यीय विधान सभा में केवल पाँच सीटें जीतीं थीं । लेकिन २०१६ के इन चुनावों में भाजपा ने अपने बलबूते ही ६० सीटें जीत लीं और २९.५ प्रतिशत मत प्राप्त किए । उसके सहयोगी दलों असम गण परिषद ने १४ और बोडो पीपुल्ज फ़्रंट ने भी १२ सीटें प्राप्त कीं । तीनों ने ४० प्रतिशत मत प्राप्त किए । सोनिया कांग्रेस को २०११ के विधान सभा चुनावों में ७८ सीटें प्राप्त कर ३९.४ प्रतिशत मत हासिल किए थे । लेकिन पन्द्रह साल से असम में राज कर रही सोनिया कांग्रेस २०१६ में केवल २६ सीटों पर सिमट कर रह गई और उसे केवल ३१ प्रतिशत मत प्राप्त हुए । जोड़ तोड़ कर राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले अजमल बद्दरुदीन की पार्टी भी १३ सीटों पर सिमट गई । पिछली बार उसे १८ सीटों मिलीं थीं । पिछली बार उसे लगभग १३ प्रतिशत मत मिले थे , इस बार यह आंकडा वहीं टिका रहा । बदरुद्दीन ख़ुद भी हार गए ।
दरअसल पिछले लम्बे अरसे से सोनिया कांग्रेस जिस प्रकार बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को प्रश्रय दे रही थी और बदरुद्दीन की पार्टी उन्हें असम में राजनैतिक स्पेस दे रही थी , उसके कारण आम असमिया अपनी पहचान को लेकर ही चिन्तित हो रहा था । असम की जनजातियाँ अवैध मुस्लिम बंगलादेशी घुसपैठियों से घिर रहीं थीं । भारतीय जनता पार्टी ने इन सभी चिन्ताओं का निदान प्रस्तुत किया । जनजातिय पहचान के प्रतीक सर्वानन्द सोनोवाल तो उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे ही । बोडो संगठन को भी भाजपा ने अपने साथ जोड़ा । बोडो लोगों का अवैध मुस्लिम बंगलादेशियों से अनेक बार संघर्ष होता रहा है । साम्यवादी दल जो लम्बे अरसे से असम में प्रासांगिक बनने का प्रयास करते रहे हैं वे इस बार वहाँ से पूरी तरह साफ़ हो गए । सोनिया कांग्रेस की असल चिन्ता यह है कि दिसंबर में भगवा फहराने का अर्थ है पूरे पूर्वोत्तर में भाजपा द्वारा पैर पसारने का ख़तरा । अरुणाचल प्रदेश पक रहा फल है जो कभी भी भाजपा की झोली में टपक सकता है । सात शताब्दी पहले असम ने लचित बडफूकन के नेतृत्व में ब्रह्मपुत्र की लहरों पर सरायघाट के स्थान पर औरंगज़ेब की सेना को बुरी तरह परास्त कर इतिहास के नए अध्याय की रचना की थी । इन चुनावों में सोनिया कांग्रेस के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने स्वयं को उस प्रसंग से जोड़ते हुए कहा कि नरेन्द्र मोदी ने औरंगज़ेब की तरह असम पर आक्रमण कर दिया है और में लचित बडफूकन की तरह उन्हें परास्त करूँगा । उनके इस बयान के कारण वे पूरे असम में वे हास्य के पात्र ही नहीं बने बल्कि नया जुमला भी चल निकला कि तुरन्त गोगोई असम के भीतर ही औरंगज़ेब के सेना के नायक बन गए हैं और अपने घर को ही बंगलादेशियों के पास दे देना चाहते हैं जबकि नरेन्द्र मोदी ने असम के भीतर से ही सर्वानन्द और हेमन्त विश्वशर्मा नये नायक गढ़ दिए हैं जो एक बार फिर सरायघाट पर औरंगज़ेब को सबक़ सिखाएँगे । यही कारण रहा कि बराक घाटी से लेकर ब्रह्मपुत्र घाटी तक और यहाँ तक कि पर्वतीय जिलों में भी लचित बडफूकन की संतानों ने भाजपा का परचम लहरा दिया । भाजपा ने स्पष्ट कहा कि कि मतान्तरण से बचने के लिए बंगलादेश से जो हिन्दू भाग कर आ रहे हैं वे घुसपैठिए नहीं बल्कि शरणार्थी हैं और उनको नागरिकता दी जायेगी । इसका बराक घाटी में गहरा असर पडा ।
दरअसल असम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जो कार्य किया है , उसी की नींव पर राष्ट्रवादी ताक़तों ने अपना परचम लहराया है । आज इक्कीसवीं शताब्दी में भाजपा ने सोनिया कांग्रेस को पराजित कर असम में एक नए अध्याय की शुरुआत की है । भाजपा के राम माधव ने असम में भाजपा की जीत को कामाख्या देवी , ब्रह्मपुत्र और शंकरदेव की परम्परा को समर्पित किया ।

केरल– – परशुराम की धरती केरल में सोनिया कांग्रेस को केरल के लोगों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया । १४० सदस्यीय विधान सभा में उसे केवल २२ सीटें मिल सकीं और मत प्रतिशत भी २२ प्रतिशत के आसपास ही रहा । उसका यूडीएफ़ केवल ४७ पर सिमट गया । सोनिया कांग्रेस की हार का एक मुख्य कारण राज्य मंत्रिमंडल में व्याप्त के मंत्रियों मे भ्रष्टाचार भी कहा जा सकता है । अन्य राज्यों में भ्रष्टाचार चाहे मुद्दा न होता हो लेकिन केरल में यह मुख्य मुद्दा बन जाता है । यह संयोग ही कहा जायेगा कि मुस्लिम लीग भी सोनिया कांग्रेस के आसपास ही रही । उसने १८ सीटें प्राप्त की । यहाँ तक सोनिया कांग्रेस का सवाल है , कर्नाटक को छोड़ कर वह सारे दक्षिण में साफ़ हो गई है । साम्यवादियों के एलडीएफ को ९१ सीटें मिलीं जिनमें से सी पी एम के हिस्से ५८ और सीबीआई के हिस्से १९ सीटें आईं । सी पी एम के अपने हिस्से २६.५ प्रतिशत वोटें आईं और सी पी आई के हिस्से ८.१ प्रतिशत । जैसा कि केरल की पुरानी परम्परा है सत्ता यूडीएफ़ और एलडीएफ के बीच बँटती रहती है । इस बार बारी एलडीएफ की थी और उसको जीत हासिल हो गई ।

लेकिन केरल की इस पुरानी परम्परा को पहली बार तोड़ने में भाजपा सफल रही है और उसी के चलते राज्य में स्थापित राजनैतिक दल घबराहट में हैं । १४० सदस्यीय विधान सभा में भाजपा को आज तक एक भी सीट नहीं मिली थी । २०११ के विधान सभा चुनावों में पार्टी ने १३८ सीटों पर चुनाव लड़ कर ६ प्रतिशत मत प्राप्त किए थे और २०१४ के लोक सभा चुनावों में पार्टी को १०.५ प्रतिशत मत मिले थे । सीट दोनों बार कोई नहीं मिली । केरल , सोनिया कांग्रेस के यूडीएफ़ और साम्यवादियों के एलडीएफ के बीच झूलता रहा है । भाजपा किसी भी तरह विधान सभा के अन्दर अपना एक अदद सिपाही भेजने के बेताब रही है । भाजपा विधान सभा के अन्दर घुस न सके , इस पर यूडीएफ़ और एलडीएफ दोनों सहमत हो जाते हैं । केरल में सोनिया कांग्रेस के सिपाहसलार ए के एंटनी ने कभी कहा था कि केरल विधान सभा में पास लेकर भाजपा दर्शक दीर्घा में तो बैठ सकती है लेकिन सभा भवन में आ पाना उसके लिए संभव नहीं है । परन्तु इस बार भाजपा ने अपने लिए दर्शक दीर्घा की बजाए विधान सभा का दरबाजा खोल ही लिया है । तिरुवनन्तपुरम की एक सीट पर कमल खिल आया है । लेकिन यह रक्त कमल है । केरल में साम्यवादियों के हाथों न जाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कितने स्वयंसेवकों ने अपना रक्त बहाया है । भाजपा के वरिष्ठ नेता ओ राजगोपाल ने जीत हासिल की लेकिन अन्य सात सीटों पर भाजपा दूसरे नम्बर पर रही है । एक सीट तो उसने केवल ८९ मतों से हारी है । केरल की राजनीति से अनजान व्यक्ति कह सकता है कि एक सौ चालीस सदस्यीय विधान सभा में केवल मात्र एक सीट जीत भर लेने से राज्य की राजनीति में क्या तूफ़ान आ सकता है ? लेकिन सोनिया कांग्रेस और साम्यवादी मोर्चा , दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं कि भाजपा का अन्ततः राज्य की विधानसभा में घुस पाना ही उन के लिए ख़तरे की घंटी है । केरल की राजनीति पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले यह आशा करते रहे कि भाजपा अंतिम समय अपनी वोटें किसी एक फ़्रंट की ओर मोड़ देगी । लेकिन उनको इस बार बहुत निराशा हुई । भाजपा ने १०.५ प्रतिशत का अपना वोट बैंक भी सुरक्षित रखा और एक सीट भी झटक ली । लेकिन यदि इसमें भाजपा के सहयोगी दल भारतीय धर्म जन सेना को प्राप्त मतों को भी जोड़ लिया जाए तो यह मत प्रतिशत १५ के पास पहुँच जाता है । इन दोनों दलों ने मिल कर यह चुनाव लड़ा था । जन सेना एझवा समुदाय के उन लोगों की है जो अपने समाज के परम्परागत मूल्यों और संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं । केरल के एझवा राज्य की पिछड़ी जातियों में गिने जाते हैं । उनका प्रभावशाली संगठन श्री नारायण धर्म परिचालन योगम समाजसेवा के कामों के लिए विख्यात है । इस योगम ने केरल के हिन्दुओं को एक मंच पर एकत्रित करने के लिए भारतीय धर्म जन सेना का गठन किया था । भाजपा ने इस संगठन के साथ मिल कर केरल में एक तीसरे मोर्चा का प्रयोग किया था । इस गठबन्धन को १५ प्रतिशत मत मिलना राज्य की राजनीति में तीसरे मोर्चे के उदय होने के स्पष्ट संकेत देता है । ध्यान रहे केरल में ईसाई और मुसलमान मज़हब में मतान्तरित हो चुके केरलीयों की संख्या लगभग ४५ प्रतिशत के आसपास है । यूडीएफ़ और एलडीएफ दोनों ही सत्ता के मोह में इन दोनों मज़हबों के लोगों के तुष्टीकरण में लगे रहते हैं । लेकिन २०१६ के इन चुनावों ने राज्य में एक तीसरे मोर्चे की नींव डाल दी है । भाजपा के नेतृत्व का यह मोर्चा केरल की अस्मिता को आधार बना कर उदय हुआ है । राजदीप सरदेसाई मानते हैं कि अभी शायद केरल में भाजपा के प्रवेश को इतना महत्व नहीं दिया जाए लेकिन केरल में भाजपा के फैलने की भूमिका तैयार हो गई है । ध्यान रहे केवल तिरुवनन्तपुरम ज़िले में ही भाजपा ने २३ प्रतिशत मत हासिल करके सभी को चौंका दिया । असम की ही तरह केरल में भी यह स्वीकारना होगा कि कई दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस प्रकार वहाँ समाज सेवा के कार्य में लगा है , उसका फल अब दिखाई देने लगा है ।
केरल में सोनिया कांग्रेस के यूडीएफ़ को ३८ प्रतिशत और सीपीएम के एलडीएफ को ३९.९ प्रतिशत मत मिले । भाजपा के एनडीए को १५.४ प्रतिशत मत मिले हैं । तीसरे मोर्चा के उदय होने से केरल के मतदाताओं की दोनों मोर्चों में से किसी एक को ही चुनने की विवशता समाप्त हो जाएगी । २०१६ के चुनाव की यही सबसे बड़ी उपलब्धि कहीं जा सकती है । मराठी में एक कहावत है । बुढ़िया मर गई , इस बात का दुख नहीं है , यमराज को घर का पता चल गया है । यह सबसे बड़ा ख़तरा है । केरल में सीपीएम और सोनिया कांग्रेस दोनों को ही भाजपा अपने लिए यमराज के समान दिखाई दे रही है । उसको इन दोनों ही पार्टियों के घर का पता चल गया है ।

तमिलनाडु– तमिलनाडु में पिछले तीस साल से एक परम्परा स्थापित हो चुकी थी । एक बार अन्ना डी एम के और दूसरी बार केवल डी एम के की सरकार । इसी परम्परा के अनुसार जयललिता और करुणानिधि बदल बदल कर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते रहे हैं । शायद इसी परम्परा से प्रभावित होकर एक्ज़िट पोल पंडितों ने भी भविष्यवाणी कर दी थी कि अबकी बारी- करूणानिधि की सवारी । लेकिन अम्माँ यानि जयललिता ने उस सवारी को रास्तें में ही उल्टा दिया और तीस साल के इतिहास को दरकिनार करते हुए लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क़ब्ज़ा कर लिया । वैसे तो उम्र के लिहाज़ से करूणानिधि के लिए मुख्यमंत्री बनने का यह अंतिम अवसर था जो तमिलनाडु के लोगों ने उन्हें नहीं दिया ।
सोनिया कांग्रेस तमिलनाडु से उन्हीं दिनों ख़त्म हो गई थी जब वहाँ दोनों द्रविड़ दलों ने अपना वर्चस्व जमा लिया था । उसके बाद इन दोनों बड़े दलों की गिराई हुई जूठन पर ही वह किसी तरह अपने कुनबे को संभाले हुए थी । इस बार भी उसने करूणानिधि की पार्टी के पीछे चलना स्वीकार किया लेकिन जब शाहसवार ही रणभूमि में औंधे मुँह गिर पड़ा तो पिछलग्गूयों की क्या दशा हुई होगी , इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है । भरी पूरी विधान सभा में सोनिया कांग्रेस को केवल आठ सीटों पर संतोष करना पडा । जहाँ तक साम्यवादी दलों की बात है, जिस प्रकार देश के बाक़ी हिस्सों से वे अपनी सफ़ें समेट रहे हैं , उसी प्रकार तमिलनाडु से उनकी सफ़ाई हो गई है । डीएमडीके के अध्यक्ष अभिनेता विजयकान्त भी चुनाव हार गए । वे साम्यवादियों के साथ मिल कर तीसरा मोर्चा बना कर प्रदेश की राजनीति में अपने लिए स्पेस तलाश रहे थे ।

केरल की तरह तमिलनाडु भी अब तक भाजपा को नाच नचाता रहा है । २३४ सदस्यीय विधान सभा में अपने बलबूते भाजपा पैर ज़माने में अब तक असफल ही रही थी । २०११ के विधान सभा चुनावों में भाजपा ने २०४ सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे । कोई प्रत्याशी जीत तो नहीं पाया लेकिन पार्टी को २.२ प्रतिशत मत मिले थे । २०१४ के लोक सभा चुनावों में पार्टी को ५.५ प्रतिशत मत मिले थे । २०१६ के चुनावों में भाजपा ने अपने १८८ प्रत्याशी मैदान में उतारे थे । लेकिन वह अपना खाता नहीं खोल पाई । उसे २.८ प्रतिशत वोट मिले । सोनिया कांग्रेस को ६.४प्रतिशत मत मिले । जहाँ तक अन्ना डीएमके और डीएमके गठबन्धन का प्रश्न है उन्हें क्रमश ४०.८ और ३९.६ प्रतिशत मत मिले । केवल एक प्रतिशत मत के अन्तर ने ज़मीन आसमान का फ़र्क़ डाल दिया । डीएमके के लिए तो एक नुक़्ते के हेरफेर से ख़ुदा जुदा हो गया ।

पुदुच्चेरी– पुदुच्चेरी विधान सभा की कुल तीस सीटें हैं । इनमें से सोनिया कांग्रेस ने १५ सीटें जीती हैं । दो सीटें डीएमके ने जीत ली हैं । इस प्रकार एक सीट के बहुमत से सोनिया कांग्रेस की सरकार यहाँ बन सकती है । भारतीय जनता पार्टी ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे । जीत तो कोई नहीं सका लेकिन पार्टी को २.४ प्रतिशत मत मिले जो पिछली विधान सभा के चुनावों में मिले मतों से १.०८ प्रतिशत अधिक हैं ।
पश्चिमी बंगाल—- साम्यवादी मोर्चा जिसमें सोनिया कांग्रेस भी शामिल थी ने ७६ सीटें जीतीं और ३८.२ प्रतिशत वोट प्राप्त किए । लैफ्ट ने १९९ और कांग्रेस ने ९२ सीटों पर चुनाव लड़ा था । मोर्चा में शामिल सोनिया कांग्रेस ने ९२ में से ४४ सीटें जीतीं और १२.३ प्रतिशत मत प्राप्त किए । मोर्चा के लैफ्ट हिस्से ने १९९ में से केवल ३२ सीटें जीतीं और २५.९ प्रतिशत मत प्राप्त किए । इन ३२ सीटों में से सीपीएम की २६ सीटें हैं ।

पश्चिमी बंगाल के डा० श्यामाप्रसाद मुखोपाध्याय ने ही भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद पार्टी वहाँ आधार जमा नहीं पाई । २०११ के विधान सभा चुनावों में प्रदेश की २९४ सदस्यीय विधान सभा में पार्टी ने २८९ सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे ४.१ प्रतिशत मत मिले थे लेकिन सीट कोई नहीं मिल पाई थी । यह मत प्रतिशत २०१४ के लोक सभा चुनावों में बढ़कर १७ प्रतिशत हो गया । २०१६ के इन चुनावों में भाजपा गठबन्धन ने १०.७ प्रतिशत मत प्राप्त किए और छह सीटें जीतीं । इनमें से तीन सीटें भाजपा की अपनी हैं । लेकिन सितम्बर २०१४ को प्रदेश में दक्षिण बशीरहाट में हुए उपचुनाव में जीत हासिल करने वाले भाजपा के शमिक भट्टाचार्य तृणमूल के हाथों पराजित हो गए ।
इस बार २०१६ के चुनावों में वाम और सोनिया कांग्रेस दोनों का एक प्रकार से सफ़ाया ही हो गया है । सीपीएम ने इस आशा के साथ सोनिया कांग्रेस के साथ समझौता किया था कि दोनों मिल कर किसी भी तरीक़े से तृणमूल कांग्रेस को राईटरज बिल्डिंग से बाहर कर देंगे । भारत में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सीपीएम और सोनिया कांग्रेस, दोनों के लिए बंगाल में सत्ता वापिसी लाज़िमी थी । यदि सत्ता न भी मिल पाए तो कम से कम विधान सभा में प्रतिष्ठाजनक सीटें मिलना तो जरुरी था । इसी मृगतृष्णा के चलते सीपीएम ने सोनिया कांग्रेस से समझौता करके अपने उपर अवसर वादी और सिद्धान्त विहीन होने का ठप्पा लगवा लेना भी मंज़ूर कर लिया । इतना ही नहीं पार्टी इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बँट गई । सीताराम येचुरी खेमा सोनिया गान्धी के साथ जाने के पक्ष में था और प्रकाश करात का खेमा इसके ख़िलाफ़ था । परन्तु पार्टी ने प्रकाश करात को दरकिनार करते हुए सोनिया कांग्रेस के साथ मिल कर राजनीति करने का मन बनाया । प्रश्न यह भी उठा कि केरल में सोनिया कांग्रेस को गालियाँ देना और बंगाल में उसकी शान में क़सीदे पढ़ना , दास केपिटल की कौन सी नई व्याख्या है जो सीपीएम अपने कैडर के गले उतारने की कोशिश कर रहा है । लेकिन सीपीएम ने इन प्रश्नों को भी निर्लज्जता से अस्वीकार कर दिया । लेकिन बंगाल के संवेदनशील मतदाताओं पर सीपीएम की इन कलाबाज़ियों का उल्टा असर पड़ा और प्रदेश में पार्टी की रही सही गरिमा भी समाप्त हो गई । लगभग ३५ बर्ष बंगाल पर शासन करने वाली सी पी एम की इतनी दुर्गति की शायद किसी को आशा नहीं थी । लोगों के ग़ुस्से का एक कारण उसका निर्लज्ज गठबंधन था । सी पी एम की विचारधारा और नीतियों का सोनिया कांग्रेस का कहीं दूर का रिश्ता भी नहीं है । लेकिन केवल सत्ता लोलुपता के कारण उसने सोनिया गान्धी से हाथ मिला लिया । विकल्पहीनता की स्थिति में लोगों के पास ममता बनर्जी के पास जाने के सिवा और कौन सा रास्ता बचा था ? ममता बनर्जी ने २९४ सदस्यों की विधान सा में २११ सीटें जीत कर और ४६ प्रतिशत मत प्राप्त कर नया इतिहास रच दिया ।

इन चुनाव परिणामों का भारतीय जनता पार्टी के लिए क्या अर्थ है ? दरअसल दिल्ली और बिहार विधान सभा चुनावों में पार्टी को हुई गहरी शिक्सत ने देश में यह हवा फैलाने शुरु कर दी थी कि नरेन्द्र मोदी का जन प्रभाव घटने लगा है और हवा बदलने लगी है । इस प्रचार को मीडिया के एक ख़ास हिस्से की सक्रिय सहायता से वैज्ञानिक तरीक़े से चलाया जा रहा था ताकि वह असर करे । असम में भाजपा की ज़बरदस्त जीत ने इस प्रचार की हवा ही नहीं निकाल दी बल्कि यह संदेश भी दे दिया दे दिया की भारतीय जनता पार्टी की पकड़ ढीली नहीं हुई है बल्कि उसका राष्ट्रव्यापी प्रसार भी हुआ है । पूर्वोत्तर भारत को आज तक सोनिया कांग्रेस और उससे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गढ़ माना जाता था । लेकिन असम में भाजपा की जीत ने इस गढ़ पर क़ब्ज़ा ही नहीं कर लिया बल्कि यह संकेत भी दे दिया है कि आने वाली समय इस इलाक़े में सोनिया कांग्रेस के लिए विनाशकारी सिद्ध होने वाला है । असम प्रयोग से एक और संकेत भी मिलता है इधर उधर बिखरी राष्ट्रवादी ताक़तें भाजपा के नेतृत्व में एकत्रित हो रही हैं । केरल और पश्चिमी बंगाल में भाजपा की एंट्री अभी चाहे प्रतीकात्मक लगे लेकिन सीपीएम व सोनिया कांग्रेस दोनों ही जानते हैं कि आने वाले समय में लोग भाजपा में विकल्प तलाश सकते हैं ।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz