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-नरसिंह जोशी

पानीपत रण संग्राम के 250वें वार्षिक स्मृति दिन 14 जनवरी 2011 पर विशेष

भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण लड़ाई जिसे टर्निंग प्वाईंट आफ हिस्ट्री यह कह सकते हैं ऐसी लड़ाई 14 जनवरी 1761 को पानीपत में हुई। मराठा और अफगानिस्तान का अहमदशाह अब्दाली के बीच का यह महाभीषण संग्राम था। देश की स्वतंत्रता के लिए, विदेशी आक्रांताओं को रोकने के लिए मराठों ने यह संघर्ष किया था। इस लड़ाई में मराठा वीरों का बलिदान हुआ परन्तु देश की रक्षा हुई। इस ऐतिहासिक लड़ाई को इस वर्ष 250 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

शिवाजी के उत्ताराधिकारियों ने नर्मदा उल्लंघित की, चम्बल पार की, दिल्ली पर जोरदार दस्तक दी, अटक पर भगवा झण्डा फहराया और पानीपत की रणभूमि पर भयंकर तांडव करते हुए एक लाख मराठों ने वीर-गति प्राप्त की। परिणामस्वरूप जिसे आज तक पानीपत का विजेता माना जाता रहा है, वह अब्दाली, जिसने अपने को दिल्ली का बादशाह घोषित किया था, वह अब्दाली वापस अफगानिस्तान भाग गया और इस्लाम के अनुयायियों के वायव्य सीमा की ओर से होने वाले आक्रमण सदा के लिए बन्द हो गये। अब्दाली भागा और उसने अपना वकील -राजदूत संधि करने के लिए पुणें की राजसभा में भेजा और आज तक जो पराजित माने जाते हैं उन मराठों ने पानीपत के पश्चात 10-12 वर्षों के अन्दर पुन: दिल्ली के बादशाह की नाक में नकेल डाला। अपनी सत्ता का दबदबा स्थापित किया।

अटक पर भगवा झण्डा (सन् 1758) फहराने के पश्चात् रघुनाथराव पेशवा दक्षिण वापिस लौटे। पंजाब की व्यवस्था और फिर दोआब पार कर बंगाल तक सत्ता प्रस्थापित करने हेतु दत्ता जी शिन्दे की नियुक्ति हुई। उसी समय ईस्लाम खतरे में यह नारा देकर मौलवी वलीउल्लाह ने अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने का न्यौता भेजा। जलते अंगारों के समान शब्दों से भरे आमंत्रण पत्र को पढ़कर अब्दाली का खून खौल उठा और वायुवेग से प्रचण्ड फौज के साथ निकलकर खून भरी आखों का अब्दाली पंजाब पहुंचा। स्वर्ण मंदिर ध्वस्त कर विभिन्न प्रकार के अत्याचार करते हुए वह दिल्ली पहुंचा, वहां तखत पर विराजमान हुआ। उसने अपने को बादशाह घोषित किया और वह कुंजपुरा में दत्ता जी के घेरे में फंसे हुए नजीब की सहायता के लिए निकला। नजीब शुकताल के किले में था। दत्ता जी ने किले पर हमला बोला था। एक ओर से अब्दाली और दूसरी ओर से नजीब के बींच दत्ता जी फंस गये और कुंजपुरा (बुराडी) की रणभूमि पर भीषण लड़ाई हुई, दत्ता जी सिंधिया ने वीरगति प्राप्त की। रणभूमि पर आहत पड़े हुए दत्ता जी पर नजीब और कुतुबशाह द्वारा लत्ता प्रहार करने का क्षोभजनक समाचार महाराष्ट्र में पहुंचते ही महाराष्ट्र प्रतिशोध भाव से धधक उठा।

श्रीमंत सदाशिव राव भाउ साहब पेशवा और श्रीमंत विश्वासराव पेशवा के सेनापतित्व में प्रचण्ड हरि भक्तों की फौज निकल पड़ी। उसने नर्मदा और चम्बल पार की तथा दिल्ली पर हमला बोला। यमुना के उत्तर किनारे अब्दाली की छावनी थी। अब्दाली के आंखों के सामने मराठों ने दिल्ली पर कब्जा किया। पाण्डवों से पृथ्वीराज तक भारत की परम्परागत अविच्छिन्न राजधानी में- दिल्ली में प्रवेश करते ही भाउसाहब के उपलब्ध पत्र के अनुसार – भाउसाहब के मन में प्रथमत: भाव जागा – ‘हे हस्तिनापुर चे राज्य’ (यह हस्तिनापुर का राज्य) और भाउसाहब के मानस पटल पर रेखांकित और रंगांकित चित्र में छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति राजाराम महाराज और श्रीमंत बाजीराव पेशवा को देखा। भाउसाहब ने मराठों की छावनी में विश्वास राव पेशवा की राजसभा आयोजित की। दरबार में विश्वासराव विराजमान होने के पूर्व भाउसाहब ने शाही तख्त के ऊपर के रजत छत्र पर घणाघात किया, छत्र भग्न हुआ। दरबार में श्रीमत विश्वासराव राज गद्दी पर विराजमान होते ही उपस्थित सरदारों ने, सेनाधिकारियों ने श्रीमंत को उपायन अर्पण कर मस्तक (मुजरा) नमाया। भाउसाहब ने अपनी धीर गम्भीर वाणी से हस्तिनापुर के पाण्डवों के राज्य की और पाण्डवों से पृथ्वीराज तक परम्परागत् भारत की राजधानी की स्मृति जागृत की।

इस राजसभा की अपेक्षित प्रतिक्रिया हुई। मौलवी वलीउल्लाह और नजीबुद्दौला ने ‘हिन्दू राज्य स्थापना की’ निन्दा की। और इस्लाम खतरे में है इस नारे के साथ काफिरों का नाश करने के लिए गाजियो के रणभूमि पर आने का आहवान किया। उधर पंजाब में प्रसन्नता की लहर दौड़ी और सिखनेता मालासिंग जाट ने ‘भाउ महाराज के नाम की द्वाही’ घोषित की। अब्दाली भी थोड़ा कांप उठा था। वह वापस जाने के विचार में था। परन्तु मौलवी वलीउल्लाह और नजीब ने उसे उकसाया और वह युध्द के लिए तैयार हुआ। उधर भाउसाहब भी दत्ता जी शिन्दे की वीरमृत्यु का प्रतिशोध लेने की दृष्टि से कुंजपुरा की ओर निकल पडे। मार्ग में ही भाउसाहब ने शाहआलम को बादशाह घोषित करते हुए विरोधियों को कमजोर करने का प्रयत्न किया। कुंजपुरा पहुंचकर अब्दाली की आखों के सामने नजीबुद्दौला को पराजित कर तथा कुतुबशाह का मस्तक अब्दाली को भेंट कर दत्ता जी की वीर मृत्यु का प्रतिशोध किया। पश्चात दोनों सेनाएं अब्दाली और मराठा पानीपत के मैदान पर आमने सामने आ गई।

दिनांक 14 जनवरी 1761 पौष शुक्ल 8 को पानीपत की भूमि पर भयंकर रण संग्राम हुआ। मराठों की भयंकर हानि हुई, यह मान्य करना ही होगा। और इस कारण ही आज तक मराठों को पराजित माना जाता है। परन्तु विजयी अब्दाली भी दिल्ली की बादशाही का त्याग कर अफगानिस्तान वापस लौट गया और उसने अपना वकील संधि करने के लिए पुणे की राजसभा में भेजा। तो फिर कौन विजेता और कौन विजित? पानीपत की रणभूमि पर मराठे हारे यह अर्धसत्य है और यही प्रचारित और प्रचलित रहा। अब्दाली पुन: आया नहीं, इतना ही नहीं अपितु वायव्य सीमा की ओर से आने वाले आक्रमण सदा के लिए समाप्त हुए। समकालीन ब्रिटिश अधिकारी मेजर इवान बॉक लिखता है पानीपत की हार भी गर्व की और कीर्तिदायक थी। मराठा हारे परन्तु अब्दाली को भी वापस जाना पड़ा। यह विजेता को पराजित करने वाला पराभव था। इस युध्द के पश्चात केवल दस वर्षों में फिनिक्स पक्षी जैसे महादजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठा फिर से दिल्ली आये और बादशाह शाहआलम की नाक में नकेल डाला।

आखिर में एक बात बताना चाहता हूं कि 16 सितम्बर 1760 का भाउसाहब पेशवा एक महत्वपूर्ण पत्र है। वे लिखते हैं, शुजा और नजीब खान का समझौता का प्रस्ताव आया कि सरहिन्द (पंजाब) तक का प्रदेश अब्दाली का यह मान्य करो……. हम सहमत नहीं है…… अटक (पेशावर) तक हिन्दुस्तान….. उसके आगे अब्दाली का प्रदेश। देश की सरहद के सम्बन्ध में समझौता करने के लिए पेशवा तैयार नहीं हुए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है। उन्होंने समझौता नहीं किया, संघर्ष किया, बलिदान दिया और देश की रक्षा की। अगर यह समझौता होता तो अपने भारत का मानचित्र अलग होता…..।

ऐसे स्वतंत्र सेनानियों को अभिवादन करना हरेक भारतीय का पवित्र कर्तव्य है और इसी दृष्टि से 14 जनवरी को पानीपत में कार्यक्रम को रहा है। पानीपत में इस युध्द का स्मारक बनाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिले।

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