लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

shvraj

यह बेहद हैरानी में डालने वाली बात है कि जनप्रतिनिधियों को विधानसभा में नियमित रूप से उपस्थिति दर्ज नहीं कराने पर दैनिक भत्ता रोकने की बाध्यकारी शर्त लगाने की कानूनी व्यवस्था की जा रही है। यह कुछ वैसी ही पहल है,जैसे छात्रों के विद्यालय में गैरहाजिर रहने पर परीक्षा में नहीं बैठने देने की शर्त लगाई जाती है अथवा विद्यालय में आने के लिए मध्यान्ह भोजन का लालच दिया जाता है। इससे यह अर्थ आसानी से निकलता है कि हमारे विद्यायकों का आचरण एवं आदतें उन अबोध बालकों जैसी हो गई हैं,जो अज्ञानता व अपरिपक्वता के चलते ज्ञानार्जन के महत्व को नहीं समझते हैं। यदि वाकई ऐसा है तो यह बेहद चिंताजनक पहलू है। लिहाजा इसका निकाल तो निकलना ही चाहिए। फिर चाहे वह अनुपस्थित रहने पर दण्ड स्वरूप दैनिक भत्ता काटना ही क्यों न हो ?

किसी भी जिम्मेबार पद पर बैठने के बाद यह व्यक्ति की नैतिक जबावदेही बनती है कि वह अपने कत्र्तव्य का ईमानदारी से पालन करे। बावजूद संविधान के पहले स्तंभ विधायिका से जुड़े लोग ऐसा नहीं कर रहे हैं,तो निसंदेह यह लोकतंत्र के लिए चिंता का बड़ा विशय है। ऐसा केवल मध्यप्रदेश की विधानसभा या देश की अन्य विधानसभाओं में हो रहा हो,ऐसा नहीं है,यही सब लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद के दोनों सदनों में भी हो रहा है। हालात इस हद तक बद्तर हो गए हैं कि कई मर्तबा तो संसद और विधानसभाओं में मंत्री तक प्रश्नो के उत्तर देने को उपस्थित नहीं रहते हैं। जबकि सवालों का जवाब देना पूर्व निधारित हो चुका है और मंत्री के पास उनके विभाग से संबंधित प्रश्न पहुंच जाते हैं। इन प्रष्नों की जानकारी भी विभागीय स्तर पर एकत्रित कर ली जाती है। बावजूद मंत्रियों का गैरहाजिर रहना इस बात की पुष्टि करता है कि एक तो उनकी जानकारी आधी-अधूरी होती है,दूसरे वे प्रति-प्रश्न का उत्तर देने में खुद को कमजोर पाते हैं।

मध्यप्रदेश विधानसभा में गैरहाजिर रहने वाले विधायकों को भत्ता नहीं दिए जाने की व्यवस्था मानसून सत्र से लागू होगी। इस प्रस्ताव को जल्दी ही विधानसभा अध्यक्ष डाॅ सीताशरण शर्मा की स्वीकृति के बाद संसदीय कार्य विभाग को भेजा जाएगा,ताकि इसे अगले सत्र से लागू किया जा सके। विधायकों को वर्तमान में 1500 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से विधानसभा भत्ता मिलता है। मानसून सत्र में यह 2000 रुपए प्रतिदिन किया जाना प्रस्तावित है। विधायकों को यह सुविधा भी हासिल है कि उनकी सप्ताह में एक दिन की उपस्थिति को आधार मानकर,पूरे हफ्ते का भुगतान कर दिया जाता है। अब जो नई व्यवस्था की जा रही है,उसके मुताबिक सदन में दैनिक उपस्थित के आधार पर भत्ते का भुगतान किया जाएगा। मसलन विधायक सदन की कार्यवाही में जितने दिन उपस्थित रहेंगे, उतने ही दिन का भत्ता मिलेगा। जाहिर है,आर्थिक लाभ-हानि से जुड़ी यह पहल विधायकों के गैरहाजिर रहने की परंपरा पर अंकुश लगाने के लिए की जा रही है।

यह पहल बेहद जरूरी है,क्योंकि एक लंबे समय से देखने में आ रहा है कि बजट सत्र से लेकर अन्य सत्रों में विधायकों की पर्याप्त उपस्थिति नहीं होने के कारण सदन का कोरम ही पूरे नहीं हो पाए, नतीजतन सदन की कार्यवाही शुरू नहीं हो सकीं। इस कारण कई विधेयक समय पर पारित नहीं हो पाए और पारित हुए भी तो उन पर पर्याप्त बहस नहीं हुई। बिना विचार-विमर्श के विधानसभा हो या लोकसभा विधेयकों का पारित होना लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है। क्योंकि बिना बहस के विधेयकों के प्रारूपों की खूबियां व खामियां सामने नहीं आ पाती हैं। ऐसे में वे विधेयक आसानी से पारित हो जाते हैं,जो औद्योगिक घरानों और नौकरशाही के हित साधने वाले विधेयक होते हैं। प्राकृतिक संपदा को औद्योगिक घरानों के हवाले कर दिए जाने वाले कानूनों से जुड़े ज्यादातर विधेयक या तो केवल सत्ताधारी दल के विधायकों की उपस्थित में पारित हुए हैं या फिर हो-हल्ले के बीच पारित हुए हैं। ऐसी ही स्थितियों के चलते मध्यप्रदेश विधानसभा की वेतनभत्ता निर्धारण समिति ने विधायकों के गैरहाजिर रहने पर उन्हें दैनिक भत्ता नहीं दिए जाने की सिफारिश की थी।

संसद में सांसदों के गैरहाजिर रहने पर उन्हें मिलने वाले दैनिक वेतन-भत्ता बंद किए जाने के बाद उड़ीसा की विधानसभा में भी इस नियम को लागू किया जा चुका है। अब मध्यप्रदेश विधानसभा ऐसा करने जा रही है तो यह एक अनुकरणीय पहल है। इनका अनुकरण देश की सभी विधानसभाओं को करना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है,क्योंकि मध्यप्रदेश,दिल्ली एवं राजस्थान में विधायकों के वेतन-भत्ते व अन्य सुविधाएं लगभग दोगुने का दिए गए हैं। वेतन-भत्तों से जुड़े विधेयक सर्वदलीय सहमति के चलते बड़ी आसानी से पारित भी हो जाते हैं। हालांकि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाए जाने की फाइल यह नोट लगाकर वापस कर दी कि देश में सूखे के हालात हैं,लिहाजा ऐसे में वेतन बढ़ाए जाते हैं तो जनता में संदेश ठीक नहीं जाएगा। सांसदों के वेतन खुद सांसदों की समिति द्वारा बढ़ा लिए जाने की सिफारिश पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हुए मोदी ने कहा कि वेतन बढ़ाने की जिम्मेबारी किसी स्वायत्त आयोग को सौंप देनी चाहिए।

हैरानी इस बात पर भी है कि संसद और विधानसभाएं जब ठप रहती हैं,तब भी माननियों की सभी सुविधाएं बहाल रहती हैं। इस नाते केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने ठीक ही कहा था कि ‘संसद में काम नहीं तो सांसदों को वेतन भी नहीं मिलना चाहिए।‘ यह उपाय केवल विधायिका में ही नहीं,बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका में भी लागू होना चाहिए। जब सरकारी व असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले दैनिक वेतनभागियों और मजदूरों पर यह नियम लागू है तो अन्य क्षेत्रों में क्यों नहीं ?

हमारे जनप्रतिनिधियों में ऐसे सांसद और विधायक भी शामिल हैं,जिनका करोड़ों-अरबों का सालाना कारोबार है और कुछ ऐसे भी विधायक है,जिनके पास सामंती घरानों के वंशज होने के कारण अरबों की अचल संपत्ति है,जो आमदनी का एक पुख्ता जरिया है। ये सभी विधायक राजनीति में आने का कारण समाजसेवा बताते हैं,लेकिन प्रदेश के 29 सांसदों और 230 विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं है, जो वेतन-भत्ते न लेता हो ? गोया,सवाल उठता है कि विधायक चाहे किसी भी विचारधारा के दल से चुने गए हों,उनका धन के प्रति मोह व लालच एक जैसा है। बहती गंगा में डुबकी लगाने को सब तत्पर हैं। यदि विधायकों के वेतन-भत्तों के साथ घर, दूरभाष, फर्नीचर, हवाई-यात्रा, रेल यात्रा और बिजली पानी की सुविधाएं भी जोड़ ली जाएं तो यह राशि चार लाख से भी ऊपर बैठती हैं। साफ है, अब राजनेता राजनीति में समाजसेवा की भावना से काम नहीं कर रहे हैं। जबकि एक समय ऐसा था जब हमारे सांसद-विधायक नाम मात्र के वेतन-भत्ते व अन्य सुविधाएं लेते थे। साथ ही शिक्षा का स्तर कम होने के बावजूद वे क्षेत्र व राष्ट्र की बुनियादी समस्याओं पर गहरी पकड़ रखते थे। लेकिन अब सांसद व विधायकों का शैक्षिक स्तर तो बढ़ा है,लेकिन सदनों में कामकाज के घंटे घटे हैं। अव्वल तो संसद व विधानसभाओं में जरूरी विधेयक पारित ही नहीं हो रहे हैं और जो हो भी रहे हैं,वे बिना किसी बहस-मुवाहिसा के पारित हो रहे हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों की सदनों में उपस्थित औपचारिक खानापूर्ति भर रह गई है। इसलिए यह अच्छी बात है कि प्रतिनिधियों के अनुपस्थित रहने पर भत्ता काटने के उपाय विधानसभाओं में लागू होने का सिलसिला शुरू हो रहा है।

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