लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.


krishna

श्रीकृष्ण आरंभ में युद्ध ही एकमात्र समाधान है, ऐसा नहीं मानते। सर्वशक्तिमान होने के बावजूद वे कभी अनायास शक्ति-प्रयोग की बात भी नहीं करते परन्तु उपमा-उपमेय के द्वारा शिष्ट भाषा में सबकुछ कह भी जाते हैं। संजय के माध्यम से वे धृतराष्ट्र को संदेश देते हैं –

    वनं राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो व्याघ्रा वने संजय पांडवेयाः ।

    मा वनं छिन्दि स व्याघ्रं मा व्याघ्रान्नीनशो वनात ॥

पुत्रों सहित धृतराष्ट्र एक वन हैं और पांडव उस वन के सिंह हैं। अतः न तो इस सिंहयुक्त वन को काटो, न वन के सिंहों का नाश करो।

    निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनं ।

    तस्मात व्याघ्रो वतं रक्षेत वनं व्याघ्रं च पालयेत ॥

यदि वनरहित सिंह होते हैं, तो उनका वध होता है और सिंहविहीन वन को लकड़हारे बिना किसी भय के काट डालते हैं। इससे बेहतर यही है कि सिंह वन की रक्षा करें और वन सिंहों का पालन करे।

श्रीकृष्ण शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की बात युद्ध के पहले तक अलग-अलग अवसरों पर बार-बार कहते हैं। वे धृतराष्ट्र के कुल का नाश नहीं चाहते थे। पाण्डवों का अधिकार दिलाने एवं धृतराष्ट्र के कुल का विनाश रोकने के लिये वे तरह-तरह की उपमायें देते हैं। वे कहते हैं –

पाण्डव शाल के वृक्ष के समान हैं और धृतराष्ट्र के पुत्र लता सदृश। कोई भी लता बड़े वृक्ष के आश्रय के बिना आगे नहीं बढ़ सकती। पाण्डव और कौरव प्रेमपूर्वक रहते हैं तो इस लोक का कोई भी शत्रु उन्हें बुरी नज़र से देखने का दुस्साहस कभी नहीं कर सकता। अन्त में वे एक कड़ा संदेश देने से भी नहीं चुकते –

धर्माचारी पाण्डव शान्ति के लिये तैयार हैं और युद्ध के लिये भी समर्थ हैं। वे अपना अधिकार लेकर ही रहेंगे, इसके लिये चाहे जो भी करना पड़े। हे संजय! तुझे धृतराष्ट्र से जो कहना है, वह कह देना। हमने दो विकल्प दिए हैं। चुनाव उन्हें ही करना है।

जाते-जाते युधिष्ठिर संजय को अन्तिम संदेश देते हैं –

धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने पृथ्वी पर जिनकी समानता नहीं है, ऐसे अनेक योद्धा एकत्र किए होंगे। पर धर्म ही नित्य है। मेरे पास इन सब शत्रुओं को नष्ट कर सके, ऐसा महाबल है। वह है मेरा धर्म!

    ददस्व वा शक्रपुरं ममैव युद्दस्व वा भारतमुख्यवीर ।

मेरा इन्द्रप्रस्थ मुझे वापस लौटा दो अथवा भारत-वंश के प्रमुख वीर, तुम युद्ध करो।

अगले अंक में – धृतराष्ट्र को विदुर की सलाह

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz