लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.


अशोक “प्रवृद्ध”

manusmritiपुरातन ग्रंथों के अनुसार स्वयंभू मनु संसार के पहले मनुष्य हैं और सम्पूर्ण पृथ्वी पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु का नाम समाहित है। अर्थात मनु के नाम से ही मनुष्य शब्द बना है । संस्कृत में मनुस्मृति के नाम से मनु की शिक्षाओं का एक संकलन वर्तमान में मिलता है , जिसके स्मृतिकार मनु ही हैं । भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता प्राप्त ग्रंथों में मनुस्मृति का ही नाम सर्वप्रथम आता है। मनु महाराज के मनुस्मृति में चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर धर्मसम्मत परामर्श दिये गये हैं जो मानव मात्र के जीवन से सम्बंधित हैं और यह सब पूर्णतः धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। मनु प्राचीन समय के एक महान समाज-व्यवस्थापक थे, जिनकी बनायी व्यवस्था आज सहस्त्राब्दियों वर्ष बीत जाने पर भी भारतीयों, वेदानुयायियों के लिए सर्वमान्य व सम्मानीय है। भारतीय समाज को आदर्श रूप देने के लिए मनु ने एक शास्त्र अर्थात धर्मशास्त्र तत्कालीन सूत्रशैली में बनाया था,जिसका एक संस्करण मानव-धर्मसूत्र के नाम से अब भी प्रचलित है। उसी सूत्रराशि के उपदेश को भृगु ने और नारद-स्मृति के अनुसार सुमति भार्गव ने लगभग ढाई हजार अनुष्टुप् छन्दों का रूप देकर बारह अध्यायों में विभक्त कर दिया था, जो कि आज-कल मनुस्मृति के नाम से विदित है। मनु की व्यवस्था में सहस्त्रों मानवीय व माननीय विषय शामिल हैं, तथापि इसमें वर्णित वर्ण-व्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था अद्वितीय हैं। इनकी व्यवस्था में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चारों पुरुषार्थों को समुचित स्थान प्राप्त है। मानव-जीवन को परिष्कृत करने के उद्देश्य से उन्होंने सोलह संस्कारों का विधान किया, और गृहस्थ के लिए पञ्चमहायज्ञों यथा, स्वाध्याय, पितृतर्पण, हवन, प्राणि-सेवा और अतिथि-सेवा, का विधान  बनाया जो संसार में सर्वत्र शान्ति प्रसार का मूलमंत्र ही माना जाता है।

 

पुरातन ग्रंथों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि महर्षि बाल्मीकि रचित बाल्मीकि रामायण और महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास रचित महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक व मनु महाराज की प्रतिष्ठा का वर्णन अनेकों स्थानों पर किया गया है, किन्तु मनुस्मृति में रामायण , महाभारत ग्रंथों व बाल्मीकि , व्यास जी का नाम तक नही है । हाँ ! मनुस्मृति में मनु महाराज ने वेदों का जिक्र अवश्य किया है और वेदों की महिमा का गान अनेक श्लोकों में किया है । इससे स्पष्ट है कि मनुस्मृति वेदों के रचना के बाद की लेकिन रामायण व महाभारत के रचना के पूर्व की रचित ग्रन्थ है।  मनु ने आचार (सदाचार) पर बहुत जोर देते हुए कहा कि आचार ही परम धर्म है और यही आचार वाल्मीकि के महाकाव्य रामायण का चरित्र बन गया है तो दूसरी ओर व्यास के इतिहास महाभारत का धर्म है। उन्होंने कहा है-

आचार: परमो धर्म: श्रुत्युक्त: स्मार्त एव च।

-मनुस्मृति  1/108

 

वेद के सन्दर्भ में अनेक वचन मनुस्मृति में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा कि मनुस्मृति वेद का सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है। मनुस्मृति में कहा है-

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम ।

दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम् ॥ -मनुस्मृति 1/13

अर्थात – जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराये उस ब्रह्मा ने अग्नि , वायु, आदित्य और  तु अर्थात अंगिरा से ऋग , यजुः , साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया ।

मनुस्मृति में ही वेद को सम्पूर्ण धर्म का मूल कहा है –

वेदोSखिलो धर्ममूलम् । -मनुस्मृति 2/6

अर्थात- वेद सम्पूर्ण धर्म अर्थात कानून का मूल है ।

मनुस्मृति से यह ज्ञात होता है कि मनु ने जो कुछ कहा है , वह वेद के आधार पर ही कहा है –

यः कश्चित्कस्य चिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।

स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ।। -मनुस्मृति 2/7

अर्थात- मनु ने जिस किसी के सन्दर्भ में जो कुछ भी धर्म कहा है वह सब वेद के अनुकूल ही है , क्योकि वेद सर्वमान्य है ।

इस प्रकार विश्व में वैदिक सभ्यता का प्रकाश-विस्तार करने वालों में मनु का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मनु ने वेद की निंदा करने वालों को नास्तिक कहा है –

नास्तिको वेदनिंदकः । मनुस्मृति 2/11

वेद की निंदा करने वाले नास्तिक (अनीश्वरवादी) है।

प्रश्न उत्पन्न होता है कि मनु की शिक्षा अर्थात स्मृति का रचनाकाल अथवा उनकी शिक्षाओं के संकलन के रचनाकाल क्या हैं? महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वेद की भांति ही मनुस्मृति को भी सृष्टि के आदि में हुआ माना है। सृष्टि के आदि विषय में स्वामी दयानन्द ने मनु के सन्दर्भ में लिखा है और मनुस्मृति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष पुराना माना है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के एकादशसमुल्लास,पृ.187 में मनुस्मृति के विषय में कहा है कि यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है । स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति, पृष्ठ 17 में कहा है –

यह जो वर्त्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें वैवस्त मनु का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव , स्वारोचिष , औत्तमि , तामस , रैवत , चाक्षुष , ये छः तो बीत गए हैं और सातवां वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है ।

 

स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगियाँ होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष, त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मन्वन्तर अर्थात 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लिखे जाते समय तक सातवें मन्वन्तर के भी 120532976 वर्ष बीत चुके थे। इस तरह स्वामी दयानन्द के अनुसार उस समय तक स्वयंभू मनु को हुए कुल 1960852976 वर्ष, एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष बीत चुके थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यही काल स्वयंभू मनु का बताया है, और उस काल के स्वयंभू मनु को मनुस्मृति का स्मृतिकार बतलाया है । उसमें जो श्लोक मनु के नाम से कहे गए हैं, वास्तव में उन्हें गुरू – शिष्य परम्परा में श्रुति – वाचिक परम्परा अर्थात प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी स्मरण करते हुए संरक्षित किया जा रहा था , जिसे बाद में लिपिबद्ध कर लिया गया । मनुस्मृति का स्वयंभू मनु से ही संबंध है। हालाँकि स्वामी दयानन्द ने मनुस्मृति को प्रक्षिप्त मानकर उसके कुछ श्लोकों को नहीं माना है । उन्होंने कहा है कि मनुस्मृति के कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हैं और उनका कुछ पता नहीं है कि उन्हें कब और किसने लिखा है?

वस्तुतः मनुस्मृति में वेदों का सार है । मनुस्मृति को बिना समझें उसकी निंदा करने वाले और उसे जलाने वाले धर्मद्रोहियों के लिए मनुस्मृति का यह श्लोक पठनीय है –

निषेकादिश्मशानान्तो मंत्रैर्यस्योदितों विधि: ।

तस्य शास्त्रेsधिकारोsस्मिन्यज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित ।।– मनुस्मृति

अर्थात – मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों का वर्णन, वेद के जिस प्रकरण में है उसी को मनुस्मृति में लिया गया है , हमने उसके अतिरिक्त अपनी ओर से अन्य कुछ भी नहीं कहा है ।

मनुस्मृति में श्लोक 11/6 के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। वेद किसी भी प्रकार के ऊँच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते। इत्यादि अनेक वचन है जो वेद के सन्दर्भ में मनुस्मृति में कहे गये है । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मनुस्मृति वेद सार ही है और वेद मनु से प्राचीन है इसमें लेशमात्र भी संदेह नही ।वैदिक विद्वानों व भारतीय पुरातन ग्रंथों के जानकारों का कहना है कि मनुस्मृति में जहाँ कहीं भी वेद विरुद्ध आचरण दिखे वो प्रक्षेप (मिलावट ) है, अतः त्याज्य है ।

 

Leave a Reply

1 Comment on "वैदिक समाज व्यवस्था का सार है मनुस्मृति"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
रघुवीर जैफ ,जयपुर
Guest
रघुवीर जैफ ,जयपुर

आपके लेख का अंतिम पेराग्राफ विरोधाभाष पैदा कर रहा या फिर भारतीओं का कथित स्वर्ण समाज मनु के साथ धोखा कर रहा है | क्यों किसी को मंदिर जाने से रोकते हो ? क्यों किसी को अयोग्य कह कर अपमान कर रहे हो ? क्यों एक मजदुर वर्ग द्वारा बनाये गए मंदिर में उसीका प्रवेश ” अपवित्र ” मानते हो ? ना जाने कितने प्रश्न अनुतरित रह जातें है |

wpDiscuz