लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर शादाब

 जन्मदिन :- 11 नवम्बर पर विशॆष 

हिन्दुस्तान के ज़र्र ज़र्र से मौहब्बत की इन्तेहा रखने वाले देश भक्त मौलाना अबुल कलाम आजाद की आज योम ऍ पॆदाईश है। मौलाना आजाद का जन्म 11 नवम्बर 1888 र्इ को सऊदी अरब के मक्का शहर में हुआ था। इन के पिता का नाम मौलाना खैरूद्दीन था जो कि अरबी भाषा के प्रसिद्ध विद्वान थे। इन कि मां मदीने के प्रसिद्ध मुफ्ती की बेटी थी। मौलाना का बचपन मक्का व मदीने कि गलियो में बीता इन का परिवार 1907 ई. में भारत कोलकता में आकर बस गया। मौलाना बचपन से ही बडे ज़हीन थे। वो एक बार पढकर ही अपना सबक याद कर लेते थे। उन्हे किताबे पढने का शौक बचपन से ही था। मौलाना आजाद पढार्इ के साथ साथ पत्र पत्रिकाओ के लिये लेख लिखते थे। सन 1900 में जब वो महज 12 साल के थे और ”दर्स-ए- निजामी के छात्र थे तो उन्होने अपना अखबार ”अहसन”के नाम से निकाला पर ये अखबार ज्यादा दिन नही चल सका। पर आजाद को सिर्फ बारह साल की छोटी उम्र में ऐसा काम करने पर हर तरफ से शाबाशी मिली। छोटी उम्र में मौलाना प्रकाशक बन गये। लोगो द्वारा उनकी हौसला अफजाई करने पर सन 1900 में ही उन्होने ”नौरंगे-आलम” नाम से कविताओ की एक पत्रिका का प्रकाशन किया ये पत्रिका लगभग आठ महीने तक निकली। 16 साल की उम्र में मौलाना आजाद ने अपने ही उद्र्व अखबार ”लिसानुस सिदक” का सम्पादन किया जिस का मकसद उद्र्व को फरोख, सामाजिक बुराई के विरूद्व लडना, समाज सुधार को बढावा देना तथा लोगो में साहितियक रूझान पैदा करना था।

ये मौलाना आजाद का लिखने पढने का शौक ही था की उन की मुलाकात महात्मा गाधी से हुई। दरअसल सन 1912 में मौलाना आजाद ने एक उद्र्व साप्ताहिक ‘अल हिलाल” शुरू किया। इस में तरह तरह के लेख प्रकाशित होते थे, विशेष रूप से देश प्रेम और भारत की आजादी के सम्बन्ध में। गाधी जी को मौलाना का यह कार्य बहुत पसन्द आया बस महात्मा गाधी का मौलाना से मिलना जुलना होने लगा और बहुत ही थोडे वक्त में मौलाना आजाद गाधी जी के प्रिय हो गये। इस अखबार की बढती लोकप्रियता के कारण अग्रेज सरकार ने इसे जब्त कर लिया। परन्तु सन 1916 में मौलाना आजाद ने दोबारा ‘अल बलाग “नाम से एक और अखबार प्रकाशित किया जिस की उस वक्त 29000 हजार कापिया निकलती थी इस बात से अन्दाजा लगाया जा सकता है की उस वक्त देश में मौलाना की मकबूलियत किस कदर थी। यही वजह रही की अग्रेजी हकूमत घबरा गई और उसने इस अखबार को भी बन्द करा दिया। सरकार के खिलाफ लिखने के जुर्म में उन्हे बंगाल से बाहर भेज दिया गया। इस दौरान उन्हे चार साल से अधिक रांची(झारखण्ड) में कैद रखा गया। मौलाना आजाद मुसलमानो को एक प्लेटफार्म पर जमा करते रहे मुसलमानो को तालीम पर तव्वजो दिलाते रहे। मौलाना आजाद हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर होने के साथ साथ अग्रेजो के पक्के दुशमन थे। आजादी के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय होने के कारण उन्हे कई बार जेल जाना पडा। सन 1923 में इन्हे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।

हिन्दुस्तान पाकिस्तान विभाजन के जनक मौहम्मद अली जिन्नाह को मौलाना आजाद ने बहुत समझाया कि विभाजन की बात ठीक नही है मुसलमानो को आजाद भारत में पूरा मान सम्मान दिया जायेगा किन्तु मि0 जिन्नाह ने एक नही मानी और भडकाऊ भाषण दे देकर लोगो को जुनून की हद तक विभाजन के लिये तैयार कर लिया। जिन्नाह के भडकाए लोगो को बार बार मौलाना आजाद ने समझाया की जिन्नाह के द्वारा दिखाया जा रहा बटवारे का ख्वाब झूठा है जिन्नाह का यह सौदा घाटे का सौदा है पर तब लोग होश की नही जोश की बात कर रहे थे। मौलाना आजाद की बात नही मानी गई। उधर जिन्नाह ने नफरत और बटवारे कि आग उगलते भडकाऊ भाषणो से कुछ मुस्लिमो की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। जिस वक्त देश का विभाजन हुआ मौलाना आजाद ने दिल्ली की जामा मसिजद की सीढियो से पूरे देश के मुसलमानो को खिताब किया और जाते हुए लोगो के बारे में कहा की जो लोग पाकिस्तान जा रहे है या पाकिस्तान का ख्वाब देख रहे है वो लोग राह से भटक गये है उन के दिमाग सो गये है उन्हे भूलना ही बेहतर है मौलाना आजाद का ये भाषण बहुत ही भावुक था जो लोगो के दिलो को छू गया उन के इस भाषण को सुन कुछ लोंगो ने अपने कदम रोक लिये लेकिन कुछ लोग जिन्नाह के साथ पाकिस्तान चले गये थे। ”इनिडया विन्स फ्रीडम” में मौलाना आजाद ने लिखा था की जिन लोगो ने विभाजन का सपना देखा है ये सपना सिर्फ सपना रहेगा और 25-30 वर्ष में ही टूट जायेगा ऍसा हुआ भी जो मुसलमान पाकिस्तान नये नये ख्वाब लेकर गये थे कुछ ही दिनो में उन लोगो के सारे ख्वाब टूट गये।

मौलाना आजाद की शख्सीयत अगर बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी अरूणा आसिफ अली की नजर से देखे तो उन्होने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ”जिस वक्त पूरा देश 14 अगस्त 1947 की रात को आजादी की खुशियाँ मना रहा था उस वक्त मौलान आजाद रो रहे थे क्योकि उन के नजदीक इस खुशी से बडा और पीडा दायक दुख हिन्दुस्तान का विभाजन होना था। मौलाना आजाद एक सच्चे देश भक्त थे वो अग्रेजो द्वारा लगाई तमाम पाबनिदयो के बावजूद जंगे आजादी की लडाई लडते रहे। 1952 में रामपुर व 1957 में गुडगाव से वो चुनाव जीते। मौलाना आजाद, 1947 में देष के स्वतंत्र होने पर पं0 जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंण्डल में देश के प्रथम शिक्षामंत्री बने तथा इस पद पर वो दस साल तक रहे। मौलाना कि जन्मतिथि 11 नवम्बर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में पूरे देश में बनाया जाता है।

मौलाना आजाद ने कुरान मजीद का अग्रेजी में तजर्ुमा भी किया। मौलाना आजाद ने सरकार में उच्च पदो पर रहते हुए अपने कार्यकाल में अनेक संगीत, नाटक अकादमिया, विज्ञान विभाग व महाविधालय खोले। 22 फरवरी 1958 को भारत का ये महान स्वतंत्रा सेनानी, साहित्यकार, साहसी पत्रकार, समाजसेवी तथा उच्चकोटी का राजनेता भारत माता की गोद में हमेशा के लिये जा कर सो गया। मौलाना अबुल कलाम आजाद की मौत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ”अब मौलाना आजाद जैसा काबिल व्यकित और देश भक्त कभी पैदा नही होगा। ऐसें ही मौके के लिये किसी शायर ने कहा है ”हजारो साल नरर्गिस अपनी बे नूरी रोती है। बडी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

 

शादाब जफर शादाब

 

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2 Comments on "राष्ट्रीय सौहार्द का उदाहरण थे मौलाना आजाद"

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vimlesh
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सादाब जफ़र साहब
ये भारत का दुर्भाग्य है की जिससे भी समाज को जोड़ने की अपेक्षा की गयी वाही कही ना कही समाज को तोड़ने वाला निकला चाहे वो जिन्ना रहे हो या पंडित नेहरु इन्ही गद्दारों का समाज ने अनुसरण किया अन्यथा आज भी अब्दुल कलाम साहब देश के सर्वमान्य लोकप्रिय व्यक्ति है किन्तु उनकी महानता सादगी को कोई अपनाने को तय्यार नहीं है जबकि शालमन खान कैटरिना करीना पर नवजवान ही नहीं बुद्दे भी नक़ल मरने से बाज नहीं आते .

ईश्वर हम सबको सद्बुद्धि दे

मुकेश चन्‍द्र मिश्र
Guest

शादाब जफर साहब आज भी मुस्लिम समाज मौलाना आजाद जैसों की नही बल्कि जहर उगलने वाले मुस्लिम नेतावों की ही बात सुनता है

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