लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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mid day mealप्रमोद भार्गव

वैसे तो यह एक दयनीय स्थिति है कि दुनिया में महाशक्ति बनने का ढिंढोरा पीट रहे भारत की 12 लाख पाठशालाओं के 12 करोड़ बच्चों को मुफ्त में पोषाहार दिया जाता है। यह स्थिति तब और बदतर तस्वीर पेश कर जाती है, जब विशाक्त भोजन खाने के कारण बाल भगवानों के मरने की खबरें आतीं रहीं। बिहार के सारण जिले में स्कूली बच्चों के मरने की खबर तब और भयावह व हदृयविदारक हो गर्इ, जब बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही ने सार्वजनिक बयान दिया कि बच्चों को जहर दिया गया। जहरीला भोजन खाने के कारण 22 बाल-गोपालों की स्कूल में ही मौत हो गर्इ और 28 अभी भी जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं। इसी तरह बिहार के ही मधुबनी जिले में 27 बच्चों के बीमार होने की खबर है। मसलन बच्चों को जो पोषाहार उन्हें स्वस्थ बनाए रखने के लिए दिया जा रहा, वह उनके लिए जानलेवा साबित हो रहा है, जाहिर है, कुपोषण और भूख दूर करने वाले उपाय कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। कुछ ऐसे नए उपाय तलाशने की जरुरत है, जिससे भीख का कटोरा थामे बच्चों के परिजनों की आर्थिक स्थिति सुधरे और भोजन के लिए उन्हें लाचारी के हाथ पसारने की जरुरत ही न रह जाए ?

कांग्रेस की पीवी नरसिंह राव सरकार ने करीब 20 साल पहले पाठशालाओं में पढ़ने वाले बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिए जाने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी। मकसद था, भोजन के लालच में बच्चों की स्कूलों में आमद बढ़ेगी और स्तरीय भोजन मिलने से गरीब व वंचित तबके के बच्चों को कुपोषण से निजात मिलेगी। लेकिन इस योजना के सार्थक परिणाम नहीं निकले। पूरे देश में योजना भ्रष्टाचार की शिकार हो गर्इ। सड़ा-गला पोषाहार परोसे जाने की शिकायतें पूरे देश से आती रही हैं। सरकारी विधालयों के शिक्षकों ने मध्यान्ह भोजना की व्यवस्था में जुटे रहने के बहाने गढ़कर शिक्षक के मूल कर्तव्य पढ़ार्इ से पीछा छुड़ा लिया। नतीजा यह निकला कि ज्यादातर स्कूलों में बच्चे केवल उसी समय कतारबद्ध हाथ में कटोरा लिए खड़े दिखते हैं, जिस समय भोजन बांटा जाता है। गोया छात्र पढ़ार्इ और पोषाहार दोनों ही बुनियादी सुविधाओं वंचित होते चले गए। सारण में 22 बच्चों की मौत इस हकीकत की ताजा बानगी है।

सुनियोजित ढंग से भोजन में जहर मिलाकर बच्चों को मारने की साजिश रचने की शायद यह देश की पहली घटना है। इसके पहले सड़-गले अनाज से तैयार भोजन खाने के कारण, भोजन विशाक्त होने के घटनाक्रम घटते रहे हैं। मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में सब्जी में सांप और छिपकली निकलने की घटनाएं घटी हैं। इन बदइंतजामियों के चलते और पोषक आहार नहीं दिए जाने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने कर्इ मर्तबा केंद्र व राज्य सरकारों को फटकारें भी लगार्इ हैं, लेकिन स्थिति सुधरने की बजाय उत्तरोत्तर भयावह रुप में ही सामने आर्इ है। मध्यान्ह भोजन सामाजिक विसंगतियों और छूआछूत की संविधान विरोधी भावना का भी शिकार रही है। मध्यप्रदेश समेत कर्इ राज्यों में उच्च जाति के बच्चों के लिए अलग और छोटी जाति के बच्चों के लिए अलग चूल्हे पर भोजन बनाए जाने की खबरें आर्इ हैं। दलित जाति की महिला के हाथ का खाना सवर्ण जाति के बच्चों द्वारा खाने से इंकार किए जाने के मामले भी सामने आए हैं। जाहिर है, आजादी के 65 साल बाद भी हम जाति मुक्त समाज के संस्कार बच्चों को छात्र जीवन से ही देने में नाकाम साबित हुए हैं। संविधान की सामाजिक न्याय व समता की मूल अवधारणा पर यह किसी कुठाराघात की तरह है।

मध्यान्ह भोजन का मुख्य मकसद भोजन की ललक में बड़ी संख्या में बच्चों का स्कूल में दाखिला तो था ही, पढ़ने वाले बच्चों को कुपोषण से छुटकारा दिलाना भी था। किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक लापरवाही के चलते हम दोनों ही उद्देश्यों में असफल रहे। करीब दो साल पहले प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह ने भूख और कुपोषण से जुड़ी एक रिपोर्ट सार्वजनिक की थी, जिसमें उन्होंने स्वीकारा था कि देश में कुल 16 करोड़ बच्चे हैं, जिनमें से 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण की गिरफत में हैं। डा सिंह ने इस अवसर पर बिना किसी लाग लपेट के कहा था कि कुपोषण जिस तादात में है, उसके चलते ‘एकीकृत बाल विकास परियोजना और ‘मध्यान्ह भोजन जैसे उपायों से इसे काबू में नहीं लिया जा सकता है। अलबत्ता नीति निर्माताओं को जरुरत है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, साफ पानी और पोषण के बीच की कडि़यों को समझें और उनके मुताबिक अपनी कार्यप्रणाली को अंजाम दें। हालांकि भारत में इतने बड़े फलक पर कुपोषण की भयावहता उजागर होना कोर्इ खास बात नहीं थी,खास बात यह थी कि प्रधानमंत्री ने इस सच्चार्इ को स्वीकारा था।

कुपोषण की इस हकीकत से रुबरु होने के बावजूद हमारे देश के नेतृत्वकर्ता इस फीलगुड में हैं कि भारत दुनिया की एक महाशक्ति के रुप उभर रहा है। महाशक्ति बन जाने और सुशासन का भ्रम फैलाने की चकाचौंध में हमें कुपोषण की वह भूख दिखार्इ नहीं दे रही है, जो हर पांच साल से कम उम्र के 21 लाख बच्चों को लील जाती है। कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश से खबर आइ्र थी कि भूख से बेहाल 10-12 साल के स्कूली बच्चे सिलीकान युक्त मिटटी के लौंदे खाकर भूख मिटा रहे हैं। इलाहाबाद के पास स्थित इस खदान की मिटटी का स्वाद सत्तू जैसा है। इस कारण बच्चे इसे आसानी से आहार बना लेते हैं। यह स्वादिश्ट मिटटी कुपोषण और कुपोषण से पैदा होने वाली तमाम बीमारियों की वजह बन रही है। भूख मिटाने के उपायों में बिहार और भी बदतर हाल में है। यहां चूहों को मारकर खाने वाले लोगों की पूरी एक ‘मूसाहार जाति है। देश की कर्इ आदिवासी जातियां आज भी पेड़ों की छाल उबालकर खा रहे हैं। चूहे और छाल खाने में बच्चे भी शामिल है। जाहिर है, स्कूलों में बंटने वाला मध्यान्ह भोजन बदइंतजामी का शिकार है। यदि शालाओं में एक समय का पर्याप्त भोजन मिल रहा होता तो बच्चे चूहे मारने की लाइन में लगे न होते ? बावजूद स्थिति यह है कि हमारे राजनीतिक दल जाति और संप्रदाय से जुड़े आरक्षण की बात करते हैं। जातीय सभाएं करते हैं। छात्रों को लैपटाप मुफ्त बांटते हैं। मसलन संकीर्ण मानसिकता और देश को बांटने वाले मुददे सभी प्रमुख दलों के केंद्र में हैं, किंतु कुपोषण और दूषित आहार, जिसकी व्यापक भयावहता सभी धर्म और समाजों के बच्चों में उपस्थित है, वह किसी भी राजनीतिक दल के दृष्टि-पत्र में शामिल नहीं है। यही वजह है कि दूषित पोषाहार से बच्चे स्कूलों में मर भी रहे हैं और बीमार भी हो रहे हैं।

ऐसे में सवाल उस खाध सुरक्षा अध्यादेश पर भी खड़ा होता है, जो देश की 67 फीसदी आबादी, मसलन 82 करोड़ लोगों की भूख मिटाएगा। यहां सवाल उठता है कि जब हम स्कूलों में पढ़ने वाले 12 करोड़ बच्चों कोएक समय के साफ-सुथरे भोजन की व्यवस्था भी नहीं कर पा रहे हैं तो 82 करोड़ लोगों के भोजन की गारंटी कैसे लेंगे ? दरअसल व्यक्ति की भूख नेतृत्वकर्ता खाध सुरक्षा और मध्यान्हय भोजन जैसे फौरी उपायों से कब तक मिटाएंगे। हमें प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक सुरक्षा की गारंटी देने की जरुरत है। मसलन हरेक परिवार के मुखिया को आर्थिक स्वांवलंबी बनाया जाए। हमारे यहां मनरेगा जैसी योजना लागू होने के बावजूद न नियमित रोजगार है और न ही राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण। गरीब और अमीर के बीच इतना असंतुलन आर्थिक उदारवाद के दौरान बढ़ा है कि वह शिक्षा, चिकित्सा, साफ पानी, पोष्टिक आहार और रोजगार व आजीविका के प्राकृतिक संसाधनों से वंचित होता चला जा रहा है। विकास दर को उंची बनाए रखने के फेर में दलित, वंचित और आदिवासियों को हाशिये पर ला खड़ा कर भगवान भरोसे छोड़ दिया है। यही कारण है कि जिन स्कूलों में गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं, वहां से विशाक्त भोजन खाकर बच्चों के मरने की खबरों का सिलसिला अनवरत बना हुआ है, तय है कल्याणकारी योजनाएं हमारे नेतृत्वकर्ताओं की प्राथमिकता में दर्ज नहीं हैं। उनकी रुचि इन्हें जैसे-तैसे लागू करके वोट बटोरने भर की है।

 

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