लेखक परिचय

शिवानंद द्विवेदी

शिवानंद द्विवेदी "सहर"

मूलत: सजाव, जिला - देवरिया (उत्तर प्रदेश) के रहनेवाले। गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र विषय में परास्नातक की शिक्षा प्राप्‍त की। वर्तमान में देश के तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादकीय पृष्ठों के लिए समसामयिक एवं वैचारिक लेखन। राष्ट्रवादी रुझान की स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय एवं विभिन्न विषयों पर नया मीडिया पर नियमित लेखन। इनसे saharkavi111@gmail.com एवं 09716248802 पर संपर्क किया जा सकता है।

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pravaktaबात वहीं से शुरू करता हूँ जहाँ से प्रवक्ता का जन्म होता है। मेरे इंटरनेट का उपभोक्ता होने और प्रवक्ता डॉट कॉम की उम्र लगभग बराबर है। संभवत: 2008 का अंतिम दौर होगा जब मैं पहली बार इंटरनेट पर सक्रिय हुआ। उस समय फेसबुक बहुत नया था और लोग फेसबुक की बजाय ऑरकुट पर ज्यादा सक्रिय थे। मै भी ऑरकुट पर आया और लोगों से जुड़ने लगा। चूंकि, विद्यार्थी जीवन से ही लिखने पढ़ने और सामाजिक सरोकारों से जुड़ने में दिलचस्पी रही थी लिहाजा इंटरनेट पर भी कुछ उसी किस्म की दुनिया तलाशने लगा। लोगों से जुड़ने के क्रम में बहुत लोग मिलते गए और मैं सीखता गया।

शुरुआती लगभग आठ महीने तो बस इंटरनेट को पूरी तरह समझने और जुड़ने-जुडाने में चले गए। इस आभासी दुनिया के कई अनुभवी और वरिष्ठ लोगों के सान्निध्य में आकर ब्लॉग और वेबसाइट आदि का ज्ञान मिला तो लिखने-पढ़ने का चस्का लगना स्वाभाविक था। स्पष्ट कर दूँ तब तक मेरा कोई भी लेख सार्वजनिक स्तर पर किसी बड़े अखबार या पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुआ था सिवाय विद्यालय आदि की पत्रिकाओं को छोड़कर ! 2009 के अंतिम दौर में संभवत: मेरे संपर्क में दो वेबसाईट आये जहाँ लोग लिखते-पढ़ते और छपते थे। उनमें से एक वेबसाईट प्रवक्ता डॉट कॉम थी जिसके संपादक संजीव सिन्हा जी हैं और दूसरी जो वेबसाईट थी उसके संपादक अविनाश दास हैं। संजीव सिन्हा जी से फोन पर बात हुई और मैंने कविता और लेख आदि भेजना शुरू किया। प्रवक्ता को मैंने जितना कुछ जब-जब भेजा प्रवक्ता ने प्रकाशित किया। लेकिन इस मामले में अविनाश दास थोड़े अलोकतांत्रिक निकले और एक बार तो एक लेख को बिना पढ़े ही उन्होंने कह दिया कि हम इस विषय पर आपका पक्ष नहीं छापेंगे। मैंने अविनाश से तब कहा था कि आप तो बेहद लोकतांत्रिक होने की बात करते हैं तो उनका जवाब था “हम इतने भी लोकतांत्रिक नहीं है”। अविनाश उस दौरान वामपंथी हुआ करते थे और हो सकता है आजकल भी हों मगर लगते नहीं हैं । खैर, उसके बाद मैंने वो लेख भी प्रवक्ता को भेज दिया और प्रवक्ता ने उसे प्रकाशित किया।

जब मैं प्रवक्ता से जुड़ा था तब प्रवक्ता में बमुश्किल पचास लेखक हुआ करते थे मगर प्रवक्ता ने देखते ही देखते छह सौ के आस-पास तमाम ख्यातिलब्ध लेखक जुटा लिए। ये वो दौर था जब वैकल्पिक मीडिया के रूप में उभर रही नई मीडिया के तमाम संपादक अभिव्यक्ति की आजादी को शर्तों,विचारधाराओं और पंथो सहित निजी पूर्वाग्रहों से मुक्त करने को तैयार नहीं थे और अपने अनुकूलता के विपरीत कुछ छापने को तैयार नहीं थे। ऐसे में प्रवक्ता ने एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया जिसमें आपको हर विचारधारा, हर पंथ का लेखक उन्मुक्त होकर अपनी विचारधारा को सही तर्कों और भाषाई शुचिता के साथ रखने को लेकर स्वतंत्र दिख सकता था था। जिस प्रवक्ता को भाजपाई और संघी कहकर लोग मखौल उड़ाते है उस प्रवक्ता ने देखते ही देखते प्रख्यात मार्क्सवादी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी के 386 लेख प्रकाशित कर दिये।

मुझे बखूबी याद है कि मार्क्सवादी आलोचक जगदीश्वर चतुर्वेदी के प्रतिवाद में इसी वेबसाईट से एक भाजपाई अथवा राष्ट्रवादी लेखक पंकज झा तक खुद को निर्वासित कर लिए। लेकिन इस इस वेबसाईट ने मार्क्सवादी विचाधारा के लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी को कायम रखा। ऐसी कोई मिसाल कम से कम समकालीन किसी और वेबसाईट में तो नहीं ही देखी जा सकती थी और ना है। इस बात का जवाब ना तो किसी वेब संपादक के पास ही होगा और ना ही किसी फरेबी आलोचक के पास ही होगा कि अब किस आधार पर वो कह सकते हैं कि प्रवक्ता किसी खास विचारधारा से ग्रसित विचारधारा है।

खैर, वैचारिक स्तर पर प्रवक्ता जितना व्यापक तब था उतना आज भी है। जो स्तर उसने कायम किया वो भी कई लोग छू भी नहीं सके, इसमें कोई न कोई बात तो रही ही होगी। मैं प्रवक्ता के लिए बहुत ज्यादा नहीं लिखा लेकिन प्रवक्ता को पढ़ा बहुत हूँ और पढ़-पढ़ कर बहुत लिखा हूँ। मैंने प्रवक्ता से ना जाने कितनी विचारधाराओं के लेखकों को पढ़ा और ना जाने कितनी अलग-अलग तरह की विचारधाराओं को करीब से समझा। प्रवक्ता मेरे लिए और मेरे जैसे ना जाने कितनों के लिए एक ऐसे प्रवक्ता की तरह साबित हुआ है जिसके सान्निध्य में रहकर वैचारिक स्तर पर तुलनात्मक अध्यन करने का अवसर मिला है। हर तरह की विचारधारा और हर विचारधारा के लेखक सिर्फ और सिर्फ प्रवक्ता डॉट कॉम पर ही देखे जा सकते हैं।

प्रवक्ता से जुड़ी अगर एक उल्लेखनीय स्मृति का जिक्र करूँ तो लेखों पर टिप्पणी करने से शुरुआत करने वाले पाठक अमेरिकी भारतीय डा.मधुसूदन उवाच ने देखते ही देखते 65 लेख प्रवक्ता के लिए लिख दिये। प्रवक्ता इस नजरिये से भी सबसे अलग है क्योंकि प्रवक्ता ने स्थापितों को केवल प्रकाशित ही नहीं किया बल्कि कई लोगों को लेखनी में स्थापित भी किया है। अपने पाँच साल के सफर में प्रवक्ता ने एलेक्सा मानकों पर भी तमाम वेबसाइटों को पटखनी देते हुए शीर्ष पर स्थान बनाया ।

अपने हृदय में वाम, दक्षिण, राष्ट्रवाद, दलित-चिंतन, स्त्री-विमर्श, कला, विज्ञान, शिक्षा, समाज के हर सरोकार को समेटे यह वेब मंच इसलिए भी सबसे अलग और सबसे ऊपर रहा क्योंकि इस मंच का एक कथ्य है “स्वस्थ बहस लोकतंत्र की प्राण होती है और वो स्वस्थ बहस किसी धारा से ग्रसित मंच पर नहीं हो सकती”। ऐसे सशक्त मंच के साथ शुरुआती दिनों से जुड़ने और सीखने समझने का अवसर प्राप्त होने के नाते मैं प्रवक्ता को तहेदिल शुक्रिया कहता हूँ।

साथ ही प्रवक्ता के संपादक संजीव सिन्हा जो कि भाजपा से जुड़े होने के बावजूद इस मंच को विचारधारा से मुक्त रखे रहे, इसके लिए उन्हें भी आभार एवं बधाई देता हूँ । मेरी शुभकामना है कि प्रवक्ता यूँ ही आगे चलता और बढ़ता रहे । प्रवक्ता आज भी कायम है कल भी रहेगा क्योंकि इसमें सबको स्वीकारने,सुनने की बौद्धिक क्षमता है, और अक्षय ऊर्जा है !

बाक़ी जो लोग अभी भी किसी आग्रह से ग्रसित होकर वेबमंच चला रहे हैं उनके लिए सिर्फ इतना ही कहूँगा-

“कैसे जियोगे तुम ज़ुल्फ़ के सर होने तक” !

शुभकामना और बधाई,पाँच वर्ष के इस प्रवक्ता को और इसके संपादकीय मंडल को ! धन्यवाद !!

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