लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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पति और सास ने बेचारी पूनम का रोज रोज के लडाई झगडे मारपीट से जीना दुश्वार कर रखा है। ये शब्द हमे हर रोज रोज कही न कही सुनने को जरूर मिलते है। पर कही ये सुनने को नही मिलता कि पूनम ने अपने पति और सास का जीना दुश्वार कर रखा है क्यो ? क्या बहू द्वारा पति और सास प्रतांडित नही होते। होते है पर पुरूष प्रधान समाज होते हुए भी ये बात घर से बाहर समाज में नही पहॅुच पाती। तभी तो सीधे साधे पुरूष चुपचाप खानदान की इज्जत की खातिर अपने बच्चो इज्जत की खातिर समझौता कर घरेलू हिंसा का शिकार होते रहते है। हद तो तब हो जाती है जब पत्नी और ससुराल वालो द्वारा ऐसे पुरूषो को दहेज एक्ट में फॅसा कर जेल तक भिजवा दिया जाता है। अगस्त 2010 में दिल्ली यात्रा के दौरान मैने जगह जगह के कई संगठनो के विज्ञापनो द्वारा ये लिखा देखा ॔॔पत्नी सताये तो हमे बताये’’ पने के बाद लगा कि अब ये आवाज पूरी ताकत से उठने लगी है। लेकिन इस आवाज और ऐसे विज्ञापनो कि जरूरत दिल्ली से ज्यादा छोटे छोटे कस्बो और ग्रामीण इलाको को ज्यादा है। दरअसल पिछले कुछ सालो से केबिल और डिश के द्वारा घरो में पहुॅच रहे टीवी सीरिलो के कारण ऐसे मामलो में लगातार बडी तादात में इजाफा हो रहा है। जिस में पुरूषो को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड रहा है। इन घरेलू हिंसा के शिकार होने वाले पुरूषो के लिये कुछ समाजसेवी संगठन बन रहे है ये एक अच्छी पहल है। क्यो कि महिलाओ के मुकाबले पुरूष घरेलू हिंसा का सब से भयावह पहलू यह है कि पुरूषो के खिलाफ होने वाली हिंसा की बात न तो कोई मानता है और न ही पुलिस इस की शिकायत दर्ज करती है और न ही कोई सरकार द्वारा महिला आयोग की तरह पुरूष आयोग का गठन अभी तक किया गया है। हॅसी मजाक में पूरे प्रकरण को उडा दिया जाता है समाज में कुछ लोग घरेलू हिंसा के शिकार व्यक्ति को जोरू का गुलाम, नामर्द और न जाने क्या क्या कहते है। जिसे सुन पीडित पुरूष खुद को हीन महसूस करता है इस सब से परेशान होकर बेबसी में कोई कोई पुरूष कई बार आत्महत्या जैसा गम्भीर कदम तक उठाने पर भी मजबूर हो जाता है।
पुरूषो के साथ कुछ महिलाये हिंसा ही नही करती उन की मर्जी के बगैर जबरदस्ती रोज रोज उन का यौन शौषण भी करती है। इस के साथ ही घूमने फिरने व मौजमस्ती करने के लिये पैसा देने व खाना बनाने के लिये उन्हे मजबूर किया जाता है ऐसा न करने या मना करने पर उन के साथ मारपीट तो आम बात है। लेकिन आज कोई यह मानने को तैयार ही नही कि पुरूषो का भी हमारे समाज में कुछ महिलाओ द्वारा उत्पीडन किया जाता है। यदि पुरूष इस सब का विरोध करता है तो पत्नी और उस के परिवार वाले उसे दहेज के झूठे मामलो में फसाने कि धमकिया देकर उस का और उस के परिवार का उत्पीडन करते है। आज समाज जिस तेजी के साथ बादल रहा है उस की जद में निसंदेह हमारी परम्पराए आ रही है। पैसा रिश्तो के मुकाबले महत्वपूर्ण हो गया है पुरानी परम्पराए और मान्यताओ के साथ साथ जीवन के अर्थ भी बदल गये है। फैशन के इस दौर में कुछ स्ति्रया भी बदली है उन के विचार और परिवार भी बदले है। पर ये भी सच है कि इस पुरूष प्रधान समाज में पुरूषो कें कठोर व्यवहार और दहेज लालचियो की तादाद में इन का प्रतिशत आज भी बहुत कम है। पर ये भी मानना पडेगा कि पुरूषो के साथ हिंसा करने वाली महिलाओ का कुछ प्रतिशत समाज में जरूर बा है।
इन सब बातो को हम या समाज स्वीकार करे या न करे पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने इन सब बातो को महसूस किया है और पिछले महीने एक मामले की सुनवाई के दौरान घरेलू हिंसा के शिकार पुरूषो की स्थिति को समझते हुए न्यायमूर्ति दलवीर भण्डारी और न्यायमूर्ति के0एस0 राधाकृष्णन की खण्डपीठ ने धारा 498(ए) के दुरूपयोग की बती श्कियतो के मद्देनजर ये कहा था कि महिलाये दहेज विरोधी कानून का दुरूपयोग कर रही है। सरकार को एक बार फिर से इस पर नजर डालने कि जरूरत है न्यायालय को ऐसी कई शिकायते देखने को मिली है जो वास्तविक नही होती है और किसी खास उद्वेश्य को लेकर दायर की जाती है। भारत में सेव फैमिली फाउंडेशन और माय नेशन फाउंडेशन ने अप्रैल 2005 से मार्च 2006 के बीच एक ऑनलाईन सर्वेक्षण किया था। जिस में शामिल लगभग एक लाख पुरूषो में से 98 फीसदी पुरूष किसी न किसी प्रकार की घरेलू हिंसा का शिकार रह चुके थे। इस सर्वेक्षण में आर्थिक, शारीरिक, मानसिक और यौन संबंधो के दौरान की जाने वाली पत्नियो द्वारा हिंसा के मामले में पुरूष पीडित थे। दहेज विरोधी कानून हमारे देश में सभी धर्मो के अर्न्तगत किये गये विवाहो पर लागू होता है। पर सन 1983 से आज तक दहेज उत्पीडन के नाम पर अदालतो में ऐसे हजारो मुक्कदमे फाईल हुए है जिन की जद में आकर हजारो निर्दोश परिवार तबाह बर्बाद हो गये है। ससुराल पक्ष में किसी एक ने ताना या कुछ कहा नही कि बहू सारे ससुराल वालो पर भा.दं.सं. की धारा 498ए के तहत पति,सास,ससुर नन्द, जिठानी,जेठ, देवरो सहित घर के सारे लोगो को मुक्कदमा दर्ज करा कर जेल करा देती है हमारी पुलिस भी इन केसो में गजब की जल्दी दिखाती है और जो लोग दूसरे शहरो कस्बो में रहते है उन को भी पकड पकड कर जेलो में ठूस देती है कोई कोई घर तो इतना बदनसीब होता है कि इन घरो में बचे बुजुर्ग को कोई पानी देने वाला तक नही बचता और किसी किसी केस में नाबालिग और दूध मुहे बच्चो को भी काफी वक्त जेलो में बिताना पडता है।
मेरा यह सब लिखने का ये कतई मकसद नही कि अपराधी खुले छूटे रहे। नही बिल्कुल नही, अत्याचारी को सजा जरूर मिले पर निर्दोश और लाचार लोगो को बिना वजह जेलो में न डाला जाये और न ही मुक्कदमे चलने चाहिये। हमारी मीडिया को ऐसे मामलो में समाचार प्रकाशित करने से पहले अपने रिर्पोटरो द्वारा सही सही जानकारी करनी चाहिये और समाचार भेजते समय रिर्पोटरो को भी अपनी अपनी जिम्मेदारी का पूरा र्निवाह करना चाहिये साथ ही उसे ये सोचने भी चाहिये कि उस कि भेजी रिर्पोट से समाज में कोई सामाजिक बुराई उत्पन्न न हो इस के साथ ही ये भी सोचना चाहिये कि कोई बेगुनाह सजा न पा जाये। वकीलो को भी ऐसे मुक्कदमे लेने के बाद गहराई से छानबीन करनी चाहिये क्यो कि उन का भी समाज के प्रति दायित्व बनता है कि वो धारा 498ए, पुरूष उत्पीडन, व महिला उत्पीडन के मुक्क्दमे जल्दबाजी में फाईल न करे उन्हे ऐसे मुक्कदमे कमाई की नजर से नही बल्कि मानव जाति की भलाई के तौर पर देखने और लेने चाहिये। इस से निसंदेह हमारा सामाजिक व पारिवारिक ताना बाना छिन्नभिन्न नही बल्कि मजबूत होगा।

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6 Comments on "पुरूष भी होते है पत्नियो द्वारा प्रताड़ित"

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इंसान
Guest
धर्मेश, मानो न मानो आप अपनी पत्नी द्वारा पीड़ित नहीं हैं| पति पत्नी और घर में अन्य सदस्य में कौन पीड़ित है तो कहना सर्वथा कठिन होगा| कोई भी हो, वह केवल अपने कर्मों से पीड़ित है| मेरे विचार में सद्भावना और परोपकार से परिपूर्ण संतुलित जीवन बहुत ही सुन्दर है| मैंने बचपन से मर्यादा को श्रेष्ठ समझा है जिसमें विस्तृत परिवार में सब के लिए आदर, प्रेम और त्याग का संबंध है| आधुनिक वातावरण में जब विस्तृत परिवार नहीं होते तो अलग से रहते अनुभव-रहित दम्पति विवाहित जीवन की कठिनाइयों को नहीं झेल पाते हैं| मन-मुटाव जीवन में अभिशाप… Read more »
Dharmesh
Guest

Mai bhi patni dvara pidit hu ……

sumit
Guest

Jisne bhi LIKHA h bahut sahi LIKHA h aisi pareshani me khud jhel raha hu aur mere aas paas Maine bahut aise logo ko dekha h me Ye chahta hu ki aisi koi sanstha ya kanun jarur bane jisse ki purusho ko isse nijaat mil paye

bharatbhoomi
Member
ॐ कानून तो व्यक्ति की रक्षा के लिये बनाये जाते है परन्तु उनका दुरुपयोग तो हर देश मे होता है | मेरा अपना अनुभव है की कुछ स्त्रिया कानून का दुरुपयोग कर रही है | हमारी भारतीय संस्कृति परिवार , संस्कार पर बहुत जोर देती है की कैसे हम अपने बच्चो को पाले | कानून तो एक सहारा है और उस सहारे को लेकर हमे न जीना पडे तो बहुत अच्छा है | जब हम किसी कानून का सहारा लेकर जीते है तो हम विकलांग जैसे है | हमारा जीवन तो कर्तव्यों को निभाने पर खड़ा होना चाहिए | हमारे… Read more »
Ashish
Guest

दहेज़ कानून में सूधार होना चाहिए
किसी एक लड़की के बस इतना कह देने पर कि मरे ससुराल के लोग मुझे परेसान कर रहे है
लड़के के पुरे परिवार को जेल में डाल देना यह सरासर गलत है
गलती तो किसी से भी हो सकती है चाहे वह लड़का हो या लड़की
अगर पुलिस और भारत का कानून लड़के की बात पर विश्वास नहीं कर रहा है .तो इसका मतलब यह है कि लड़का होना ही पाप है .

sunil singh
Guest

दहेज़ कानून में सूधार होना चाहिए
मजाक बना रखा है जब चाहे पुरुष एंव उसके परिवार जनो को झूठे केस मे फसा दिया जाता है | सोचने वाली बात है कि अगर पत्नि फंसी लगा ले तो लडके का पुरा परिवार दोषी | अगर लडका फंसी लगता है तो लडकी को एंव उसके परिवार को दोषी नही ढहराया जाता |अगर पुलिस और भारत का कानून लड़के की बात पर विश्वास नहीं कर रहा है .तो इसका मतलब यह है कि लड़का होना ही पाप है |

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