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हृदयनारायण दीक्षित

ज्ञान की प्यास परम सौभाग्यवती है। यह कभी तृप्त नहीं होती। जानकारियों के क्षेत्र अनंत है, ज्ञान की प्यास भी अनंत। प्रत्येक नई जानकारी प्यासे की हलक में पड़ने वाली कुछ जल बूंदे जैसी होती हैं। इससे प्यास नहीं बुझती। ज्ञान की प्यास और भी बढ़ती है। जैसे अषाढ़ की थोड़ी सी बूंदा-बांदी धरती में उमस बढ़ाती है वैसे ही ज्ञान की यात्रा लगातार बेचैनी बढ़ाती है। बूंद-बूंद से कैसे भरे रिक्त चित्त का घड़ा? ज्ञान के घड़े का आयतन बढ़ता जाता है। सच्चे ज्ञान अभीप्सु को पूरा का पूरा सागर चाहिए, बूंद-बूंद से भरा घट नहीं, संपूर्ण सागर चाहिए। ऐसा संपूर्ण चाहिए, जिसमें संपूर्ण घटाने से भी संपूर्ण ही बचे, कम या ज्यादा नहीं। ‘यजुर्वेद’ के ईशावास्य खंड की यही अनुभूति है। ज्ञान एक अतृप्त यात्रा है और यही लक्ष्य भी। गंगा ऋषिकेश के शिखर में स्थित पर्वत उपत्यकाओं को लांघते हुए सागर से मिल जाने की बेचैनी यात्रा करती हैं। अनथक, अविश्रांत, निरंतर, सतत् प्रवाह, छंदबद्ध, ”चरैवेति-चरैवेति”। सागर के पहले कोई विश्राम नहीं। संपूर्ण सागर से मिलने की पुलक, यात्रा के दौरान और यात्रा पूरी करने के बाद भी। ज्ञान यात्रा भी ऐसी ही होती है।

गीता के छठे अध्याय के आठवां श्लोक की प्रथम पंक्ति मजेदार है- ‘ज्ञान विज्ञान तृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः’। डॉ. राधाकृष्णन् का अनुवाद है ज्ञान-विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला इंद्रियों को जीत चुका अविचल व्यक्ति। यहां ज्ञान और विज्ञान से तृप्त आत्मा की विशेषता है। अर्थात् सामान्य आत्माएं ज्ञान-विज्ञान से अतृप्त होती हैं। जाहिर है कि यहां शस्त्रों से न मारे जा सकने वाली, आग से न जलने वाली, पानी से न भिगोए जाने वाली निष्कलुष निरपेक्ष आत्मा से भिन्न किसी अन्य साधारण तत्व को आत्मा कहा गया है। यह आत्मा दरअसल व्यक्ति का अंतरंग है। यहां आत्मा मन, बुद्धि और विवेक का क्षेत्र है। मनुष्य के भीतर ज्ञान-विज्ञान की भूख के यही क्षेत्र हैं। गीता में ‘ज्ञान और विज्ञान’ शब्द कई बार आये हैं। सातवें अध्याय के दूसरे श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- ”ज्ञान तेडहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याभ्य शेषतः” अर्थात् मैं तुझे सारा ज्ञान-विज्ञान सहित बताऊंगा। यहां ज्ञान अनुभवजन्य बोध है और विज्ञान अस्तित्व-प्रकृति के सिद्धांतों की विवेकसम्मत जानकारी है। (3.41) इंद्रियों की विषयासक्ति को ज्ञान- विज्ञान का नार्शकत्ता बताया गया है। गीता के अनुसार ज्ञान का ज्ञान जरूरी है, विज्ञान का ज्ञान भी जरूरी है। दोनो का ज्ञानी इंद्रियजयी कूटस्थ – अविचल और प्रशांत हो जाता है और तब योगी कहलाता है, उसके लिए मिट्टी के ढेला, पत्थर या स्वर्ण खंड एक जैसा हो जाता है – ”समलोष्टाश्म कांचनः”। (वही 6.8)

योग चित्त में समता विचार लाता है। समता विचार मूल्यवान है। चित्त अपने पराए के भेद से मुक्त हो जाता है। गीता में समत्व दृष्टि पर जोर है। आगे एक खूबसूरत श्लोक में कहते हैं, जब मनुष्य सुहृदों, मित्रों, शत्रुओं, उदासीनों, मध्यस्थों, ईष्यालुओं, पुण्यात्माओं और पापियों के प्रति समबुद्धि रखता है, वह विशिष्ट हो जाता है – ‘समबुद्धिर्विशिष्यते’। (वही 6.9) यहां बुद्धि के पहले सम विशेषण है। बुद्धि निर्णायक होती है। समबुद्धि पक्षपातपूर्ण रहित चित्त का परिणाम है। योग विद्या चित्त को निष्कलुष और कंपन रहित बनाने का ही विज्ञान है। लेकिन निष्कंप चित्त की उपलब्धि आसान नहीं है। श्रीकृष्ण इसकी विधि बताते हैं, योगी को एकांत में रहकर स्वयं को एकाग्र करते हुए सतत् आत्मवान होना चाहिए। उसे सभी इच्छाओं और संग्रही भाव से मुक्त रहना चाहिए। (वही 10) यहां योग विज्ञान की सुस्पष्ट झांकी है। मूल श्लोक का ‘सतत्म’ शब्द ध्यान देने योग्य है। योग अभ्यास निरंतर साधना से ही सफल होता है। यहां ‘सतत्म’ का अर्थ गहन निरंतरता है। इसी तरह ‘निराशी’ का अर्थ हारा हुआ निराश व्यक्ति नहीं है। वह योग के प्रति गहन आशा से परिपूर्ण लेकिन सांसारिक इच्छाओं के प्रति बोधपूर्वक निराशी है।

आशा बहुमूल्य धारणा है। आशा में स्वयं के प्रति विश्वास होता है, अस्तित्व के प्रति भरोसा रहता है। ईश्वर या परमात्मा की आस्था वाले लोगों की आशा और भी बेहतर होती है, उन्हें परमात्मा पर विश्वास होता है। ‘गीता’ में ज्ञान और विज्ञान दोनों का विश्लेषण है। विज्ञान अस्तित्व के गूढ़ नियमों, यानी वैदिक भाषा वाले ‘ऋत’ की जानकारी देता है और ज्ञान स्वयं का बोध है। दोनो की सम्यक जानकारी और योग की साधना सांसारिक फलों के प्रति निराशी बनाती है और आत्मबोध के प्रति भरपूर आशा जगाती है। ‘गीता’ का योग सहज है। सतत् आत्मावान होना और निराशी भाव से युक्त होना इसकी सामान्य भूमिका है। आगे 4 श्लोकों में योग की सामान्य बाते हैं। स्वस्थ स्थान पर, न बहुत ऊंची और न बहुत नीची जगह पर कुशा और मृगचर्म का आसन बिछाकर, चित्त एकाग्र करके इंद्रियों को वश में रखते हुए आत्मशुद्धि के लिए योगाभ्यास करना चाहिए। (वही 11 व 12) डॉ0 राधाकृष्णन के अनुवाद में टिप्पणी है यहां योग का अभिप्राय ध्यान योग है। लेकिन यहां योग का उद्देश्य ‘आत्मशुद्धि’ है – ‘आत्मविशुद्धये’। तब योग या बोध के अभाव वाली आत्मा अशुद्ध होनी चाहिए। यहां आत्मा का मूल अर्थ अंतःकरण है।

योग परिपूर्ण विज्ञान है। मनुष्य स्वभावतः बहिर्मुखी होता है लेकिन योग अंतर्यात्रा है। ज्ञान भीतर उगता है, बाहर प्रकट होता है। लेकिन ज्ञान का उगना आसान नहीं है। योग बाहर से शुरू होता है, शारीरिक क्रियाओं के जरिए मन की पर्तों में प्रवेश करता है, भीतर प्रकाश उगता है। गीता में प्रारंभिक गतिविधियों की भी विस्तृत चर्चा है, अपने शरीर, सिर और गर्दन को सीधा स्थिर रखते हुए अन्य किसी भी दिशा में न देखते हुए नासाग्र पर दृष्टि जमानी चाहिए। (वही 13) आंखे संसार से जोड़ती हैं, चित्त चंचल हो जाता है। ढीला शरीर गुरूत्वाकर्षण के अतिरिक्त भार को ढोता है। नासिका के अग्रभाग पर जमीं दृष्टि संपूर्ण व्यक्तित्व की ऊर्जा को समेट कर एक जगह लाती है। आगे बताते हैं प्रशांत चित्त, अकंप मन, अस्तित्वगत होकर वह समूची चेतना को मेरी ओर मोड़कर मेरा ध्यान करते हुए संयत रहे। (वही 14) यहां मेरा ध्यान करते हुए का अर्थ श्रीकृष्ण का ध्यान करना नहीं हो सकता। अर्जुन सखा, अंतरंग और सहयोगी है। श्रीकृष्ण से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे अपना ध्यान कराने के लिए ही ऐसा तत्व दर्शन अपने मित्र को समझाएं। यहां प्रयुक्त ‘मत्परः’ का अर्थ अस्तित्वगत ध्यान ही है।

ध्यान चिंतन का क्षेत्र नहीं है। मन और बुद्धि चिंतन के उपकरण हैं। स्मरण भी बुद्धि और मन के ही आयाम हैं। प्रभु-स्मरण या श्रीकृष्ण स्मरण के कार्य मानसिक और बौद्धिक हैं। स्मृति ही इन कार्यो में मुख्य भूमिका निर्वहन करती है। लेकिन ध्यान स्मरण के आगे की यात्रा है। ध्यान सोच, विचार, चिंतन, मनन या स्मरण जैसा कार्य नहीं है। ध्यान विचारशून्यता के भी परे अस्तित्व के साथ एकात्म होने की अनुभूति है। यह हमारी चेतना की निर्विचार – नो माइंड स्थिति है। उपनिषद् के ऋषि ठीक कहते हैं कि मन और वाणी जहां से लौट आते हैं, वहीं पर परम आनंद का धाम है। श्रीकृष्ण ने कहा, मन को नियंत्रित कर चुका योगी योग संयम में रहते हुए उस परम निर्वाण को पाता है, जो मेरे भीतर है। (वही 15) यहां परम निर्वाण – परम मुक्ति ही योगी की लब्धि है। यही लब्धि श्रीकृष्ण के अंदर है। परम् निर्वाण या परम मुक्ति सबका अधिकार है। प्राचीन भारत में यह सहज प्राप्य था। योग ध्यान भारतीय अनुभूति के ही प्राचीन उपकरण हैं, वे ‘ऋग्वेद’ में हैं, समूचे वैदिक साहित्य में हैं, उपनिषदों में है, गीता में हैं। ‘ऋग्वेद’ के पहले से भी हैं। गीता परिशुद्ध विज्ञान ग्रंथ है, दर्शन ग्रंथ है। करणीय है, माननीय भी है।

* लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद् सदस्य हैं।

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