लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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muslimभारत में सर्वधर्म समभाव की बातें करते हुए हिंदू मुस्लिम ईसाई के भाई भाई होने की बात कही जाती है। इससे पूर्व भारत का आर्यत्व-हिंदुत्व इस पृथ्वी को एक राष्ट्र तथा इसके निवासियों को भूमिपुत्र कहकर भाई भाई मानता रहा है। हिंदुत्व ने संसार में मानवतावाद फैलाया और इसी को भारतीय धर्म के रूप में स्थापित किया।

पाणिनि ने ऐसे शब्दों को दुष्ट शब्द कहा है जो मूल शब्द में विकृति उत्पन्न करते हैं। जैसे यव का जौ हो जाना, युक्ति का जुगती हो जाना, व्यजन का बीजणा हो जाना, पणज-का बणज और बणज से बंजारा बन जाना इत्यादि। इन शब्दों ने अपने मूल शब्द में विकार-दुर्गंध उत्पन्न की यही इनकी दुष्टता है-इसी प्रकार जो व्यक्ति मानव के मूल धर्म मानवता में विकार पैदा करे-अवरोध डाले- शांति प्रिय लोगों का जीना कठिन करे, वह दुष्ट कहलाता है। क्योंकि ऐसे दुष्ट से मानव समाज की मुख्यधारा में बाधा आती है और जनसाधारण कहीं न कहीं स्वयं को असुरक्षित अनुभव करता है। वेद ऐसे लोगों को समाज के लिए अनुपयुक्त मानता है और ऐसे लोगों के लिए राष्ट्र को आदेशित करता है कि उनका समूलोच्छेदन करो। इन दुष्टों को ही दैत्य, असुर, राक्षस, अनार्य जैसे शब्दों से हमारे यहां पुकारा गया है। ऐसे लोगों का समूलोच्छेदन आवश्यक है। क्योंकि ऐसे लोगों का कोई धर्म (मानवतावाद तक ही सीमित करके लें) नही होता। आज की प्रचलित परिभाषा में जिन्हें धर्म समझा जाता है वो धर्म नही अपितु सम्प्रदाय हैं। यह तो है वेद की व्यवस्था।

अब कुरान की व्यवस्था पर विचार करें। कुरान के बारे में मौलाना मौदूदी, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे कितने ही मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि कुरान दुनिया को अल्लाह की पार्टी (यानि मुसलमान) और शैतान की पार्टी (यानि मुसलमान) इन दो भागों में बांटकर देखती है। यानि हर मुसलमान पाक व साफ है और खुदा की संतान है, बाकी सब शैतान हैं। इस भाव के रहते भला कैसे मुसलमान अपने पड़ोसी किसी गैर मुसलमान से प्यार करेगा? कुरान की ऐसी बहुत सी आयतें हैं जो गैर मुसलमानों को यानि शैतान की संतानों को या शैतान की पार्टी के लोगों को खत्म करने की आज्ञा देती हैं। उन्हें जब 1924 में लाला लाजपतराय ने पढ़ा तो सी.आर. दास के लिए उन्होंने लिखा था-‘मैंने गत छह माह मुस्लिम इतिहास और कानून (शरीय:) का अध्ययन करने में लगाये। मैं ईमानदारी से हिंदू मुस्लिम एकता की आवश्यकता और वांछनीयता में भी विश्वास करता हूं। मैं मुस्लिम नेताओं पर पूरी तरह विश्वास करने को भी तैयार हूं। परंतु कुरान और हदीस के उन आदेशों का क्या होगा? (जो मानवता को खुदा की पार्टी और शैतान की पार्टी में विभाजित करते हैं।) उनका उल्लंघन तो मुस्लिम नेता भी नही कर सकते।’

इसीलिए भारत में समस्या के मूल पर प्रहार करने से बचकर झूठी ऊपरी एकता की बातें करने वालों को तथा हिंदू मुस्लिम के मध्य सांस्कृतिक रूप से स्थापित गंभीर मतभेदों को उपेक्षित करते हुए कई लोग जिस प्रकार अगंभीर और अतार्किक प्रयास करते हैं, उन्हें टोकते हुए ए.ए.ए. फैजी लिखते हैं-‘इस दिखावटी एकता के धोखे से हमें बचना चाहिए। परस्पर विरोधों के प्रति आंखें नही मूँद लेनी चाहिए। पुराने धर्मग्रंथों के उद्वरण दे देकर प्रतिदिन भारत वासियों की सांस्कृतिक एकता और सहिष्णुता का बखान नही करना चाहिए। यह तो अपने आपको नितांत धोखा देना है। इसका राष्ट्रीय स्तर पर त्याग किया जाना चाहिए।’

बात साफ है कि फैजी साहब हर उस मुसलमान को जो दुनिया को दो पार्टियों में बांटता है और शरीय: में विश्वास करता है, किसी भारत जैसे देश के लिए देशद्रोही मानते हैं, और शासन को उनके प्रति किसी प्रकार के धोखे में न आने की शिक्षा देते हैं। जो मुसलमान शरीय: में विश्वास नही करते उनकी देश भक्ति असंदिग्ध हो सकती है। पर उनकी संख्या कितनी है? चाहे जितनी हो वो अभिनंदनीय हैं। उनके दिल को चोट पहुंचाना इस लेख का उद्देश्य नही है।

परंतु एम.आर.ए. बेग क्या लिखते हैं? तनिक उस पर भी विचार कर लेना चाहिए। वह लिखते हैं-‘न तो कुरान और न मुहम्मद ने ही मानवतावाद (भारत के वास्तविक धर्म का) का अथवा मुसलमान गैर मुसलमान के बीच सह अस्तित्व का उपदेश दिया है। वास्तव में इस्लाम का…धर्म के रूप में गठन ही दूसरे सभी धर्मों को समाप्त करने के लिए किया गया है। इससे यह भी समझा जा सकता है कि किसी भी देश का संविधान जिसमें मुसलमान बहुसंख्यक हों, धर्मनिरपेक्ष क्यों नही हो सकता? और धर्मनिष्ठ मुसलमान मानवतावादी क्यों नही हो सकता?’

इसका अर्थ है कि एक मुसलमान को उसकी कट्टर धर्मनिष्ठा ही देशद्रोही और मानवता विरोधी बनाती है। इसीलिए बेग साहब अपनी पुस्तक ‘मुस्लिम डिलेमा इन इंडिया’ में आगे पृष्ठ 112 पर कहते हैं-‘वास्तव में कभी कभी ऐसा लगता है कि मुस्लिम आशा करते हैं, कि सभी हिंदू तो मानवतावादी हों पर वह स्वयं साम्प्रदायिक बने रहें।’

पृष्ठ 77 पर उसी पुस्तक में बेग साहब ने लिखा है-‘इस्लाम को निष्ठा से पालन करते हुए भारत का उत्तम नागरिक होना असंभव है।’

एम.जे. अकबर ने भारत के धर्मनिरपेक्ष बने रहने पर अच्छा विचार दिया है कि आखिर भारत धर्मनिरपेक्ष क्यों बना रहा है? इस पर वह लिखते हैं:-‘भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य इसलिए बना हुआ है कि दस हिंदुओं में से नौ अल्पसंख्यकों के विरूद्घ हिंसा में विश्वास नही करते।’भारत के बहुसंख्यकों का ऐसा विचार प्रशंसनीय है। राष्ट्र के नागरिकों के मध्य ऐसा ही भाव होना भी चाहिए। परंतु बात बहुसंख्यकों की नही है-बात अल्पसंख्यकों की है कि उन्हें कैसा होना चाहिए? उन्हें निश्चित ही बहुसंख्यकों के आम स्वभाव का अनुकरण करना चाहिए।

एम.सी. छागला साहब ‘रोजेज इन डिसेम्बर’ नामक अपनी पुस्तक के पृष्ठ 84 पर लिखते हैं-‘यदि किसी योग्य व्यक्ति की उपेक्षा अथवा उसको उन्नति से केवल इसलिए वंचित करना साम्प्रदायिकता है कि वह मुस्लिम, ईसाई या पारसी है तो यह भी साम्प्रदायिकता है कि उसकी नियुक्ति केवल इसलिए कर दी जाए कि वह इनमें से किसी अथवा किसी दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय से है।’

हामिद दलवाई ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स इन सैक्युलर इंडिया’ के पृष्ठ 29 पर लिखते हैं-‘जब तक मुस्लिम साम्प्रदायिकता को समाप्त नही किया जाएगा, हिंदू साम्प्रदायिकता कभी समाप्त नही की जा सकेगी। साम्प्रदायिक मुसलमान पूरे भारत को इस्लाम में धर्मान्तरित करने के अपने स्वर्णिम सपनों में इतने खोए हुए हैं कि कोई भी तर्क उनके व्यवहार को बदलने में सफल नही हो सकता। उन्हें यह विश्वास कराना आवश्यक है कि उनके इस दिशा में किये गये सभी प्रयास असफल होंगे और उनकी आकांक्षाएं कभी भी पूरा होने वाली नही हैं। सर्वप्रथम उनके भव्य सपनों का मोहभंग करने की आवश्यकता है।’ मुशीरूल हक अपनी पुस्तक ‘इस्लाम इन सैक्यूलर इंडिया’ के पृष्ठ 12 पर लिखते हैं-‘बहुत से मुसलमान ऐसा विश्वास करते हैं कि भारतीय शासन को तो धर्मनिरपेक्ष बना रहना चाहिए किंतु मुसलमानों को धर्मनिरपेक्षता से दूर ही रहना चाहिए।’

इस प्रकार बात स्पष्टï है कि जो मुसलमान देश में शरीय: कानून को देश के कानून से ऊपर रखने की बात करते हैं उनके विषय में जैसा कि ऐनीबीसेंट ने कहा है-कि ऐसी सोच राष्ट्र की स्थिरता के विरूद्घ विद्रोह है-ही सही है।

कुछ लोगों का तर्क है कि देश में हिंदू भी देशद्रोही काम करते पाए गये हैं, तो हमें उन देशद्रोहियों का भी पक्ष नही लेना है। हां, जो लोग ये मानते हैं कि खाद्य वस्तुओं में मिलावट करना भी देशद्रोह है, वो भूल में हैं-ये देशद्रोह नही अपितु एक अनैतिक और अवैधानिक कार्य है। देशद्रोह के लिए विद्रोह का भाव होना आवश्यक है, पूरे शांति प्रिय समाज के लिए एक चुनौती बन जाना आवश्यक है। जबकि अनैतिक और अवैधानिक कार्य करने वाले लोग मुनाफा कमाने के लिए चुपचाप अपनी व्यावसायिक गतिविधियों में संलिप्त रहते हैं। जब ऐसी गतिविधियों को किसी संगठन का, या सम्प्रदाय का, या समूह का संरक्षण मिल जाए तो तब वह अनैतिक और अवैधानिक कार्य भी देशद्रोह में सम्मिलित हो जाता है। जैसे हिजबुल मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे आतंकी संगठनों के कार्य तथा नक्सलवादियों के कार्य इत्यादि। सारे ऊपरिलिखित मुस्लिम विद्वान भारत देश के प्रति मुस्लिमों की आस्था को शरीय: के रहते संदिग्ध मानते हैं, अत: शरीय: के रहते देश के कानूनों का उल्लंघन, देश के आम समाज को शैतान की पार्टी मानना, देश में मुस्लिम शासन की स्थापना के सपने बुनना इत्यादि घातक इरादे देशद्रोह की श्रेणी में ही आते हैं। यदि कोई हिंदू भी देश के किसी भाग में देश के कानूनों से ऊपर अपना कानून चलाए या अपना राज्य स्थापित करने का सपना संजोए तो वह भी देशद्रोही है। चूंकि देशद्रोह देश की प्रभुसत्ता, एकता और अखण्डता को चोट पहुंचाने वाली किसी भी गतिविधि का नाम है। जबकि अनैतिक और अवैधानिक कार्यों में देश की प्रभुसत्ता, एकता और अखण्डता सुरक्षित रह सकती है और वो अनैतिकता और अवैधानिकता सदा देश के कानून से ही दंडित भी होती है। वह कभी स्वयं को देश के कानून से ऊपर घोषित नही करती, यद्यपि देश के कानून के लिए एक चुनौती अवश्य होती है। उससे देश का आम समाज आहत होता है परंतु आतंकित नही, जबकि देशद्रोहियों की गतिविधियों से जनसाधारण आतंकित रहता है-क्योंकि उनकी सोच आम समाज के सर्वथा विपरीत होती है, और कई बार आम आदमी के खून से होली खेलकर भी वो लोग अपनी बात की ओर आपका ध्यान खींच सकते हैं। उन्हें देश के आम समाज के विपरीत चलना ही अच्छा लगता है।

इसीलिए कुरान की मंशा के खिलाफ जाकर भी अधिकतर मुसलमान गाय कटवाते हैं, ताकि देश का बहुसंख्यक समाज उत्तेजित हो। बात किसी की सोच को कोसने की नही है बात शास्त्रार्थ अर्थात स्वस्थ चर्चा और चिंतन से स्वस्थ सामाजिक परिवेश की स्थापना करने की होनी चाहिए। उसके लिए गलत बातों को छोड़कर सही और राष्ट्रोचित बातों को अपनाना ही पड़ेगा। ‘गलत धारणाएं बदलो और भारत बदलो’ के आदर्श पर चलने से ही लाभ हो सकता है। देशद्रोही इस देश के मूल्यों से, संस्कृति से, और इतिहास से घृणा करने वाला और उन्हें मिटाने वाला हो सकता है। इस देश की भूमि को वह पुण्य भू: और पितृ भू: न मानने वाला होता है, जबकि एक अनैतिक और अवैधानिक कार्य करने वाला इन सबके प्रति स्वाभाविक रूप से आस्थावान हो सकता है, वह इन चीजों से कोई समझौता नही कर सकता जबकि देशद्रोही सबसे पहले इन पर ही प्रहार करता है। गाय का मांस हिंदू के द्वारा खाना भी एक अनैतिक कार्य है, यह बात देशभक्ति से जोड़कर नही देखी जा सकती। क्योंकि ऐसा करने वाला अपने देश, धर्म और संस्कृति के प्रति आक्रामक लोगों के खिलाफ कई बार स्वयं भी आक्रामक होता है।

 

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23 Comments on "मुस्लिम विद्वानों की दृष्टि में: देशद्रोही कौन?"

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Saleem Ahmed
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R. Singh ji aapka thnaks ki aap ne kafi kuch gayan banta is post pe

​शिवेंद्र मोहन सिंह
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​शिवेंद्र मोहन सिंह

ज्ञान बांटा या अपनी मुस्लिम परस्ती दिखाई? ऐसे लोगों को ही जयचंद कहा जाता है।

आर. सिंह
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​शिवेंद्र मोहन सिंहजी, आपकी इस टिप्पणी पर नज़र ज़रा देर से पड़ी. क्या आवश्यक है कि सब आपके विचारों से सहमत हों? विपरीत विचार रखने वालों को गाली देने का संस्कार आपने कहाँ से पाया? ऐसे इस तरह की टिप्पणी का मुझ पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ता,पर इससे आप जैसों के संस्कार अवश्य उजागर हो जाते हैं.

शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह
सिंह साहब बिलकुल दुरुस्त बात कही है आपने, सहमत तो हम एक घर में भी नहीं हो पाते हैं, लेकिन जिनके खिलाफ भारतियों ने १२०० सालों से तलवारें उठा रखी हैं, उनके संग गलबहियां डालेंगे तो ऊंचनीच तो जरूर सुननी पड़ेंगी। क्या आप एक भी ऐसा देश बता सकते हैं जहाँ मुस्लिम धर्म अहिंसा के बल पर गया है? राकेश भाई ने जिन किताबों का सन्दर्भ दिया है कम से कम उन किताबों को ही पढ़ लेते, तो मुस्लिम धर्म का मर्म समझ में आ जाता। और भारत पर आक्रमण करने वालों को आप भूल सकते हैं मैं नहीं। पुराने… Read more »
आर. सिंह
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शिवेंद्र मोहन जी,अपनी बात को सिद्ध करने के लिए गलथेथरी पर तो मत उतरिय. आप कैसे कहते है कि भारतीयों (?) ने किसी के खिलाफ १२०० वर्षों से तलवारें उठा रखी है? यह लगता है कि आपका अपना गढ़ा हुआ इतिहास है. राजपूतों की शौर्य गाथा मत दोहराने लगिएगा,क्योंकि भारत को जंजीर ईन लोगों का हाथ आरम्भ से ही रहा है.उसके दोषी जयचंद ही नहीं पृथ्वी राज भी है.उसके दोषी मान सिंह ही नहीं राणा सांगा भी हैं. मैं पूछता हूँ,पृथ्वी राज ने क्या सोचकर अपने मौसेरे भाई की बेटी को स्वयंबर से उठा लिया था? कौन बाप इसकी बर्दास्त… Read more »
इफ्तेख़ार अहमद
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इस्लाम आतंक ? या आदर्श भारत का विश्‍वगुरू बनना अब कितना आसान ? एक ऐसी सच्‍चाई जिसे जानता हर कोई है लेकिन मानने के लिये वही तैयार होता है जिसका ज़मीर जिन्‍दा है, इस्‍लाम मारकाट आतंकवाद की शिक्षा देता है इस बात का प्रचार होने से अच्‍छे भले दिमाग में गलतफहमियां जड़ पकड़ चुकी हैं, जिसने हिन्‍दू मुस्लिम एकता को कमजोर ही किया है, स्‍वामी लक्ष्मीशंकराचार्य जी ने उन सभी गलतफहमियों के मूल पर प्रहार करके हिन्‍दू मुस्लिम एकता को मजबूत किया है, जिस दिन दोनों समुदायों के बीच से गलत फहमियों और नफरतों का सफाया सचमुच हो जायेगा भारतीय… Read more »
इफ्तेख़ार अहमद
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( 18 ) ————————————————————————————————- किया तथा अपना वतन छोड़ने को मजबूर किया था । आज वे ही मक्का वाले अल्लाह के रसूल के सामने ख़ुशी से कह रहे थे – “ला इला-ह इल्लल्लाह मुहम्म्दुर्रसूलुल्लाह ” और झुंड के झुंड प्रतिज्ञा ले रहे थे : ” अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अश्हदु अन्न मुहम्म्दुर्रसूलुल्लाह” ( मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद ( सल्ल० ) अल्लाह के रसूल हैं । ) हज़रत मुहम्मद ( सल्ल० ) की पवित्र जीवनी पढ़ने के बाद मैंने पाया कि आप ( सल्ल० ) ने… Read more »
इफ्तेख़ार अहमद
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( 40 ) ————————————————————————————————- डर हो कि काफ़िर लोग तुमको ईज़ा ( तकलीफ़ ) देंगे । बेशक काफ़िर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं ।” -कुरआन, पारा 5 , सूरा 4 , आयत-101 इस पूरी आयात से स्पष्ट है कि मक्का व आस-पास के काफ़िर जो मुसलमानों को सदैव नुक़सान पहुँचाना चाहते थे ( देखिए हज़रत मुहम्मद सल्ल० की जीवनी ) । ऐसे दुश्मन काफ़िरों से सावधान रहने के लिए ही इस 101 वीं आयात में कहा गया है :- ‘कि नि:संदेह ‘ काफ़िर ‘ तुम्हारे खुले दुश्मन हैं ।’ इससे अगली 102 वीं आयात से स्पष्ट हो जाता है जिसमें अल्लाह… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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आपकी बात बहुत ही तर्क सनगत है तथा आपके मजहब का बहुत अच्छा बचाव या कहूँ तो सही व्याख्या है आपके अनुसार ,पर प्रश्न ये है की इतिहास क्या कहात है??वर्तमान क्या कहता है ??इतिहास में ये प्रमाण है की खुद इस्लाम को बनाने वाले ने कही मूर्तियों को तोड़ा या तोड़ने की आज्ञा दी ,इतिहास इस बात का प्रमाण है की जत्थे के जत्थे हमारे देश में आते थे हमारे मंदिरों को तोड़ने मूर्ति को विखंडित करने ,हमारा कत्ले आम करने हमको जबरदस्ती से इस्लाम अपनाने को मजबूर करने ,और अभी तक मुझे एस एक भी अतंग वादी नहीं… Read more »
​शिवेंद्र मोहन सिंह
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​शिवेंद्र मोहन सिंह

फिर राष्ट्र गान गाने में परहेज क्यों ? १ घंटे में हिन्दुओं का सफाया करने की बातें क्यों (हैदराबाद प्रकरण )? बर्मा के दंगों को लेकर शहीद समारक पे तोड़ फोड़ क्यों? कश्मीर से हिन्दुओं की सफाई क्यों ? अमरनाथ यात्रा पे हमले क्यों ?

उपरोक्त बातें और करनी में जमीन आसमान का फर्क क्यों ? है कोई जवाब?

राकेश कुमार आर्य
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अहमद साहब, आपने मेरा ज्ञानवर्धन किया इसकी लिए आपका धन्यवाद। लेकिन आपने विषयांतर कर दिया है। चर्चा कुछ और थी। आपने स्वंय स्वीकार किया है कि इस्लाम कि लड़ाई बहू देवतावादियों से है-तो क्या आप बताएँगे वो बहुदेवतावादी कौन है? पाकिस्तान में इन बहू देवतावादियों की करोड़ों कि संख्या आज लाखो में सिमटकर रह गई है,तो क्या आप नहीं मानते कि वहाँ उन बहू देवतावादियों के साथ आज भी घोर अत्याचार हो रहें है। भारत में आजादी के समय जीतने मुसलमान थे उनके पाँच छह गुना मुसलमान यहाँ हो गया,तो क्या आप नहीं मानते कि हिन्दू स्वभावत कितना शांतिपूर्ण सह… Read more »
इफ्तेख़ार अहमद
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राकेश कुमार आर्य जी मई एक लिंक भेज रहा हूँ उसे क्लिक कर इस छोटी सी ऑनलाइन बुक को ज़रु पढ़े मुझे उम्मीद है की आपको ज्ञान लाभ की प्राप्ति होगी.

http://siratalmustaqueem.blogspot.in/2010/09/blog-post_15.html

Dr. Dhanakar Thakur
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लेख में अनेक तर्क से एक स्पष्ट बात रखी गयी है की भारत में सर्वधर्म समभाव की बातें करते हुए हिंदू मुस्लिम ईसाई के भाई भाई होने की बात कही जाती है जबकि हिन्दू के बांकी विरोधी हैं । हिंदुत्व ने संसार में मानवतावाद फैलाया और इसी को मानव धर्म के रूप में स्थापित किया। ब्रह्मापुत्र सनक ,सनंदन ,सनातन ,सनत का बताया मार्ग सदाचार है जिस के विरोधी दुष्टों को ही दैत्य, असुर, राक्षस, अनार्य जैसे शब्दों से हमारे यहां पुकारा गया है। आज की प्रचलित परिभाषा में जिन्हें धर्म समझा जाता है वो धर्म नही अपितु सम्प्रदाय हैं। हर… Read more »
राकेश कुमार आर्य
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डाक्टर धनाकर जी, आपकी प्रतिकृया के लिए धन्यवाद। विखंडित मानसिकता और खंडित मानवता को आज जोड़ने की आवश्यकता है लेकिन यह जुड़ाव ऊपरी-ऊपरी मीठी-मीठी बातें करने से नहीं बनेगा हर मत,पंथ,संप्रदाय अपनी-अपनी सर्वोच्ता के झंडे लिए खड़ा है उसमे से गंभीरता के साथ अच्छी बातों को हमें ग्रहण करना होगा मानवता के हिट में इससे बेहतर कोई बात नहीं हो सकती। वेद ज्ञान के आदि स्रोत है।उनके ज्ञान की पवित्रता को कोई भंग नहीं कर सकता। वेद किसी संप्रदाय को बढ़ावा नहीं देते और ना ही संप्रदाय खतम करने की आज्ञा देते हैं इसलिए मेरे इस तत्व को विज्ञान की… Read more »
आर. सिंह
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राकेश कुमार जी,बहुत दिनों पहले मैने एक पुस्तक पढ़ी थी,इस्लाम: चैलेंज टू रेलिजन .हमलोग जिस तरह कहते हैं कि हिंदुत्व कोइ धर्म या रेलिजन नहीं,यह तो एक जीवन पद्धति है,उसी तरह उस पुस्तक में भी विभिन्न उदाहरणों द्वारा यह प्रमाणित करने की चेष्टा की गयी है कि इस्लाम कोई धर्म या मज़हब नहीं, वह तो आदर्श जीवन जीने की एक पद्धति है. मुझे लेखक तर्क असंगत नहीं लगे. बात आकर रूकती है देश प्रेम और देश भक्ति पर. मेरे ग्यानानुसार हिंदू धर्म मानवता और विश्व वंधुत्व पर तो बहुत ज़ोर देता है,पर हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों में मुझे राष्ट्र पेम… Read more »
राकेश कुमार आर्य
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आर सिंह जी, चौदह सौ वर्ष से इस्लाम बहुदेवतावादियों को धरती से खतम करने के लिए जिहाद कर रहा है लेकिन वह अपने उद्देश्य में अभी तक सफल नहीं हुआ है परिणाम अब ये आ रहा है कि इस्लाम और इसाइयत दो परस्पर विरोधी खेमो में विश्व विभाजित हो गया है यानि अगले चौदह सौ वर्ष तक दुश्मनी के नए दौर की नई शुरुआत।वैसे इस्लाम और इसाइयत पूर्व में भी लगातार तीन सौ वर्षों तक युद्ध लड़ चुके है। परिणाम क्या निकला सिवाय नफरत को बढ़ावा देने के। मझाब की खासियत ही ये होती है कि वह आपस में बैर… Read more »
yash rattan Devgon
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मुस्लिम मजहब के अनुसार ३ तरह के जिहाद होते हैं, उनमे से एक जिहाद, ‘जिहाद बिल सैफ है’ जिहाद बिल सैफ उस समय वाजिब है जब दुश्मन ने देश पर हमला कर दिया हो | मुस्लिम मजहब की पुस्तकों के अनुसार खुद को किसी भी तरह मारना (suicide) या किसी दुसरे को देश में शांति के समय मारना कुफर है | स्वार्थी लोग अपने फायदे के लिए जवान मुस्लिम लोगों को उनके सही रास्ते से भटकाते हैं कि, अमुस्लिम लोगों को मारने से उनको जन्नत में स्थान मिलेगा लेकिन यह मजहब के अनुसार गलत है क्योंकि बेकसूर लोगों को मारने… Read more »
आर. सिंह
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सभी विद्वत गणो से क्षमा याचना के साथ यह अल्पज्ञानी यह अर्ज़ करना चाहता है कि मेरे विचारनुसार कोई भी धर्म ग्रंथ युग की वाणी भी बोलता है और युग युग की वाणी भी. मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि धर्म ग्रंथ जिस काल में ,जिन परिस्थितियों में लिखा गया है,उन परिस्थितियों का प्रभाव उन पर साफ दृष्टिगोचर होता है. इसको मद्दे नज़र अगर धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा किपरिस्थियों और काल के प्रभाव से कोई भी धर्म ग्रंथ अछूता नहीं रहा है. इसीलिए वेदों में कही हुई बहुत सी बातें आज शायद ठीक नहीं… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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आप वास्तव में ही अलाप ग्यानी है जो आपको भारतीय शास्त्र में राष्ट्र प्रेम नहीं मिला ,अरे क्या हमारे राम व् कृष्ण चुरन खाने के लिए भारत के कोने कोने में शास्त्र लिए राक्षसों को मारते थे क्या आपने नहीं पढ़ा ??”आपि स्वर्ण मयि लंका न में लक्ष्मण रोचते जननी जन्म भुमिश्य च : स्वर्गादपि गरीयसी ” क्या अपने नहीं पढ़ा शस्त्रेण रक्षम राष्ट्रं ,आपने नहीं पढ़ा भीष्म को वो वाक्य जो बहुत ज्यादा प्रसिद्द है राष्ट्र की सीमाए वस्त्र के सामान होती है जिनकी रक्षा करना हमारा {पुत्र } धर्म है “………………आप को फर्जी लेखकों को छोड़ कर पहले… Read more »
आर. सिंह
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मैं तो अग्यानि हूँ ही और अबतो उस पर आप जैसे ग्यानियो ने मुहर भी लगा दी,पर मैं अपने आप को कोस रहा हूँ कि आपने जो उदाहरण दिए,वह भी थोड़ा ही मेरी ग्यान वृद्धि कर सका. भागवत गीता तो मैने पढ़ी है मेरे विचार से कृष्ण के असल रूप के दर्शन वहीं होते हैं. उसके साथ महाभारत का युद्ध भी जुड़ा हुआ है. पहली बात तो यह है कि यह दो राष्ट्रों के बीच संघर्ष नहीं थ. कृष्ण ने भी यही कहा था: यदा यदा धर्मस्य ग्लानिर भवति भारत. अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मांम सृजाभ्यहम. इसमे राष्ट्र शब्द तो कहीं भी… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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इसे ही कहते है असली कम्युनिस्ट बुद्धि ,जो अपने सीमित ज्ञान को ही सब कुछ मानती है और जब कोई तर्क भी दिया जाए तो सुनना नहीं ,कृष्ण भारत मे ही क्यू राक्षसो को मारते है???वो चाहे तो पूरे विश्व मे जहां भी है वहाँ जाकर मार दे??राम को भारत के गाँव गाँव घूम घूम कर निशाचरों को मारने की क्या जरूरत पड़ी??अयोध्या से दक्षिण भारत बहुत दूर है बहुत दूर ,अपना वनवास तो आराम से छतीस घर मे काट लेते ??आज्ञा भी ये ही थी डंकरण्य जाओ ,फिर??ये तरुक क्या है जन्म भूमि कोई भी हो सकती है ??गाँव… Read more »
आर. सिंह
Guest
आप जैसे लोगों के साथ यही मुसीबत है. आपलोग जब कुछ समझ में नहीं पाते है तो किसी को वाम पंथी और किसी को दक्षिण पंथी मान लेते हैं. संस्कृत का ज्ञान नहीं के बराबर है,अतः यह तो नहीं कह सकता कि मैने मूल गीता का अध्ययन किया है,पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मैने हिन्दी अनुवाद सहित एक से अधिक बार गीता का अध्ययन किया है. अगर आप कहते हैं तो मैं फिर से उसको पढ़ने का प्रयत्न करता हूँ. गीता पर तीन पुस्तकें अभी भी मेरे पास हैं.१. गीता रहस्य.२ गीता ऐज इट इज.३. भागवत गीता फार… Read more »
अभिषेक पुरोहित
Guest

माता के वस्त्र ,

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