लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर शादाब

आज हिन्दुस्तान की हर सियासी पार्टी मुसलमान के आरक्षण, तालीम,उन के रहन सहन, उन के जिंदगी जीने के गिरते स्तर पर चिंतित दिखाई दे रह है। पर मेरा मानना और सोचने के साथ ही देश की तमाम सियासी पार्टियो से ये भी कहना है कि अरे भाई मुस्लिमो को कोई आरक्षण वारक्षण नही चाहिये, अगर हो सके तो उसे रोज रोज विभिन्न इस्लामिक संस्थाओ से मिलने वाले इन फतवो से बचाया जाये यदि मुसलमान इन फतवो से बच गया तो वो खुद ही तरक्की कर लेगा। आज का अनपढ गरीब मुस्लिम नौजवान पाकी नापाकी तक को नही जानता। कलमो को दोहरा नही सकता। नमाज याद नही। कुरान उसने पढा नही। निकाह हो गया पर बीवी के क्या क्या हकूक है शौहर के क्या क्या हक है उसे पता नही,हाँ उसे अपना एक हक पता है जिस वो रोज पूरा करता है बीवी चाहे पाक हो या नापाक। बच्चो की तादाद में कमी ना आने पाये उन्हे तालीम, रोटी,कपडा मिले या ना मिले। ऐसे में इन अनपढ मुस्लिम लोगो पर फतवो का क्या वजूद। फतवा तो तंकवे वाले कट्टरपंथी मुसलमानो के लिये सही है क्यो कि उन की पूरी जिंदगी कुरान और हदीस पर है। क्यो बेवजह रोज रोज नये नये फतवे दे देकर इस्लाम को बदनाम किया जा रहा है। क्यो इस्लाम मजहब का मजाक उडाया जा रहा है हमारे उलेमाओ को समझना चाहिये। मुसलमानो के एहतेमाद का सब से पुराना इस्लामिक मरकज दारूल उलूम देवबन्द को दुनिया के तमाम मुसलमान मानते है यही वजह है कि वक्त वक्त पर इस इदारे से मुस्लिम हजरात राय मश्वरा लेते रहते है। लेकिन वक्त और माहौल के हिसाब से इस पर किस तरह काबू पाया जाये,अमल किया जाये आज इस पर सोचना बेहद जरूरी हैं आज ज्यादर मुसलमान वक्त के हिसाब से चल रहे है और बदल रहे है फतवा देते वक्त इस बात का ध्यान क्यो नही दिया जाता कि ये आज के दौर के लिहाज से है या नही इस पर अमल हो सकता है या नही।

हम सब जानते है हिन्दुस्तान इस्लामिक मुल्क नही है यहा शरिया कानून नही चलता, ऐसे मुल्क में हमारा किरदार हमारे जिन्दगी जीने के तौर तरीके कैसे हो इस पर हमे संजीदगी से सोचना चाहिये। शरीअत के हिसाब से क्या आज का मुसलमान सरकारी दफतरो में काम कर सकता है तहमद या टखनो से ऊपर पाजामा पहन कर कही आ जा सकता है रिश्वत अगर वो ले भी नही तो क्या आज हिन्दुस्तान में रिश्वत दिये बगैर उस का काम चल सकता है। आज जब मुसलमान तालीम, रोजगार,बेहतर जिन्दगी और मुल्क की तरक्की में अपना अहम किरदार निभा रहे है जिन लोगो ने कुरान और हदीस का मुताला किया है उन्हे ये बताने की जरूरत नही कि पैगम्बर हजरत मौहम्मद सल0 के जमाने में भी औरते अहम किरदार निभाया करती थी। इस जमाने में होने वाली जंगो में औरते आगे आगे रहती थी करबला इस की बेहतर मिसाल है वही हूजूर की पहली बीवी मोहतरमा खतीजा अपने जमाने की बेहतरीन ताजिर (व्यापारी, थी।

सऊदी अरब में सऊदी एयरलाईन्स में लडकिया एयर होस्ट्रिज से लेकर काउंटर, हवाई जहाज की तमाम जिम्मेदारियां सभालती है इस बात को तमाम मुसलमान हज यात्रा पर जाते हुए अपनी ऑखो से देखते है जिन में उलेमा भी होते है कुवैत, मिस्र, ईरान, ईराक, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया की पार्लियामेन्ट में औरते कानून बनाने में सरकार को महत्तवपूर्ण योगदान दे रही है सऊदी अरब में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की तमाम मुस्लिम औरते नौकरी पेशा है वहा ये फतवो का बखेडा क्यो खडा नही होता जब कि सऊदी अरब, कुवैत, मिस्र, ईरान,मलेशिया में तो शरई इस्लामिक कानून है। पर्दे की बाध्यता के फतवे से मुस्लिम औरतो की तरफ से इस का विरोध भी हो रहा है। ये सही है कि पर्दे के लिये कुरान और अल्लाह के रसूल का हुक्म है हर हालत में औरत के लिये पर्दो जरूरी है यह कोई बंदिश नही बल्कि औरत को महफूज रखने के लिये उसे खूबसूरत लिबास दिया गया है। लेकिन वक्त जरूरत के हिसाब से क्या आज इस में थोडा बदलाव जरूरी नही ।

आज तालीम और सरकारी नौकरियो में मुस्लिम किस कदर पिछड चुका है ऊपर से ये फतवे। क्या कल हम उम्मीद लगाये कि हमारी बेटी डाक्टर, इन्जीनियर, आई एस, पीसीएस ,या किसी और पद पर बैठ सकती है नही बिल्कुल नही। आखिर क्या मुसलमान को वक्त के हिसाब से बदलना नही चाहिये। क्या वक्त के हिसाब से मस्जिदे नही बदली उलेमा नही बदले हमारे सफर करने और जिन्दगी जीने के तरीके नही बदले। कुन्बा पाबन्दी को इस्लाम ने सख्ती के साथ मना किया है पर क्या मुसलमान इस पर अमल कर रहा। शराब को इस्लाम ने हराम करार दिया है पर क्या मुसलमान शराब नही पी रहा और जो लोग इस गुनाह में मुलव्विज है उन के साथ हमारे रिश्ते नही है उन के साथ हम लोग खाते पीते नही। जात पात की इस्लाम में कोई जगह नही पर क्या कोई मुसलमान ऐसा सोच रहा है बेटियो के रिश्ते तलाशते वक्त क्या हम लडका दीनदार तकवे वाला देखते है शायद नही। हम लोग पैसे वाला अपनी बिरादरी वाला सूट बूट स्मार्ट कलीन शेव माडर्न जमाने का ढूढते है सरकारी नौकर हो ऊपर की आमदनी अच्छी हो तो क्या कहने। फिर शरई और शरअत का ढिढोरा क्यो पिटा जा रहा है। टीवी देखना घर में रखना हराम है पर रोज नये नये इस्लामिक चैनल बाजार में आ रहे है उलेमाय-ए-दीन कैमरो के सामने बैठकर खूब तकरीरे कर रहे है कुछ इस्लामिक चैनलो पर तो औरते पूरा पूरा सोलाह श्रृंगार कर मुंह खोलकर दीन और इस्लाम की दुहाई देती है।

आज इस्लाम बदलाव मॉग रहा है। लेकिन ऐसा नही कि इस्लाम और हमारे बुजुर्ग रूसवा हो जाये। बल्कि ऐसा बदलाव जिस से मुसलमान तरक्की करे और मुआशरे में सर उठा कर जी सके। दूसरी कौमो के लोग उस पर फब्तिया ना कसे मुसलमानो के बच्चे और बच्चिया भी डाक्टर इन्जीनियर बने। पढ लिखकर कुरान और हदीस को समझे।

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5 Comments on "फतवों में घुटता मुस्लिम समाज"

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rp agrawal
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शादाब्जी, में आठ महीने पहले दुबई गया था मेरे मन में विचार ये था की एक दकिया नुशी कोम के देश में जा रहा हू ! दुबई चार दिन रुका था !मेने मह्सुश किया की भारत के मुसलमानों से यहाँ के मुस्लमान शालीन है तहजीब है अन्य धर्मो के प्रति सहिष्णु है फिरका परस्ती से दूर है !मेने मेरे अनुभव मेरे दोस्तों में बाटें मेरा एक दोस्त इरान एवमकुवेत के अनुभव सुनाये बोला दोनों देशो के मुस्लमान प्रगतिशील है व्यापारिक बुधिवाले है ! वेज्ञानिक उपलब्धियों का पूरा उपयोग करते है अनुशासन में तो अग्रेजो को भी मात देते है चोरिया… Read more »
Jeet Bhargava
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पढने लायक उम्दा लेख.

Anil Gupta
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भाई शादाब, आपके इन खुले और तरक्कीपसंद विचारों को यदि अधिकांश मुस्लिम समाज मान ले तो इस देश में मुसलमानों के नाम पर सियासत करने वाले नेताओं की दुकानें बंद हो जाएगी. दिक्कत ये है की पाकिस्तान के बनने के बाद जो मुस्लमान हिंदुस्तान में रह गए वो इस देश के बनकर रहना चाहते थे लेकिन सियासी सौदागरों ने उन्हें इस कदर निचोड़ा है की वो आज तक अपने को इस देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं के साथ सही तरीके से एडजस्ट नहीं कर पाया है. आख़िरकार इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता है की इस देश के रहने… Read more »
GGShaikh
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शादाब साहब का दर्द सही है और विमलेश जी की टिपण्णी भी…
मुस्लिम समाज को दीनी व दुनयावी इल्म उनकी उम्र व समझ के स्टेज दर स्टेज मिले…
दूसरा, मुस्लिम समाज में दुनियवी इल्म-तालीम पहुँचाने के ‘ज़रिये’ और बढाए जाए… ताकि उनके जीवन को नए नज़रिए, विस्तार मिलते रहे.

vimlesh
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शादाब जी विशिष्ट अन्तः विवेचन जब तक उपरोक्त बातो पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तब तक इश्लाम का कोई भला नहीं होने वाल उलटे नुकसान ही होगा .

मै आपकी ही बातो में एक बात और जोड़ना चाहुगा दीनी तालीम हासिल करना कराना गलत नहीं है किन्तु उसे हासिल करने की एक परिपक्व उम्र होनी ही चाहिए वो चाहे वो १८-२० वर्ष की उम्र हो या ३०-४० की, न की ५-६ वर्ष के अबोध बालक .

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