लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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-राकेश कुमार आर्य-
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भारत के लोकतंत्र को बिकाऊ घोड़ों की मण्डी बनाने वालों और यहां आम चुनावों में मिलने वाले जनादेश की मनमानी व्याख्या करके सिरों की गिनती के आधार पर लोकतंत्र के साथ ‘क्रूर उपहास’ करने वाले लोगों के लिए वास्तव में ही सोचने का समय है। 16वीं लोकसभा में देश के मतदाताओं ने जिस परिपक्वता के साथ अपना जनादेश दिया है, उससे कई बातें स्पष्ट हो गयीं हैं। सर्वप्रथम तो ये कि इस देश में लोकतंत्र की जड़ें बड़ी गहरी है, दूसरे ये कि यहां का मतदाता और विशेषत: युवा वर्ग बहुत ही विवेकशील और जागरूक है, तीसरे ये कि जनता जनार्दन है और उसके दिये जनादेश की अब कोई अनुचित, अतार्किक और अलोकतांत्रिक व्याख्या नही कर सकता।

इन अनुचित, अतार्किक और अलोकतांत्रिक व्याख्याओं के कारण ही हमें चरण सिंह, चंद्रशेखर, गुजराल और देवेगौड़ा जैसे प्रधानमंत्री मिले। जब किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नही मिलता था तो तब यहां किसी ‘देवेगौड़ा’ को तलाशकर खण्डित जनादेश के टुकड़ों को एक साथ जोड़कर उसे ‘अखण्ड-ज्योति’ के रूप में स्थापित कर देश की जनता से पुजवाने का अप्राकृतिक कृत्य किया जाता रहा है। अप्राकृतिक इसलिए कि टुकड़े दरार का प्रतीक होते हैं और दरार से कभी अखण्डित प्रतिमा का निर्माण नही हो सकता। पर यहां कई बार दरारों से अखण्डित प्रतिमा बनायी गयीं। अब फिर ऐसी ही किसी ‘अखण्डित-प्रतिमा’ के निर्माण के लिए मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता जैसे इस खेल के कुछ कुशल खिलाड़ी सक्रिय थे, ये तीसरे मोर्चे के नाम पर देश में फिर से कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो एकदम असंवैधानिक होता, पर दिखायी देता पूर्णत: कुछ असंवैधानिक ही। इसलिए देश की जनता ने स्पष्ट जनादेश देकर देश की लोकतांत्रिक परंपराओं व आदर्शों के इन घोर शत्रुओं की इच्छाओं और योजनाओं पर तुषारापात कर दिया है। इसके लिए देश की जनता ने मुलायम सिंह यादव, मायावती, ममता, जयललिता, नीतीश कुमार, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव आदि को उनकी हैसियत बता दी है कि देश के भाग्य निर्माता वे नहीं, बल्कि देश की सवा अरब की जनता है। देश की जनता ने कड़े शब्दों में इन नेताओं को अपना आदेश सुनाकर जो पीड़ा दी है, उससे ये अगले 5 वर्ष भी नहीं उभर पायेंगे। जिसके सपने मर जायें, या जिसकी योजनाओं पर उसके जीते जी पानी फिर जाए, इसकी पीड़ा को बस वही जानता है।

वैसे जहां तक खण्डित जनादेश के मिलते रहने की बात है तो इंदिरा गांधी के बाद से ही देश अखण्ड नेतृत्व को ढूंढ़ रहा था। राजीव गांधी को एक पूर्ण पुरूष मानकर यह जनादेश दिया गया, पर देश की जनता को शीघ्र ही उनकी अपूर्णताओं का ज्ञान हो गया। उसके पश्चात कुछ सीमा तक अटल जी को इस योग्य माना गया, परंतु तब तक भाजपा का इतना विस्तार नहीं हो पाया था, इसलिए अटल जी स्वयं खण्डित जनादेश को जोड़-तोड़ कर शासन करते रहे। दूसरे, ‘गठबंधन अधर्म’ निर्वाह के प्रवाह में वे अपने लिए नियत किये गये राष्ट्रधर्म के निर्वाह में या तो चूक कर गये या प्रमोद महाजन जैसे उनकी परामर्शदात्री सभा के लोगों ने उनसे चूक करा दी। इसलिए वह भी पूरे देश के लिए सम्माननीय होने के उपरांत भी देश की जनता के लिए ‘अखण्ड नेतृत्व’ देने में सफल नहीं रह सके।

अब बहुत देर के बाद देश को एक ‘अखण्ड नेतृत्व’ मिला लगता है। जनता ने परखकर मोदी को अपना नेता बताया है। हमारा मानना रहा है कि देश को अब तक ‘खण्डित जनादेश’ नहीं मिलता था, बल्कि खण्डित जनादेश के नाम पर खंडित नेता मिला करता था। ऐसा नेता जिसकी क्षेत्रीय या प्रांतीय छवि होती थी। ऐसे ‘देवेगौड़ाओं’ से उसके सहयोगी दल मिलकर सत्ता में भागीदारी किया करते थे और देश की सत्ता के संचालन हेतु एक ‘पार्टनरशिप डीड’ (न्यूनतम सांझा कार्यक्रम) तैयार करके सत्ता में अपने-अपने अंशों के अनुसार सत्ता साधनों का दुरूपयोग किया करते थे। यह स्थिति देश के लिए बहुत ही शर्मनाक थी। लोकतंत्र के जनाजे में पड़े ये कीड़े देश को खा रहे थे और किसी को पता भी नही था कि ये क्या कर रहे हैं?

‘देवेगौड़ाओं’ को अपनी कुर्सी की चिंता रहती थी इसलिए वह सब कुछ जानकर भी अनजान बने रहते थे। अटलजी के काल में स्थिति कुछ दूसरी थी, उनका व्यक्तित्व ऐसे देवेगौड़ाओं से ही नहीं अपितु नेहरू और इंदिरा से भी कई मायनों में ऊंचा था, इसलिए उनके कार्यकाल में सत्ता के साधनों का अंश तय करके दुरूपयोग करने का साहस लोगों को नही हुआ। पर जब मनमोहन सिंह गद्दी पर बैठाये गये तो स्थिति में एकदम दुखद परिवर्तन आया। इनके काल में सत्ता के साधनों का दुरूपयोग ही नही किया गया, बल्कि राजनीतिज्ञों द्वारा और सहयोगी राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता को अपनी बपौती ही मान लिया गया। परिणामस्वरूप मनमोहन मरी हुई जमीर के मालिक बनकर केवल सत्ता प्रतिष्ठानों को नोंच नोंचकर खाने वाले गिद्घों को मौन रहकर देखने का काम करते रहे और उनका साहस इतना भी नहीं होता था कि देश की आत्मा और जिगर को खाने वाले गिद्घों को ‘हट परे’ तो कह दी देते। नेता के लिए इससे अधिक शर्मनाक स्थित कोई नहीं हो सकती थी। अब तक देश को नेता मिलता नही था, बल्कि दिया जाता था। पर इस बार देश की जनता ने लोकसभा में 335 सीटों का प्रचण्ड बहुमत देकर अपना नेता स्वयं चुना है। नेता ने जनता को और जनता ने नेता को आंखों ही आंखों में समझ लिया और हमने देखा कि मोदी ने चुनाव प्रचार के समय देश की जनता की इस मानसिकता का पूरा लाभ उठाया। इसीलिए उन्होंने देश की जनता से सीधा संवाद स्थापित किया और मंच व जनता के बीच की दूरी को मिटाकर रख दिया। मानो जनता भी यही चाहती थी। अत: उसने भी अपना भरपूर सहयोग मोदी को दिया। इतनी भारी संख्या में मतदान किया गया कि पिछले सभी कीर्तिमान ध्वस्त हो गये। टुकड़ों को जोड़ जोड़कर या दस्सी पंजी इकट्ठी करके तीसरे चौथे मोर्चे या किसी गठबंधन को सिरों की गिनती बनाने या बिगाडऩे का अवसर ही नेताओं को इस बार नही दिया गया। सबने मान लिया कि इस बार मोदी सरकार। मोदी के साथ जो क्षेत्रीय दल इस समय राजग में है, उनकी स्थिति पर भी विचार करें। इसे हम यूं समझ सकते हैं कि अटल जी को जो राजग सहयोगी मिले थे वे उनके सहारे थे, पर संप्रग के सहयोगी दलों के लिए मनमोहन बेचारे थे और अबकी बार के राजग सहयोगियों के लिए मोदी आसरे हैं। बस, इसी अंतर के कारण मोदी देश में खण्डित जनादेश को अखंडित नेतृत्व के रूप में बांधकर प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं।

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