लेखक परिचय

अतुल तारे

अतुल तारे

सहज-सरल स्वभाव व्यक्तित्व रखने वाले अतुल तारे 24 वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। आपके राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और समसामायिक विषयों पर अभी भी 1000 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से अनुप्रमाणित श्री तारे की पत्रकारिता का प्रारंभ दैनिक स्वदेश, ग्वालियर से सन् 1988 में हुई। वर्तमान मे आप स्वदेश ग्वालियर समूह के समूह संपादक हैं। आपके द्वारा लिखित पुस्तक "विमर्श" प्रकाशित हो चुकी है। हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी व मराठी भाषा पर समान अधिकार, जर्नालिस्ट यूनियन ऑफ मध्यप्रदेश के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, महाराजा मानसिंह तोमर संगीत महाविद्यालय के पूर्व कार्यकारी परिषद् सदस्य रहे श्री तारे को गत वर्ष मध्यप्रदेश शासन ने प्रदेशस्तरीय पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया है। इसी तरह श्री तारे के पत्रकारिता क्षेत्र में योगदान को देखते हुए उत्तरप्रदेश के राज्यपाल ने भी सम्मानित किया है।

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-अतुल तारे-

sonia rahul
एक गंभीर वैचारिक बहस का संयोग से या दुर्योग से ही सही पर एक अवसर अवश्य है। यह बहस न केवल देश की पत्रकारिता को एक दिशा देगी अपितु देश के नव निर्माण के लिए भी उपयोगी होगी। यह अवसर उपलब्ध कराया है नेशनल हेरॉल्ड घोटाले ने। यह घोटाला क्या है और इसके आरोपी कौन हैं पूरा देश जानता है। जिस परिवार ने आजादी के बाद देश को लूटने में कोई हिचक नहीं दिखाई उसके लिए अखबार या अखबार के दम पर या अखबार की आड़ में लूट पर कोई खास आश्चर्य नहीं होता है, मेरा इरादा घोटाले पर चर्चा करना भी नहीं है। कानून अपना काम करेगा और मां बेटे सीखचों में होंगे, इसकी सभी को प्रतीक्षा है। विषय बहस का यह है कि क्या मिशन के आधार पर एक समाचार पत्र का संचालन किया जा सकता है? आजादी के पहले पत्रकारिता मिशन थी फिर प्रोफेशन बनी आज न्यूज टे्रडिंग का जमाना है। शब्द हमारे यहां ब्रह्म स्वरूप हैं, पर पत्रकारिता आज व्यापार की भी सारी हदें लांघ रही है। विगत हाल ही के दशकों में तकनीक के स्तर पर पत्रकारिता ने उल्लेखनीय ऊंचाई हासिल की है पर मूल्यों के आधार पर कितनी रसातल पर जा रही है इसको नापने का कोई पैमाना नहीं है। अखबार या चैनल के नाम पर धंधे या सारे जायज या नाजायज धंधों को बचाने का सुरक्षा कवच मीडिया कहीं-कहीं बनता दिखाई दे रहा है। ऐसे में मिशन का भाव काफी पीछे छूटता सा दिखता है। नेशनल हेराल्ड कांग्रेस विचार आधारित पत्र समूह था। आजादी पाने के लिए, गुलामी की बेडिय़ा तोडऩे के लिए लखनऊ से 1938 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने इसकी स्थापना की पर परिणाम क्या सामने आ रहा है। अखबार की दम पर देश भर में 5000 करोड़ का आर्थिक साम्राज्य बनाया गया और अखबार बंद हो गया। आज यही साम्राज्य मात्र चंद लाख रुपए में मां-बेटे को सौंपने की तैयारी है। वामपंथ की विचारधारा से  प्रेरित भी कई पत्र पत्रिकाएं जिनमें ब्लिट्स, गणपुत्र आदि प्रमुख हैं प्रारंभ हुई आज इतिहास हैं। एक मान्यता स्थापित की जा रही है कि मिशन के आधार पर आज के दौर में अखबार का संचालन असंभव है। यह सच है अखबार का अर्थशा अनोखा है। लाखों खर्च कर सैकड़ों की रद्दी में रोज सुबह अखबार शक्ल लेता है। अत: जाहिर है कि अखबार का पेट भरने के लिए विज्ञापन या अन्य संरक्षण आवश्यक है। याद करें देश की प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने सवाल खड़ा किया था कि अखबार के पेज बढ़ रहे हैं पर कीमत घट रही है क्या गणित है? यह आवाज प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर तब अनसुनी कर दी गई आज स्थिति यह है कि राजधानी से प्रकाशित एक अंग्रेजी पत्र समूह के मालिक कहते हैं कि अखबार की कीमत रद्दी से कुछ अधिक रखना हमारी मजबूरी है अन्यथा हॉकर घरों में अखबार नहीं डालेगा, रद्दी की दुकान पर तुलवाएगा। क्या परिदृश्य है, जो घर फूंके आपना चले हमारे संग, स्वयं को जलाकर, गला कर प्रारंभ हुई पत्रकारिता आज किस मोड़ पर है? पर यहीं पर ध्यान देने की, अपनी आंखों पर लगे चश्मे को साफ करने की भी जरूरत है। यह प्रयास एक आशा की किरण दिखाता है। आजादी के बाद देश के नव निर्माण के लिए राष्ट्रवाद की प्रेरणा से देश में एक ऐतिहासिक प्रयोग प्रारंभ हुआ। लखनऊ से स्वदेश, राष्ट्रधर्म दिल्ली से पांचजन्य महाराष्ट्र से तरुण भारत सहित देश भर में मिशन के आधार पर पत्रकारिता प्रारंभ हुई जिसके सुखद परिणाम सामने हैं। 1977 में सरकार जाते ही नेशनल हेराल्ड बंद हो जाता है पर आपातकाल का निरंकुश दमन भी इन पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद नहीं कर पाता। यह सच है कि प्रसारण के मापदंड पर, व्यवसायिक दक्षता के आधार पर इन पत्र-पत्रिकाओं की एक सीमा है पर आज जब बड़े-बड़े पत्र समूह हांफ रहे हैं यह समूह सार्थक हस्तक्षेप करने में सफल है। वह कौन सी प्रेरणा है, वह कौनसी तपस्या है, इसके पीछे किसका समर्पण है, यह समय है कि निरपेक्ष एवं तटस्थ भाव से अध्ययन किया जाए और पत्रकारिता में मूल्यों की स्थापना किस प्रकार की जा सकती है समझा जाए। एक देशव्यापी बहस अखबारों के अर्थशा पर समय की मांग है। यह बहस न केवल पत्रकारिता के स्तर को एक आदर्श मुकाम देगी देश की तस्वीर भी बदलेगी।

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