लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव
उत्तर कोरिया ने 10 साल में पांचवां परमाणु परीक्षण किया है। यह परीक्षण देश के 68वें स्थापना दिवस के मोके पर किया गया। इस परीक्षण के बाद दुनिया की महाशक्तियों से बेपरवाह उत्तर कोरिया ने सफल परीक्षण पर खुशी जताते हुए कहा है कि अब इस बात की पुष्टि हो गई है कि उसके बैलिस्टिक राॅकेट परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं। वहां के राष्ट्रिय टेलीवीजन ने दावा किया कि यह उनके देश के परमाणु परीक्षणों में सबसे ताकतवर बम था। इसके बाद अब उत्तर कोरिया किसी भी देश पर परमाणु हमला कर सकता है। परीक्षण स्थल पुंजेरी के आसपास 5.3 तीव्रता के कृत्रिम भूकंप के झटके महसूस किए गए। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण से लेकर यूरोपीय एजेंसियों ने भूकंप की पुष्टि की है। इस परीक्षण के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उत्तर कोरिया को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी के साथ स्थिति पर विचार के लिए दक्षिण कोरिया व जापान के राष्ट्रध्यक्षों से बातचीत भी की है। दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाने को लेकर सहमति भी बनती दिख रही है। एक आपात बैठक के दौरान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 41 के तहत प्रतिबंध संबंधी प्रस्ताव का प्रारूप भी बनाने पर सहमती बनी है।
उत्तर कोरिया ने इसी साल जनवरी में हाईड्रोजन बम का परीक्षण किया था। यह परमाणु बम से 100 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। ताजा परीक्षण के बाद जो कृत्रिम भूंकप उत्पन्न हुआ उसकी तीव्रता के आधार पर वैज्ञानिक इस परमाणु परीक्षण में इस्तेमाल किए गए बम की क्षमता का विश्लेशण कर रहे हैं। इसके निष्कर्श से पता चलेगा की यह सामान्य परमाणु या हाइड्रोजन बम था, या फिर थर्मोन्यूक्लियर बम था। कुछ विशेषज्ञों की राय है कि यह 20 से 30 किलोटन क्षमता का बम था। हालांकि दक्षिण कोरियाई सेना ने दावा किया है कि बम की क्षमता 10 किलोटन तक की थी, जो हिरोशिमा पर गिराए गए घातक परमाणु बम से कम हैं। इस बम की क्षमता 15 किलोटन तक बताई गई थी।
उत्तर कोरिया का युवा तानाशाह किंग जोन ने अपने पिता की मृत्यु के बाद 2011 में शासन की बगडोर संभाली थी। जोंग इतना निर्दयी व कठोर है, कि उसने उपप्रधानमंत्री और उपसेनापति को इसलिए तोप से बंधवाकर मार दिया था, क्योंकि वे एक उच्च स्तरीय सभा में सोते पाए गए थे। जोंग इसी तरीके से करीब सवा सौ लोगों को खुलेआम मृत्युदण्ड दे चुका है। करीब सवा लाख जेलों में बंद लोग उसकी अमानवीय क्रूरता के शिकार हैं। अमेरिका ने जोंग पर मानवाधिकारों के उल्लघंन के आरोप में कुछ पाबंदियां भी लगाई हुई है। अमेरिका की नई कोशिशें ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रतिबंधों के अलावा दक्षिण कोरिया औैर जापान के साथ मिलकर सैनिक कार्यवाही करने की भी है। लेकिन चीन की उत्तर कोरिया के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट वैश्विक रणनीति नहीं होने के कारण अमेरिका इकतरफा कार्यवाही करने से हिचक रहा है। चीन उत्तर कोरिया द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों पर दिखावटी गुस्सा व निंदा तो जाहिर करता है, लेकिन न तो खुली खिलाफत करता है और न ही अमेरिका का इस मुद्दे पर साथ देने को तैयार है।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर 6 अगस्त और नागासाकी पर 9 अगस्त 1945 को परमाणु बम गिराए थे। इन बमों से हुए विस्फोट और विस्फोट से फूटने वाली रेडियोधर्मी विकिरण के कारण लाखों लोग तो मरे ही,हजारों लोग अनेक वर्षों तक लाइलाज बीमारियों की भी गिरफ्त में रहे। विकिरण प्रभावित क्षेत्र में दशकों तक अपंग बच्चों के पैदा होने का सिलसिलला जारी रहा। अपवादस्वरूप आज भी इस इलाके में लंगड़े-लूल़े बच्चे पैदा होते हैं। अमेरिका ने पहला परीक्षण 1945 में किया था। तब आणविक हथियार निर्माण की पहली अवस्था में थे,किंतु तब से लेकर अब तक घातक से घातक परमाणु हथियार निर्माण की दिशा में बहुत प्रगति हो चुकी है। लिहाजा अब इन हथियारों का इस्तेमाल होता है तो बर्बादी की विभीशिका हिरोशिमा और नागासाकी से कहीं ज्यादा भयावह होगी। इसलिए कहा जा रहा है कि आज दुनिया के पास इतनी बड़ी मात्रा में परमाणु हथियार हैं कि समूची धरती को एक बार नहीं, अनेक बार नष्ट-भ्रष्ट किया जा सकता है।
जापान के आणविक विध्वंस से विचलित होकर ही 9 जुलाई 1955 को महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन और प्रसिद्ध ब्रिटिश दार्शनिक बट्र्रेंड रसेल ने संयुक्त विज्ञप्ति जारी करके आणविक युद्ध से फैलने वाली तबाही की ओर इशारा करते हुए शांति के उपाय अपनाने का संदेश देते हुए कहा था,‘यह तय है कि तीसरे विश्व युद्ध में परमाणु हथियारों का प्रयोग निश्चित किया जाएगा। इस कारण मनुष्य जाति के लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। किंतु चौथा विश्व युद्ध लाठी और पत्थरों से लड़ा जाएगा।‘ इसलिए इस विज्ञप्ति में यह भी आगाह किया गया था कि जनसंहार की आशंका वाले सभी हथियारों को नष्ट कर देना चाहिए। तय है, भविष्य में दो देशों के बीच हुए युद्ध की परिणिति यदि विश्वयुद्ध में बदलती है और परमाणु हमले शुरू हो जाते हैं तो हालात कल्पना से कहीं ज्यादा डरावने होंगे। हमारे प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस भयावहता का अनुभव कर लिया था,इसीलिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में आणविक अस्त्रों के समूल नाश का प्रस्ताव रखा था। लेकिन परमाणु महाशक्तियों ने इस प्रस्ताव में कोई रूचि नहीं दिखाई, क्योंकि परमाणु प्रभुत्व में ही,उनकी वीटो-शक्ति अंतनिर्हित है। अब तो परमाणु शक्ति संपन्न देश,कई देशों से असैन्य परमाणु समझौते करके यूरेनियम का व्यापार कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवा की ओट में ही कई देश परमाणु-शक्ति से संपन्न देश बने हैं और हथियारों का जखीरा इकट्ठा करते चले जा रहे हैं।
दुनिया में फिलहाल 9 परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। ये हैं, अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान, इजराइल और उत्तर कोरिया। इनमें अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और ब्रिटेन के पास परमाणु बमों का इतना बड़ा भंडार है कि वे दुनिया को कई बार नष्ट कर सकते हैं। हालांकि ये पांचों देश परमाणु अप्रसार संधि में शामिल हैं। इस संधि का मुख्य उद्देश्य परमाणु हथियार व इसके निर्माण की तकनीक को प्रतिबंधित बनाए रखना है। हालांकि ये देश इस मकसद पूर्ति में सफल नहीं रहे। पाकिस्तान ने तस्करी के जरिए उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार निर्माण तकनीक हस्तांरित की और वह आज परमाणु शक्ति संपन्न नया देश बन गया है। उसने पहला परमाणु परीक्षण 2006, दूसरा 2009 और तीसरा 2013 चौथा जनवरी 2016 और अब सितंबर में पांचवा परीक्षण भी कर लिया है। उत्तरी कोरिया के इन परीक्षणों से पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में बहुत गहरा असर पड़ा है। चीन का उसे खुला समर्थन प्राप्त है। अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान को वह अपना दुश्मन देश मानता है। इसीलिए यहां के तानाशाह किम जोंग अमेरिका और दक्षिण कोरिया को आणविक युद्ध की खुली धमकी देते रहे हैं।
उत्तरी कोरिया की सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी ने जब अपनी 70वीं वर्शगांठ मनाई थी, तब इस अवसर पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारी लिऊ युनशान भी मौजूद थे। इसी समय किम ने कहा कि ‘कोरिया की सेना तबाही के हथियारों से लैस है। इसके मायने हैं कि हम अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश की ओर से छेड़ी गई किसी भी जंग के लिए तैयार हैं।‘ अमेरिका के आधिकारी इस समारोह के ठीक पहले यह आशंका जता भी चुके थे, कि उत्तर कोरिया के पास अमेरिका के विरूद्ध परमाणु हथियार दागने की क्षमता है। दरअसल, कोरिया 10 हजार किलोमीटर की दूरी की मारक क्षमता वाली केएल-02 बैलेस्टिक मिसाइल बनाने में सफल हो चुका है। वह अमेरिका से इसलिए नाराज है, क्योंकि अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में सैनिक अड्ढे बनाए हुए हैं।
परमाणु हमलों का खतरा केवल उत्तरी कोरिया से ही नहीं पाकिस्तान से भी है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड केमरून कह चुके हैं कि युद्ध की स्थिति में परमाणु विकल्प का बेखौफ इस्तेमाल करेंगे। भारत को आंख दिखाते हुए पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी कह चुके हैं कि उनके परमाणु हथियार महज शोपीस नहीं हैं। बावजूद अमेरिका के अखबार ‘द वाशिंगटन पोस्ट‘ ने खबर दी थी कि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच भारत जैसा असैन्य परमाणु समझौता हो सकता है। इस खबर से सचेत होकर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने अमेरिका को अगाह किया हुआ है कि वह कोई भी परमाणु समझौता करने से पहले पाकिस्तान के परमाणु प्रसार से संबंधित रिकाॅर्ड का अवलोकन करे। दरअसल,भारत ने अमेरिका से 2005 में 123 समझौते किए थे। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत को एनएसजी में छूट मिली हुई है। भारत को शंका है कि इस समझौते के बदले अमेरिका 48 देशों वाले परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की ओर से पाक के लिए छूट का समर्थन कर सकता है। अमेरिका इस समूह का सदस्य देश है। अमेरिका के अनुरोध पर ही इस समूह ने भारत को उन नियमों में रियासत दे दी थी, जो परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले देशों के साथ परमाणु व्यापार को बाधित करते हैं। ऐसा संभव हो जाता है तो पाकिस्तान को असैन्य परमाणु करार के बहाने यूरेनियम खरीदने में आसानी होगी और वह इसका उपयोग परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाने में करेगा। बेलगाम आतंकवाद को सरंक्षण देने वाले देश पाकिस्तान को इस तरह की रियायत देने के मायने,परमाणु हमले को खुला आमंत्रण देने जैसा होगा। पाकिस्तान से सबसे ज्यादा खतरा भारत को है।

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