लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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गिरीश पंकज

imagesअंतरजाल (इन्टरनेट) के आने के बाद न्यू मीडिया के रूप में विकसित वेब पत्रकारिता ने एक तरह की क्रांति की है. इसके माध्यम से जन पत्रकारिता का नया सिलसिला चल पडा है. जैसे हर व्यक्ति के पास अपना संचार तंत्र (मोबाइल ) रहता है, उसी तरह अब हर नागरिक के पास फेस बुक, ट्विटर और ब्लाग आदि के रूप में उसका अपना अखबार भी है, अपनी पत्रिका भी है . अब यह कतई ज़रूरी नहीं रहा कि कोई व्यक्ति विचारो के प्रकाशन के लिए किसी पत्र-पत्रिका का मुंह ताके। उसे कुछ सूझा, तो वो फ़ौरन उसे लोक व्यापी बना सकता है. यह एक ऐसा सोशल मीडिया है जो अब तक स्वतंत्र है और समाचारपत्रों की भाँति किसी भी तरह के सेंसरशिप से भी मुक्त है . और सबसे बड़ी बात, इस न्यू मीडिया के अवतार के बाद आम आदमी की रचनात्मकता बढ़ी है और अभिव्यक्ति के प्रति जागरूक हो कर वह अपने मन को वैश्विक क्षितिज तक भी खोल पा रहा है .

न्यू मीडिया ने समकालीन समाज को अभिव्यक्ति का अधिकार और हथियार दोनों दे दिया है. सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति भी अब फेस बुक के माध्यम से अपने सुख-दुःख को साझा कर सकता है। देश-दुनिया की किसी भी समस्या या घटना पर अपने शब्दों में हस्तक्षेप कर सकता है। वह अपने विचार प्रस्तुत कर के बौद्धिक वातावरण बना सकता है.वह किसी मुद्दे पर आम लोगों को अपने साथ जोड़ सकता है. और वक्त आने पर वह क्रांति की पृष्ठभूमि भी तैयार कर सकता है. सचमुच आज एक नया आभासी-देश इस दुनिया में विकसित हो रहा है, जिसकी आबादी एक करोड़ पार कर चुकी है . आज मेरी-आपकी बात पलक झपकते पूरी दुनिया तक पहुंचा जाती है. फेसबुक में मैं कुछ लिखता उन तो यूके – कनाडा या किसी भी देश में बैठे मित्र उस पर अपनी प्रतिक्रया दे कर समर्थन करते है या उस विचार को आगे बढ़ा देते है.

हमारे देश ने सदियों पहले ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का घोष किया था. आज इंटरनेट के इस युग में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ जीवंत हो कर सामने नज़र आ रहा है. अब हम विश्व ग्राम के निवासी है. और किसी भी मुद्दे पर एक हो कर सोचने-विचारने का कम करते है.

इस न्यू मीडिया के कारण अब जन-संवाद आसान हो गया है. अनेक देशो के उदहारण हमारे सामने है कि न्यू सोशल मीडिया के कारण कैसे वहां क्रांति संभव हो सकी. इस मामले में सबके अपने अनुभव होंगे। मेरे भी अनेक सार्थक अनुभव रहे हैं. केवल एक अनुभव मैं साझा कर रहा हूँ, जिससे हम इस न्यू मीडिया के महत्त्व को समझ सकते है. पिछले साल की बात है. हैदा बाद के एक विश्व्विद्यालय की एक खबर मैंने कहीं पढ़ी कि वहा के कुछ छात्र गौ मांस खाने का उत्सव मनाएंगे। इस खबर ने मुझे विचलित कर दिया। मैंने फेसबुक में इस घटना की अपने तरीके से निंदा की. मेरे विचार पढ़ कर अनेक लोगों ने प्रतिक्रियाएं दीं. कुछ गौ मांस प्रेमी भी आ गए निंदा करने , लेकिन मुझे बेहद खुशी उस वक़्त हुयी जब फैज़ खान नामक मुस्लिम युवक की प्रतिक्रिया मिली। वह मेरे विचारो से इतना प्रभावित हुआ की उसने भी फेसबुक की अपनी ”दीवार’ पर लिखा कि गौ मांस भक्षण उत्सव के विरोध वह कल धरने पर बैठ रहा है. और उसने ऐसा किया . उसके धरने पर मैं भी शामिल हुआ। अनेक हिन्दू-मुस्लिम युवक भी शामिल हुए. पूरी शालीनता के साथ दिन भर धरना दिया गया. उसके बाद फैज़ ने गौ रक्षा का संकल्प लिया और एक तरह से गौ रक्षा क्रांति का सिपाही बन कर उभरा। फैज़ अगले महीने दिल्ली में पर जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर भी बैठ रहा है . उसकी मांग है देश में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया जाए. कहने का मतलब यह कि फेसबुक की मेरी एक टिप्पणी ने एक युवक को इतना भावुक कर दिया कि अब वः गौ माता की सेवा में रत हो गया है। अपनी गौ क्रान्ति को और व्यापक बनाने के लिए फैज़ खान न्यू मीडिया का सहरा ले रहा है. उसे कारण एक वतावरण बन रहा है और उसके गौ रक्षा अभियान में अनेक युवक-युवतियां शामिल हो रहे है.

तो ये है इस न्यू मीडिया की ताकत। लेकिन अनेक ऐसे लोग भी है जो इस मीडिया का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं. वे यहाँ आ कर अश्लीलता फैला रहे है, साम्प्रदायिकता का जहर फेंक रहे हैं . मनुष्य को जाति-धर्म की संकीर्णता में बांधने की कोशिश कर रहे है. विचारशून्य लोगों के लिए न्यू मीडिया अभिशाप कहा जा सकता है . न्यू मीडिया को मै एक चाकू कहता हूँ. चिकित्सक के हाथ आएगा तो वह शल्यक्रिया करेगा, मगर किसी गुंडे के हाथ आएगा, तो हत्याए करेग़ा। इसलिए यह खा जा सकता है की न्यू मीडिया समझदारो का माध्यम है. बंदर के हाथ में उस्तरा खतरनाक होता है. इस वक्त कभी-कभी लगता है कि ये माध्यम कुछ बंदरो के हाथ में भी है इसलिए उनकी प्रविष्टियाँ विवेकहीन होती है. समाज को नुकसान पहुँचाने वाली।

मुझे लगता है हर काल में दो तरह की सोच वाले लोग विद्यमान रहते है. एक वे जो बेहतर समाज रचने की दिशा में प्रतिबद्ध रहते हैं दूसरे वे जो विघ्न संतोषी होते है. इनसे हमें हर काल में जूझना पड़ता है. न्यू मीडिया के दौर में भी ऐसे लोग कम नहीं हैं , फिर भी अधिक संख्या अच्छे लोगों की है जो नैतिक मूल्यों के सजग ”प्रवक्ता” बन कर उभरे हैं. इनसे ही उम्मीदे की जा सकती हैं. वेब पत्रकारिता के माध्यम से अपनी परम्परा और संस्कृति के उन्नयन काम भी हमारा है . हम आधुनिक बने, मगर अपने सुन्दर घर को, मान्य सांस्कृतिक परम्पराओं को नष्ट करके नहीं। हमें नव् निर्माण करना है मगर बेहतर मनुष्य का. सोच व्यापक हो. किसी जाति -धर्म-सम्प्रदाय के प्रति कटुता या घृणा न फैले। न्यू मीडिया के माध्यम से होने वाली जन-प्रत्रकारिता पत्रकारिता के उस रूप को सामने लाये जो अब लुप्त- सा होता जा रहा है। अन्यायपूर्ण सत्ता और सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध आवाज़ करने वाले न्यू मीडिया से सबको उम्मीद है इसलिए यह ज़रूरी है कि यहाँ बौद्धिक लोगों की संख्या बढ़े. जो सोते हुए लोगों को जगाने का कार्य करें . ”प्रवक्ता’ जैसी वेब पत्रिकाओं के माध्यम से यह काम बेहतर ढंग से हो सकता है .. फेसबुक और ब्लॉग के जरिये भी एकल जन पत्रकारिता को बेहतर बनाने के लिए लोगों को प्रशिक्षित करने का काम भी किया जा सकता है , तब और सार्थक संवाद हो सकेंगे।

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