लेखक परिचय

अनिल सौमित्र

अनिल सौमित्र

मीडिया एक्टिविस्‍ट व सामाजिक कार्यकर्ता अनिलजी का जन्‍म मुजफ्फरपुर के एक गांव में जन्माष्टमी के दिन हुआ। दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता में स्‍नातकोत्तर डिग्री हासिल कीं। भोपाल में एक एनजीओ में काम किया। इसके पश्‍चात् रायपुर में एक सरकारी संस्थान में निःशक्तजनों की सेवा करने में जुट गए। भोपाल में राष्‍ट्रवादी साप्‍ताहिक समाचार-पत्र 'पांचजन्‍य' के विशेष संवाददाता। अनेक पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जालों पर नियमित लेखन।

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-अनिल सौमित्र

राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक बिहार में एनडीए या भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है। यह महज आशंका नहीं, बल्कि घटनाओं और नेताओं के रवैये के आधार पर किया जा रहा विश्लेषण हैं। एनडीए संयोजक शरद यादव भले ही बीच-बचाव कर रहे हों, वे गठबंधन बनाए रखना चाहते हों, लेकिन बिहार में नीतीश का दखल शरद से ज्यादा और सबसे ज्यादा हैं। घटनाक्रम बता रहे हैं कि नीतीश उड़ीसा के नवीन पटनायक के रास्ते पर हैं। लेकिन न तो बिहार उड़ीसा है और न ही नीतीश, नवीन पटनायक। लेकिन यह भी सच है कि नीतीश की जिद्द के आगे शरद यादव की वैसे ही कुछ नहीं चलेगी, जैसे जार्ज फर्नांडीस की नहीं चली।

बिहार में ऐसा लग रहा है कि भाजपा-जद (यू) गठबंधन अब कुछ ही दिनों का मेहमान है। भाजपा और जद (यू) के नेता एक-दूसरे को कहने लगे हैं – अतिथि तुम कब जाओगे! 12 और 13 जून को भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अवसर पर आयोजित स्वाभिमान रैली को नीतीश पचा नहीं पाए। नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन को नीतीश ने जरूरत से ज्यादा ही तूल दे दिया। विज्ञापन का विरोध तो एक बार जायज भी था, लेकिन बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात द्वारा दी गई राहत राशि को लौटाकर और भाजपा नेताओं को दिया गया भोज वापस लेकर नीतीश ने अच्छा नहीं किया। सहायता देने वालों के साथ इस तरह का सलूक बिहारी संस्कृति नहीं। संभव है नीतीश कुमार की यह मंशा रही हो कि वे नरेन्द्र मोदी को उनका पैसा वापस कर एक बार बिहार के स्वाभिमान को जागृत कर देंगे और इसका एकमुश्त लाभ उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में मिल जायेगा। लेकिन राजनैतिक समीक्षकों के मुताबिक नीतीश का दांव उल्टा पड़ गया।

नीतीश के व्यवहार की आलोचना अब देशभर में हो रही है। पहले तो बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत और मदद की गुहार प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ही की थी। चूंकि बिहार में जनता दल यू और भाजपा गठबंधन की एनडीए सरकार है, इसलिए भाजपा शासित राज्यों ने नीतीश की गुहार पर विशेषरूप से गौर फरमाया। गुजरात की सरकार ने पहल करते हुए बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए एक विशेष राहत रेल और पांच करोड़ रूपये की मदद मुहैया कराई। लेकिन एक छोटे से विज्ञापन प्रकरण को जिस तरीके से तिल का ताड़ बनाया उससे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश की देशभर में किरकिरी ही हो रही है। राजद के लालू यादव और कांग्रेस ने भी नीतीश के इस रवैये की निंदा है। अगर नरेन्द्र मोदी इतने ही बुरे हैं तो नीतीश कुमार पांच साल से भाजपा का गठबंधन क्यों चला रहे हैं। क्या मोदी विहीन भाजपा के साथ नीतीश कुमार का गठबंधन है? या मोदी युक्त भाजपा और जनता दल यू का गठबंधन है? जिस राहत राशि को नीतीश कुमार ने वापस किया है वह न तो नरेन्द्र मोदी का व्यक्तिगत था, और न ही मोदी द्वारा नीतीश कुमार को व्यक्तिगत तौर पर दिया गया था। विशेष राहत रेल और पांच करोड़ रूपया समूचे गुजरात की जनता द्वारा गुजरात सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी के मार्फत बिहार की जनता को बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार के माध्यम से दिया गया था। तब बिहार की जनता ने गुजरात की सहायता को स्वीकार किया था। कायदे से तो बिहार को गुजरात का एहसानमंद होना चाहिए और गुजरात को शुक्रिया करना चाहिए। लेकिन नीतीश कुमार ने मुसलमान मतदाताओं को नाराज न करने की कवायद में नरेन्द्र मोदी, गुजरात की जनता और भाजपा को नाराज करने का खतरा मोल ले लिया। आज नीतीश कुमार के मुस्लिम मोह के कारण भाजपा और जदयू का वर्षों पुराना गठबंधन एनडीए टूट की कगार पर है।

गौरतलब है कि अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही नरेन्द्र मोदी भाजपा के विकासपुरुष हैं। यह सच है कि वाजपेयी जहां पार्टी के परे भी विकासपुरुष के रूप में स्वीकार्य हुए, वहीं नरेन्द्र मोदी गुजरात में ही सिमट कर रह गए। मीडिया और विपक्ष ने नरेन्द्र मोदी की छवि अल्पसंख्यक और मुस्लिम विरोधी की बना दी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी का यही बिगाड़ा हुआ चेहरा उपयोगी लगता है। नीतीश ने मोदी के बहाने न सिर्फ अल्पसंख्यकों का रहनुमा होने का संदेश दिया है, बल्कि वे गुजराती या मोदी सहयोग को वापस कर बिहारीपन को उजागर करना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि प्रादेशिक, क्षेत्रीय या जातीय पहचान सिर्फ महाराष्ट्र या गुजरात का नहीं, बल्कि बिहार का भी हो सकता है। मराठी और गुजराती गौरव के बरक्श वे बिहारी गौरव व स्वाभिमान को स्थापित करने की कवायद कर रहे हैं। नीतीश की यह कवायद उनके राजनैतिक अहंकार की तरह प्रदर्शित हुआ है।

चाहे बाल ठाकरे की शिवसेना हो या राज ठाकरे की एमएनएस, दोनों ने मराठी एकता और क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर बिहारियों के साथ घोर दुव्र्यवहार और अपमान किया है। मुम्बई में रहने वाले बिहारी आज भी अपमान और जलालत की जिन्दगी जी रहे हैं। वे एक अनजाने भय से आज भी भयभीत हैं। यह सच है कि मराठियों द्वारा मुम्बई में बिहारियों के साथ दुव्र्यवहार किया गया, लेकिन इस तरह का कोई अपमानजनक व्यवहार गुजरातियों ने नहीं किया। यह भी सच है कि नीतीश कुमार ने बिहारियों के साथ हुए दुव्र्यवहार का पुरजोर विरोध करने की बजाए नरमी ही बरती थी। अपमान करने वालों के साथ नरमी और मदद करने वालों के साथ बेरूखी करके नीतीश ने ओछी और अवसरवादी राजनीति का ही परिचय दिया है। बिहार की जनता इसे शायद ही स्वीकार करे। अंग्रेजों के खिलाफ गांधी को और कांग्रेस के खिलाफ जयप्रकाश स्वीकार कर बिहार ने एक नजीर पेश की है। बिहार का इतिहास इस बात का गवाह है कि वह देश के विभिन्न हिस्सों से नेतृत्व, मुद्दों, और आंदोलनों न सिर्फ स्वीकार करता रहा है, बल्कि उसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लेता रहा है। जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीयता से उपर उठकर बिहार ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद का समर्थन किया है। भाजपा-जदयू के गठबंधन को स्वीकार करना और शरद यादव और जार्ज फर्नांडिस जैसे बाहरी किन्तु राष्ट्रीय नेतृत्व की स्वीकार्यता इसी का परिचायक है।

हालांकि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व एनडीए संयोजक शरद यादव के साथ है। लेकिन भाजपा का प्रदेश नेतृत्व नीतीश को उनकी ही भाषा में जवाब देने का उतारू है। जाहिर है गठबंधन का एक धर्म होता है। गठबंधन टिकाउ हो इसके लिए सभी घटकों को गठबंधन-धर्म का पालन करना लाजिमी होता है। किसी भी एक घटक द्वारा धर्म के उल्लंघन से गठबंधन को खतरा हो सकता है। नीतीश कुमार ने गुजरात की राहत राशि वापस कर, भाजपा नेताओं नरेन्द्र मोदी और वरुण गांधी का विरोध कर और आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए प्रचारकों, मुद्दों और रणनीति पर एकतरफा फैसला देकर भी गठबंधन धर्म के साथ न्याय नहीं किया है। नीतीश कुमार का यह रवैया किसी को समझ में नहीं आ रहा है। कुछ समझ में आने वाला तथ्य है तो यही कि नीतीश यह सब मुसलमान वोटों के लिए कर रहे हैं। लेकिन राजनीति के जानकार यह भी समझने की कोशिश में हैं कि क्या नरेन्द्र मोदी का विरोध या मोदी परहेज से मुसलमान वोट की गारंटी है! वह भी ऐसे समय में जब राजद के लालू यादव, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और लोजपा के रामविलास पासवान जैसे मुस्लिमपरस्त नेता अल्पसंख्यक वाटों के लिए किसी भी हद तक जाने और कोंई भी हथकंडा अपनाने के लिए तैयार हैं। भले ही इसके लिए घोषित आतंकियों का समर्थन क्यों न करना पड़े। बिहार में लोभ-लालच और भय से मुस्लिम मतों की बंदरबांट तय है। फिर नीतीश भाजपा समर्थन, बिहारी स्वाभिमान-संस्कृति और एनडीए गठबंधन को क्यों और किसके लिए दांव पर लगा रहे हैं? क्या जनता दल (यू) ने किसी और दल या नेता से गठबंधन की अघोषित कोशिश शुरु कर दी है? नीतीश कुमार मुस्लिम मतों के लिए जरूरत से ज्यादा चिंतित हैं? या कि उन्हें उनकी सरकार द्वारा अल्पसंख्यक कल्याण के लिए किए गए कार्यों पद भरोसा नहीं, उन्हें मुसलमानों से विश्वासघात का डर सता रहा है? यह सब सवाल हैं जो बिहार समेत देश की जनता के दिल-दिमाग और जुबां पर आ रहे हैं। नीतीश को इन सवालों का जबाव देना है, भाजपा को इन सवालों के लिए तैयार रहना है। भाजपा के लिए झारखंड का गठबंधन एक मिसाल है। अस्वाभाविक, दबाव और अविश्वास पर आधारित गठबंधन बन भले ही जाए लेकिन वह चल नहीं सकता। गठबंधन तोड़ने का समाजवादी इतिहास रहा है। भाजपा को भी तय करना है विचार और स्वाभिमान की कीमत पर गठबंधन चलाना है या बिहार की जनता, भाजपा के विचार और स्वाभिमान के लिए कोई रास्ता अख्तियार करना है।

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1 Comment on "नीतीश की नकारात्मक राजनीति"

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Rajat Abhinav
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सौमित्र जी नीतीश बीजेपी की स्वाभिमान रैली को नहीं पचा पा रहे हैं ऐसा बिलकुल भी नहीं है. नीतीश ने तो बीजेपी नेताओं के सम्मान में भोज भी देने का मन बनाया था. पर जिस नरेन्द्र मोदी के विज्ञापन को आप जरुरत से ज्यादा तूल देने की बात कह रहे है दरअसल इस विज्ञापन को जरुरत से ज्यादा मोदी ने तूल दिया था,यदि ऐसा नहीं थी तो इस रैली के महज़ एक दिन पहले बिहार के अखबारों में मोदी का विज्ञापन देने की जल्दीबाजी को आप क्या कहेंगें? फिर जिस तरह से मोदी ने इन विज्ञापनों में मुसलमानों को निशाना… Read more »
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