लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

लोकपाल में अल्पसंख्यक आरक्षण का पेंच डालकर कांग्रेस ने खासतौर से मुस्लिम वोट रिझाने का एक सियासी दांव खेला है। जबकि धर्म के आधार पर लोकपाल-पीठ में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देना संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है। संविधान धर्म आधारित आरक्षण की इजाजत नहीं देता। ऐसा नहीं है कि कानूनी मसौदा तैयार करने वाले मंत्री-बनाम-वकील इस हकीकत से अनजान हैं। यदि ऐसा होता तो सरकारी नौकरियों में केंद्रीय मंत्री-मण्डल ने पिछड़े वर्ग के कोटे में कोटा निर्धारित कर जो अल्पसंख्यक वर्गो के लिए 4.5 फीसदी आरक्षण तय किया है, उसे भी धर्म के आधार पर करते ? लेकिन संप्रग सरकार का गुप्त अजेंडा लोकपाल को पारित कराने की बजाए, विधेयक पारित न हो इस कोशिश में ज्यादा है। संसद में मसौदा पेश होते समय, सांसदों के सुर बदल जाने के बावजूद संसद में लोकपाल के परिप्रेक्ष्य में व्यापक सहमति है। यही सहमति तार-तार हो जाए इसलिए आरक्षण का पेंच डाला गया। वैसे आरक्षण किसी भी जाति या धर्म के लिए क्यों न हो, उसका सामाजिक असमानता दूर करने से वास्ता कम और वोटों का गणित अपने अनुकूल बिठाने से ज्यादा रहा है। ऐसे फौरी आकर्षण अक्सर बुनियादी व स्थायी महत्व के सरोकारों से दूरी बढ़ाने का काम करते हैं। इसीलिए ऐसे शगूफे राजनीतिक दलों को ऐन चुनाव के वक्त याद आते हैं और वे मतदाताओं को बरगलाने की दृष्टि से आरक्षण जैसे चुनावी पैंतरे आजमाते हैं।

ऐसी ही पैंतरेबाजी के तहत उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने तो न केवल मुस्लिम आरक्षण का दांव खेला, बल्कि आर्थिक आधार पर सवर्ण जातियों को भी आरक्षण देने की मांग प्रधानमंत्री से कर डाली। इसी तर्ज पर कांग्रेस सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाकर मुस्लिम कार्ड खेलने की पृष्ठभूमि पहले से ही रच रही थी और उसने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले आरक्षण का दांव चल भी दिया। यह अंधा दांव कांग्रेस के लिए कारगर साबित होता है या नहीं, यह विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे। लेकिन वोट कबाड़ने का यह खेल न केवल कांग्रेस बल्कि देश के लिए बर्र (ततईया) के छत्ते में हाथ डालने जैसा घातक भी सिद्ध हो सकता है। क्योंकि इस प्रावधान के साथ ही आबादी के अनुपात में धार्मिक समुदायों और जातियों को आरक्षण देने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है।

मुस्लिम वोटों का ध्रुविकरण किए जाने की कोशिशें कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब तक इस समुदाय को बहुसंख्यक समाज की ओर से छाया-भय का काल्पनिक वातावरण तैयार करके भुनाया जाता रहा है। गुजरात दंगों के बाद न्यायालय, मानवाधिकार आयोग और नागरिक समाज ने जिस तरह से कथित दंगाइयों से लोहा लेते हुए उन्हें जेल का रास्ता दिखाया तो अब पिछले एक दशक से कमोबेश सांप्रदायिक दंगों पर अंकुश लगा हुआ है। नतीजतन छाया-भय का हथियार भौंथरा हो गया। सपा और बसपा भी भय की इसी प्रतिच्छाया में मुसलमानों का राजनीतिक दोहन पिछले दो दशक से करते हुए उत्तर प्रदेश की सत्ता और देश की अखिल भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण व प्रभावी भूमिका निभाते चले आ रहे हैं। पर अब कांग्रेस के दिग्गज खिलाड़ियों ने मुस्लिमों को आरक्षण का जो चारा डाला है, उससे सपा और बसपा की चूलें हिल गई हैं।

हालांकि यह जरूरी नहीं है कि आरक्षण के मंत्र से अभीमंत्रित कर दिए जाने के बावजूद मुसलिमों का बड़े स्तर पर कल्याण हो जाए। इस हेतु यह भी जरूरी है कि मुस्लिमों को मदरसा शिक्षा और परिवार नियोजन न अपनाने की जड़ता से भी उबारा जाए। किंतु जब भी मुस्लिमों को धार्मिक पूर्वग्रहों और भाषाई शिक्षा से उबारने की बात उठती है तो मुल्ला-मौलवी अजान भरने लगते हैं कि यह पहल उनकी भाषाई शिक्षा पर कुठाराघात है। ‘शिक्षा का अधिकार अमल में लाते समय ऐसी आशंकाएं जताई गईं थीं। जिनका खण्डन करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के प्रगतिशील मंत्री सलमान खुर्शीद ने साफ किया था कि मदरसा शिक्षा के अनुच्छेद 29 और 30 की अनदेखी यह कानून नहीं करता, लिहाजा मुसलमानों को सोचने की जरुरत है कि तकनीक के युग में मदरसा शिक्षा से बड़े हित सधने वाले नहीं हैं।

यह सही है कि एक समय आरक्षण सामाजिक न्याय और समता के सरोकारों से वास्ता रखता था। लेकिन सभी धर्म-समुदायों और जातीय वर्गों द्वारा शिक्षा हासिल कर लिए जाने के बाद जिस तरह से देश में शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी हुई है, उसके कारगर उपाय आरक्षण जैसे चुक चुके औजार से मौजूदा परिवेश में संभव नहीं है। इस सिलसिले में हम गुर्जर और जाट आंदोलनों का भी हश्र देख चुके हैं। हालांकि गर्म लोहे पर चोट करते हुए नागर विमानन मंत्री अजीत सिंह ने जाट आरक्षण का टोटका उछाल दिया। उनका कहना है उत्तर प्रदेश, राजस्थान महाराष्ट्र और उत्तराखण्ड जैसे कई राज्यों में जाटों को पिछड़ी जाति माना जाता है। लिहाजा केंद्र के स्तर पर उन्हें मुस्लिमों की तर्ज पर क्यों नहीं पिछड़ें वर्ग में शामिल किया जाता ? किंतु यहां सियासी दलों को यह सोचने की जरुरत है कि वंचित समुदाय गरीब सवर्ण हों अथवा अल्पसंख्यक उनको बेहतरी के अवसर देना तो लाजिमी है, किंतु बदहाली की समूची सूरत जातिवादी अथवा अल्पसंख्यक चश्मे से सुधारी जाना नमुमकिन है। खाद्य की उपलब्धता से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जितने भी मानव जीवन से जुड़े बुनियादी सरोकार हैं, उनको मौजूदा दौर में हासिल करना केवल पूंजी और शैक्षिक कुशलता से ही संभव है। ऐसे में आरक्षण के जो वास्तविक हकदार हैं, वे अपरिहार्य योग्यता के दायरे में न आ पाने के कारण उपेक्षित ही रहेंगे। गोया, आरक्षण का सारा लाभ वे बटोर ले जाएंगें, जो आर्थिक रुप से पहले से ही सक्षम हैं और जिनके बच्चे स्तरीय पाठशालाओं में पढ़े हैं। इसलिए पिछड़ों के कोटे में कोटा देकर आरक्षण की जो वकालात लोकपाल में देने की, की जा रही है, सही अर्थांे में उसके पिछड़े मुसलमानों के लिए कोई ज्यादा मायने नहीं हैं। इसे यदि नीतिश कुमार द्वारा बिहार में दिए आरक्षण की तरह विभाजित किया जाता तो वंचित मुस्लिमों के हित साधे जा सकते हैं। बिहार में पिछड़ों के आरक्षण को तीन श्रेेणियों पिछड़े, अति पिछड़े और पसमांदा मुसलमानों के रूप में रेखांकित किया गया है। इसी तर्ज पर दलित आरक्षण को दालित तथा महादालित वर्गां में विभाजित किया गया है। केंद्र्र जिन अल्पसंख्यक वर्गाें को आरक्षण देने की बात कर रहा है उसमें मुस्लिमों के साथ सिख, ईसाई और पारसी भी जुड़े हैं। जबकि यह मुददा केवल मुस्लिम आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में तूल पकड़ रहा है। और राजनीतिक दलों के प्रवस्ता इस कथित उपलब्धि को वोट बैंक की राजनीति के चलते इसी स्वार्थ सिद्धी के तारतम्य में हवा देने में लगे हैं। आरक्षण की यह सुविधा महज वोट बैंक का जंजाल है यह पहलू भी सामने आया है। दरअसल मण्डल आयोग की जिस रिपोर्ट के आधार पर पिछड़ों को आरक्षण दिया गया था, उसमें पिछड़ी जातियों के अल्पसंख्यक पहले से ही सूचीबद्ध हैं। इसलिए आरक्षण का यह पैंतरा बरगलाने का शगूफा भी लगता हैं।

यह सही है कि हमारे देश में आज भी धर्म और जाति आधारित भेदभाव बदस्तूर हैं। जबकि संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर राष्ट्र किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। इस दृष्टि से संविधान में विरोधाभास भी है। संविधान के तीसरे अनुच्छेद अनुसूचित जाति आदेश 1950 जिसे प्रेसिडेन्शियल ऑर्डर के नाम से भी जाना जाता है, के अनुसार केवल हिन्दू धर्म का पालन करने वालों के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में अन्य धर्म समुदायों के दलित और हिन्दू दलितों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा है, जो समता और सामाजिक न्याय में भेद करती है। इस तारतम्य में पिछले 50 सालों से दलित ईसाई और दलित मुसलमान संघर्षरत रहते हुए हिन्दू अनुसूचित जातियों को दिए जाने वाले आधिकारों की मांग करते चले आ रहे हैं, किंतु संविधान में संशोधन किए बिना इन मांगों को माना जाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है।

ऐसी सिथति में लोकपाल के मसौदे में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह और बहुजन समाजवादी पार्टी के दबाव में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़ों और मुसलमानों को 50 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की बात कैसे संविधान सम्मत कही जा सकती है ? वह भी महज नौ सदस्यीय लोकपाल में ? इसी पेंच के चलते ‘महिला आरक्षण विधेयक’ राज्य सभा से पारित हो जाने के बावजूद लोकसभा में अटका हुआ है। मसौद में इस इबारत के शामिल कर दिए जाने से लगता है सरकार ने जान-बूझकर बर्र के छत्ते में हाथ डाला है। इस नए विमर्श ने लोकपाल की दिशा ही परिवर्तित कर दी है। मुसलिमों को दश का ‘नागरिक’ माने जाने बदले केवल ‘वोट’ मानते हुए यह कुटिल चाल चली गई है। क्येांकि लोकपाल के नाभि केंद्र में अब तक ‘भ्रष्टाचार’ था अब ‘आरक्षण’ आ जाएगा।

यहां यह भी सोचने की जरूरत है कि देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं लेखा महापरीक्षक (सीएजी) और केंद्रीय सतर्कता आयोग में आज भी आरक्षण का प्रावधान नहीं है। तब क्या ये संस्थाएं अपने दायित्व का निर्वहन, कर्त्तव्य-निष्ठा से नहीं कर रही हैं ? राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और निर्वाचन आयुक्त जैसे पद भी आरक्षण मुक्त हैं, तब इन पदों पर अपनी प्रतिभा के बूते दलित और मुस्लिम कैसे पहुंचे ? लोकपाल में यदि आरक्षण की व्यवस्था होती है तो कल उपरोक्त संवैधानिक संस्थाओं व पदों के लिए भी आरक्षण सुविधा की पैरवी की जाने लगेगी ? यही नहीं वोट बैंक भुनाने की स्वार्थ-सिद्धी अपने देश में इतनी प्रबल है कि कुुछ राजनेता तो अभी से मुस्लिमों को आबादी के अनुपात में आरक्षण का मुद्दा उछालने लगे हैं। राजनीति में मजहब-दोहन की यह संकीर्णता हमें कहां ले जाएगी ? नागरिक को वोट समझने के ये प्रावधान न्यायपालिका और सेना जैसी अनुशासित संस्थाओं को ध्वस्त करने के कुटिल उपक्रम हैं। यहां दलों और उनके माननीय सांसदों को यह ख्याल रखने की जरूरत है कि संसद की जिस सर्वोच्चता की वे दलील देते हैं, जनता को भरोसा देने के बावजूद यदि उस सर्वोच्चता का वे सशक्त लोकपाल पारित कर मान नहीं रखते तो देश की अवाम अन्ना आंदोलन की छत्र-छाया में ही भ्रष्टाचार से छुटकारे के उपाय तलाशेगी ?

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1 Comment on "लोकपाल में अल्पसंख्यक आरक्षण का सियासी पेंच"

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Anil Gupta
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देश का विभाजन जिस समय हुआ था उस समय देश में दो विचार प्रबल थे. एक, जो देश को बिना किसी मजहब या जाती के भेदभाव के एक राष्ट्र मानता था और देश को एक रखना चाहता था. दूसरा, जो देश को विभिन्न राष्ट्रों का समूह मानता था और जो मुस्लिम लीग के इस विचार का पक्षधर था की देश को हिन्दू व मुस्लिम आधार पर बाँट दिया जाये. महात्मा गाँधी ने ये ऐलान किया था की देश का विभाजन मेरी लाश पर ही हो सकता है. लेकिन बाद में कांग्रेस के तत्कालीन नेता जवाहरलाल नेहरु द्वारा तीन घंटे २… Read more »
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