लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

अंग्रेजी शासन का एक प्रमुख सूत्र था – बांटो और राज करो । उनकी उत्तराधिकारी कांग्रेस ने भी अपने जन्मकाल से ही इसे अपना लिया। तब से दल के कई नाम बदले और कई चेहरे; पर उसने इस सूत्र को नहीं छोड़ा।

खिलाफत के नाम पर कांग्रेस में मतभेद – 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत आकर गांधी जी कांग्रेस के सर्वेसर्वा बन गये। तब तक लाल-पाल-बाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल) परिदृश्य से विदा हो चुके थे। अतः गांधी जी को खुला मैदान मिल गया। हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर उन्होंने कांग्रेस में ही भेद उत्पन्न कर दिये।

खिलाफत आंदोलन को ही लें। तुर्की के खलीफा को अंग्रेजों ने गद्दी से हटाया, इससे भारत को क्या लेना था ? कुछ लीगी कठमुल्लाओं ने खलीफा की बहाली के लिए आंदोलन चलाया। गांधी जी भी उसे एकतरफा समर्थन दे बैठे। यद्यपि अधिकांश कांग्रेसजन इसके विरुद्ध थे। संघ के संस्थापक डा0 हेडगेवार उस समय नागपुर में कांग्रेस में ही सक्रिय थे। उन्होंने खिलाफत को ‘अखिल आफत’ कहा था।

गांधी जी को लगता था कि खिलाफत के समर्थन से मुसलमान स्वाधीनता आंदोलन का समर्थन करने लगेंगे; पर वे भूल गये कि स्वाधीनता मोलभाव की चीज नहीं है। यह आंदोलन कुछ समय बाद अपनी मौत आप ही मर गया; पर इसने भारत के मुसलमानों और हिन्दुओं में स्थायी विषमता पैदा कर दी। बड़ी संख्या में हिन्दुत्वप्रेमी कांग्रेसी भी अलग होकर बैठ गये।

वन्दे मातरम् को काटा – अंग्रेज अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए भारत के नागरिकों को बांटना चाहते ही थे। उन्होंने इसके लिए मुसलमानों की पीठ पर हाथ रख दिया। मुसलमान नेता उनकी शह पर आंदोलन चलाते थे और वे उनकी निरर्थक मांगों को कुछ ना-नुकर के बाद मान लेते थे। इससे मुस्लिम नेताओं का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ गया।

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल को दो भागों में बांट दिया; पर पूरे देश में हुए व्यापक विरोध के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। इस आंदोलन के सूत्रधार लाल-बाल और पाल ही थे। वंदे मातरम् इसका मंत्र था। मंदिर, पवित्र नदियां और रक्षाबंधन का धागा जैसे हिन्दू प्रतीकों के माध्यम से यह आंदोलन चला। इस समय गांधी तथा नेहरू कहीं परिदृश्य में नहीं थे; पर आगे चलकर इन्होंने वंदे मातरम् को ठुकरा दिया। बहुत दबाव पड़ने पर उसका केवल पहला छंद राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया।

राष्ट्र ध्वज का विभाजन – वन्दे मातरम् जैसा व्यवहार भगवे झंडे के साथ भी हुआ। जब राष्ट्रध्वज का प्रश्न उठा, तो झंडा कमेटी ने सर्वसम्मति से भगवा ध्वज को मान्यता दी; पर कांग्रेस ने इसे छोटाकर इसमें सफेद और हरे रंग की पट्टियां जोड़ दीं। इस प्रकार उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के मंत्र और ध्वज को बांटने का भी पाप कर दिखाया। परिणाम यह हुआ कि जो देशवासी 1905 में केवल एक राज्य के विभाजन पर आंदोलित हो उठे थे, वही 1947 में चुपचाप बंटवारे को देखते रहे।

देश का विभाजन – 1947 के घटनाक्रम से स्पष्ट हुआ है कि कांग्रेस और विशेषकर नेहरू की सत्तालिप्सा से ही विभाजन हुआ। यदि स्वाधीनता का संघर्ष कुछ वर्ष और चलाने का साहस इनमें होता, तो भारत अखंड रहता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति बहुत बिगड़ गयी थी। अतः बहुत बड़ी अंग्रेज सेना को भारत में रखना संभव नहीं था और भारतीय छावनियों में जयहिन्द और सुभाष चंद्र बोस का बोलबाला था। ऐसे में उन्हें तो जाना ही था; पर सत्ता के लालच में कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार कर लिया। इतना ही नहीं, नेहरू की देन अनुच्छेद 370 के कारण कश्मीर घाटी में विभाजनवादी फिर जोर पकड़ रहे हैं।

भाषा के आधार पर राज्यों को विभाजन – देश के सुचारू संचालन के लिए प्रशासनिक सुविधानुसार नये राज्यों का निर्माण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रायः इनका निर्माण भौगोलिक संरचनाओं अर्थात नदी, पहाड़ आदि के आधार पर होता है; पर नेहरू ने इसके लिए भाषा को मुख्य आधार बना दिया। इससे अनेक जगह हिंसक संघर्ष हुए। राज्यों के निर्माण को पचास साल बीतने पर भी आज तक भाषायी विवाद बने हैं। चंडीगढ़ तथा बेलगांव का विवाद बार-बार मियादी बुखार की तरह उभर आता है। मुंबई के कुछ राजनीतिक ठेकेदार वहां से मराठीभाषियों के अतिरिक्त शेष सब को बाहर जाने को कहते हैं। इसकी प्रतिक्रिया कभी असम में होती है तो कभी बिहार में। लोगों के दिलों को जोड़ने वाली भाषा को कांग्रेस ने तोड़ने का हथियार बना दिया।

हिन्दी-अंग्रेजी के नाम पर उत्तर-दक्षिण में भेद – इसके बाद कांग्रेस ने हिन्दी तथा सभी भारतीय भाषाओं को दासी तथा अंग्रेजी को रानी बना दिया। (आओ रानी हम ढोएंगे पालकी, यही हुई है राय जवाहर लाल की – नागार्जुन) कांग्रेस ने यह भय फैला दिया कि हिन्दी के प्रसार से उत्तर भारत वाले दक्षिण पर हावी हो जाएंगे। इससे दक्षिण और विशेषकर तमिलनाडु में व्यापक हिन्दी विरोधी आंदोलन हुए, जिससे देश को भारी हानि पहुंची।

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनते ही उनकी दून मंडली सत्ता में हावी हो गयी। अति सम्पन्न घरों के ये लोग बोलते ही नहीं, तो सोचते भी अंग्रेजी में थे। इसका परिणाम यह हुआ कि हर गांव और शहर में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय कुकुरमुत्ते की तरह उग आये। इनके छात्र न ठीक हिन्दी जानते हैं और न अंग्रेजी। रोमन अंकावली को अंतरराष्ट्रीय अंकों के नाम पर सबने स्वीकार कर लिया है। नयी शहरी पीढ़ी हिन्दी बोल तो सकती है; पर लिख और पढ़ नहीं सकती। अब बची हुई हिन्दी को भी बोलियों में बांट कर उसे और लुंज-पुंज करने का प्रयास हो रहा है।

जातीय विभाजन – कांग्रेस ने अपनी सत्ता को स्थायी बनाये रखने के लिए देश के सभी वर्गों को जाति के आधार पर भी बांट दिया। आरक्षण के बारे में लोगों के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। यदि आजादी मिलते ही शासन प्रयास करता, तो आरक्षण के साथ ही देश में समरसता फैलाने वाले कार्यक्रम भी लागू हो सकते थे। शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर बच्चे को अभिभावकों द्वारा अधिक घी, दूध देने या ट्यूशन करवाने से शेष भाई-बहिन नाराज नहीं होते। ऐसे ही शासन को भी यहां अभिभावक की भूमिका निभानी चाहिए थी; पर कांग्रेस ने इसके बदले जातीयता को बढ़ावा दिया। इससे आरक्षण के साथ-साथ जातीय विद्वेष भी स्थायी हो गया है। 1947 से पूर्व हिन्दू समाज में जातीय संघर्ष के उदाहरण नहीं मिलते; पर अब ऐसा नहीं है। हिन्दुओं को बांटकर कांग्रेस और अन्य सत्तालोलुप दल अब मुसलमानों और ईसाइयों को भी बांट रहे हैं।

हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा – भारत में विदेशी और विधर्मियों के आक्रमण के कारण बड़ी संख्या में धर्मान्तरण हुआ। फिर भी खून के संबंध होने के कारण दोनों में झगड़ा प्रायः नहीं होता था। अंग्रेजों ने 1857 के संघर्ष से यह जान लिया कि स्थायी राज्य के लिए हिन्दू और मुसलमानों को सदा लड़ाते रहना होगा। अतः उन्होंने सरकारी कत्लखानों में मुस्लिम कसाइयों को रखकर गोहत्या कर्राइं। कांग्रेस ने इसे बंद करने के बदले हजारों यंत्रचालित कत्लखाने खोल दिये। अतः गाय के नाम पर आज भी दोनों समुदाय लड़ते रहते हैं।

विभिन्न आयोगों के नाम पर विभाजन – कांग्रेस ने अल्पसंख्यक आयोग स्थापित कर हिन्दुओं के बीच स्थायी विभाजन के विषबीज बो दिये। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का आधार मुख्यतः रक्त समूह होता है। इस नाते यहां केवल यहूदी और पारसी ही अल्पसंख्यक हैं; पर उन्होंने अपने लिए कभी विशेषाधिकार नहीं मांगे। इसी से वे नौकरी हो या व्यापार, सब जगह उच्च स्थानों पर हैं। उनकी देशभक्ति और योग्यता पर कभी किसी ने संदेह नहीं किया।

पर शासन ने मुसलमानों और ईसाइयों के साथ हिन्दू मां की संतान सिख, जैन और बौद्धों को भी अल्पसंख्यक बना दिया, जबकि इनमें से कोई अल्पसंख्यक नहीं है। मुसलमान और ईसाई भी हिन्दुओं की तरह शत-प्रतिशत भारतीय हैं; पर वोट के लिए कांग्रेस इन्हें हिन्दुओं के विरुद्ध खड़ा कर रही है। इससे जहां इनके प्रति संदेह उत्पन्न हो रहा है, वहां इनकी उन्नति में भी बाधा पड़ रही है। सच्चर और रंगनाथ आयोग द्वारा कांग्रेस इस विभाजन को और मजबूत कर रही है। अल्पसंख्यक सुविधाओं के चक्कर में सिख, जैन और बौद्ध भी हिन्दुओं से क्रमशः दूर हो रहे हैं।

श्रीराम जन्मभूमि का विभाजन – विभाजन का ताजा षड्यन्त्र है अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का विभाजन। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 1857 के बाद जन्मभूमि को हिन्दुओं को सौंपने के लिए स्थानीय मुसलमान तैयार हो गये थे; पर अंग्रेजों ने इस मुहिम के नेता बाबा रामचरण दास और अमीर अली को फांसी देकर झगड़ा समाप्त नहीं होने दिया। 1947 के बाद कांग्रेस भी इसी षड्यन्त्र में लगी रही।

क्या ही अच्छा होता यदि सोमनाथ के साथ ही अयोध्या, काशी और मथुरा के विवाद भी समाप्त कर दिये जाते; पर कांग्रेस शासन ने भगवान रामलला के प्राकट्य के बाद वहां ताला ही लगवा दिया। वी.पी.सिंह और नरसिंह राव ने अपने प्रधानमंत्री काल में मंदिर के साथ या ऊपर-नीचे मस्जिद बनवाने के कई तरह से षड्यन्त्र किये। यद्यपि वे हर बार इसमें विफल रहे।

और अब न्यायालय द्वारा जन्मभूमि के विभाजन का षड्यन्त्र हो रहा है। जो स्थान सदा से श्रीरामलला का है, उसे तीन भागों में बांटने का निर्णय करवाया गया है। कांग्रेस जानती है कि यह षड्यन्त्र भी विफल होगा; पर इसके माध्यम से मुसलमानों के वोट तो पक्के होंगे ही।

संघ को अलग करने का प्रयास – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुओं की आंख का तारा है। समाज के हर सुख-दुख में स्वयंसेवक सदा आगे खड़े नजर आते हैं। अब कांग्रेस भगवा आतंकवाद का शिगूफा छोड़कर संघ के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को फंसाना चाहती है। उसकी इच्छा है कि इस बहाने संघ हिन्दू समाज में अलग-थलग पड़ जाए। दुर्भाग्यवश मीडिया भी बिना कुछ जाने इसमें सहयोगी बन रहा है।

कांग्रेस का मंत्र, तंत्र और यंत्र ही ‘बांटो, बांटो और बांटो’ है। देश-विभाजन से लेकर जन्मभूमि के विभाजन तक की कहानी इसका प्रमाण है। इसे प्रत्येक देशभक्त को समझना होगा।

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