लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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भारत

भारत

भारत में जातियों का वर्गीकरण और उनकी सामाजिक स्थिति को विकृत करने का काम अंग्रेजों ने किया। भारत की प्राचीन वर्णव्यवस्था कर्म के आधार पर थी। कर्म से ही व्यक्ति का वर्ण निश्चित किया जाता था, कर्म परिवर्तन से वर्ण परिवर्तन भी सम्भव था। इसलिए एक शूद्र के ब्राह्मण बनने की पूर्ण सम्भावना थी। कालान्तर में शिक्षा के अभाव, वर्ण व्यवस्था को परम्परागत बनाने की मानव की प्रकृति, (कुम्हार का बच्चा कुम्हार बन जाता है) तथा अपने-अपने वर्ण के लिए निश्चित कर्म (जैसे ब्राह्मण का कर्म वेद का पढऩा-पढ़ाना है) में बरते जाने वाले प्रमाद के कारण स्थिति बदल गयी और वर्णव्यवस्था हमारे लिए एक परम्परागत रूढि़ बन गयी। तब ब्राह्मण का कम पढ़ा-लिखा बच्चा भी ब्राह्मण माना जाने लगा।

इस रूढि़ को समाप्त कर भारत की प्राचीन वर्णव्यवस्था को सुधारने की आवश्यकता थी। लेकिन इसमें कोई सुधार नहीं किया गया। अंग्रेजों के सामने दो बातें थीं-एक तो वह भारत को सही अर्थ और संदर्भों में समझने और जानने के लिए तैयार नहीं थे, दूसरे वह भारत के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त अंतर्विरोधों और विसंगतियों को और भी अधिक गहरा करके उनका राजनीतिक लाभ उठाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारत के बारे में सर्वप्रथम यह तथ्य स्थापित किया कि यहाँ पर प्राचीन काल से बाहरी लोगों का आना लगा रहा। ‘‘काफि ले आते गये और हिन्दुस्तान बनता गया’’ आर्यों को भी विदेशी बताया गया और उस काल से लेकर शक, हूण, कुषाण, गूर्जर, सातवाहन, तुर्क, मुगल, पठान, अंग्रेज़, डच, फ्रांसीसी, और पुर्तगाली लोगों के आने वाले काफि लों को यहाँ के मूल समाज के साथ कुछ यूँ संलग्न किया गया कि ऐसा लगने लगा, जैसे यहाँ के मूल निवासी तो जंगली जीवन ही जीते थे। उनके सामाजिक रीति-रिवाज आदिकाल के थे, और बाहरी लोगों ने आकर ही यहाँ आदिवासी जनजातियों के रूप में उन्हें स्थापित किया। इस प्रकार हमारे विषय में विदेशियों द्वारा एक झूठ को सच के रूप में स्थापित किया गया और हम भारतीयों ने विदेशियों की इस वैचारिक जूठन को पूँछ हिला-हिलाकर खाना आरम्भ कर दिया, और आज तक खा रहे हैं। इसलिए देश में आज राष्ट्रवाद की भावना संकट में हैं। हम एक थे, एक हैं, और मुट्ठी भर विदेशी लोगों को छोडक़र शेष सारा भारतवर्ष ऋषि पूर्वजों और लोकहित के लिए समर्पित रहे मान्धाता, भगवान राम, युधिष्ठिर, कृष्ण और ऐसे ही विभिन्न भूपतियों की संतानें हैं-यह बात स्थापित होनी चाहिए थी, परन्तु की नहीं गयी। आज सब जैसे ‘‘मेड इन इंग्लैंड’’ से क्रय करते हैं, वैसे ही हम ‘‘मेड इन अमेरिका’’ के भारत विषयक विचारों को क्रय रहे हैं, और विद्वान होने के पदक को पाकर अपनी पीठ स्वयं ही थपथपा कर धन्य भाग हो रहे हैं। यह अशोभनीय सोच हमारा पीछा कर रही है और हम झूठ मूठ ही कहे जा रहे हैं-‘गर्व से कहो मैं भारतीय हूँ,’ अपनी जड़े विदेशों में टटोलकर भी भारतीय होने पर गर्व कैसे हो सकता हैं?

अनुसंधान की दिशा ठीक नही है, तो हिंदुस्तान की दशा भ्रमित हो गयी। भारत को भारत में टटोलना होगा। स्मरण रहे कि यदि भारत विदेशी होता तो भारत का नाम भारत नहीं होता। यह किसी विदेशी भाषा का ही नाम होता।

जहाँ तक भारत में जातियों को ‘जहर का इंजेक्शन’ बनाकर  अंग्रेजों द्वारा भारत की नसों में चढ़ाने का प्रश्न है तो 1861 की जनगणना के अंतर्गत जे.ए.बेन्स ने जातियों को उनके परम्परागत व्यवसाय का आधार प्रदान किया, और चरवाहों को उसने वन जातियों के सदस्य कहा। उनकी संख्या उस समय एक करोड़ आठ लाख अनुमानित की गयी। 1901 की जनगणना के समय उन्हें प्रकृतिवादी कहा गया। 1911 की जनगणना में उन्हें ‘‘जनजातीय प्रकृतिवादी अथवा जनजातीय धर्म को मानने वाले कहा गया। 1921 की जनगणना में उन्हें ‘‘पहाड़ी व वन्य जातियों’’ का नाम दिया गया। 1931 में उन्हें ‘‘आदिम जनजातियाँ’’  कहा गया। भारत सरकार अधिनियम 1935 में जनजातीय जनसंख्या को ’’पिछड़ी जनजातियाँ’’ कहा गया। सन्  1941 की जनगणना में उन्हें केवल ‘‘जनजातियाँ’’ कहा गया। तब उनकी कुल जनसंख्या लगभग 2.47 करोड़ आँकी गयी।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत के संविधान के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों का उल्लेख किया गया है। जिन्हें राष्ट्रपति घटा या बढ़ा सकते हैं। तब से कुछ लोगों को स्थायी रूप से हमने इन जनजातिया के सदस्य मानना आरंभ कर दिया है। 1891 में जो एक बुराई आरम्भ हुई थी, 1950 के संविधान ने उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे सही होने का नाम दे दिया। अंग्रेजों ने आदिवासी लोगों के मध्य अपनी मिशनरीज स्थापित कीं और हमारे अनुसूचित जनजाति के लोगों को भारतीय समाज से अलग स्थापित कर ईसाई बनाया। आज के अधिकांश ईसाई ऐसे ही पुराने भारतीय समाज के लोग हैं। जबकि आज की सरकारें उन्हें आरक्षण दे देकर शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में बढऩे के लिए विद्यालय और स्थान न देकर उन्हें अकर्मण्य कर रही हैं, इसलिए वे लोग आज भी धर्मपरिवर्तन कर रहे हैं। 1947 से अब तक हमने अनुसूचित जनजातियों को लेकर इतना ही विकास किया हैं।

मानव ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। मानव मानव परस्पर बन्धु हैं, क्योंकि वह सब एक ही पिता की सन्तानें हैं। हर मानव अमृत पुत्र है, आर्य पुत्र है। भारत की इसी पुरातन सोच के अनुकरणीय मूल्य को वर्तमान के जातिवादी समाज में स्थापित करने की आवश्यकता है। तभी भारत ‘विश्वगुरू’ बनेगा।

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6 Comments on "हमारा मूल विदेशों में नही, भारत में है"

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Himwant
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भारत को पर लम्बे समय तक अक्रान्ताओ ने राज किया. उनका राज तभी चल सकता था, जब वे भारत को विभाजित रखते. इस कारण उन्होंने जाती आधारित विभाजन रेखाए तैयार की. आज जब अधिकाँश सवर्ण समाज इस जाती व्यवस्था से कोई सरोकार नही रखता फिर भी भारत ओ कमजोर देखने की मंशा रखने वाले लोग इस खाई को और चौड़ी करना चाहते है. समझदारी इसी में है की जाती आधारित कोई प्रकार का विभेद है तो हम उससे जितनी जल्दी हो छुटकारा पा ले. और जबरजस्ती इसे राजनितिक मुद्दा न बनाए, जैसे रोहित की आत्महत्या पर नक्सली वद्यार्थी संगठन कर… Read more »
आर. सिंह
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यह सही है कि वर्ण व्यवस्था के प्रारंभिक कालों में वर्ण कर्म पर आधारित था,पर यह व्यवस्था ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य तक ही सीमित था.शूद्र इस व्यवस्था से बाहर थे.शूद्र पराजित अनार्य श्रेणी से आते थे,जब कि अन्य तीनों वर्ण विजेता आर्य श्रेणी के थे.

राकेश कुमार आर्य
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राकेश कुमार आर्य
आदरणीय आर सिंह जी, अपने राष्ट्र और समाज के हित में यह उचित होगा कि हम विदेशियों द्वारा अपने विषय में फैलाई गई उन भ्रांत धारणाओं से अपने आप को बाहर निकालें जिनके कारण हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना हो। जिन लोगों ने भारत के प्राचीन साहित्य में जोड़-तोड़ करके या काट छांट करते अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ नयी बातें जोड़ने का निन्दित कार्य किया है, अच्छा हो कि उनके उस कृत्य की समीक्षा कर उसे भारतीय साहित्य के लिए अनर्गल माना जाए। केवल आलोचनाएँ करते रहने से समाज में वर्ग संघर्ष… Read more »
Dr Ranjeet Singh
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मान्यवर! आपने लिखा – “भारत की प्राचीन वर्णव्यवस्था कर्म के आधार पर थी। कर्म से ही व्यक्ति का वर्ण निश्चित किया जाता था, कर्म परिवर्तन से वर्ण परिवर्तन भी सम्भव था। इसलिये एक शूद्र की ब्राह्मण बनने की पूर्ण सम्भावना थी”। परन्तु ऐसा जो आपने लिखा इसमें कोई भी प्रमाण आपने नहीं दिया। उसके अभाव में मात्र एक दृढोक्ति के आधार बल पर कौन आस्तिक कोई भी बात स्वीकार कर लेगा – और स्वीकार कर सकता है? स्वकथन की पुष्टि में कोई प्रमाण तो आपको देना ही चाहिये था। तथा च, क्योंकि आप ‘आर्य’ हैं और स्वामी श्रीदयानन्द जी के… Read more »
राकेश कुमार आर्य
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राकेश कुमार आर्य

मान्यवर रणजीत सिंह जी,
होली की शुभकामनाओं के साथ आपसे विनम्र अनुरोध है कि यदि आपने मुझसे कोई जिज्ञासा व्यक्त की है तो उसके लिए आपके भीतर अपेक्षित जिज्ञासु भाव का होना भी अपेक्षित है। जबकि आपकी प्रतिक्रिया में व्यंग्य है। जिज्ञासु विनम्र भाव लेकर ही ज्ञानार्जन करना उचित होता है। किसी पर कटाक्ष करके आप कभी ज्ञानर्जित नहीं कर सकते। मैं आपकी जिज्ञासा का तभी उत्तर दूंगा जब आप विनम्र भाव से अपनी जिज्ञासा शांत कराने की बात करेंगे। आपको यदि कोई कष्ट हुआ हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी। हूँ।
सादर

Dr Ranjeet Singh
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मान्यवर! आपने लिखा – “भारत की प्राचीन वर्णव्यवस्था कर्म के आधार पा थी। कर्म से ही व्यक्ति का वर्ण निश्चित किया जाता था, कर्म परिवर्तन से वर्ण परिवर्तन भी सम्भव था। इसलिये एक शूद्र की ब्राह्मण बनने की पूर्ण सम्भावना थी”। परन्तु ऐसा जो आपने लिखा इसमें कोई भी प्रमाण आपने नहीं दिया। उसके अभाव में मात्र दृढोक्ति के आधार पर कौन आस्तिक कोई भी बात स्वीकार कर लेगा – और स्वीकार कर सकता है? स्वकथन की पुष्टि में कोई प्रमाण तो आपको देना ही चाहिये था। तथा च, क्योंकि आप ‘आर्य’ हैं और स्वामी श्रीदयानन्द जी के आर्य हैं;… Read more »
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