लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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बी एन गोयल

 

मुझे श्री बी एस आनंद प्रायः याद आते हैं – उन के साथ कभी काम नहीं किया. वे जलंधर में थे और मैं अहमदाबाद में. लेकिनबहुत बार उन से उन के संस्मरण सुने. पहली भेंट उन से हुई जब वे रिटायर हो करस्टाफ ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में लेक्चर देने के लिए आये थे.चुस्त दुरुस्त आकर्षक व्यक्तित्व. उन का लेक्चर एक प्रकार से अनौपचारिक और व्यवहारिक अनुभवों से भरपूरथा. लेक्चरमें ही उन्होंने बताया कि वे प्रधान मंत्री पंडितनेहरु के साथ ही केम्ब्रिज में पढ़े हैं. हम सब के लिए यह एक बहुत बड़ी बात थी. हम ने पूछा,‘क्या आप दोनों क्लास फेलो थे? ‘नहीं, क्लासफेलो तो नहीं, हाँ, कालिज एक ही था क्लास अलग. हम वहां इंडियन स्टूडेंट्स एसोसिएशन की मीटिंग में मिलते थे,’उन का उत्तर था.हमने निवेदन किया, ‘‘इस से जुड़ा कोई संस्मरण सुनाएँ’. आनंद साहब ने बताया.

 

वे जलंधर आकाशवाणी केंद्र के डायरेक्टर थे. एकदिनसन्देश मिला कि उन्हेंअमुक दिन प्रधान मंत्रीनिवास पर बुलाया गया है.सन्देश पर विश्वास नहीं हुआ, कुछ अजीब सा भीलगा किउन्हें पी एम हाउस पर सीधे इस तरह से बुलाएँ. महा निदेशालय से मालूम किया लेकिनवहां भी किसी को कुछ खबर नहीं. दिल में धुकधुकी सी हुई. सोचते रहें कि कहीं कोई गलती हुई या किसी ने कुछ शिकायतकी.जो भी हो नींद उड़ गयी. एक तरह से जान सांसत में औरजाना भी ज़रूरी. अपनी तरफ से हमने कायदे क़ानून के अनुसार सबको सूचित किया और म० नि० से स्वीकृति भी ले ली.

 

निश्चित तिथि पर तीनमूर्ति भवनपहुँच गए. रेसप्शन पर अपना नाम दिया. जैसाकि होता है उन के पास भी मेरा नाम था. मुझे बताया गया कि‘अभी कोई विशेष मीटिंग चल रही है, थोडा इंतज़ार करें, आप का नंबर आएगा तो बुला लेंगे’. हम वहीँ लॉनमें बैठ गए. अन्दर दिल नें धुक धुक कि‘यह पेशी किस लिए है, ऑफिस के प्रोटोकोल में मेरी कहीं गिनती नहीं, व्यक्तिगत रूप से मेरी कोई मित्रता नहीं.’ लगभग एक घंटा के बाद मीटिंग ख़त्म हुई. देखा पंडित नेहरु किसी विदेशी मेहमान को छोड़ने बाहर तक आये थे. उन्हें छोड़ने के बाद जैसे ही अन्दर जाने लगे तो उन्होंने एक नज़र लॉन में इंतज़ार करते हुए लोगों की तरफ डाली और अन्दर चले गए.

 

इन्हीं में मैं भी था और लगा कि उन्होंने मुझे देख लिया है.कुछ समय बाद मुझे सन्देश मिला कि अभी थोड़ी देर में आप को बुलाते हैं. लगभग आधा घंटा के बाद एक व्यक्ति मुझे ले जाने के लिए आया. धडकते दिल से मैं अन्दर गया, सामनेहाथ जोड़ कर नमस्ते की. परन्तु प्रधान मंत्री खड़े होकर गले लगे और जोर से बोले,

‘अरे बलवंत सिंह कहाँ हो, अभी कुछ दिन पहले पता चला कि आप जालंधर में हो.’

-कुछ बात थी सर ?

-अरे नहीं भाई, आप के पंजाब केगवर्नरकी कोई रिपोर्ट आयी थी जिस में बलवंत सिंह आनंद का नाम था. मैंने सोचा यह कोई और नहीं आप ही होंगे.

मेरी मानसिक स्थिति अभी भी संतुलित नहीं थी.मैंने हिम्मत कर के पूछा–‘कैसी रिपोर्ट सर’.

‘अरे भाई आप पंजाब गवर्नर के यहाँ किसी मीटिंग में गए थे, रिपोर्ट में मीटिंग में आने वालों के नामों की लिस्ट होती है. उस में आप का नाम था – मैंने पढ़ा तो लगा कि ये वही आनंद हैं जो कभी केम्ब्रिज में हमारे साथ थे. सोचा बुला कर बात ही की जाये’.

 

मेरी जान में जान आयी. एक तो पंजाब उस समय बड़ा प्रदेश था – इस में हरियाणा, हिमाचल और चंडीगढ़ भी शामिलथे. उन दिनों राज्य के गवर्नर एक देसी रियासत के पूर्व महाराजा थे इस लिए थोडा तुनुक मिजाज़ भी थे. जलंधर आकाशवाणी केंद्र पंजाब का क्षेत्रीय केंद्र था. उन दिनों आकाशवाणी के क्षेत्रीय केंद्र के निदेशक राज्यस्तर के सभी समारोह तथा मीटिंग में निमंत्रित होते थे.उन के लिए भी एक प्रोटोकोल था. अतः मुझे सरकारी मीटिंग में जाना ही होता था. तसल्ली यह हुई कि इतने वर्षों के बाद भीप्रधान मंत्री को मेरी याद थी.”थोड़ी देर बातचीत करने के बाद मैंने उन से विदा ली.उनके यहाँ से निकल कर एक आजाद पक्षी की तरह राहत की सांस ली.यह एक तरह से किसी लम्बी डोर के दो छोरों के मिलने जैसा था.” स्टाफ ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के हम सबयुवकों के लिए भी यहएक आश्चर्य ही था.

 

समय बीतता गया. हमदिल्लीविदेश प्रसारण सेवा .से होते हुए रोहतक पहुँच गए.एक दिन के० नि०लाल साहब ने बुला कर कहा – आपबी एस आनंद जी को जानते हो, वो आज यहाँ हैं – उन के कुछ संस्मरण रिकॉर्ड कर लो. नेकी और पूछ पूछ. मालूम यह हुआ की उन का बेटा हरजीत सिंह आनंद IAS हो गया है और उन की पहली पोस्टिंग SDM के तौर पर रोहतक हो गयी है. इस का सीधा अर्थ अब आनंद साहब रोहतक आते रहेंगे.

इस तरह अनेक बार उन से मिलना हुआ –बहुत सी बातें हुई. हरजीत सिंह जी ने बाद में Ph.D की, उनके  विवाह के अवसर पर आनंद साब ने हमारे ग्रुप को भीआमंत्रित किया था हरजीत सिंह भारत सरकार के सचिव पद से रिटायर हुए हैं.

 

इसीतरह एक और घटना. एक दिन जब आनंद साहब रोहतकआये हुए थे तो उन्होंने हमारे केंद्र के एक पुराने कर्मचारी श्री सहगल को देखा. वह जलंधर और दिल्ली केंद्र पर काम करचुका था. चतुर्थ श्रेणी में भी उस का दर्जा एक सुपरवाइजर जैसा था.अतःवह प्रायः सूट और टाई में आना पसंद करता था.

 

यहाँथोड़ीसीबात ऑफिस की व्यवस्था से सम्बंधित -जैसा की प्रत्येक ऑफिस में होता है आकाशवाणी में भी कुछ पद केवल यहींके लिए विशिष्ठ होते थे. जैसे भारत सरकार के अन्यकार्यालयों में LDC/UDC होते हैं. आकाशवाणी में UDC के समकक्ष प्रोग्राम सेक्रेटरी होता था. उसकीपदोन्नतिभी आगे उसीकेडर में ही होती थी. इसी तरह चतुर्थ श्रेणी पदों में कुछ विशिष्ठ पद थे– स्टूडियोअटेंडेंट, स्टूडियो गार्ड आदि. जिन दिनों की हम बात कर रहे हैं उन दिनों एक पद का नाम स्टूडियो कमिशार होता था. यह चतुर्थ श्रेणी में नीचे से ऊपर दुसरे नंबर पर होता था. इसपद के व्यक्ति का काम स्टूडियो की आवश्यकताओं को देखना, वहां की साफ़ सफाई कराना, स्टूडियोमें पानी की व्यवस्था कराना, वार्ताकारों, कलाकारों आदि को ठीक से बैठना आदि था.

 

आनंद साहब ने बताया कि एक बार राज्य सरकार के एक स्थानीय समारोह का निमंत्रण पत्र आया. वे स्वयं अन्यत्र व्यस्त थेअतःउन्होंने खेद का पत्र समय रहतेभेज दिया. कुछ दिनों के बाद राज्य सरकार के एक अधिकारी आनंद साब से अचानक मिले तो उन्होंने आनंद साब से समारोह में उन की अनुपस्थिति की चर्चा की. आनंद साब ने कहा  कि वे अन्यत्र व्यस्त थे और उन्होंने खेद की सूचना भेज दी थी. अधिकारी महोदय ने बताया कि आप का खेद पत्र भी मिला और आप आये भी नहीं लेकिन आप के कमिश्नर महोदय तो आये थे. कमिश्नर महोदय – आनंद साब ने कहा हमारे यहाँ तो कोई  कमिश्नर जैसा व्यक्ति नहीं होता – अधिकारी महोदय ने पूरे विश्वास से कहा, नहीं वे आये और उन्होंने स्वयं को आकाशवाणी का कमिश्नर बताया. आनंद साब ने उन से कुछ नहीं कहा लेकिन इस की जांच शुरू कर दी.

 

अंत में पता लगा की हमारे स्टूडियो कमिशार साब कमिश्नर बन कर समारोह में पहुँच गए थे. उन्हें मालूम था किनिदेशक महोदय तो आयेंगे नहीं और इतने बड़े समारोह में किसी को पता भी नहीं चलेगा. आनंद साब ने उसी समय म.नि. से इस पद नाम बदलवा कर स्टूडियो अटेंडेंट कराया. इसी तरह कुछ अन्य पदों के नाम भी बदले गए –

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय ।

आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय ॥

 

 

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2 Comments on "परम्पराएँ प्रसारण की (2) – दोछोर"

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​शिवेंद्र मोहन सिंह
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​शिवेंद्र मोहन सिंह

हा हा हा हा हा हा

yogeshwar sharma
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wah wah wah. kitnee mahaan parmpara thin iss desh men .

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