लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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sanjay joshiहमारे देश में अवलेह, पाकड़, पीपल, केला, तुलसी आदि वृक्षों की पूजा होती है। जानवरों में कई जानवरों से प्रेम किया जाता है और उन्हे पालतू बनाकर रखा जाता है । इतना ही नही , कुछ पशु तो ऐसे है जिनकी पूजा होती है । क्यों होती है यह बात आज के युवा कम ही समझते हैं । लेकिन इसका सांस्कारिक महत्व क्या है इस बात पर अब विचार करने का समय इसलिये भी आ गया है क्योंकि  देश ही नही पूरा विश्व पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्या को लेकर चिंतित हो गया है कि आखिर पृथ्वी का क्षरण रोका कैसे जाय। क्योंकि अगर पृथ्वी ही नहीं रहेगी तो लोग कहां रहेगें ? ग्लेशियर पिघलते जायेगें तो पानी कहां से आयेगा और भूकंप के झटकों व ज्वालामुखी के उपद्रव से कौन रक्षा करेगा । यह बात आज एक वार्ता के दौरान भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय विनायक जोशी ने कही ।

उन्होने कहा कि वनस्पतियों की पूजा सनातन काल से ही होती चली आ रही है , पितरों के लिये जहां हम पीपल को आधार मानकर घंटा बांधते है वही गृहदशा को ठीक करने के लिये भी उसकी पूजा होती है । यहां यह बता देना कि यह शाश्वत है जिसका लाभ भी मिलता है । इसी तरह तुलसी हर घर में पूज्यनीय है और इसके औषधीय  महत्व को भी  कम नही आंका जा सकता। वट वृक्ष मांगलिक दोष को दूर करता है तो गाय घर में समृद्धि लाती है इसी को सोचकर गोदान की व्यवस्था का जन्म हुआ था लेकिन अब सब खत्म सा होता जा रहा है ।पिछली सरकारों ने इस सिद्धान्त पर काम नही किया और पर्यावरण आज हमारे लिये समस्या बन गया है। जिसके कारण देश में कई तरह के परिवर्तन होने की बात कही जा रही है।

संजय जोशी ने कहा कि अभी हाल में ही पेरिस में एक कार्यक्रम का आयोजन इसी बात को लेकर हुआ जिसमें विश्व के 195 देशों ने हिस्सा लिया । जिसमें कहा गया कि अगर ग्लोबल वार्मिग एक प्रतिशत और बढ जाय तो भारत देश का 39 प्रतिशत हिस्सा जलमग्न हो जायेगा । कल्पना कीजिये कि अगर एहतियात के तौर पर कदम न उठाये गये तो एक नयी समस्या जन्म ले लेगी कि आखिर इस भूमि पर रहने वाले लोगों को आश्रय कहां दिया जाय ?  इसमें यह भी कहा गया कि बाग्लादेश जैसे कई देश जलमग्न होकर विश्व के पटल पर दिखेगें ही नहीं । इसलिये समय रहते इसका निदान आवश्यक है और सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिये । उन्होनें भारत सरकार द्वारा इस मसले पर अपनी प्रतिबद्धता जताने पर काफी खुशी जाहिर की और इस दिशा में प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किये गये प्रयासों की प्रशंसा भी की ।

पर्यावरण पर बोलते हुए उन्होने कहा कि सरकार यदि चाहे तो काफी कुछ कर सकती है लेकिन जिस तरह से दो दशक पहले कीडों के नाम पर संयुक्त मध्यप्रदेश जब था तो साल वृक्षों का सफाया किया गया उससे कई नीतियां जो गलत थी वह जन्म ले गयी । चंदन के जंगल साफ हो गये , शीशम व सागौन बाजार से गायब हो गये और लकडियों को लेकर जो दुकान चली कि वृक्ष ही गायब हो गये। यह एक मास्टर प्लान था ताकि भारत को खत्म किया जा सके लेकिन समय रहते हम इस प्रयास में लगेंगें कि पर्यावरण का पर्याय  जो भी हो हम उसे सृजित करेगें और देश को खुशहाल बनायेंगें।

श्री जोशी ने सभी से अपील की अपने परिवार जनों की याद में एक वृक्ष तो कम से कम लगायें और इस परमपरा को अपनी विरासत में शामिल करें ताकि पर्यावरण  की चिंता से मुक्त होकर भारत नयीं उंचाईयों को प्राप्त कर सके और आने वाली पीढी खुली हवा में स्वस्थ होकर सांस ले सके ।

 

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1 Comment on "पर्यावरण तो हमारे संस्कारों का प्रतीक है – संजय जोशी"

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Himwant
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हम कोई भी पूजा करते है तो कलश की पूजा करते है। कलश पर्यावरण का ही तो प्रतीक है। लेकिन आज हमारी पूजा सामाग्री आजकल प्लास्टिक में बिकती है। हमारे कर्मकांडी पंडितो में पर्यावरण की समझ कम हो चली है, उपभोक्तावाद के प्रभाव से। उसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

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