लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

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women 1   डा.राज सक्सेना 

‘सतसईया’ का दोहा हो या,  ‘पदमावत’चौपाई हो ?

या बच्चन की ‘मधुशाला’की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

केश-कज्जली ,छवि कुन्दन सी,

चन्दन जैसी   गंध   लिये |

देवलोक    से     पोर-पोर में,

भर    लाई   क्या  छंद प्रिये |

चातक चक्षु,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?

या बच्चन की ‘मधुशाला’की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

रक्त – कपोल ,   नासिका तीखी,

अधर  पगे, मधु    प्याले से |

क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित-,

मृग-नयना ,   मतवाले    से |

मदमाती,मदमस्त,मुखर सी,मस्त-मस्त अंगडाई हो ?

या बच्चन की ‘मधुशाला’की, सबसे  श्रेष्ठ रुबाई हो ?

देह-कलश  से बरस    रही है,

यौवन   की   रसधार    प्रिये  |

पुष्प – लता सी  स्वर्ण-देह में,

घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |

मलयागिरि से चली मस्त हो,  मंद वही पुरवाई हो ?

या बच्चन की ‘मधुशाला’की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

प्रिय सुमुखि क्यों आई हो ?,

धरती पर  नव-छन्द लिए |

महक रहा  जो  मधुर गंध  से,

अमृत-घट  निज  संग  लिए |

सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी  –  शहनाई हो ?

या बच्चन की ‘मधुशाला’की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?

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3 Comments on "‘पदमावत’चौपाई हो ?"

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आर. सिंह
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श्रृंगार रस की एक उत्कृष्ट रचना. अति सुन्दर.

बी एन गोयल
Guest

अति सुन्दर नहीं सुन्दरतम -बधाई

डा.राज सक्सेना
Guest

उत्साह वर्द्धन के लिए आपको शतश: आभार

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