लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिंदुस्थानी

कांग्रेस पार्टी ने नेशनल हेराल्ड जैसे व्यक्तिगत मामले को जिस प्रकार से राजनीतिक रूप दिया है, वह देश के किसी भी राजनीतिक विद्वान और विधि वेत्ताओं के गले नहीं उतर रही है। वास्तव में कांग्रेस का यह कदम न्यायालयीन प्रक्रिया का अपमान है। कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस मामले में इस बात की बहुत कोशिश की कि उन्हें पेशी से छूट मिल जाए, लेकिन मामले को गंभीर मानते हुए न्यायालय ने उन्हें छूट देने से साफ इनकार कर दिया। इससे ऐसा तो लगता ही है कि मामला इतना सरल नहीं है। नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस की राजनीति पूरी तरह से देश को गुमराह करने वाली ही प्रतीत हो रही है, कांग्रेस के नेताओं ने जिस प्रकार से इसे बदले की भावना से की जा रही कार्यवाही निरूपित किया है, वह समझ से परे है।
नेशनल हेराल्ड मामला सरकार की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह मामला पूरी तरह से कांग्रेस का व्यक्तिगत है। नेशनल हेराल्ड प्रकरण धोखाधड़ी का मामला है। जिसमें कांग्रेस पार्टी ने अपने राजनीतिक अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए नेशनल हेराल्ड को ऋण उपलब्ध कराया। इस प्रकार का कार्य एक राजनीतिक पार्टी द्वारा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस ने ऐसा करके अनुचित कार्य ही किया है। इतना ही नहीं कांग्रेस ने उस ऋण को माफ़ भी कर दिया और यंग इंडिया कंपनी बनाकर उसको अपने कब्जे में ले लिया। नेशनल हेराल्ड का मामला वास्तव में राजनीतिक मामला है ही नहीं, इसमें राजनीति केवल इतनी मानी जा सकती है कि इसमें देश के सबसे पुराने दल कांग्रेस की भूमिका है। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने जब यह प्रकरण दायर किया था, तब वे भाजपा के नेता नहीं थे। फिर यह कहना ठीक नहीं कि यह सब बदले की कार्यवाही के तहत किया जा रहा है। लेकिन कांग्रेस में उभरने की जद्दोजहद में प्रयासरत राहुल गांधी इस प्रकरण को पूरी तरह से राजनीतिक बदले की भावना से की गई कार्यवाही निरूपित कर रहे हैं, जो उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता का ही प्रदर्शन करता है। राहुल गांधी जितना इस मुद्दे को उठाएंगे, उनकी कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठेंगे। कांग्रेस द्वारा इस मामले में सरकार पर आरोप लगाकर कई प्रकार के सवालों को जन्म दे दिया है। जिसकी जैसी भावना होती है, उसे चारों तरफ वैसा ही दिखाई देता है। इस पर सवाल यह भी है कि हो सकता है कि कांग्रेस ने अपनी सरकार के समय न्यायपालिका में जरूर हस्तक्षेप करने का प्रयास किया होगा। अगर नहीं किया तो सरकार पर सीधे आरोप लगाने के बजाय न्यायपालिका का सम्मान करते हुए कांग्रेस के दोनों मुखिया अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का प्रयास करते। कांग्रेस के नेताओं ने ऐसा न करके संसद में हंगामा ही मचा दिया। एक नितांत व्यक्तिगत मामले में पूरी संसद की कार्यवाही को बाधित करना देश के साथ धोखा है। धोखा इसलिए कहा जाएगा क्योंकि संसद बहस का केन्द्र तो हो सकती है, लेकिन हंगामे के लिए उसमें कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हंगामे से देश का महत्वपूर्ण समय बर्बाद होता है। उसमें लाखों रुपए व्यय होते हैं। भारत की संसद में जिस प्रकार से सरकार पर हमला बोला जा रहा है, उससे देश को बहुत बड़ी क्षति हो रही है। आज देश में भले ही राजनीतिक सत्ता परिवर्तित हो चुकी है, लेकिन संसद में जिस प्रकार की राजनीति कांग्रेस के शासनकाल में शुरू हुई थी, उसी का परिपालन करते हुए कांग्रेस संसद के सत्र को अवरोधित करती दिखाई दे रही है। इससे संसद का महत्वपूर्ण समय फिजूल ही जा रहा है। संसद अगर आगे भी इसी प्रकार के हंगामे की भेंट चढ़ती रही तो आने वाले दिनों में देश की जनता का लोकतंत्र के इस मंदिर से ही विश्वास उठ जाएगा।
वर्तमान में कांग्रेस की हालत देखकर निश्चित ही यह कहा जा सकता है कि वह राजनीति करने के लिए अपने लिए मुद्दे तलाश कर रही है, जैसे ही कोई मुद्दा मिलता है, वैसे कांग्रेस उस पर सवार होकर राजनीति करने लगती है। कैसी विचित्र बात है कि जब कांग्रेस केन्द्र की सत्ता पर काबिज थी, तब उसने भाजपा द्वारा उठाई गई चर्चा कराने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया था। किन्तु आज सरकार द्वारा चर्चा कराए जाने की बात स्वीकार कर लेने के बाद आज भी कांग्रेस चर्चा से पीछे हटती हुई दिखाई दे रही है।
कांग्रेस नेता शायद इस बात को भलीभांति जानते हैं कि चर्चा कराने पर कांग्रेस की बची हुई साख भी धूमिल हो जाएगी। हो सकता है कांग्रेस इसी डर के कारण ही चर्चा से दूर भाग रही है। यह बात सही है कि किसी भी विवाद का हल चर्चा से ही निकाला जा सकता है। अगर चर्चा नहीं होगी, तो ऐसे प्रकरणों का हल निकल ही नहीं सकता।
लोकसभा और राज्यसभा में किसी विवादित मुद्दे पर बहस होना एक स्वस्थ प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन यह बहस शोर शराबा का आधार नहीं बनना चाहिए। वास्तव में बहस के बाद ही किसी ठोस नजीजे पर पहुंचा जा सकता है, और सरकार व विपक्षी दल दोनों को ही बहस के बाद जो निर्णय निकलता है उसका अनुपालन करना चाहिए। शोर शराबा करने से संसद में कोई काम काज नहीं होता। यह शोर शराबा निश्चित रूप से देश के साथ एक धोखा है, फिर चाहे वह कांग्रेस करे अथवा भाजपा। लोकतंत्र के मंदिर संसद में बहस के नाम पर इस प्रकार का शोर शराबा बन्द ही होना चाहिए। और देश के सभी राजनीतिक दलों को रचनात्मक विरोध करने का तरीका अपनाकर ही अपनी राजनीतिक दिशा तय करना चाहिए। इसी में देश की भलाई है, और इसी से ही लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

 

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