लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ. आशीष वशिष्ठ

देश के वर्तमान राजनीतिक वातावरण इस ओर इशारा कर रहे हैं कि राजनीतिक दल आम चुनावों की तैयारियों में जुट गए हैं। असम हिंसा से लेकर कोयला घोटाले में मचा बवाल और हाय-तौबा चुनावी तैयारियों की ही कवायद का हिस्सा है। अन्ना और रामदेव के आंदोलनों ने यूपीए सरकार के खिलाफ देशभर में माहौल बनाकर विपक्षी दलों के मन में यह आस जगा दी थी कि देश में मध्यावधि चुनाव के हालात बन रहे हैं और क्षेत्रीय दलों और तीसरे मोर्च के तरफदार नेता जोड़-तोड़ और मोर्चबंदी में मशगूल हो गए। इन आंदोलनों की हवा निकालने के बाद कांग्रेस खुद को फ्रंट फुट पर समझ रही है, लेकिन कोयला घोटाले ने सरकार की मुसीबतें एक बार फिर बढ़ा दी हैं। असम हिंसा के प्रतिक्रिया स्वरूप मुंबई, लखनऊ, कानपुर और इलाहाबाद में हुई हिंसा और उपद्रव में कही न कहीं चुनावी माहौल की आहट सुनाई देती है। कोयला घोटाले में विपक्ष का सरकार को घेरने की कवायद, संसद में प्रधानमंत्री का बयान चुनावी महाभारत की वार्मिंग अप एक्सरसाइज ही तो है।

असल में पिछले आठ साल के कार्यकाल में यूपीए सरकार की छवि पर कई बदनुमा दाग लगे हैं। करोड़ों रुपये के घोटालों और तमाम कांड के खुलासे से आम आदमी की नजर में सरकार का कद बौना हुआ है। जिस तेजी से सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है उसने सरकार की पेशानी पर बल ला दिए हैं। इस विषम स्थिति से उभरने के लिए सरकार हर उस कवायद में जुटी है जिससे हवाओं का रूख उसके पक्ष में बहने लगे। विपक्ष भी सरकार के हर कदम पर नजरें गढ़ाए है, इसलिए वो हर छोटी-बड़ी घटना पर प्रतिक्रिया देने और हल्ला करने का कोई भी अवसर छोड़ नहीं रहा है। राज्यों में सत्तासीन क्षेत्रीय दलों का उत्साह भी चरम पर है तो वहीं सत्ताहीन दल भी चुनावी माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। लब्बोलुबाब यह है कि राजनीतिक दलों ने चुनावी माहौल बनाना शुरू कर दिया है।

कश्मीर से असम तक देश में हिंसा, उपद्रव और छुटपुट घटनाओं में एकाएक हुई बढ़ोतरी का संबंध प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर राजनीति और आम चुनावों से जुड़ा है इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक दल जान बूझकर छोटे और महत्वहीन मुद्दों को हवा देने और सुलगाने में लगे हैं। असम हिंसा की आड़ में देश का माहौल खराब करने की नापाक कोशिश पर तो जैसे-तैसे लगाम लग गई लेकिन इस मसले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और आचरण और बयानबाजी चुनावी माहौल को गर्माने का काम कर रही है। देश के प्रमुख विपक्षी दल ने जिस तरह बांग्लादेशियों के मुद्दे को उठाया है और बांग्लादेशी भगाओ, देश बचाओ चुनावी रणनीति का ही हिस्सा है। भाजपा इस मुद्दे को चुनावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की तैयारी में है।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज करवाने के बाद सत्तासीन समाजवादी पार्टी का उत्साह चरम पर है, फिलवक्त सपा सुप्रीमो आम चुनावों को लेकर सबसे ज्यादा बैचेन दिखाई दे रहे हैं और तीसरे मोर्च से लेकर मध्यावधि चुनाव तक की तमाम संभावनाएं टटोल रहे है। वहीं बसपा, पीस पार्टी, रालोद और अपना दल भी दमखम से तैयारियों में जुटे हैं। देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश के अलावा आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, उड़ीसा में बीजू पटनायक, हरियाणा में ओम प्रकाश चौटाला ओर गैर कांग्रेस और भाजपा शासित राज्यों में तमाम क्षेत्रीय दल चुनाव तैयारियों में कोई कसर छोडऩा नहीं चाहते हैं। मुलायम सिंह और ममता बनर्जी तो मध्यावधि चुनाव की उधेड़बुन में लगे हैं। वो अलग बात है कि अधिकतर दल और सांसद मध्यावधि चुनाव नहीं चाहते हैं। लेकिन यह बात तय है कि 2014 के आम चुनाव के लिए तैयारियां शुरू हो चुकी है क्योंकि एनडीए और खुद यूपीए के भी कुछ घटक दलों को ये आभास हो चुका है कि इन आम चुनावों में परिवर्तन की प्रबल संभावना है इसलिए राजनीतिक दल इस अवसर को खोना नहीं चाहते हैं।

जिस तरह कोयला घोटाले को लेकर बीजेपी पीएम के इस्तीफे की मांग पर अड़ी है और सरकार बैकफुट की बजाय फ्रंट फुट पर खेलती दिख रही है। उसके नेता और मंत्री अपने तर्कों से बीजेपी को ही उसके रवैये के लिए कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। देश में चल रहा यह हाई वोल्टेज राजनीति ड्रामा साफ तौर पर दर्शाता है कि भारत में चुनाव युद्ध की रणभेरी बज चुकी है और देश के सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव के लिए कमर कस ली है। लेकिन यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि चुनाव सन् 2014 में होने हैं।

चुनाव से दो साल पहले ही चुनाव अभियान शुरू कर देना पार्टियों के लिए खतरनाक हो सकता है और आज जो विवाद दिखाई दे रहा है, उसका शायद ही कोई परिणाम निकलेगा। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का आज संसद में बहुमत है, इसलिए संसद में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित करना संभव नहीं है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के सदस्य चाहे कितना भी संसद से इस्तीफा देने की धमकी क्यों नहीं दें, वे इस्तीफा नहीं देंगे क्योंकि शिव सेना के अलावा विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दूसरी किसी भी पार्टी के सांसद शायद ही इस्तीफा देंगे। दूसरी बात यह है कि संसद से इस्तीफा देने के बाद चुनाव की पूर्वबेला में भाजपा के हाथ से एक ऐसा मंच निकल जाएगा, जहां से अपनी बात सिर्फ पूरे देश से ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से कही जा सकती है। फिलहाल कोई भी यह नहीं चाहता है कि वर्तमान स्थिति में वास्तव में कोई बदलाव हो। प्रधानमंत्री संसद को भंग करके मध्यावधि चुनाव करवाने का खतरा नहीं उठाएंगे और विपक्षी दल सरकार का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री से ऐसे ही इस्तीफा मांगते रहेंगे और यह आशा करते रहेंगे कि सन् 2014 तक ऐसी ही परिस्थिति चलती रहेगी।

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