लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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आज मेरी साधना के

फूल धरती पर खिले हैं।

ये न मुरझायें कभी

ये न कुम्हलायें कभी,

इनके साथ,

मेरे सभी सपने जुड़े हैं।

मोती जो बिखरे हुए हैं,

इनसे मै माला बनाऊँ,

उलझे शब्दों से,

एक कविता बनाऊँ,

कल्पना से मै मन बहलाऊँ।

पर मन बहलता ही नहीं है,

कोई ख़ालीपन है अभी,

इस ख़ालीपन से ही,

जीवन को गति मिलेगी,

गति ही न हो तो ,

प्राणहीन मै हो जाऊँ।

कुछ सपने सजते हैं कभी,

कुछ टूट जाते हैं,

आस जिसकी करू,

वो नहीं मिला तो क्या,

जो मिला है बहुत है,

ईश के भंडार से,

इसी मे से कुछ लुटादूँ,

उसी के दरबार मे,

कुछ न ऐसा करूं मै,

जो किसी के , अहित मे हो,

मुझको इतनी शक्ति देना,

जो सोचूं वो कर सकूं मै,

ख़शी हो तो मुस्कुराऊं,

पर न मै बहक जाऊँ।

कष्ट हो तो सहन करलूं,

दुख मे न डूब जाऊ।

अहंकार की भावना,

पास ना आने दूं कभी

स्वाभिमान के बिना भी,

जी न पांऊँ मै कभी।

 

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4 Comments on "साधना"

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PRAN SHARMA
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मन को भरपूर छूती है कवयित्री बीनू भटनागर जी की यह कविता .

binu bhatnagar
Guest

bahut bahut shukriya

Vijay Nikore
Guest

“मुझको इतनी शक्ति देना, जो सोचूं वो कर सकूं मै,

ख़शी हो तो मुस्कुराऊं, पर न मै बहक जाऊँ।

…….. बीनू जी की यह कविता संबल देती है । बधाई ।
— विजय निकोर

binu bhatnagar
Guest

thank you very much

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