लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

अण्णा आंदोलन जन लोकपाल की बड़ी तस्वीर बन जाने के बावजूद उनका जन लोकपाल राजनीतिक कूटनीति का शिकार एक सोची-समझी चाल के जरिए फिलहाल बना दिया गया है। प्रधानमंत्री ने अण्णा को राजनीतिक चतुराई से भरी जो चिट्ठी लिखी थी, उसी से साफ हो गया था कि सरकार इस मसले को राजनीति के प्लेटफॉर्म पर लाकर इसे विवादित बना देना चाहती है। क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों और परंपराओं के जरिए ही आगे बढ़ाने की बाध्यता जताकर उन्होंने साफ कर दिया था कि सरकार की मंशा जन लोकपाल के पक्ष में नहीं है। इस प्रकरण के राजनीतिक हल तलाशने की सर्वदलीय बैठक के माध्यम से जो प्रक्रिया शुरू हुई और उसमें भाजपा समेत जिस तरह से जन लोकपाल को सभी दलों ने नकार दिया, उससे सरकार के हौसले बुलंद हुए और सरकार ने देर रात अण्णा दल कुतका दिखा दिया। किंतु इस बैठक से दो बात साफ हुईं एक तो हमाम में सब नंगे हैं, दूसरे संसद की सर्वोच्चता के बहाने सभी विपक्षी दल इसलिए लामबंद हो गए है क्योंकि जन लोकपाल का श्रेय नागरिक समाज लूट ले गया तो ये दल हाशिए पर चले जाएंगे। लेकिन इस ताजा बदली परिस्थिति में 10 दिन से निराहार अनशन पर बैठे अहिंसा के पुजारी अण्णा ने भ्रष्टाचार खत्म करने की जो हुंकार भरी है, उसने सरकार समेत सभी राजनीतिक दलों की बैचेनी बढ़ा दी है, जिसके परिणाम स्वरूप गुरूवार को लोकसभा में प्रधानमंत्री को घोषणा करनी पड़ी की सरकार जन लोकपाल को बहस के लिए संसद में रखेगी।

एक निहत्थे, देहाती राष्ट्रभक्त ने इतना तो तय कर दिया है कि लड़ाई भले ही लंबी चले लेकिन राजनीतिक बदलाव की यह प्रक्रिया अब थमने वाली नहीं है। अण्णा के नैतिक बल ने राजनीतिकों के प्रत्यक्ष अहंकार को पंगु बना दिया। संविधान की सर्वोच्चता और संसद की संप्रभुता के बहाने देश की समस्त राजनीति कुटिलता के साथ प्रतिकार की होड़ में लग गई। जबकि बुधवार को ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि संविधान सर्वोच्च है, लेकिन जनता से ऊपर नहीं। किंतु संसद जनकाक्षांओं को समझने में पूरी तरह विफल रही। इसी का नतीजा है कि संसदीय जनतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार होने जा रहा है कि किसी विधेयक के तीन मसौदों पर बहस होगी। जबकि जनलोकपाल की सौ सांसद सिफारिश कर चुके हैं।

संसदीय दल की बैठक के बाद कांग्रेस यह खुलासा सार्वजनिक करने में कामयाब हो गई कि केवल वह खुद ही नहीं कोई भी राजनीतिक दल जन लोकपाल का जस का तस समर्थन नहीं कर रहा है। असम गण परिषद् ने जन लोकपाल का हुबहू समर्थन जरूर किया है, लेकिन उसकी यह आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह है। दरअसल राजनीतिज्ञ बड़ी समझदारी बरतते हैं और जन उभार से जो भी मसले संसद का हिस्सा बनते हैं, उसका समाधान न होने की जिम्मेबारी वे बड़ी चतुराई से उस दल पर डाल देते हैं जो सत्ता पर राज कर रहा होता है। जन लोकपाल को लेकर भी कामोबेश यही स्थिति थी। किंतु संप्रग सरकार ने बड़ी चतुराई से इस स्थिति को बेनकाब कर दिया है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल ही नहीं, भाजपा व वामपंथी दलों समेत अन्य कोई भी राजनीतिक दल जन लोकपाल का समर्थन नहीं करता है। हमाम में सब नंगे हैं। प्रबल जन दबाव के बावजूद कोई भी दल अपने अधिकारों में कटौती नहीं चाहता और न ही ठोस जनलोकपाल लाकर कानूनी प्रक्रिया को सरल व सामान्य बनाना चाहता। उनका मूल मकसद देश के समूचे तंत्र को यथावत बनाए रखना है। क्योंकि यह स्थिति उनके लिए न केवल फायदेमंद है, बल्कि उनकी शक्ति व संप्रभुता को भी बनाए रखने वाली है। जबकि इन दलों को आत्ममंथन करते हुए सोचना चाहिए कि संसद सर्वोच्च हो सकती है, किंतु सांसद नहीं ? सरकार सर्वोच्च हो सकती लेकिन सरकार चलाने वाले सर्वोच्च नहीं हो सकते ?

कितनी विडंबनापूर्ण स्थिति है कि जब भी जनांदोलनों द्वारा भ्रष्टाचार खत्म करने की बात उठती है, सभी राजनीतिक एक ही भाषा बोलने लगते हैं। आज सभी विपक्षी दल कह रहे हैं एक सशक्त और प्रभावी लोकपाल विधेयक लाया जाए। किंतु अण्णा दल का जो सशक्त और प्रभावी जन लोकपाल सामने है, उसे नकार भी रहे है। प्रधानमंत्री कहते हैं मैं लोकपाल में आने को तैयार हूं, किंतु मेरे सहयोगी ऐसा नहीं चाहते। क्या एक राजनीतिक इच्छाशक्ति, चंद सहयोगियों के सामने कमजोर पड़ गई है ? यह तो एक बहाना भर है। दरअसल प्रधानमंत्री खुद इस दायरे में आना नहीं चाहते। क्योंकि एक के बाद एक जो घोटाले संप्रग-2 के कार्यकाल में उजागर हुए हैं, उनमें डॉ. मानमोहन सिंह की अप्रत्यक्ष भूमिका का अब खुलासा होने लगा है। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में डीएमके सांसद कनिमोझी के बाद अब पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने भी कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम् 2-जी स्पेक्ट्रम लाइसंेस आवंटन से पूरी तरह वाकिफ थे। इन दोनों ने ही ए. राजा के साथ स्पेक्ट्रम की नीलामी नहीं करने का फैसला लिया था। यही प्रधानमंत्री को अब कैश फॉर नोट मामले में अपना दामन बचाना मुश्किल हो गया है। इस मामले में जिन अमर सिंह को षड़यंत्र रचने का मुख्य आरोपी बनाया गया है, आखिरकार वह षड्यंत्र उन्होंने रचा किसकी सरकार बचाने के लिए ? क्या ईमानदार प्रधानमंत्री की नैतिकता का यह तकाजा नहीं था कि सरकार भले ही गिर जाए वे गैर कानूनी कार्य को अप्रत्यक्ष ही सही अंजाम नहीं देंगे ?

जन लोकपाल को कूटनीति के गलियारे में धकेलने का काम पूरी तरह सुनियोजित साजिश है। जिस वक्त प्रधानमंत्री इस बिल को लेकर सर्वदलीय बैठक में दल प्रमुखों की राय ले रहे थे, उसी दौरान राज्यसभा में नारायण सामी ऐलान कर रहे थे कि जन लोकपाल स्थायी समिति के हवाले विचार-विमर्श के लिए भेज दिया गया है। इससे यह जाहिर करने कोशिश तो की गई कि अण्णा की मांगों को ठुकराया नहीं गया है, किंतु उन्हें माना भी नहीं गया है। स्थायी समिति तो एक औपचारिक समिति है, अंततः वह वही मंशा जाहिर करती है, जो सरकार चाहती है। वास्तव में तो सर्वदलीय संसद की बैठक में राजनीतिक ईमानदारी से राजनीतिक दलों को अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए थी, इससे संसदीय लोकतंत्र के सामने पारदर्शिता की एक परिपाटी भी बनती और जनता में भी साफ होता कि भ्रष्टाचार के प्रति दलों का क्या रूख है।

सर्वदलीय बैठक के परिणामों से सरकार जो कुटिल खेल खेलने में कामयाब हुई है, उसका राजनीतिक परिदृश्य में सबसे ज्यादा खामियाजा कालांतर में भाजपा को भुगतना होगा। क्योंकि सरकार ने यह साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार की मुहिम में वह तो अण्णा के साथ है, लेकिन गेंट अब सभी संसदीय दलों के पाले में है। भाजपा इसलिए भी खामियाजा भुगतेगी क्योंकि उसे उसकी ही पार्टी के कद्दावर कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। जसवंत सिंह ने भ्रष्टाचार पर भाजपा की एक राय न होने का सवाल खड़ा किया था। फिर एक कदम आगे बढ़कर वरूण गांधी तो रामलीला मैदान में ही आंदोलनकारियों के बीच बैठकर अण्णा को अपना समर्थन दे आए। इसके बाद यशवंत सिन्हा, शत्रुधन सिन्हा और बिहार से भाजपा सांसद उदय सिंह इस मुद्दे पर इस्तीफे की पेशकस कर भाजपा की दो मुंही नीति पर तमाचा जड़ चुके हैं। जबकि भाजपा समेत सभी विपक्षी दलों के पास यह एक ऐसा सुनहरा अवसर था, जिसके जरिए जनलोकपाल को समर्थन देकर वे संप्रग को हाशिए पर ला सकते थे। फिलहाल राजनीतिक स्पेक्ट्रम में भूचाल जरूर है, लेकिन जन लोकपाल यथारूप में संसद में पारित होना कतई संभव नहीं है। किंतु इतना जरूर है, अण्णा हजारे ने बुधवार की देर रात अण्णा दल की दलील खारिज कर दिए जाने के बाद जो हंुकार भरी थी वह रंग लाई है, नतीजतन प्रधानमंत्री को संसद में न केवल जन लोकपाल पर बहस का भरोसा देना पड़ा बल्कि अण्णा को सलाम करते हुए उनसे अनशन तोड़ने की अपील भी की। संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस पर सर्वसम्मति भी बनाई। हालांकि अब अण्णा के स्वास्थ्य और अन्य कोई विकल्प खुले न होने के कारण संसद के इस भरोसे पर भरोसा करते हुए अण्णा का अनशन तुड़वा देना चाहिए। वैसे भी भ्रष्टाचार और व्यवस्था विरोधी मुहिम लंबी चलेगी, जिसके लिए अण्णा की जरूरत अक्षुण्ण बनाए रखना जरूरी है।

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2 Comments on "कूटनीति के गलियारे में जन लोकपाल"

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Anil Gupta,Meerut,India
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Anil Gupta,Meerut,India
अन्नाजी के आन्दोलन का आज ग्यारहवां दिन है. सर्कार का रुख इस आन्दोलन को लम्बे से लम्बा खींचने का लगता है ताकि सोनिया जी और उनकी वित्तीय सलाहकार मंडली को उनके अकूत खजाने को स्विट्जर्लेन्दके बैंकों से और अधिक गुप्त और जटिल कानूनी व्यवस्थाओं वाले देशों को शिफ्ट करने के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त मिल सके. चर्चाओं के मुताबिक जब से सोनिया गाँधी अपने गुप्त रोग का गुप्त देश में गुप्त इलाज कराने गुप्त डाक्टरों की शरण में गयी हैं तबसे अब तक एक लाख करोड़ से ज्यादा स्विस बैंकों से अन्यत्र शिफ्ट हो गया है.ये जांच का विषय… Read more »
bipin kishore sinha
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बिल्कुल सही विवेचना की आपने। सरकार तो सरकार है, हर परिवर्तन का विरोध करना उसका स्वभाव है। लेकिन विपक्ष को क्या हो गया है? भाजपा कांग्रेस की बी टीम नजर आ रही है। भगवान ने उसे एक सुनहरा अवसर प्रदान किया था, सत्ता में पुनर्वापसी का। लेकिन सुषमा और जेटली की अक्ल ही जब घास चर रही हो, तो उसपर सिर्फ तरस खाया जा सकता है। भाजपा का भविष्य है – पुनः मुषिको भव – अगले चुनाव में सिर्फ दो सीट।

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