लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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suchana-ka-adhikarडॉ. राधेश्याम द्विवेदी
प्रक्रियागत खामियाँ:- भारत के अनेक प्रान्तों के जन सूचना आयुक्त बहुत ही अच्छी तरह से समाज एवं सरकार मे व्याप्त अनियमितताएं उजागर करवा रहे हैं तथा स्वच्छ व पारदर्शी शासन के तरफ अग्रसर हैं. समाज मे आम नागरिक एवं प्रबुद्ध मध्यम वर्ग इस कानून का प्रयोगकर अल्प समय में लम्बे समय से लम्बित मामलों का निदान कराने मे सफल होने लगे हैं. आमलोगों में भी इस कानून के बारे में जागरुकता बढ़ी है, परन्तु कुछ प्रान्तों में कुछ प्रक्रियागत खामियाँ भी देखने को मिलती हैं. इस विषय में अधिनियम के अलावा कोई सर्वमान्य एवं एकरूपता वाली नियमावली न तो भारत सरकार ने और न ही राज्य सरकारों ने प्रकाशित की है. प्राइवेट प्रकाशकों के प्रकाशनों में अनावश्यक विस्तार दिया गया है किन्तु पूर्ण स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है. इन खामियों के चलते आम जनता को वांछित लाभ नहीं मिल पाता है. प्रायः यह देखा गया है कि अनेक केन्द्रीय एवं राज्य सरकारें सूचना को सही रूप में उपलब्ध कराने में पूर्ण रूचि नहीं रखती हैं. वे सूचना आवेदन पत्र का कभी-कभी उत्तर तो दे देती हैं तो कभी-कभी उत्तर भी नहीं देती हैं. कभी-कभी गोल-माल जबाब दे दिया जाता है. वे धारा 6(3) का प्रयोग कर अन्य सूचनाधिकारियों या अनुभागों को आवेदन स्थानान्तरित कर देती हैं. कोई-कोई मूल विभाग आवेदक को इसकी सूचना दे देता है और अधिकांश जन सूचनाधिकारी यह औपचारिकता भी नहीं निभातें हैं. आवेदक तो मूल विभाग से या तो पत्राचार द्वारा अथवा व्यक्गित प्रयास करके थकहार कर बैठ जाता है. या कभी- कभी आवेदक धारा19(1)या(3) में आगे अपील करता जाता है.
नकल आसानी से उपलब्ध नहीं :-प्रायः केन्द्र या प्रदेशों में केन्द्र/राज्य जन सूचना अधिकारी 30 दिन की समय सीमा में धारा 7 के अनुसार कार्यवाही पूरा करने में विरत रहते हैं. आवेदक को धारा 19(1) के अन्तर्गत प्रथम अपील अधिकारी को अपील करना पडता है. प्रायः प्रथम अपील भी समय से निस्तारित नहीं होती है. बिवश होकर धारा 19(3) के अन्तर्गत द्वितीय अपील केन्द्र/राज्य सूचना आयोग मे करना पड़ता है. यहाँ सालों प्रतीक्षा के बाद केस विचारण के लिए लिया जाता है. आयोग का काम है कि आवेदकों को जन सूचना दिलवाना, सूचनाधिकारियों को मार्गदर्शन करना, अधिनियम एवं प्रक्रिया के बारे में आम जनता व अधिकारियों को प्रशिक्षित एवं जागरुक करना, परन्तु व्यवहारिक रूप में यह प्रक्रिया अपनाई नहीं जाती है. केवल कागजी खानापूरी कर दी जाती है. कुछ भाग्यशाली आवेदक तो सूचना पा जाते है मगर अधिकांशतः भटकते रहते हैं. जो सूचना नियमतः 30 से 60 दिनों में मिलनी चाहिए उसमें 3 से 5 साल का समय लग जाता है. यदि सूचना आयोग वादी के पक्ष में आदेश भी पारित कर लेता है तो उस आदेश की नकल के लिए आवेदक के कई साल गुजर जाते हैं. उसे नकल आसानी से उपलब्ध नहीं कराई जाती है. आयुक्त का कार्यालय आयोग के सारे किये-कराये पर नकल न देकर पानी फेर देता है. ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि आयोग का हर अन्तरिम या अन्तिम आदेश की प्रति उसे अनिवार्य रुप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए. उसे रोज का रोज इन्टरनेट पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए तथा उसे प्रमाणीकरण की जरूरत भी नहीं होना चाहिए. बिना नकल के कोई आदेश क्रियान्वित नहीं कराया जा सकता है.
अर्थ दण्ड वादी को दिलाया जाना चाहिए:- यहाँ तक कि सरकार को मिलने वाला अर्थ दण्ड भी सरकार के खाते में नहीं आ पाता है और प्रतिवादी उस आदेश को दबवाने में कामयाब हो जाता है. प्रदेश सूचना आयोग, प्रदेश सरकारें तथा नोडल एजेंसी केन्द्रीय जन सूचना आयोग को इस बुनियादी समस्या के प्रति त्वरित कार्यवाही करके इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए. यदि सुविधा बढ़ाकर कुछ शुल्क निर्धारित कर दिया जाय तो आम जनता उसे भी देने में पीछे नहीं हटेगी. सूचना आयोगो द्वारा विभागों पर लगाया जाने वाला अर्थ दण्ड वादी को भी दिया जाना चाहिए. उन्हें वाद का खर्चा व हजार्ना भी दिलाया जाना चाहिए. इससे इस कानून का सख्ती से परिपालन होगा और आवेदक का परिश्रम भी व्यर्थ नहीं जाएगा. आयोग केवल फाइन लगाकर अपना केस समाप्त मान लेता है. वादी को सूचना भी नहीं मिलती और ना ही खर्चा.
उत्तर प्रदेश में एक बड़े अन्तराल एवं जद्दोजहद के फलस्वरूप मुख्य सूचना आयुक्त श्रीमान् जावेद उस्मानी जी ने कार्यभार संभला था ,उस समय उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्तालय की बहुत ही खराब स्थिति थी. इस आलेख का लेखक वाद सं. एस.10-4738/2012 , एस.10- 274 सी./ 2014, एस.10- 341 सी./ 2014, एस.5-1238/ए/2014 ,एस.5-1240/ए/2014 एवं एसे ही इन्हीं दो पीठों के अधीन कई अन्य अपीलों के पैरवी के दौरान तथा माननीय न्यायालयों में हो रहे समस्याओं का बहुत व्यवहारिक अनुभव अर्जित कर चुका है. सूचना आयोग के एस.5 के पीठासीन अधिकारी श्री पारस नाथ गुप्ता जी तथा एस. 10 के श्री राजकेश्वर सिंह जी के अनुभवों से भी दो चार होना पड़ा है. इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आयोग की कार्यप्रणाली में आये गुणवत्ता के फलस्वरूप ही उत्तर प्रदेश वासियों को प्रायः सूचनायें अब मिलने लगीं हैं. जिले स्तर के अधिकारी इसके प्रति अभी भी गंभीर नहीं हैं| वे बहुत ही हीला-हवाली के उपरान्त ही सूचना देना सुनिश्चित करते हैं. लेखक ने इस विभाग में व्याप्त अनेक व्यवहारिक समस्याओं एवं कठिनाइयों को एक प्रतिवेदन के माध्यम से दिनांक 18.02.2015 को स्पीड पोस्ट के माध्यम से मुख्य सूचना आयुक्त उ. प्र. को पे्रषित किया था. उस समय तो तत्काल कोई खास परिवर्तन नहीं दिखा परन्तु एक साल के अन्तराल में इस लेखक के संलग्न प्रतिवेदन की अनेक बातों को संज्ञान लेते हुए कुछ सार्थक कार्यवाही शुरू कर दिया गया है. इनमें प्रमुख हैं- जिले /मण्डल स्तर पर प्रशिक्षण , कार्यशाला का आयोजन ,जन सुनवाई, लोक अदालतों का संचालन, नकल प्राप्त करने के कुछ कारगर उपाय तथा नयी नियमावली का प्रकाशन आदि.
तृतीय पक्ष या थर्ड पार्टी के प्रवधान समाप्त मानी जानी चाहिए:- आज मैं तृतीय पक्ष या थर्ड पार्टी के प्रवधानो के खामियों की तरंफ भी ध्यान आकृष्ट कराना चाहुंगा. इसे व्यक्तिगत सूचना होने के कारण संरक्षण प्राप्त है. अधिनियम के धरा 8 उपखण्ड 1 के आच्छादन से सूचनाधिकारी इसका हवाला देकर सुचना देने से बच जाते है. वादी की अपनी सूचना इतनी ज्यादा नहीं होती जितनी तृतीय पक्ष या थर्ड पार्टी की होती है. कोई भी संदिग्ध व्यक्ति जिसके बारे में सूचना मांगी गयी है, वह अपनी सहमति इस प्रावधान में दे ही नहीं सकता है. उल्टे वादी या अपीलार्थी पर दबाव या धमकी मिलना शुरू हो सकता है. एसी स्थिति में उसके जानमाल का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है.
देश में अनेक बड़े से बड़े घोटाले और अनियमितताएं सम्बंधित पक्ष से पूछकर या अनुमति लेकर उजागिर नहीं की गयी हैं. सूचनाधिकारी और सूचना आयुक्त को उस विषय की गंभीरता को देखते हुए उक्त उपखण्ड के प्रावधानों को नजरन्दाज करते हुए सूचना उपलब्ध कराया जाना चाहिए. जब 30 या 60 दिन के अन्दर मिलनेवाली सामान्य सी सूचना कई पेशियों के बाद भी ना मिले तो समझ लेना चाहिए कि यह जनहित का मामला है और व्यक्तिगत, तृतीय पक्ष या थर्ड पार्टी का यहां कोई तारतम्य नहीं बनता है. जैसे 30 दिन की मियाद पूरी करने के बाद सूचनाधिकारी प्रतिलिपि के लिए शुल्क लेने का अधिकार खो देता है, उसी प्रकार मियाद के बाद तृतीय पक्ष या थर्ड पार्टी की अवधारणा भी समाप्त मानी जानी चाहिए. सूचना अधिकारी व आयोग को पारदर्शिता हेतु उस सूचना को कत्तई नहीं रोकना चाहिए. प्रदेश तथा केन्द्र सरकार को इस पहलू की समीक्षा कर आवश्यक दिशा निर्देश जारी किया जाना चाहिए.
डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

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