लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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Amanya-Degree-Jaipurहाल ही में राजस्थान में एक निजी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया। जोधपुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की ओर से जारी की गईं 25 हजार से अधिक डिग्रियां और अंक तालिकाएं फर्जी पाई गईं। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने फर्जी डिग्री के मामले में जोधपुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के चेयरमैन कमल मेहता को गिरफ्तार कर लिया। इससे पहले सिक्किम में भी एक निजी विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और मालिक को जेल की हवा खानी पड़ी थी। हिमाचल की भी एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी द्वारा इसी तरह डिग्रियां बांटी जा रही थीं। आज देश भर में कई निजी शिक्षा संस्थानों द्वारा फर्जी डिग्री देने का धंधा जोरों पर चल रहा है।
शिक्षा एक मजाक बन चुकी है। लोग परीक्षा पुस्तिकाएं घर पहुंचा दे रहे हैं। दलाली का धंधा जोरों पर है। पुरानी तिथियों में भी डिग्रियां बांटी जा रही हैं। लेकिन उस पर सरकार की ओर से कोई प्रभावी कार्यवाही होती नहीं दिखाई देती। हाल ही में बिहार और उत्तरप्रदेश के विद्यालयों में नक़ल की बानगी हम देख ही चुके हैं। जब उदारीकरण की अवधारणा और निजीकरण के दबाव के फलस्वरूप उच्च शिक्षा को सरकार ने अपने संरक्षण से मुक्त कर देने का गुरु मंत्र दे दिया, तो बिना कुछ बेहतर सोचे समझे, व्यवहारिक दृष्टि के आभाव में निजीकरण के उस रास्ते को अपना लिया गया जो शिक्षा को मुनाफे के धंधे में बदलता था। लिहाजा बेतहाशा निजी विश्वविद्यालय कुकुरमुत्ते की तरह उगने-फैलने लगे।
अनेक ऐसे व्यापारी और नेताओं ने विश्वविद्यालय खोल लिए जिन्हें अपनी काली कमाई को सफेद करना था। ध्यातव्य है कि पिछली सदी के अंतिम वर्षों में छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ आ गई। निजी विश्वविद्यालयों का खुलना गलत नहीं है, लेकिन उनका नियमन तो अवश्य होना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। वह तो भला हो  प्रोफेसर यशपाल का, जो वे फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में गए और बड़ी मुश्किल से उन पर रोक लग पाई। खैर उसके बाद थोड़ा नियमन हुआ। लेकिन जब ज्ञान आयोग ने कहा कि देश को 1,500 विश्वविद्यालयों की जरूरत है, तो एक बार फिर निजी विश्वविद्यालयों और संस्थानों की बाढ़ आने लगी। इससे पहले कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में तकनीकी और मेडिकल शिक्षा का व्यवसाय खूब फला फूला। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज धड़ाधड़ खुलने लगे। आज देश में जितने सेकेंडरी स्कूल नहीं हैं उतने इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। मैनेजमेंट शिक्षा का भी यही हाल है।
आज उच्च शिक्षा एक भारी उद्योग बन गया है। अब भी देश में कुल 450 ही विश्वविद्यालय हैं। जिनमें कई बिलकुल स्तरहीन हैं। यद्दपि चीन या अन्य विकसित देशों की तुलना में यह संख्या कहीं कम है। इसलिए यह उचित है कि उच्च शिक्षा का विस्तार जरूर हो, लेकिन सोच-समझकर हो और कमसकम एक स्तर तो कायम रहे। अब स्थिति  है कि तमाम महानगरों के आसपास उच्च शिक्षा एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित हो गई है। दिल्ली या उसके आसपास इन संस्थानों की इतनी भरमार है कि दिल्ली से निकलने वाली हर सड़क पर पच्चीस-पचास कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं। तकनीकी संस्थानों का तो कोई हिसाब ही नहीं है। विचित्र स्थिति यह है कि ऐसे संस्थान भी विकसित शहरी क्षेत्रों के करीब ही खुलते हैं। अब उत्तराखंड में देहरादून और हरिद्वार के आसपास ज्यादातर विश्वविद्यालय और निजी संस्थान हैं। दूर दर्ज के पहाड़ी इलाके ऐसे संस्थानों से वंचित हैं। माना यह जाता है कि पूंजी की भी अपनी एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है, पर निजी विश्वविद्यालयों के रूप में उग आई ज्यादातर दुकानें असल में आम जनता को लूटने के अड्डे बन गई हैं। अब वास्तविकता यह है कि ये लोग सिर्फ पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं की भीड़ भर खड़ी करने में सहायक हो रहे हैं रोजगार दिला पाना इनके वश में नहीं हैं।
पिछले दिनों ब्रिटेन से एक अच्छी व बहुत उत्साहवर्धक खबर थी। वहां के कुछ प्राध्यापकों ने यह फैसला किया कि वे मिल-जुलकर एक ऐसा विश्वविद्यालय खोलेंगे, जहां मुफ्त में शिक्षा दी जाएगी। वे लोग भी हमारी-आपकी तरह महंगी होती जा रही उच्च शिक्षा से दुखी थे, लिहाजा 40 अध्यापकों ने यह फैसला किया कि वे मुफ्त विश्वविद्यालय खोलेंगे और उसमें वॉलंटियर बनकर बिना मेहनताने के पढ़ाएंगे। अभी इस विश्वविद्यालय के छात्रों को डिग्री नहीं मिलेगी, लेकिन उन्हें स्नातक, परास्नातक और डॉक्टरेट स्तर की एकदम वैसी ही शिक्षा दी जाएगी, जैसी कि ब्रिटेन के आला दर्जे के संस्थानों में दी जाती है। उनकी इस मुहिम से जुड़ने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है। यह विचार केवल ब्रिटेन के कुछ अध्यापकों के मन में आया हो, ऐसा नहीं है। ऐसी ही एक मुहिम वड़ोदरा जिले के एक अविकसित आदिवासी इलाके में प्रादेशिक सरकार के तमाम दुर्भावों के वावजूद प्रोफेसर गणेश देवी ने चलाई थी।
आज वह एक स्थायी महत्त्व की संस्था बन चुकी है। जिस तरह से दुनिया भर में शिक्षा महज व्यवसाय या  ‘पण्य  वस्तु’ (कमोडिटी)  बन गई है, उसने यह चिंता पैदा कर दी है कि आने वाली पीढ़ियों का आखिर  क्या होगा?  क्या शिक्षा सचमुच गरीब की पहुंच से बहुत दूर छिटक जाएगी जैसे कि लक्षण अब स्पष्ट नजर आने लगे हैं। भारत ही नहीं, यूरोप-अमेरिका में भी यह आम धारणा है कि उच्च शिक्षा महंगी हो रही है। वहां शिक्षा-ऋण बेतहाशा बढ़ रहा है। बैंकों पर भरी बोझ है। उसकी वसूली दिन-प्रतिदिन मुश्किल होती जा रही है। कमसकम भारत में यह नौबत अभी नहीं आई है। इस तरह मुक्त मंडी की अवधारणा भी धराशायी हो रही है। सपना यह था कि मुक्त मंडी यानी बाजारवाद में सब कुछ बाजार की शक्तियां नियंत्रित करेंगी। जिसके पास प्रतिभा होगी, वह आगे बढ़ेगा और प्रतिभाहीन व्यक्ति पिछड़ता जाएगा, भले ही वह कितना ही अमीर क्यों न हो। लेकिन हो इसके उलट रहा है। जिसके पास धन है, पूंजी है, वह पढ़ रहा है और आगे बढ़ रहा है। बाकी लोग वंचित रहे जा रहे हैं, भले ही वे कितने ही प्रतिभावान क्यों न हों। इस व्यवस्था में भी प्रतिभाएं उसी तरह से वंचना की शिकार हैं जैसे कि इससे पहले गत शती के नौवें दशक तक की व्यवस्था में थीं। उसमें  धन का ऐसा नंगा नाच नहीं था। लेकिन यह शिक्षा आज पूरी तरह, नए सिरे से संपन्न और विपन्न वर्ग पैदा कर रही है। अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी यह कहना पड़ा कि ‘मेरा सपना है कि हर नागरिक को विश्वस्तरीय शिक्षा उपलब्ध हो। यदि यह एक काम भी हम कर पाए तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।’
ऐसे ही मकसद से वर्ष 2009 में अमेरिका के कैलिफोर्निया नगर में पीपुल्स यूनिवर्सिटी नाम से एक मुफ्त ऑनलाइन यूनिवर्सिटी शुरू की गई। इस यूनिवर्सिटी में छात्रों से कोई ट्यूशन फीस नहीं ली जाती, सिर्फ पाठ्य सामग्री की लागत भर ली जाती है। यहां पाठ्य सामग्री का स्तर तो ऊंचा है, लेकिन क्लास रूम जैसा अनुभव नहीं। यहां भी प्राध्यापक लोग स्वयंसेवक ही हैं, यानी जो लोग बिना मेहनताने के पढ़ाना चाहते हैं, वे ही यहां सेवा दे रहे हैं। यह एक अच्छी बात यह है कि उन्हें ऐसे अध्यापक मिल पा रहे हैं। असल में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो घोर पूंजीवाद के  इस युग में भी मुफ्त सेवा देने को तत्पर हैं। ऐसे लोगों की दुनिया में सचमुच कमी नहीं है, जो परोपकार के भाव से अपना ज्ञान और अनुभव बांटना चाहते हैं। इसलिए यदि आप किसी नेक काम के लिए पवित्र भाव से आगे बढ़ते हैं, तो लोग आपकी मदद के लिए स्वत: आगे आ जाते हैं। आखिर पंडित मदनमोहन मालवीय ने गुलामी के उस दौर में चंदे से एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खड़ा किया ही।
आजादी से पहले ही गुरुकुल कांगड़ी बना, डीएवी आंदोलन खड़ा हुआ। ये सभी संस्थाएं शिक्षा को रोजगार के अतिरिक्त मनुष्य के चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम भी मानती थीं। उसे बहुत निम्नस्तर का व्यापारिक कारोबार नहीं। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद उच्च शिक्षा को घोर उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। स्कूली शिक्षा में तो कुछ प्रयोग हुए भी, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कोई उद्देश्यपरक महत्त्व का काम नहीं हुआ। दरअसल हम पूरी तरह सरकार पर निर्भर हो गए। हमने यह समझ लिया कि सरकार ही हमारी भाग्य विधाता है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। इसलिए सरकार ने जो चाहा जैसा चाहा किया और फिर बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिमी पूंजीवादी प्रभाव के फलस्वरूप शिक्षा को बाजारू रूप दे डाला गया। सरकार ने अपनी जिम्मेदारी कमाऊ पूतों को सौंप दी बिना किसी अंकुश या नियमन के।
बहरहाल सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। एक तो शिक्षा को अनाप-शनाप ढंग से महंगे होने से रोकने की, और दूसरी, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की। सरकार को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि ज्यादातर निजी विश्वविद्यालयों का ध्येय मुनाफा कमाना है। वे ऐसी ही जगह विश्वविद्यालय खोलना चाहते हैं, जहां के लोगों के पास खर्च करने को पर्याप्त पैसा हो। वे गरीब-गुरबों, गांव-देहातों या दूर-दराज के लोगों के लिए विश्वविद्यालय नहीं बनाना चाहते। जो लोग पहले से ही धनी हैं, ये उन्हीं के बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। इसलिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी खाई पैदा हो गई है।
अगर इस खाई को पाटना है और वाकई हर नागरिक को समान उच्च शिक्षा उपलब्ध करानी है तो सरकार को कुछ गंभीर कदम उठाने होंगे। इसके लिए शिक्षाविदों और अध्यापकों को भी सामने आना होगा। शिक्षा को महज मुनाफे का धंधा समझने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। सरकार यह समझती है और कहीं न कहीं इस मुनाफे के खेल में वह भी शामिल है। विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भी दरवाजे अब खुल चुके हैं। स्वदेशी और राष्ट्रवाद का राग अलापने वाले लोगों को भी इससे कोई गुरेज नहीं है। उनके लिए विदेशी निवेश, विकास की परम अवस्था है। लेकिन समस्या यह है कि यदि देशी विश्वविद्यालयों को संभालना ही इतना मुश्किल है, तो ऐसी परिस्थितियों में विदेशी विश्वविद्यालयों को संभालना कितना मुश्किल होगा। क्योंकि हमारे यहां भ्रष्ट व्यवस्था है और सबकुछ चलता है। अतः यह उचित वक्त है जब सरकार को भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस समस्या को सुलझाना चाहिए और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव की नीतियों का सख्ती से नियमन किया जाना चाहिए।
शैलेन्द्र चौहान

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