लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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ramराम नाम की लूट है लूट सके तो लूट. ये वाक्य न जानें कहनें वाले ने किन अर्थों में किस आव्हान को करते हुए कहा था किन्तु वर्तमान भारत में यह आव्हान चरितार्थ और सुफलित होता दिखाई पड़ रहा है. तथ्य है कि भारत में जब यहाँ के एक सौ तीस करोड़ लोग बात करतें हैं तब औसतन प्रत्येक छठे वाक्य में एक न एक बार राम नाम का उच्चारण अवश्य होता है और किसी न किसी रूप में राम स्मरण कर लिए जातें हैं. राम नाम के उच्चारण में उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इस नाम का उल्लेख न केवल भारत में अपितु सम्पूर्ण विश्व में सतत बढ़ता और उत्साह से लिया जाता दिख रहा है. भारत वंशियो के सम्पूर्ण विश्व में प्रभावी ढंग से फैलते जानें के कारण अब वैश्विक स्तर पर राम शब्द सर्वाधिक समझा-बूझा और सुबोध-सुभाष शब्द बनता जा रहा है. भारत भूमि पर राम नाम का यह सतत उच्चारण जितना सुखद है उतना ही स्वाभाविक भी है क्योंकि राम में ही तो इस भूमि के प्राण बसते हैं और राम से ही इस भारत भूमि का आदि अखंड है और अंत असंभव है!! भारत के जन-जन, मन-मन, कण-कण, तन-तन, और यहाँ तक कि ब्रह्माण्ड के मूल तत्व क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा में व्याप्त प्रभु श्री राम ही तो इस भूखंड “भारत-भू” के प्रमख आधार और आराध्य रहें हैं. आज जब राम नाम का जोर शोर सम्पूर्ण विश्व में हो रहा है तब यह भी आवश्यक और समयानुकूल है कि हम सर्वाधिक चर्चित शासन प्रणाली राम-राज्य की अवधारणा को भी भली-भांति समझें और इस सर्वाधिक लोक कल्याण कारी राजकीय प्रणाली से अपनी युवा पीढ़ी को भी परिचित कराएं. राम शब्द यदि हम भारतवंशियों के लिए आराधना और श्रद्धा का परिचायक है तो रामराज्य शब्द अतिशय कौतुक, उत्सुकता और उत्कंठा के साथ साथ सर्वाधिक कामना वाला शब्द है. रामराज्य की अनूठी किन्तु प्रामाणिक और सिद्ध शासन प्रणाली को स्वयं महात्मा गांधी ने इस देश की धरती पर लागू करना चाहा था. विदेशियों से भारत की स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान इस देश के जन-जन को आन्दोलन में समाहित और सम्मिलित करनें के लिए उन्होंने अंग्रेजों की शोषक और आततायी राज्य प्रणाली के स्थान पर महात्मा गांधी ने इस देश की जनता को स्वराज के साथ साथ रामराज्य की राज्य प्रणाली का स्वप्न दिखाया था जो कि कदाचित इस देश के स्वतंत्रता आन्दोलन का सर्वाधिक बड़ा और जन-जन को जोड़ लेनें वाला तत्व रहा. राम राज्य के स्वप्न को देश ने आकंठ उत्साह में डूब कर सच करना चाहा और इस दिशा में सतत संभव प्रयास भी किये और कामना भी!! किन्तु सक्षम और प्रेरक नेतृत्व के अभाव में यह स्वप्न अधूरा ही रहा और राम राज्य की कल्पना दिन-प्रतिदिन परिकल्पना बनकर यथार्थ के धरातल से दूर जाती गई. आज जबकि राम-राज्य के प्रणेता प्रभु श्रीराम का जन्मदिवस हमारें उत्सव रामनवमी के रूप में हमारें समक्ष है तब राम नाम की आराधना उपासना तो करें ही साथ-साथ इस राम-राज्य की सर्वाधिक लोक कल्याणकारी अवधारणा का भी विश्लेषण अध्ययन करें तो सामयिक होगा. इस वर्ष राम नवमी के शुभ प्रसंग पर राम राज्य की अवधारणा का अध्ययन और अधिक प्रासंगिक और सान्दर्भिक इस लिए भी है क्योंकि इस वर्ष हमारा समूचा भारत वर्ष आगामी पांच वर्षों के लिए विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में चुनावी पद्धति से अपनी सरकार चुननें जा रहा है. आसन्न लोकसभा चुनाव हों या भारत में बीते समय में होनें वाले किसी भी स्तर के चुनाव हों, इसमें प्रत्येक चुनावी प्रत्याशी राम राज्य के सपनें का उल्लेख अवश्य ही करता है. पौराणिक या एतिहासिक सन्दर्भों को वर्तमान युग के संदर्भो की तुलना में यदि हम देखें तो राम राज्य की अवधारणा आज वर्तमान युगीन भारत में भी उतनी ही सामयिक और समीचीन दिखती है जितनी कि प्राचीन समय में थी!! हाँ इतना अवश्य है कि इन युगीन तुलनाओं को करते समय हमें या हमारें वर्तमान काल खंड को सटीक और सापेक्षिक होना होगा. सापेक्षता के साथ अध्ययन करनें पर अवश्य ही हम इस आश्चर्य जनक और विस्मयकारक तथ्य पर पहुँच जायेंगे और पायेंगे कि राम राज्य की अवधारणा तो वह राज्यीय अवधारणा है जो समय की गति से ऊपर और सर्वकालिक है. कितनी ही पीढियां बीत जाएँ या यह पृथ्वी कितना ही अलौकिक विकास और वैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ले किन्तु शासन और प्रजा के परस्पर सम्बन्ध वैसे ही होनें चाहिए जैसे पौराणिक रामराज्य में थे. राम राज्य का यह अध्ययन करते समय हम यह भी पायेंगे कि जब विकास के इस दौर में राम राज्य की यह कालजयी अवधारणा और अधिक प्रासंगिक और सान्दर्भिक होकर प्रभावी और परिणाम मूलक हो गयी है.

 

कदाचित श्री राम की यही लोक पालक छवि है जिसके कारण चौदहवीं शताब्दी के प्रसिद्द कवि और शायर अमीर खुसरो ने राम नाम के महत्त्व को स्वीकारते हुए कहा था कि-

 

शोखी-ए-हिन्दू ब बीं, कुदिन बबुर्द अज खास ओ आम,

राम-ए-मन हरगिज़ न शुद हर चंद गुफ्तम राम राम। ——

 

अर्थात इस विश्व का प्रत्येक सर्वसाधारण, राजकीय और सामाजिक व्यक्ति यह जान ले कि मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम एक शोख-शानदार-और बार बार स्मरणीय शख्शियत हैं. राम मेरे मन में हैं और मुझसे हरगिज जुदा न होंगे और में जब भी बोलूँगा राम-राम अवश्य बोलूँगा. इसी राम नाम की महिमा को हम क्रांतिकारी कवि कबीर की वाणी में भी पातें हैं जब वे कहतें हैं-

 

राम मिले निर्भय भय ,रही न दूजी आस

जाई सामना शब्द में राम नाम विस्वास

 

जब हम राम राज्य और वर्तमान की सर्वाधिक प्रासंगिक और स्वीकार्य शासन प्रणाली लोकतंत्र की चर्चा करतें हैं तब पातें हैं कि राम राज्य तो लोकतंत्र का सबसे जीवंत उदाहरण था जिसमें धोबी की कही बात से राज परिवार का निजी जीवन भी प्रभावित होता था. आज के समय में जो राजनीतिज्ञ अपनें निजी जीवन को अपनें सार्वजनिक जीवन से अलग रखनें कि अपील करते नहीं थकते हैं और कुछ अजीबोगरीब प्रकार की आचरण गत रियायतों और छूटों की आशा रखतें हैं तब राम राज्य का माता सीता और धोबी वाला अध्याय एक प्रेरक संदेशवाही अध्याय बनकर उपस्थित होता है जिसमें राम ने धोबी की बात पर अपनें व्यक्तिगत और वैवाहिक जीवन की स्थिति पर निर्णय कर एक राजा की भूमिका का जीवंत और कालजयी उदाहरण प्रस्तुत कर दिया था. राम राज्य में नागरिकों के साथ साथ पशु-पक्षियों के साथ भी न्याय होता था. रामराज्य समाजवाद के तत्वों पर आधारित राज्य था. प्रभु श्री राम ने अपनी सम्पूर्ण संपत्ति दान में दे दी और स्वयं मिट्टी के पात्र में भोजन करते और सामान्य शयन-विहार करते थे. निस्संदेह कहा जा सकता है कि रामराज्य कल्पना से नहीं, इस प्रकार के आचरण को चरितार्थ करनें से ही स्थापित हो सकता है. लोक और और शासन में सद्भावना तभी हो पाएगी जब नीतिपूर्वक कार्य किए जाएं. वर्तमान राजनैतिक परिवेश में में राजधर्म और गठबंधन धर्म एक सर्वाधिक चर्चित पहलु है. राजनीति के इस नए उपजे पक्ष पर यदि हम चर्चा करें तो ध्यान आएगा कि सुग्रीव,विभीषण और श्रीराम से बड़ा-अनोखा और बेमेल किन्तु तादात्म्य वाला राजनीतिक गठबंधन किन्तु सफलतम गठबंधन अन्यत्र कहीं देखनें में नहीं आता है. शास्त्रोक्त है कि धर्म में राजनीति आ जाए तो वह अधर्म बन जाता है, किन्तु जहाँ राजनीति में धर्म का समावेश हो तब राजनीति नीतिवत हो कर लोक कल्याण कारी हो जाती है. राजनीति के मूल अर्थ होतें है राज्य को सुचारु और लोक कल्याण की दिशा में ले जाना और धर्म अर्थात अपने-अपने कर्त्तव्य, राज्य के प्रति कर्त्तव्य, समाज के प्रति कर्त्तव्य, प्रजा के प्रति कर्त्तव्य को धर्म की भांति धारण करना. राम ने राज्य किया तो मर्यादा में रह कर किया, और राजा बनें तो अतीव विनम्र और लोकाज्ञाकारी बनकर. आज कहा जाता है कि संक्रमण काल में आचरण में कुछ छूट और कुछ अपवाद संभव हैं और यह कर अनेक प्रकार की अनैतिकता कर ली जाती है किन्तु, अपने जीवन के कठिनतम और कठोरतम समय में भी प्रभु श्री राम नीति और धर्म सम्मत ही रहे. जब शत्रुओं की ओर से विभीषण ने राम के साथ सहयोग का प्रस्ताव रखा तब सुग्रीव ने राम से कहा कि, यह शत्रु का भाई है, राक्षस कुल से है, और हो सकता है कि यह हमारें साथ किसी प्रकार का छल कपट कर ले. सुग्रीव ने यह भी कहा कि यह अपने सहोदर का नहीं हुआ, तब हमारा कैसे हो सकता है? इस वृतांत में श्री राम के गठबंधन के साथी और बाली पुत्र अंगद ने भी लगभग सुग्रीव की ही भांति मत प्रकट किया था और कहा था कि विभीषण को बंदी बनाने अथवा वध की आज्ञा प्रदान की जाए. गठबंधन के ही जामवंत ने भी मत प्रकट किया कि शत्रु शिविर से संबंधित किसी भी व्यक्ति पर कभी विश्वास न किया जाए क्योंकि वे कभी भी धोखा दे सकते हैं. सभी ने राम को यही परामर्श दिया कि विभीषण विश्वास योग्य नहीं है. किन्तु इस सबके बाद भक्त वत्सल श्री राम ने जो निर्णय लिया वह पवन पुत्र हनुमान और राजनीति के गूढ़ ज्ञाता हनुमान के कहे अनुसार लिया और विभीषण को शरण देकर उसके साथ रावण से युद्ध किया. श्री राम के जीवन में इसके पूर्व के एक घटना क्रम में भी जनप्रिय राजा किन्तु कठोरता पूर्वक कर्तव्य पालन करनें वाले राजा की छवि दृष्टिगोचर होती है जब चित्रकूट में भरत, राम को वापस ले जाने पहुंचे तब राम ने अनुज भरत को समझाकर राजकाज चलाने के लिए मना लिया, किन्तु भरत को राज्य चलाने का अनुभव तो था ही नहीं अतः राम ने भरत को राज्य संचालन की व्यावहारिक शिक्षा दी और कहा कि मंत्री परिषद में केवल ऐसे सदाचारी और सज्जन ही सम्मिलित किए जाएं, जो घूस न लेते हों, पीढ़ीगत रूप से पिता-पितामहों के समय से काम करते आ रहे हों अर्थात अनुभवी हों तथा निष्कपट, निश्छल स्वभाव के धनी हों. कालजयी रामभक्त तुलसीदास ने रामचरित मानस की चौपाईयों में राजा राम को उद्दृत करते हुए कहा है कि-

मुखिय मुख सो चाहिए खान पान कहुं एक।

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।

राम कहते हैं कि राजा को मुख के सदृश होना चाहिए. जैसे मुख अन्न को ग्रहण करता है पर अन्य अंगों का पालन-पोषण समान रूप से करता है, इसी तरह राजा शासक होकर जनता से कर, शुल्क व उपहार ग्रहण करता है, एवं इससे राजकोष का संचालन इस प्रकार करता है कि सम्पूर्ण राज्य का पालन पोषण समान रूप से हो. यही राजधर्म का एक अंश है.

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