लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

मैं यहां ए के रामानुजन के उस विवादास्पद लेख का खण्डन नहीं कर रहा, जिसे हाल ही में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की पहल पर दिल्ली विश्व विद्यालय के इतिहास स्नातक पाठ्यक्रम से प्रतिबंधित किया गया है। मैं इस बात का प्रखर पक्षधर हूं कि इतिहास पुरातत्व संबंधी कथाओं पर निरंतर शोधपरक सामग्री प्रकाश में आती रहनी चाहिए। क्योंकि रामायण और महाभारत कथाएं नाना लोक स्मृतियों और विविध आयामों में प्रचलित बनी रहकर वर्तमान हैं। इनका विस्तार भी सार्वभौमिक है। दुनिया के ही नहीं भारत के भी वामपंथी विचारधारा से प्रेरित बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तरह-तरह के कुतर्क गढ़ कर इस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत को मिथक कहकर नकारने की कोशिश करता रहा है। लेकिन देश-दुनिया के जनमानस में राम-कृष्ण की जो मूर्त-अमूर्त छवि बनी हुई है, उसे गढ़े गए तर्कों-कुतर्कों से कभी खंडित नहीं किया जा सका। शायद इसीलिए भवभूति और कालिदास ने रामायण को इतिहास बताया। बाल्मीकि रामायण और उसके समकालीन ग्रंथों में ‘इतिहास’ को ‘पुरावृत्त’ कहा गया है। गोया, कालिदास के ‘रघुवंश’ में विश्वामित्र राम को पुरावृत्त सुनाते हैं। मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने रामायण को महाकाव्यात्मक इतिहास की श्रेणी में रखा है। ऐसे ग्रन्थों की तथ्यात्मकताओं को झुठलाने की दृष्टि से कलंक और काम कथाओं के विभिन्न रामायणों में वर्णित क्षेपकों के संकलन को अल्पवयस्क छात्रों को पढ़ाकर आखिर हम किस प्रकार की जुगुप्सा अथवा जिज्ञासा विद्यार्थियों में उत्पन्न करना चाहते हैं? इन्हीं ग्रंथों में विज्ञानसम्मत अनेक सूत्र व स्त्रोत मौजूद हैं। हम इन्हें क्यों नहीं संकलित कर पाठ्यक्रमों में शामिल करते? ऐसा करने से हम मेधावी छात्रों में विज्ञान सम्मत महात्वाकांक्षा जगा सकते हैं और भारतीय जीवन-मूल्यों के इन आधार ग्रंथों से मिथकीय आध्यात्मिकता की धूल झाड़ने का काम भी कर सकते हैं।

इतिहास, तथ्य और घटनाओं के साथ मानव की विकास यात्रा की खोज भी है। यह तय है कि मानव, अपने विकास के अनुक्रम में ही वैज्ञानिक अनुसंधानों से सायास-अनायास जुड़ता रहा है। ये वैज्ञानिक उपलब्धियां या आविष्कार रामायण, महाभारतकाल मे उसी तरह चरमोत्कर्ष पर थीं, जिस तरह ऋग्वेद के लेखन-संपादन काल के समय संस्कृत भाषायी विकास के शिखर पर थी। रामायण का शब्दार्थ भी राम का ‘अयण’ अर्थात ‘भ्रमण’ से है। वे तीन सौ रामायण और अनेक रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथ, जिनके प्रभाव को नकारने के लिए पाउला रिचमैन ने 1942 में ‘मैनी रामायणस द डाइवर्सिटी ऑफ ए नैरेटिव ट्रेडिशन इन साउथ एशिया’ लिखी और ए के रामानुजन ने ‘थ्री हंड्रेड रामायण फाइव एग्जांपल एंड थ्री थॉट्स ऑन ट्रांसलेशन’ निबंध लिख कर कामजन्य विद्रूप अंशों का संकलन किया। इन्हीं रामायणों, रामायण विषयक संदर्भ ग्रंथों और मदन मोहन शर्मा शाही के बृहद् उपन्यास से इस लेख में विज्ञान सम्मत आविष्कारों की खोजों को व्याख्यायित किया जा रहा है।

रामायण एकांगी दृष्टिकोण का वृतांत भर नहीं है। इसमें कौटुम्बिक सांसारिकता है। राज-समाज संचालन के कूट मंत्र हैं। भूगोल है। वनस्पति और जीव जगत हैं। राष्ट्रीयता है। राष्ट्र के प्रति उत्सर्ग का चरम है। अस्त्र-शस्त्र हैं। यौद्धिक कौशल के गुण हैं। भौतिकवाद है। कणांद का परमाणुवाद है। सांख्यदर्शन और योग के सूत्र हैं। वेदांत दर्शन है और अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियां हैं। गांधी का राम-राज्य और पं. दीनदयाल उपाध्याय का आध्यात्मिक भौतिकवाद के उत्स इसी रामायण में हैं। वास्तव में रामायण और उसके परवर्ती ग्रंथ कवि या लेखक की कपोल-कल्पना न होकर तात्कालीन ज्ञान के विश्व कोश हैं। जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने तो ऋग्वेद को कहा भी था कि यह अपने युग का ‘विश्व कोश’ है। मसलन ‘एन-साइक्लोपीडिया ऑफ वर्ल्ड !

लंकाधीश रावण ने नाना प्रकार की विधाओं के पल्लवन की दृष्टि से यथोचित धन व सुविधाएं उपलब्ध कराई थीं। रावण के पास लडाकू वायुयानों और समुद्री जलपोतों के बड़े भण्डार थे। प्रक्षेपास्त्र और ब्रह्मास्त्रों का अकूत भण्डार व उनके निर्माण में लगी अनेक वेधशालाएं थीं। दूरसंचार व दूरदर्शन की तकनीकी-यंत्र लंका में स्थापित थे। राम-रावण युद्ध केवल राम और रावण के बीच न होकर एक विश्वयुद्ध था। जिसमें उस समय की समस्त विश्व-शक्तियों ने अपने-अपने मित्र देश के लिए लड़ाई लड़ी थी। परिणामस्वरूप ब्रह्मास्त्रों के विकट प्रयोग से लगभग समस्त वैज्ञानिक अनुसंधान-शालाएं उनके आविष्कारक, वैज्ञानिक व अध्येता काल-कवलित हो गए। यही कारण है कि हम कालांतर में हुए महाभारत युद्ध में भी वैज्ञानिक चमत्कारों को रामायण की तुलना में उत्कृष्ट व सक्षम नहीं पाते हैं। यह भी इतना विकराल विश्व-युद्ध था कि रामायण काल से शेष बचा जो विज्ञान था, वह महाभारत युद्ध के विंध्वस की लपेट में आकर नष्ट हो गया। इसीलिए महाभारत के बाद के जितने भी युद्ध हैं वे खतरनाक अस्त्र-शस्त्रों से लड़े जाकर थल सेना के माध्यम से ही लड़े गए दिखाई देते हैं। बीसवीं सदी में हुए द्वितीय विश्व युद्ध में जरूर हवाई हमले के माध्यम से अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा-नागाशाकी में परमाणु हमले किए।

बाल्मीकी रामायण एवं नाना रामायणों तथा अन्य ग्रंथों में ‘पुष्पक विमान’ के उपयोग के विवरण हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उस युग में राक्षस व देवता न केवल विमान शास्त्र के ज्ञाता थे, बल्कि सुविधायुक्त आकाशगामी साधनों के रूप में वाहन उपलब्ध भी थे। रामायण के अनुसार पुष्पक विमान के निर्माता ब्रह्मा थे। ब्रह्मा ने यह विमान कुबेर को भेंट किया था। कुबेर से इसे रावण ने छीन लिया। रावण की मृत्यु के बाद विभीषण इसका अधिपति बना और उसने फिर से इसे कुबेर को दे दिया। कुबेर ने इसे राम को उपहार में दे दिया। राम लंका विजय के बाद अयोध्या इसी विमान से पहुंचे थे।

रामायण में दर्ज उल्लेख के अनुसार पुष्पक विमान मोर जैसी आकृति का आकाशचारी विमान था, जो अग्नि-वायु की समन्वयी ऊर्जा से चलता था। इसकी गति तीव्र थी और चालक की इच्छानुसार इसे किसी भी दिशा में गतिशील रखा जा सकता था। इसे छोटा-बड़ा भी किया जा सकता था। यह सभी ऋतुओं में आरामदायक यानी वतानुकूलित था। इसमें स्वर्ण खंभ मणिनिर्मित दरवाजे, मणि-स्वर्णमय सीढियां, वेदियां (आसन) गुप्त गृह, अट्टालिकाएं (केबिन) तथा नीलम से निर्मित सिंहासन (कुर्सियां) थे। अनेक प्रकार के चित्र एवं जालियों से यह सुसज्जित था। यह दिन और रात दोनों समय गतिमान रहने में समर्थ था। इस विवरण से जाहिर होता है, यह उन्नत प्रौद्योगिकी और वास्तु कला का अनूठा नमूना था।

‘ऋग्वेद’ में भी चार तरह के विमानों का उल्लेख है। जिन्हें आर्य-अनार्य उपयोग में लाते थे। इन चार वायुयानों को शकुन, त्रिपुर, सुन्दर और रूक्म नामों से जाना जाता था। ये अश्वहीन, चालक रहित, तीव्रगामी और धूल के बादल उड़ाते हुए आकाश में उड़ते थे। इनकी गति पतंग (पक्षी) की भांति, क्षमता तीन दिन-रात लगातार उड़ते रहने की और आकृति नौका जैसी थी। त्रिपुर विमान तो तीन खण्डों (तल्लों) वाला था तथा जल, थल एवं नभ तीनों में विचरण कर सकता था। रामायण में ही वर्णित हनुमान की आकाश-यात्राएं, महाभारत में देवराज इन्द्र का दिव्य-रथ, कार्त्तवीर्य अर्जुन का स्वर्ण विमान एवं सोम-विमान, पुराणों में वर्णित नारदादि की आकाश यात्राएं एवं विभिन्न देवी-देवताओं के आकाशगामी वाहन रामायण-महाभारत काल में वायुयान और हैलीकॉप्टर जैसे यांत्रिक साधनों की उपलब्धि के प्रमाण हैं।

किंवदंती तो यह भी है कि गौतम बुद्ध ने भी वायुयान द्वारा तीन बार लंका की यात्रा की थी। एरिक फॉन डॉनिकेन की किताब ‘चैरियट्स ऑफ गॉड्स’ में तो भारत समेत कई प्राचीन देशों से प्रमाण एकत्रित करके वायुयानों की तत्कालीन उपस्थिति की पुष्टि की गई है। इसी प्रकार डॉ. ओंकारनाथ श्रीवास्तव ने अनेक पाश्चात्य अनुसंधानों के मतों के आधार पर संभावना जताई है कि ‘रामायण’ में अंकित हनुमान की यात्राएं वायुयान अथवा हैलीकॉप्टर की यात्राएं थीं या हनुमान ‘राकेट बेल्ट’ बांधकर आकाशगमन करते थे,जैसाकि आज के अंतरिक्ष-यात्री करते हैं। हनुमान-मेघनाद में परस्पर हुआ वायु-युद्ध भी हावरक्रफ्ट से मिलता-जुलता है। आज भी लंका की पहाड़ियों पर चौरस मैदान पाए जाते हैं, जो शायद उस कालखण्ड के वैमानिक अड्डे थे। प्राचीन देशों के ग्रंथों में वर्णित उड़ान-यंत्रों के वर्णन लगभग एक जैसे हैं। कुछ गुफा-चित्रों में आकाशचारी मानव एवं अंतरिक्ष वेशभूषा से युक्त व्याक्तियों के चित्र भी निर्मित हैं। मिस्त्र में तो दुनिया का ऐसा नक्शा मिला है, जिसका निर्माण आकाश में उड़ान-सुविधा की पुष्टि करता है। इन सब साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि पुष्पक व अन्य विमानों के रामायण में वर्णन कोई कवि-कल्पना की कोरी उड़ान नहीं हैं।

ताजा वैज्ञानिक अनुसंधानों ने भी तय किया है कि रामायण काल में वैमानिकी प्रौद्योगिकी इतनी अधिक विकसित थी, जिसे आज समझ पाना भी कठिन है। रावण का ससुर मयासुर अथवा मयदानव ने भगवान विश्वकर्मा (ब्रह्मा) से वैमानिकी विद्या सीखी और पुष्पक विमान बनाया। जिसे कुबेर ने हासिल कर लिया। पुष्पक विमान की प्रौद्योगिक का विस्तृत व्यौरा महार्षि भारद्वाज द्वारा लिखित पुस्तक ‘यंत्र-सर्वेश्वम्’ में भी किया गया था। वर्तमान में यह पुस्तक विलुप्त हो चुकी है, लेकिन इसके 40 अध्यायों में से एक अध्याय ‘वैमानिक शास्त्र’ अभी उपलब्ध है। इसमें भी शकुन, सुन्दर, त्रिपुर एवं रूक्म विमान सहित 25 तरह के विमानों का विवरण है। इसी पुस्तक में वर्णित कुछ शब्द जैसे ‘विश्व क्रिया दर्पण’आज के राड़ार जैसे यंत्र की कार्यप्रणाली का रूपक है।

नए शोधों से पता चला है कि पुष्पक विमान एक ऐसा चमत्कारिक यात्री विमान था, जिसमें चाहे जितने भी यात्री सवार हो जाएं, एक कुर्सी हमेशा रिक्त रहती थी। यही नहीं यह विमान यात्रियों की संख्या और वायु के घनत्व के हिसाब से स्वमेव अपना आकार छोटा या बड़ा कर सकता था। इस तथ्य के पीछे वैज्ञानिकों का यह तर्क है कि वर्तमान समय में हम पदार्थ को जड़ मानते हैं, लेकिन हम पदार्थ की चेतना को जागृत कर लें तो उसमें भी संवेदना सृजित हो सकती है और वह वातावरण व परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढालने में सक्षम हो सकता है। रामायण काल में विज्ञान ने पदार्थ की इस चेतना को संभवतः जागृत कर लिया था, इसी कारण पुष्पक विमान स्व-संवेदना से क्रियाशील होकर आवश्यकता के अनुसार आकार परिवर्तित कर लेने की विलक्षणता रखता था। तकनीकी दृष्टि से पुष्पक में इतनी खूबियां थीं, जो वर्तमान विमानों में नहीं हैं। ताजा शोधों से पता चला है कि यदि उस युग का पुष्पक या अन्य विमान आज आकाश गमन कर लें तो उनके विद्युत चुंबकीय प्रभाव से मौजूदा विद्युत व संचार जैसी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी। पुष्पक विमान के बारे में यह भी पता चला है कि वह उसी व्यक्ति से संचालित होता था इसने विमान संचालन से संबंधित मंत्र सिद्ध किया हो, मसलन जिसके हाथ में विमान को संचालित करने वाला रिमोट हो। शोधकर्ता भी इसे कंपन तकनीक (वाइब्रेशन टेकनोलॉजी) से जोड़ कर देख रहे हैं। पुष्पक की एक विलक्षणता यह भी थी कि वह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक ही उड़ान नहीं भरता था, बल्कि एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक आवागमन में भी सक्षम था। यानी यह अंतरिक्षयान की क्षमताओं से भी युक्त था।

रामायण एवं अन्य राम-रावण लीला विषयक ग्रंथों में विमानों की केवल उपस्थिति एवं उनके उपयोग का विवरण है, इस कारण कथित इतिहासज्ञ इस पूरे युग को कपोल-कल्पना कहकर नकारने का साहस कर डालते हैं। लेकिन विमानों के निर्माण, इनके प्रकार और इनके संचालन का संपूर्ण विवरण महार्षि भारद्वाज लिखित ‘वैमानिक शास्त्र’ में है। यह ग्रंथ उनके प्रमुख ग्रंथ ‘यंत्र-सर्वेश्वम्’ का एक भाग है। इसके अतिरक्त भारद्वाज ने ‘अंशु-बोधिनी’ नामक ग्रंथ भी लिखा है, जिसमें ‘ब्रह्मांड विज्ञान’( कॉस्मोलॉजी) का वर्णन है। इसी ज्ञान से निर्मित व परिचालित होने के कारण विमान विभिन्न ग्रहों की उड़ान भरते थे। वैमानिक-शास्त्र में आठ अध्याय, एक सौ अधिकरण (सेक्शंस) पांच सौ सूत्र (सिद्धांत) और तीन हजार श्लोक हैं। इस ग्रंथ की भाषा वैदिक संस्कृत है।

वैमानिक-शास्त्र में चार प्रकार के विमानों का वर्णन है। ये काल के आधार पर विभाजित हैं। इन्हें तीन श्रेणियों में रखा गया है। इसमें ‘मंत्रिका’ श्रेणी में वे विमान आते हैं जो सतयुग और त्रेतायुग में मंत्र और सिद्धियों से संचालित व नियंत्रित होते थे। दूसरी श्रेणी ‘तांत्रिका’ है, जिसमें तंत्र शक्ति से उड़ने वाले विमानों का ब्यौरा है। इसमें तीसरी श्रेणी में कलयुग में उड़ने वाले विमानों का ब्यौरा भी है, जो इंजन (यंत्र) की ताकत से उड़ान भरते हैं। यानी भारद्वाज ऋषि ने भविष्य की उड़ान प्रौद्योगिकी क्या होगी, इसका अनुमान भी अपनी दूरदृष्टि से लगा लिया था। इन्हें कृतक विमान कहा गया है। कुल 25 प्रकार के विमानों का इसमें वर्णन है।

तांत्रिक विमानों में ‘भैरव’ और ‘नंदक’ समेत 56 प्रकार के विमानों का उल्लेख है। कृतक विमानों में ‘शकुन’, ‘सुन्दर’ और ‘रूक्म’ सहित 25 प्रकार के विमान दर्ज हैं। ‘रूक्म’ विमान में लोहे पर सोने का पानी चढ़ा होने का प्रयोग भी दिखाया गया है। “त्रिपुर”विमान ऐसा है, जो जल, थल और नभ में तैर-दौड़ व उड़ सकता है।

उड़ान भरते हुए विमानों का करतब दिखाये जाने व युद्ध के समय बचाव के उपाय भी वैमानिकी-शास्त्र में हैं। बतौर उदाहरण यदि शत्रु ने किसी विमान पर प्रक्षेपास्त्र अथवा स्यंदन (रॉकेट) छोड़ दिया है तो उसके प्रहार से बचने के लिए विमान को तियग्गति (तिरछी गति) देने, कृत्रिम बादलों में छिपाने या ‘तामस यंत्र’ से तमः (अंधेरा) अर्थात धुआं छोड़ दो। यही नहीं विमान को नई जगह पर उतारते समय भूमि गत सावधानियां बरतने के उपाय व खतरनाक स्थिति को परखने के यंत्र भी दर्शाए गए हैं। जिससे यदि भूमिगत सुरंगें हैं तो उनकी जानकारी हासिल की जा सके। इसके लिए दूरबीन से समानता रखने वाले यंत्र ‘गुहागर्भादर्श’ का उल्लेख है। यदि शत्रु विमानों से चारों ओर से घेर लिया हो तो विमान में ही लगी ‘द्विचक्र कीली’ को चला देने का उल्लेख है। ऐसा करने से विमान 87 डिग्री की अग्नि-शक्ति निकलेगी। इसी स्थिति में विमान को गोलाकार घुमाने से शत्रु के सभी विमान नष्ट हो जाएंगे।

इस शास्त्र में दूर से आते हुए विमानों को भी नष्ट करने के उपाय बताए गए हैं। विमान से 4087 प्रकार की घातक तरंगें फेंककर शत्रु विमान की तकनीक नष्ट कर दी जाती है। विमानों से ऐसी कर्कश ध्वनियां गुंजाने का भी उल्लेख है, जिसके प्रगट होने से सैनिकों के कान के पर्दे फट जाएंगे। उनका हृदयाघात भी हो सकता है। इस तकनीक को ‘शब्द सघण यंत्र’ कहा गया है। युद्धक विमानों के संचालन के बारे में संकेत दिए हैं कि आकाश में दौड़ते हुए विमान के नष्ट होने की आशंका होने पर सातवीं कीली अर्थात घुंडी चलाकर विमान के अंगों को छोटा-बड़ा भी किया जा सकता है। उस समय की यह तकनीक इतनी महत्वपूर्ण है कि आधुनिक वैमानिक विज्ञान भी अभी उड़ते हुए विमान को इस तरह से संकुचित अथवा विस्तारित करने में समर्थ नहीं हैं।

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1 Comment on "रामायण काल में विज्ञान (भाग-१)"

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DrRajesh Dehariya
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में विश्वास करता हूँ की हमारा विज्ञानं मात्र पदार्थों के परीक्षणों पर ही सीमित नहीं था वरन हम लोग मानसिक ,आध्यात्मिक परीक्षण करने में सक्षम थे और इनके लाभ दैनिक दिनचर्या में उठाने में सक्षम थे .

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